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बुधवार, 25 मार्च 2026

मार्च २५, दोहे, रामकिंकर, यीट्स, सॉनेट, नदी, होली, हवन, तंत्रोक्त रात्रिसूक्त, छप्पय, ग़ज़ल

 सलिल सृजन मार्च २५

*
ग़ज़लिका
० 
हाथ उनके ही साफ रहते हैं
हाथ जो लोग साफ करते हैं
.
काम करते हो गर अहर्निश तो
हाथ मैले भी साफ लगते हैं
.
हाथ जुड़ते हैं जब इबादत में
माफ़ दुनिया को आप करते हैं
.
आइनों के न हाथ होते हैं
कान भी वे नहीं पकड़ते हैं
.
हाथ पर कुछ धरें नहीं मन तो
लोग बेबात नाम धरते हैं
.
दूरियाँ दिल में पल न पातीं जब
हाथ को थाम हाथ मिलते हैं
.
हाथ जुड़ माथ जब नवाते हैं
दिल में सद्भाव सुमन खिलते हैं
०००
छंदशाला
दोहा-रोला-कुंडलिया
 ०
नयनप्राश का यदि करें, सेवन नयन सदैव।
स्वस्थ नयन होंगे सभी, व्यग्र न नयन अजैव।। - अशोक व्यग्र
व्यग्र न नयन अजैव, शांति रख क्रांति करेंगे।
भ्रांति मिटा सद्भाव, और सहकार वरेंगे।।
जमा जमीं पर कदम, छू लेंगे हम आकाश।
रहें सहायक सदा, हर कदम पर नयन प्राश।।
२५.३.२०२६
०००

समसामयिक दोहे
जज को जज मत कीजिए, कह देंगे कंटेम्पट।
कहीं न हियरिंग हो सके, लाख करो कंप्लेन्ट।।
.
जनमत की अवहेलना, करते कहते न्याय।
खेल रहे कानून से, सिस्टम है निरुपाय।।
.
बोरी भर दें नोट लें, मुट्ठी भर सामान।
मँहगाई की मार से, त्रस्त-पस्त इंसान।।. 
०००
स्मरण युगतुलसी
बोलिए राम पिआरा
राम नाम पिचकारी में भर, सिय माता का रंग
मलें गुलाल पवनसुत का तब, हो होली हुड़दंग
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
कोसल्या कैकेई सुमित्रा, मेवा गुझिया बांँट
खुश हों, भोग लगांय पवनसुत, गरम गरम लें छाँट
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
ठंडाई में भांग घोल पी, हैं लछमन जी मस्त
कहाँ उर्मिला खोजें हँस, हँस भरत माण्डवी पस्त
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
रंग बाल्टी भर लें ताकें, श्रुतिकीरति कित नाथ?
दिखे शत्रुघ्न दौड़ी फिसले, दोनों थामे हाथ
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
जांबवान पर रंग डालकर, सभी हुए हैरान
रंग न कोई चढ़ पाता है, आफत में है जान
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
थकें न लिख लिख राम कथाएँ, वाल्मीकि वन बैठ
जनभाषा में गाएँ तुलसी, जन गण मन में पैठ
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
करें रामकिंकर मीमांसा, रंग भक्ति का घोल
उड़िया बाबा ने दी दीक्षा, राम नाम अनमोल
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
नित्य नहाना नाम नर्मदा, गुरु से पा आशीष
रामकथामृत बाँटें दीदी, मंदाकिनी मनीष
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
राम-भक्ति रस पान करें जो, हों भव सागर पार
चढ़े राम का रंग न छूटे, हो प्रभु पर बलिहार
बोलिए राम पिआरा
अवधपति सा रा रा रा
२५.३.३०२४
•••
होरी के हुरहुरे
सूरज के मुँह पर मले, ऊषा लाल गुलाल
हो न लाल पीला कहे, मुँह पर मचा धमाल
कहे घर ताको हियां
मुझे भाया महोबिया
सूर्य कलपे बेचारा
जोगी जी सा रा रा रा
सर ला रंग-अबीर दें, खेलूँ सरला संग
कहें सुशील दवाई कह, गटक बहुत सी भंग
कर रहे नैन मटक्का
डॉक्टर हक्का बक्का
हुआ झट नौ दो ग्यारा
जोगी सी सा रा रा
लट्ठ मार होली कहें, तनिक न करिए रोष
खुद गुझिया खाकर कहें, सलिल करो संतोष
अजब है जग की माया
धूप में बैठी छाया
मूंँदकर नैन निहारा
जोगी जी सा रा रा रा
कर विनोद जिज्ञासु ने, कहा न पीसो दंत
हुए लापता युगों से, अरुण बसंत न तंत
न वसु धा वसुधा बोली
तनूजा करे ठिठोली
सो रहे ने हुंकारा
जोगी जी सा रा रा रा
चौबे जी पर चढ़ गया, है चौबिन का रंग
गारंटी दे रहे हैं, महामहिम कर जंग
तुरत रेखा घर जा रे!
भाँग पी, ले चटखारे
केजरी है बेचारा
जोगी जी सा रा रा रा
•••
सॉनेट
नदी
नदी नीर निर्मल रखो रे!
नदी जीव की जिंदगी है।
नदी श्वास की बंदगी है।
नदी पीर मिल कम करो रे!
नदी तीर जीवन जिया रे!
नदी सभ्यता की नियंता।
नदी संस्कृति की विधाता।
नदी आस का नव दिया रे!
नदी ने न कुछ भी लिया रे!
नदी ने न निज जल पिया रे!
नदी ने दिया ही दिया रे!
नदी सूखती, सब मरें रे!
नदी बाढ़ हो तो मिटें रे!
नदी साफ रखकर तरें रे!
२५-३-२०२२
•••
Poems : William Butler Yeats
काव्यानुवाद : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
* 1. The Falling of the Leaves
Autumn is over the long leaves that love us,
And over the mice in the barley sheaves;
Yellow the leaves of the rowan above us,
And yellow the wet wild-strawberry leaves.
The hour of the waning of love has beset us,
And weary and worn are our sad souls now;
Let us part, ere the season of passion forget us,
With a kiss and a tear on thy drooping brow.
*
१. पतझर
*
हमें रहे प्रिय लंबे पत्तों पर है पतझर, २४
जौ की ढेरी में जा छिपे हुए चूहों पर;
पीले पत्ते रोवन तरु के; सर के ऊपर,
पीले-गीले पर्ण जंगली रसबेरी के।
प्रणय भंग की बेला में हैं खिन्न मना हम,
ओढ़े हुए उदासी अपनी आत्माएँ अब;
सहभागी हों, भुला न दे उमंग का मौसम,
अश्रु भरी नत तेरी भौंहों का चुम्बन कर।
२५-३-२०२२
***
2. A Cradle Song
THE angels are stooping
Above your bed;
They weary of trooping
With the whimpering dead.
God's laughing in Heaven
To see you so good;
The Sailing Seven
Are gay with His mood.
I sigh that kiss you,
For I must own
That I shall miss you
When you have grown.
*
२. लोरी
झुकी हुई हैं परियाँ २२
तेरी शैया पर;
क्लांत भटकने से हैं वे
मुरदों जैसी।
देव स्वर्ग में हँसें
देख तुमको अच्छा।
नाविक सात
मस्त हैं मस्ती में अपनी।
तुम्हें चूम कर आह भरूँ,
मैं अपने आप
सोच खलेगी कमी
बड़े होगे जब तुम।
२५-३-२०२२
***
विमर्श
घर पर हवन कैसे करें?
हवन कुंड, हवन सामग्री (आम की लकड़ी, चावल, जौ, कलावा, शक्कर, गाय का घी, पान का पत्ता, काला तिल, सूखा नारियल, लौंग, इलायची, कपूर, बताशा आदि)
लाकर सबसे पहले स्नान तथा भूमि, कलश तथा देव पूजन कर लें।
हवन सामग्री को आपस में ठीक से मिला लें।
हवन कुंड को जल से शुद्ध कर लें। आटे से रंगोली बनाकर इसके ऊपर हवन कुंड रख दें। हवन कुंड के चारों तरफ कलावा बाँध दें। हवन कुंड में लकड़ी रखें और थोड़ा सा कपूर या घी डालकर अग्नि प्रज्वलित करें। आसन पर बैठकर निम्न मंत्र एक-एक कर पढ़ें। हर मंत्र के पाठ के बाद अग्नि में आहुति डाल दें।
हवन करते समय इन मंत्रों के साथ दें आहुति:
ॐ गणेशाय नम: स्वाहा
ॐ सरस्वत्यै नम: स्वाहा
ॐ आग्नेय नम: स्वाहा
ॐ पृथ्व्यै नाम: स्वाहा
ॐ नवग्रहाय नम: स्वाहा
ॐ कर्मदेवताय चित्रगुप्ताय नम: स्वाहा
ॐ शिव-पार्वत्यै नम: स्वाहा
ॐ विष्णु-लक्ष्म्यै नम: स्वाहा
ॐ हनुमते नम: स्वाहा
ॐ कुल देवताय नम: स्वाहा
ॐ स्थान देवताय नम: स्वाहा
ॐ भारत देशाय नम: स्वाहा
ॐ हिंदीभाषाय नम: स्वाहा
ॐ पञ्चतत्वाय नम: स्वाहा
ॐ जयंती मंगलाकाली, भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते स्वाहा।
ॐ ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरांतकारी भानु: शशि भूमि सुतो बुधश्च: गुरुश्च शुक्र शनि राहु केतव सर्वे ग्रहा शांति करा भवंतु स्वाहा।
ॐ गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवा महेश्वर: गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम: स्वाहा।
ॐ शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे, सर्व स्थार्ति हरे देवि नारायणी नमस्तुते।
ॐ पितृ देवताय नम: स्वाहा
ॐ सर्वदेवताय नम: स्वाहा
इसके बाद हवन में खीर का भोग डालें। फिर एक सूखा नारियल लें। इसके चारों ओर रक्षा सूत्र लपेट कर घी मल लें। इस नारियल को हवन कुंड के बीच में रख दें। अंत में बची हुआ हवन धूप को ऊपर से डालकर इस मंत्र को बोले- ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते.
***
महाशोक
आज प्रातःकाल हिंदी माँ के वरद पुत्र, महाकाव्यों उत्तर रामायण व उत्तर भागवत सहित अनेक कृतियों के यशस्वी रचयिता डॉक्टर किशोर काबरा धराधाम से विदा लेकर माँ सरस्वती के चरणों में पहुँच गए।
यह मेरी व्यक्तिगत क्षति है। अपनी गुजरात यात्राओं में हमेशा मुझ पर काबरा जी ने अग्रजवत असीम स्नेह बरसाया। प्रो भगवत प्रसाद मिश्र 'नियाज', डॉक्टर अंबाशंकर नागर डॉक्टर विष्णु विराट, डॉक्टर शांति सेठ, डॉक्टर काबरा जी आदि से अहमदाबाद और गुजरात हिंदी का तीर्थ था। डॉक्टर किशोर काबरा के प्रति हृदय से श्रद्धांजलि।
*
हे क्षणभंगुर भव राम राम।
वे चिर किशोर, शत शत प्रणाम।।
हिंदी ने खोया सुहृद पूत
पा नाम अमित, अब है अनाम।।
थे तपःपूत, थे अग्रदूत
थे कर्मव्रती सचमुच अकाम।।
अंतिम दम तक थे सृजनलीन
चाहा न कभी किंचित विराम।।
'उत्तर रामायण' कीर्तिकलश
'उत्तर भागवत' है पूर्णकाम।।
तुमको खोकर हम दीन हुए
थे अतिसमृद्ध कर कमल थाम।।
हे महाभाग! शत वंदन लो
वर दो हिंदी हित मिटे चाम।।
२५-३-२०२२
***
हिंदी काव्यानुवाद-
तंत्रोक्त रात्रिसूक्त
*
II यह तंत्रोक्त रात्रिसूक्त है II
I ॐ ईश्वरी! धारक-पालक-नाशक जग की, मातु! नमन I
II हरि की अनुपम तेज स्वरूपा, शक्ति भगवती नींद नमन I१I
*
I ब्रम्हा बोले: 'स्वाहा-स्वधा, वषट्कार-स्वर भी हो तुम I
II तुम्हीं स्वधा-अक्षर-नित्या हो, त्रिधा अर्ध मात्रा हो तुम I२I
*
I तुम ही संध्या-सावित्री हो, देवी! परा जननि हो तुम I
II तुम्हीं विश्व को धारण करतीं, विश्व-सृष्टिकर्त्री हो तुम I३I
*
I तुम ही पालनकर्ता मैया!, जब कल्पांत बनातीं ग्रास I
I सृष्टि-स्थिति-संहार रूप रच-पाल-मिटातीं जग दे त्रास I४I
*
I तुम्हीं महा विद्या-माया हो, तुम्हीं महा मेधास्मृति हो I
II कल्प-अंत में रूप मिटा सब, जगन्मयी जगती तुम हो I५I
*
I महा मोह हो, महान देवी, महा ईश्वरी तुम ही हो I
II सबकी प्रकृति, तीन गुणों की रचनाकर्त्री भी तुम हो I६I
*
I काल रात्रि तुम, महा रात्रि तुम, दारुण मोह रात्रि तुम हो I
II तुम ही श्री हो, तुम ही ह्री हो, बोधस्वरूप बुद्धि तुम हो I७I
*
I तुम्हीं लाज हो, पुष्टि-तुष्टि हो, तुम ही शांति-क्षमा तुम हो I
II खड्ग-शूलधारी भयकारी, गदा-चक्रधारी तुम हो I८I
*
I तुम ही शंख, धनुष-शर धारी, परिघ-भुशुण्ड लिए तुम हो I
II सौम्य, सौम्यतर तुम्हीं सौम्यतम, परम सुंदरी तुम ही हो I९I
*
I अपरा-परा, परे सब से तुम, परम ईश्वरी तुम ही हो I
II किंचित कहीं वस्तु कोई, सत-असत अखिल आत्मा तुम होI१०I
*
I सर्जक-शक्ति सभी की हो तुम, कैसे तेरा वंदन हो ?
II रच-पालें, दे मिटा सृष्टि जो, सुला उन्हें देती तुम हो I११I
*
I हरि-हर,-मुझ को ग्रहण कराया, तन तुमने ही हे माता! I
II कर पाए वन्दना तुम्हारी, किसमें शक्ति बची माता!! I१२I
*
I अपने सत्कर्मों से पूजित, सर्व प्रशंसित हो माता!I
II मधु-कैटभ आसुर प्रवृत्ति को, मोहग्रस्त कर दो माता!!I१३II'
*
I जगदीश्वर हरि को जाग्रत कर, लघुता से अच्युत कर दो I
II बुद्धि सहित बल दे दो मैया!, मार सकें दुष्ट असुरों को I१४I
*
IIइति रात्रिसूक्त पूर्ण हुआII
१२-४-२०१७
***
व्यंग्य दोहावली:
*
व्यंग्य उठाता प्रश्न जो, उत्तर दें हम-आप.
लक्ष्य नहीं आघात है, लक्ष्य सके सच व्याप.
*
भोग लगाखें कर रए, पंडज्जी आराम.
भूले से भी ना कहें, बे मूँ से "आ राम".
*
लिए आरती कह रहे, ठाकुर जी "जय राम".
ठाकुर जी मुसका रहे, आज पड़ा फिर काम.
*
रावण ज्यादा राम कम, हैं बनिए के इष्ट.
कपड़े सस्ते राम के, न्यून मुनाफा कष्ट.
*
वनवासी को याद कब, करें अवध जा राम.
सीता को वन भेजकर, मूरत रखते वाम.
*
शीश कटा शम्बूक का, पढ़ा ज्ञान का ग्रंथ.
आरक्षित सांसद कहाँ कहो, कहाँ खोजते पंथ?
*
जाति नहीं आधार हो, आरक्षण का मीत
यही सबक हम सीख लें, करें सत्य से प्रीत.
*
हुए असहमत शिवा से, शिव न भेजते दूर.
बिन सम्मति जातीं शिवा, पातीं कष्ट अपूर.
*
राम न सहमत थे मगर, सिय को दे वनवास.
रोक न पाए समय-गति, पाया देकर त्रास.
*
'सलिल' उपनिषद उठाते, रहे सवाल अनेक.
बूझ मनीषा तब सकी, उत्तर सहित विवेक.
*
'दर्शन' आँखें खोलकर, खोले सच की राह.
आँख मूँद विश्वास कर, मिले न सच की थाह.
*
मोह यतीश न पालता, चाहें सत्य सतीश.
शक-गिरि पर चढ़ तर्क को, मिलते सत्य-गिरीश.
*
राम न केवल अवध-नृप, राम सनातन लीक.
राम-चरित ही प्रश्न बन, शंका हरे सटीक.
*
नंगा ही दंगा करें, बुद्धि-ज्ञान से हीन.
नेता निज-हित साधता, दोनों वृत्ति मलीन.
*
'सलिल' राम का भक्त है, पूछे भक्त सवाल.
राम सुझा उत्तर उसे, मेटें सभी बवाल.
*
सिया न निर्बल थी कभी, मत कहिए असहाय.
लीला कर सच दिखाया, आरक्षण-अन्याय.
*
सबक न हम क्यों सीखते, आरक्षण दें त्याग.
मानव-हित से ही रखें, हम सच्चा अनुराग.
*
कल्प पूर्व कायस्थ थे, भगे न पाकर साथ.
तब बोया अब काटते, विप्र गँवा निज हाथ.
*
नंगों से डरकर नहीं, ले पाए कश्मीर.
दंगों से डर मौन हो, ब्राम्हण भगे अधीर.
*
हम सब 'मानव जाति' हैं, 'भारतीयता वंश'.
परमब्रम्ह सच इष्ट है, हम सब उसके अंश.
*
'पंथ अध्ययन-रीति' है, उसे न कहिए 'धर्म'.
जैन, बौद्ध, सिख, सनातन, एक सभी का मर्म.
*
आवश्यकता-हित कमाकर, मानव भरता पेट.
असुर लूट संचय करे, अंत बने आखेट.
*
दुर्बल-भोगी सुर लुटे, रक्षा करती शक्ति.
शक्ति तभी हो फलवती, जब निर्मल हो भक्ति.
*
'जाति' आत्म-गुण-योग्यता, का होती पर्याय.
जातक कर्म-कथा 'सलिल', कहे सत्य-अध्याय.
*
'जाति दिखा दी' लोक तब, कहे जब दिखे सत्य.
दुर्जन सज्जन बन करे, 'सलिल' अगर अपकृत्य.
*
धंधा या आजीविका, है केवल व्यवसाय.
'जाति' वर्ण है, आत्म का, संस्कार-पर्याय.
*
धंधे से रैदास को, कहिए भले चमार.
किंतु आत्म से विप्र थे, यह भी हो स्वीकार.
*
गति-यति लय का विलय कर, सच कह दे आनंद.
कलकल नाद करे 'सलिल', नेह नर्मदा छंद.*
श्रीराम नवमी, २५.३.२०१८
***
दोहा दुनिया
*
रश्मि अभय रह कर करे, घोर तिमिर पर वार
खुद को करले अलग तो, कैसे हो भाव-पार?
*
बाती जग उजयारती , दीपक पाता नाम
रुके नहीं पर मदद से, सधता जल्दी काम
*
बाती सँग दीपक मिला, दिया पुलिस ने ठोंक
टीवी पर दो टाँग के, श्वान रहे हैं भौंक
*
यह बाती उस दीप को, देख जल उठी आप
किसका कितना दोष है?, कौन सकेगा नाप??
*
बाती-दीपक को रहा, भरमाता जो तेल
उसे न कोइ टोंकता, और न भेजे जेल
*
दोष न 'का'-'की' का कहें, यही समय की माँग
बिना पिए भी हो नशा,घुली कुएँ में भाँग
२५-३-२०१७
***
सानंद दे छंद नर्मदा २२ :
छप्पय छन्द
रोला-उल्लाला मिले, बनता छप्पय छंद
*
छप्पय षट्पदिक (६ पंक्तियों का), संयुक्त (दो छन्दों के मेल से निर्मित), मात्रिक (मात्रा गणना के आधार पर रचित), विषम (विशन चरण ११ मात्रा, सम चरण१३ मात्रा ) छन्द हैं। इसमें पहली चार पंक्तियाँ चौबीस मात्रिक रोला छंद (११ + १३ =२४ मात्राओं) की तथा बाद में दो पंक्तियाँ उल्लाला छंद (१३+ १३ = २६ मात्राओं या १४ + १४ = २८मात्राओं) की होती हैं। उल्लाला में सामान्यत:: २६ तथा अपवाद स्वरूप २८ मात्राएँ होती हैं। छप्पय १४८ या १५२ मात्राओं का छंद है। संत नाभादास सिद्धहस्त छप्पयकार हुए हैं। 'प्राकृतपैंगलम्'[1] में इसका लक्षण और इसके भेद दिये गये हैं।
छप्पय के भेद- छंद प्रभाकरकार जगन्नाथ प्रसाद भानु के अनुसार छप्पय के ७१ प्रकार हैं। छप्पय अपभ्रंश और हिन्दी में समान रूप से प्रिय रहा है। चन्द[2], तुलसी[3], केशव[4], नाभादास [5], भूषण [6], मतिराम [7], सूदन [8], पद्माकर [9] तथा जोधराज हम्मीर रासो कुशल छप्पयकार हुए हैं। इस छन्द का प्रयोग मुख्यत:वीर रस में चन्द से लेकर पद्माकर तक ने किया है। इस छन्द के प्रारम्भ में प्रयुक्त रोला में 'गीता' का चढ़ाव है और अन्त में उल्लाला में उतार है। इसी कारण युद्ध आदि के वर्णन में भावों के उतार-चढ़ाव का इसमें अच्छा वर्णन किया जाता है। नाभादास, तुलसीदास तथा हरिश्चन्द्र ने भक्ति-भावना के लिये छप्पय छन्द का प्रयोग किया है।
उदाहरण - "डिगति उर्वि अति गुर्वि, सर्व पब्बे समुद्रसर। ब्याल बधिर तेहि काल, बिकल दिगपाल चराचर। दिग्गयन्द लरखरत, परत दसकण्ठ मुक्खभर। सुर बिमान हिम भानु, भानु संघटित परस्पर। चौंकि बिरंचि शंकर सहित, कोल कमठ अहि कलमल्यौ। ब्रह्मण्ड खण्ड कियो चण्ड धुनि, जबहिं राम शिव धनु दल्यौ॥"[10] पन्ने की प्रगति अवस्था आधार प्रारम्भिक माध्यमिक पूर्णता शोध टीका टिप्पणी और संदर्भ ऊपर जायें ↑ प्राकृतपैंगलम् - 1|105 ऊपर जायें ↑ पृथ्वीराजरासो ऊपर जायें ↑ कवितावली ऊपर जायें ↑ रामचन्द्रिका ऊपर जायें ↑ भक्तमाल ऊपर जायें ↑ शिवराजभूषण ऊपर जायें ↑ ललितललाम ऊपर जायें ↑ सुजानचरित ऊपर जायें ↑ प्रतापसिंह विरुदावली ऊपर जायें ↑ कवितावली : बाल. 11 धीरेंद्र, वर्मा “भाग- 1 पर आधारित”, हिंदी साहित्य कोश (हिंदी), 250।
लक्षण छन्द-
रोला के पद चार, मत्त चौबीस धारिये।
उल्लाला पद दोय, अंत माहीं सुधारिये।।
कहूँ अट्ठाइस होंय, मत्त छब्बिस कहुँ देखौ।
छप्पय के सब भेद मीत, इकहत्तर लेखौ।।
लघु-गुरु के क्रम तें भये,बानी कवि मंगल करन।
प्रगट कवित की रीती भल, 'भानु' भये पिंगल सरन।। -जगन्नाथ प्रसाद 'भानु'
*
उल्लाला से योग, तभी छप्पय हो रोला।
छाया जग में प्यार, समर्पित सुर में बोला।। .
मुखरित हो साहित्य, घुमड़ती छंद घटायें।
बरसे रस की धार, सृजन की चलें हवायें।।
है चार चरण का अर्धसम, पन्द्रह तेरह प्रति चरण।
सुन्दर उल्लाला सुशोभित, भाये रोला से वरण।। -अम्बरीश श्रीवास्तव
*
उदाहरण-
०१. कौन करै बस वस्तु कौन यहि लोक बड़ो अति।
को साहस को सिन्धु कौन रज लाज धरे मति।।
को चकवा को सुखद बसै को सकल सुमन महि।
अष्ट सिद्धि नव निद्धि देत माँगे को सो कहि।।
जग बूझत उत्तर देत इमि, कवि भूषण कवि कुल सचिव।
दच्छिन नरेस सरजा सुभट साहिनंद मकरंद सिव।। -महाकवि भूषण, शिवा बावनी
(सिन्धु = समुद्र; ocean or sea । रज = मिट्टी; mud, earth । सुमन = फूल; flower । इमि = इस प्रकार; this way । सचिव = मन्त्री; minister, secretary । सुभट = बहुत बड़ा योद्धा या वीर; great warrior.)
भावार्थ- संसार जानना चाहता है, कि वह कौन व्यक्ति है जो किसी वस्तु को अपने वश में कर सकता है, और वह कौन है जो इस पृथ्वी-लोक में सबसे महान है? साहस का समुद्र कौन है और वह कौन है जो अपनी जन्मभूमि की माटी की लाज की रक्षा करने का विचार सदैव अपने मन में रखेता है? चक्रवाक पक्षी को सुख प्रदान करने वाला१ कौन है? धरती के समस्त सात्विक-मनों में कौन बसा हुआ है? मांगते ही जो आठों प्रकार की सिद्धियों २ और नवों प्रकार की निधियों३ से परिपूर्ण बना देने का सामर्थ्य रखता है, वह कौन है? इन सभी प्रश्नों को जानने की उत्कट आकांक्षा संसार के मन में उत्पन्न हो गयी है। इसलिये कवियों के कुल के सचिव भूषण कवि, सभी प्रश्नों का उत्तर इस प्रकार देते है − वे है दक्षिण के राजा, मनुष्यों में सर्वोत्कृष्ट एवं साहजी के कुल में जो उसी तरह उत्पन्न हुए हैं, जैसे फूलों में सुगंध फैलाने वाला पराग उत्पन्न होता है, अर्थात शिवाजी महाराज। शिवाजी के दादा, मालोजी को मालमकरन्द भी कहा जाता था। Who has the power to conquer all; who is the greatest of them all? Who is the ocean of courage; who is consumed by the thought of protecting the motherland? Who offers bliss to the Chakrawaak; who resides in every flower-like innocent souls? Who, in this world grants Ashtasiddhi and Navnidhi? The world seeks answers, and I, the minister of the poets’ clan, answer thus, He is the ruler of the Deccan, the great warrior, son of Shahaji, grandson of Maloji, i.e. Shivaji.
संकेतार्थ- १. शिवाजी का शौर्य सूर्य समान दमकता है। चकवा नर-मादा सूर्य-प्रकाश में ही मिलन करते है। शिवाजी का शौर्य-सूर्य रात-दिन चमकता रहता है, अत: चकवा पक्षी को अब रात होने का डर नहीं है। अतः वह सुख के सागर में डूबा हुआ है। २. अष्टसिद्धियाँ : अणिमा- अपने को सूक्ष्म बना लेने की क्षमता, महिमा: अपने को बड़ा बना लेने की क्षमता, गरिमा: अपने को भारी बना लेने की क्षमता, लघिमा: अपने को हल्का बना लेने की क्षमता, प्राप्ति: कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता, प्रकाम्य: कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता, ईशित्व: हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना, वैशित्व: जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण पा लेने की क्षमता ३. नवनिधियाँ: महापद्म, पद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्ब।
काव्य-सुषमा और वैशिष्ट्य- 'साहस को सिंधु' तथा 'मकरंद सिव' रूपक अलंकार है। शिवाजी को साहस का समुद्र तथा शिवाजी महाराज मकरंद कहा गया है उपमेय, (जिसका वर्णन किया जा रहा हो, शिवाजी), को उपमान (जिससे तुलना की जाए समुद्र, मकरंद) बना दिया जाये तो रूपक अलंकार होता है। “सुमन”- श्लेष अलंकार है। एक बार प्रयुक्त किसी शब्द से दो अर्थ निकलें तो श्लेष अलंकार होता है। यहाँ सुमन = पुष्प तथा अच्छा मन। “सरजा सुभट साहिनंद”– अनुप्रास अलंकार है। एक वर्ण की आवृत्ति एकाधिक बार हो तो अनुप्रास अलंकार होता है। यहाँ ‘स’ वर्ण की आवृत्ति तीन बार हुई है। “अष्ट सिद्धि नव निद्धि देत माँगे को सो कहि?” अतिशयोक्ति अलंकार है। वास्तविकता से बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर कहने पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है। यह राज्याश्रित कवियों की परंपरा रही है। प्रश्नोत्तर या पहेली-शैली का प्रयोग किया गया है। ०२. बूढ़े या कि ज़वान, सभी के मन को भाये। गीत-ग़ज़ल के रंग, अलग हट कर दिखलाये।। सात समंदर पार, अमन के दीप जलाये। जग जीता, जगजीत, ग़ज़ल सम्राट कहाये।। तुमने तो सहसा कहा था, मुझको अब तक याद है। गीत-ग़ज़ल से ही जगत ये, शाद और आबाद है।। -नवीन चतुर्वेदी, (जगजीत सिंह ग़ज़ल गायक के प्रति)
०३. लेकर पूजन-थाल प्रात ही बहिना आई।
उपजे नेह प्रभाव, बहुत हर्षित हो भाई।।
पूजे वह सब देव, तिलक माथे पर सोहे।
बँधे दायें हाथ, शुभद राखी मन मोहे।।
हों धागे कच्चे ही भले, बंधन दिल के शेष हैं।
पुनि सौम्य उतारे आरती, राखी पर्व विशेष है।। -अम्बरीश श्रीवास्तव (राखी पर)
२५-३-२०१६
***
चित्रगुप्त-रहस्य
*
चित्रगुप्त पर ब्रम्ह हैं, ॐ अनाहद नाद
योगी पल-पल ध्यानकर, कर पाते संवाद
निराकार पर ब्रम्ह का, बिन आकार न चित्र
चित्र गुप्त कहते इन्हें, सकल जीव के मित्र
नाद तरंगें संघनित, मिलें आप से आप
सूक्ष्म कणों का रूप ले, सकें शून्य में व्याप
कण जब गहते भार तो, नाम मिले बोसॉन
प्रभु! पदार्थ निर्माण कर, डालें उसमें जान
काया रच निज अंश से, करते प्रभु संप्राण
कहलाते कायस्थ- कर, अंध तिमिर से त्राण
परम आत्म ही आत्म है, कण-कण में जो व्याप्त
परम सत्य सब जानते, वेद वचन यह आप्त
कंकर कंकर में बसे, शंकर कहता लोक
चित्रगुप्त फल कर्म के, दें बिन हर्ष, न शोक
मन मंदिर में रहें प्रभु!, सत्य देव! वे एक
सृष्टि रचें पालें मिटा, सकें अनेकानेक
अगणित हैं ब्रम्हांड, है हर का ब्रम्हा भिन्न
विष्णु पाल शिव नाश कर, होते सदा अभिन्न
चित्रगुप्त के रूप हैं, तीनों- करें न भेद
भिन्न उन्हें जो देखता, तिमिर न सकता भेद
पुत्र पिता का पिता है, सत्य लोक की बात
इसी अर्थ में देव का, रूप हुआ विख्यात
मुख से उपजे विप्र का, आशय उपजा ज्ञान
कहकर देते अन्य को, सदा मनुज विद्वान
भुजा बचाये देह को, जो क्षत्रिय का काम
क्षत्रिय उपजे भुजा से, कहते ग्रन्थ तमाम
उदर पालने के लिये, करे लोक व्यापार
वैश्य उदर से जन्मते, का यह सच्चा सार
पैर वहाँ करते रहे, सकल देह का भार
सेवक उपजे पैर से, कहे सहज संसार
दीन-हीन होता नहीं, तन का कोई भाग
हर हिस्से से कीजिये, 'सलिल' नेह-अनुराग
सकल सृष्टि कायस्थ है, परम सत्य लें जान
चित्रगुप्त का अंश तज, तत्क्षण हो बेजान
आत्म मिले परमात्म से, तभी मिल सके मुक्ति
भोग कर्म-फल मुक्त हों, कैसे खोजें युक्ति?
सत्कर्मों की संहिता, धर्म- अधर्म अकर्म
सदाचार में मुक्ति है, यही धर्म का मर्म
नारायण ही सत्य हैं, माया सृष्टि असत्य
तज असत्य भज सत्य को, धर्म कहे कर कृत्य
किसी रूप में भी भजे, हैं अरूप भगवान्
चित्र गुप्त है सभी का, भ्रमित न हों मतिमान
२५-३-२०१४
***
दोहे भोजपुरी में:
*
पनघट के रंग अलग बा, आपनपन के ठौर.
निंबुआ अमुआ से मिले, फगुआ अमुआ बौर..
*
खेत हुई रहा खेत क्यों, 'सलिल' सून खलिहान?
सुन सिसकी चौपाल के, पनघट के पहचान..
*
आपन गलती के मढ़े, दूसर पर इल्जाम.
मतलब के दरकार बा, भारी-भरकम नाम..
*
परसउती के दरद के, मर्म न बूझै बाँझ.
दुपहरिया के जलन के, कइसे समझे साँझ?.
*
कौनऊ के न चिन्हाइल, मति में परि गै भाँग.
बिना बात के बात खुद, खिचहैं आपन टाँग..
***
दोहा
जितना पाया खो दिया, जो खोया है साथ।
झुका उठ गया, उठाया झुकता पाया माथ।।
***
मुक्तक
*
मन मंदिर में जो बसा, उसको भी पहचान.
जग कहता भगवान पर वह भी है इंसान..
जो खुद सब में देखता है ईश्वर का अंश-
दाना है वह ही 'सलिल' शेष सभी नादान..
*
चित्र न जिसका गुप्त है, है नश्वर संसार
चित्र गुप्त जिसका वही, सृष्टि रचे साकार
काया रच निज अंश को, रख करता जीवंत-
कायस्थ होता ब्रह्म ही, ले नाना आकार
२५-३-२०१०

*

मार्च २४, ग़ज़लिका, पैरोडी, चित्रगुप्त, दुर्गा, समरेंद्र मित्रा, कुंडलिया, महादेवी, होली

सलिल सृजन मार्च २४
*
छंद शाला
ग़ज़ल
उनको ये लगता है उनके राज़ खुल सकते नहीं,
आईना बनकर के सच्चाई दिखा सकती हूँ मैं।
.
जो निगाहें ढूँढती हैं सिर्फ़ मेरी हार को,
उनकी उम्मीदों पे भी पानी फिरा सकती हूँ मैं। - डॉ. भावना कुँवर, आस्ट्रेलिया
.
फिक्र है जिनको कि नदियाँ सूखती सब जा रहीं
जान लें कि आँख से गंगा बहा सकती हूँ मैं
.
कम न मुझको आँकना जब आकलन मेरा करो
ईश्वर को भी जमीं पर ला-खिला सकती हूँ मैं
.
भावना जब लापता तो गीत कैसे जी सके
शब्द कर संजीव हँस ग़ज़लें सुना सकती हूँ मैं
000
छंद शाला दोहा-रोला-कुंडलिया ० संबंधों के छंद नव, रच दे यह नव वर्ष। जन जन के मन में नवल, पूरित कर दे हर्ष।। -अशोक व्यग्र पूरित कर दे हर्ष, विमल उत्कर्ष साथ दे। सुख समृद्धि संतोष, सफलता हाथ-हाथ दे।। लिखें नित्य अध्याय, लगन श्रम अनुबंधों के। सहिष्णुता सद्भाव, स्नेहमय संबंधों के।। ००० नयन अकर पर कर सकें, विग्रह सन्धि समास। शब्दशक्तियाँ हैं सभी, मौन नयन के पास। - अशोक व्यग्र मौन नयन के पास, छंद हैं गीत-ग़ज़ल भी। मिथक-बिंब रस-राग, पुरातन संग नवल भी।। मिलें अगर तो फेर न, तोड़ ना कभी भी वचन। प्रवास न, वास करें, नयन में 'सलिल' नित नयन।। २४.३.२०२६ ०००
000
समरेंद्र कुमार मित्रा
समरेंद्र कुमार मित्रा (१४ मार्च १९१६-२६ सितंबर १९९८) वह भारतीय वैज्ञानिक और गणितज्ञ थे जिन्होंने १९५३ - ५४ में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) में भारत का पहला कंप्यूटर (एक इलेक्ट्रॉनिक एनालॉग कंप्यूटर) डिजाइन विकसित और निर्मित किया। मित्रा को कलकत्ता मैथमैटिकल सोसाइटी द्वारा भारत में कंप्यूटर के पिता के रूप में मान्यता दी गई थी। मित्रा भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) में कम्प्यूटिंग मशीन और इलेक्ट्रॉनिक्स डिवीजन के संस्थापक और पहले प्रमुख थे।
हममें से कितने इन्हें पहचानते या इनके बारे में कुछ जानते हैं।
०००
ग़ज़लिका
परिवार
*
चोट एक को, दर्द शेष को, जिनमें वे ही, हैं परिवार।
जहाँ रहें वे,उसी जगह हो, स्वर्ग करें सुख, सभी विहार।।
मेरा-तेरा, स्वार्थ नहीं हो, सबसे सबको, प्यार असीम।
सब सबका हित, रहें साधते, करें सभी का, सब उद्धार।।
नेह नर्मदा, रहे प्रवाहित, विमल सलिल की, धार अपार।
जो अवगाहे, वही सुखी हो, पाप मिटें सब, दें-पा प्यार।।
शूल फूल हों, पतझर सावन, दर्द हर्ष हो, संग न दूर।
हो मनभेद न, रहे एकता, मरुथल में भी, रहे बहार।।
मुझको वर दो, प्रभु बन पाए, मेरा भारत, घर-परिवार।
बने रवायत, जनसेवा कर, बने सियासत, हरि का द्वार।।
(मात्रिक सवैया, यति ८-८-८-७, पदांत गुरु लघु)
२४.३.२०२३
***
दोहा
है भवि शुचि तो कीजिए, खुश रहकर आनंद.
'सलिल' जीव संजीव हो, रचकर गाए छंद.
***
महीयसी महादेवी की अद्भुत होली
*
हिंदी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखनेवाली बुआ श्री (महीयसी महादेवी वर्मा) से जुड़े संस्मरण की शृंखला में इस बार होली चर्चा। बुआ श्री ने बताया था कि रंग पर्व पर भंग की तरंग में मस्ती करने में साहित्यकार भी पीछे नहीं रहते थे किंतु मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया जाता था। हिन्दू पंचांग के अनुसार होली बुआ श्री का जन्म दिवस भी है। प्रयाग राज (तब इलाहाबाद) में अशोक नगर स्थित बंगले में साहित्यकारों का जमघट दो उद्देश्यों की पूर्ति हेतु होता था। पहला महादेवी जी को जन्म दिवस की बधाई देना और दूसरा उनके स्नेह पूर्ण आतिथ्य के साथ साहित्यकारों की फागुनी रचनाओं का रसास्वादन कर धन्य होना। बुआ श्री होली की रात्रि अपने आँगन में होलिका दहन करती थीं। उसके कुछ दिन पूर्व से बुआश्री के साथ उनके मानस पुत्र डॉ. रामजी पांडेय का पूरा परिवार होली के लिए गुझिया, पपड़िया, सेव, मठरी आदि तैयार करा लेता था। एक एक पकवान इतनी मात्रा में बनता कि कई पीपों (कनस्तरों) और टोकनों में रखा जाता। होली का विशेष पकवान गुझिया (कसार की, खोवे की, मेवा की, नारियल चूर्ण की, चाशनी में पगी), सेव (नमकीन, तीखे, मोठे गुण की चाशनी में पगे), पपड़ी (बेसन की, माइडे की, मोयन वाली), खुरमे व मठरी, दही बड़ा, ठंडाई आदि आदि बड़ी मात्रा में तैयार करे जाते कि कम न हों।
होली खेलत रघुवीरा
सवेरा होते ही शहर के ही नहीं, अन्य शहरों से भी साहित्यकार आते, राई-नोन से उनकी नजर उतरी जाती, बुआ श्री स्वयं उन्हें गुलाल का टीका लगाकर आशीष देतीं। आगंतुक साहित्यिक महारथियों में आकर्षण का केंद्र होते महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, फिराक गोरखपुरी, सुमित्रानंदन पंत, डॉ. हरिवंशराय बच्चन, उमाकांत मालवीय, रघुवंश, अमृत राय, सुधा चौहान, कैलाश गौतम, एहतराम इस्लाम आदि आदि। साहित्यकारों पर किंशुक कुसुम (टेसू के फूल) उबालकर बनाया गया कुसुंबी रंग डाला जाता था। यह रंग भी बुआ श्री की देख-रेख में घर पर ही तैयार किया जाता था। क्लाइव रोड से बच्चन जी की अगुआई में एक टोली 'होली खेलत रघुवीरा, बिरज में होली खेलत रघुवीरा' आदि होली के लोक गीत गाते, झूमते मस्ताते हुए पहुँचती। बच्चन जी स्वयं बढ़िया ढोलक बजाते थे।
'बस करो भइया...'
महाप्राण निराला बुआ श्री को अपनी छोटी बहिन मानते थे, फिर होली पर बहिन से न मिलें यह तो हो ही नहीं सकता था। उनके व्यक्तित्व की दबंगई के कारण अनकहा अनुशासन बना रहता था। निराला विजय भवानी (भाँग) का सेवन भी करते थे। एक वर्ष अलीगंज स्थित निराला जी के घर कुछ साहित्यकार भाँग लेकर पहुच गए, निराला जी को ठंडाई में मिलाकर जमकर भाँग पिला दी गई। भाँग के नशे में व्यक्ति जो करता है करता ही चला जाता है। यह टोली जब महादेवी निवास पहुँची तो गुझिया बाँटी-खाई जा रही थीं। निराला जी ने गुझिया खाना आरभ किया तो बंद ही न करें, किसका साहस कि उन्हें टोंककर अपनी मुसीबत बुलाए। बुआ जी अन्य अतिथियों का स्वागत कर रही थी, किसी ने यह स्थिति बताई तो वे निराला जी के निकट पहुँचकर बोलीं- ''भैया! अब बस भी करो और लोग भी हैं, उन्हें भी देना है, गुझिया कम पड़ जाएँगी।'' निराला जी ने झूमते हुआ कहा- 'तो क्या हुआ? भले ही कम हो जाए मैं तो जी भर खाऊँगा, तुम और बनवा लो।'' उपस्थित जनों के ठहाकों के बीच फिर गुझिया खत्म होने के पहले ही फिर से बनाने का अनुष्ठान आरंभ कर दिया गया।
राम की शक्ति पूजा
एक वर्ष होली पर्व पर बुआ श्री के निवास पर पधारे साहित्यकारों ने निराला जी से उनकी प्रसिद्ध रचना ''राम की शक्ति पूजा'' सुनाने का आग्रह किया। निराला जी ने मना कर दिया। आग्रहकर्ता ने बुआ श्री की शरण गही। बुआ श्री ने खुद निराला जी से कहा- ''भैया! मुझे शक्ति पूजा सुना दो।'' निराला जी ने ''अच्छा, इन लोगों ने तुम्हें वकील बना लिया, तब तो सुनानी ही पड़ेगी। उन्होंने अपने ओजस्वी स्वर में समा बाँध दिया। सभी श्रोता सुनकर मंत्रमुग्ध हो गए।
खादी की साड़ी
महादेवी जी सादगी-शालीनता की प्रतिमूर्ति, निराला जी के शब्दों में 'हिंदी के विशाल मंदिर की वीणापाणी' थीं।वे खादी की बसंती अथवा मैरून बार्डर वाली साड़ी पहनती थीं। प्रेमचंद जी के पुत्र अमृत राय उन्हें प्रतिवर्ष जन्मदिन के उपहार स्वरूप खादी की साड़ी भेंट करते थे। उल्लेखनीय है कि अमृत राय का विवाह महादेवी जी की अभिन्न सखी सुभद्रा कुमारी चौहान की पुत्री सुधा चौहान के साथ बुआ श्री की पहल पर ही हुआ था।
बिटिया काहे ब्याहते
बुआ श्री अपने पुत्रवत डॉ. रामजी पाण्डेय के परिवार को अपने साथ ही रखती थीं। उनके निकटस्थ लोगों में प्रसिद्ध पत्रकार उमाकांत मालवीय भी रहे। रामजी भाई की पुत्री के विवाह हेतु स्वयं महादेवी जी ने पहल की तथा यश मालवीय जी को जामाता चुना। विवाह का निमात्रण पत्र भी बुआ श्री ने खुद ही लिखा था। वर्ष १९८६ में यश जी होली की सुबह अमृत राय जी के घर पहुँच गए, वहाँ भाग मिली ठंडाई पीने के बाद सब महादेवी जी के घर पहुँचे। जमकर होली खेल चुके यश जी का चेहरा लाल-पीले-नीले रंगों से लिपा-पूत था, उस पर भाग का सुरूर, हँसी-मजाक होते होते यश जी ने हँसना शुरू किया तो रुकने का नाम ही न लें, ठेठ ग्रामीण ठहाके। बुआ श्री ने स्वयं भी हँसते हुई चुटकी ली '' पहले जाना होता ये रूप-रंग है तो अपनी बिटिया काहे ब्याहते?''
बुआ श्री ने हमेश अपना जन्मोत्सव अंतरंग आत्मीय सरस्वती पुत्रों के के साथ ही मनाया। वे कभी किसी दिखावे के मोह में नहीं पड़ीं। होली का रंग पर्व किस तरह मनाया जाना चाहिए यह बुआ श्री के निवास पर हुए होली आयोजनों से सीखा जा सकता है।
***
पैरोडी
'लेट इज बैटर दैन नेवर', कबहुँ नहीं से गैर भली
होली पर दिवाली खातिर धोनी और सब मनई के
मुट्ठी भर अबीर और बोतल भर ठंडाई ......
होली पर एगो ’भोजपुरी’ गीत रऊआ लोग के सेवा में ....
नीक लागी तऽ ठीक , ना नीक लागी तऽ कवनो बात नाहीं....
ई गीत के पहिले चार लाईन अऊरी सुन लेईं
माना कि गीत ई पुरान बा
हर घर कऽ इहे बयान बा
होली कऽ मस्ती बयार मे-
मत पूछऽ बुढ़वो जवान बा--- कबीरा स र र र र ऽ
अब हमहूँ७३-के ऊपरे चलत, मग्गर ३७ का हौसला रखत बानी ..
भोजपुरी गीत : होली पर....
कईसे मनाईब होली ? हो धोनी !
कईसे मनाईब होली..ऽऽऽऽऽऽ
बैटिंग के गईला त रनहू नऽ अईला
एक गिरउला ,तऽ दूसर पठऊला
कईसे चलाइलऽ चैनल चरचा
कोहली त धवन, रनहू कम दईला
निगली का भंग की गोली? हो धोनी !
मिलके मनाईब होली ?ऽऽऽऽऽ
ओवर में कम से कम चउका तऽ चाही
मौका बेमौका बाऽ ,छक्का तऽ चाही
बीस रनन का रउआ रे टोटा
सम्हरो न दुनिया में होवे हँसाई
रीती न रखियो झोली? हो राजा !
लड़ के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ
मारे बँगलदेसीऽ रह-रह के बोली
मुँहझँऊसा मुँह की खाऽ बिसरा ठिठोली
दूध छठी का याद कराइल
अश्विन-जडेजा? कऽ टोली
बद लीनी बाजी अबोली हो राजा
भिड़ के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ
जमके लगायल रे! चउआ-छक्का
कैच भयल गए ले के मुँह लटका
नानी स्टंपन ने याद कराइल
फूटा बजरिया में मटका
दै दिहिन पटकी सदा जय हो राजा
जम के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ
अरे! अईसे मनाईब होली हो राजा,
अईसे मनाईब होली...
२४.३.२०१६
***
सत श्लोकी दुर्गा
हिंदी भावानुवाद
शिव बोले- हो सुलभ भक्त को, कार्य नियंता हो देवी!
एक उपाय प्रयत्न मात्र है, कार्य-सिद्धि की कला यही।।
देवी बोलीं- सुनें देव हे!, कला साधना उत्तम है।
स्नेह बहुत है मेरा तुम पर, स्तुति करूँ प्रकाशित मैं।।
ॐ मंत्र सत् श्लोकी दुर्गा, ऋषि ‌नारायण छंद अनुष्टुप।
देव कालिका रमा शारदा, दुर्गा हित हो पाठ नियोजित।।
ॐ चेतना ज्ञानी जन में, मात्र भगवती माँ ही हैं।
मोहित-आकर्षित करती हैं, मातु महामाया खुद ही।१।
भीति शेष जो है जीवों में, दुर्गा-स्मृति हर लेती,
स्मृति-मति हो स्वस्थ्य अगर तो, शुभ फल हरदम है देती।
कौन भीति दारिद्रय दुख हरे, अन्य न कोई है देवी।
कारण सबके उपकारों का, सदा आर्द्र चितवाली वे।२।
मंगलकारी मंगल करतीं, शिवा साधतीं हित सबका।
त्र्यंबका गौरी, शरणागत, नारायणी नमन तुमको।३।
दीन-आर्त जन जो शरणागत, परित्राण करतीं उनका।
सबकी पीड़ा हर लेती हो, नारायणी नमन तुमको।४।
सब रूपों में, ईश सभी की, करें समन्वित शक्ति सभी।
देवी भय न अस्त्र का किंचित्, दुर्गा देवि नमन तुमको।५।
रोग न शेष, तुष्ट हों तब ही, रुष्ट काम से, अभीष्ट सबका।
जो आश्रित वह दीन न होता, आश्रित पाता प्रेय अंत में।६।
सब बाधाओं को विनाशतीं, हैं अखिलेश्वरी तीन लोक में।
इसी तरह सब कार्य साधतीं, करें शत्रुओं का विनाश भी।७।
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चित्रगुप्त-रहस्य
*
चित्रगुप्त पर ब्रम्ह हैं, ॐ अनाहद नाद
योगी पल-पल ध्यानकर, कर पाते संवाद
निराकार पर ब्रम्ह का, बिन आकार न चित्र
चित्र गुप्त कहते इन्हें, सकल जीव के मित्र
नाद तरंगें संघनित, मिलें आप से आप
सूक्ष्म कणों का रूप ले, सकें शून्य में व्याप
कण जब गहते भार तो, नाम मिले बोसॉन
प्रभु! पदार्थ निर्माण कर, डालें उसमें जान
काया रच निज अंश से, करते प्रभु संप्राण
कहलाते कायस्थ- कर, अंध तिमिर से त्राण
परम आत्म ही आत्म है, कण-कण में जो व्याप्त
परम सत्य सब जानते, वेद वचन यह आप्त
कंकर कंकर में बसे, शंकर कहता लोक
चित्रगुप्त फल कर्म के, दें बिन हर्ष, न शोक
मन मंदिर में रहें प्रभु!, सत्य देव! वे एक
सृष्टि रचें पालें मिटा, सकें अनेकानेक
अगणित हैं ब्रम्हांड, है हर का ब्रम्हा भिन्न
विष्णु पाल शिव नाश कर, होते सदा अभिन्न
चित्रगुप्त के रूप हैं, तीनों- करें न भेद
भिन्न उन्हें जो देखता, तिमिर न सकता भेद
पुत्र पिता का पिता है, सत्य लोक की बात
इसी अर्थ में देव का, रूप हुआ विख्यात
मुख से उपजे विप्र का, आशय उपजा ज्ञान
कहकर देते अन्य को, सदा मनुज विद्वान
भुजा बचाये देह को, जो क्षत्रिय का काम
क्षत्रिय उपजे भुजा से, कहते ग्रन्थ तमाम
उदर पालने के लिये, करे लोक व्यापार
वैश्य उदर से जन्मते, का यह सच्चा सार
पैर वहाँ करते रहे, सकल देह का भार
सेवक उपजे पैर से, कहे सहज संसार
दीन-हीन होता नहीं, तन का कोई भाग
हर हिस्से से कीजिये, 'सलिल' नेह-अनुराग
सकल सृष्टि कायस्थ है, परम सत्य लें जान
चित्रगुप्त का अंश तज, तत्क्षण हो बेजान
आत्म मिले परमात्म से, तभी मिल सके मुक्ति
भोग कर्म-फल मुक्त हों, कैसे खोजें युक्ति?
सत्कर्मों की संहिता, धर्म- अधर्म अकर्म
सदाचार में मुक्ति है, यही धर्म का मर्म
नारायण ही सत्य हैं, माया सृष्टि असत्य
तज असत्य भज सत्य को, धर्म कहे कर कृत्य
किसी रूप में भी भजे, हैं अरूप भगवान्
चित्र गुप्त है सभी का, भ्रमित न हों मतिमान
२४.३.२०१४

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सोमवार, 23 मार्च 2026

मार्च २३, रामकिंकर, सॉनेट, वर्ड्सवर्थ, मनहरण घनाक्षरी, कज्जल छंद, होली, फागुन, कुण्डलिया

सलिल सृजन मार्च २३
२३ मार्च - कब क्या?
- विश्व मौसम विज्ञान दिवस
- शहीद दिवस भारत १९३१ (शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फाँसी), विश्व मौसम विज्ञान दिवस, संविधान दिवस पाकिस्तान १९५६.
- राम मनोहर लोहिया जन्म १९१०, स्वतंत्रता सत्याग्रही, समाजवादी नेता
- हेमू कालाणी जन्म १९२३, भारतीय क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी
- सहजीवन (लिव इन) दिवस (सर्वोच्च न्यायालय ३ सदस्यीय खंड पीठ ने सह जियावन को अपराध नहीं माना)
छंद शाला दोहा-रोला-कुंडलिया ० भ्रान्तिपूर्ण गत वर्ष था, क्रान्तिपूर्ण संघर्ष। शान्तिपूर्ण नववर्ष हो, कान्तिपूर्ण उत्कर्ष। - अशोक व्यग्र कांतिपूर्ण उत्कर्ष, कांत का हो अब मैया! कोई रहे न भ्रांत, शांत हो पाए छैंया।। सजनी-साजन संग, माँगे समृद्धि सुख शांति। माँ देतीं वर विहँस, ना हो जीवन में भ्रांति।। ००० नयन स्वाद अवसाद है, नयन श्वास उच्छश्वास। रुदन नयन का नाद है, नयन हास उपहास।। - अशोक व्यग्र नयन हास उपहास, नयन परिहास कर रहे। अनायास-सायास, नयन उपवास कर कहे।। हर सुख-दुख अनिवार्य, सह लें चुप तजिए नय न। रहे धूप या छाँव, खुले रखें निश-दिन नयन।। २३.३.२०२६ ०००
000
स्मरण रामकिंकर
*
राम किंकर प्रभु नमन शत,
कृपा करिए तनिक हम पर,
रूठिए निज भक्त से मत,
पग-कमल में मन बना घर।
तरो भव से प्राण पामर,
काम हर निष्काम करना,
नहीं मन में हो तनिक डर,
श्वास नित सिय राम भजना।
राम-रस ले मधुर रसना,
नयन कर सिय-राम दर्शन,
कान सीता-राम सुनना,
कर अधर हनुमान वंदन।
शीश पग में हो सदा नत,
राम किंकर प्रभु नमन शत।
२३.३.२०२४
***
सॉनेट
*
नहीं भक्ति का मार्ग सहज,
भज प्रभु को तज माया-मोह,
सांसारिक दुनिया पग-रज,
मन में तनिक न रखना द्रोह।
साथ नहीं कुछ जाएगा,
पाया-खोया जो सम जान,
ठाठ यहीं रह जाएगा,
है समान मान-अपमान।
मन मत हो उन्मन किंचित,
तन्मय रहकर ले प्रभु नाम,
हो मत हरि छाया-वंचित,
काम सभी कर हो निष्काम।
अगम भक्ति का मार्ग सहज,
श्वास-श्वास में प्रभु को भज।
२३.३.२०२४
***
सॉनेट
रश्मि
रश्मि तिमिर का पाश काटती
कण-कण करता है अभिनंदन
करतल ध्वनि हो अक्षत चंदन
नव आशा निशि-दिवस बाँटती
रश्मि सलिल लहरों सँग खेले
सिकता-कण कनकाभित होते
नित नव अनगिन सपने बोते
रविकर पल पल लगें नवेले
रश्मि रचे रचना हर रुचिकर
धूप-छाँव कर, मन बहलाए
शुभ प्रयास की जय जय गाए
रश्मिरथी सबके मन में हो
किरण करे किसलय हर पोषित
तुहिन कणों को करे न शोषित
२४-३-२०२३
•••
भाषा सेतु
अंग्रेजी हिंदी
*
William Wordsworth - daffodils विलियम वर्ड्सवर्थ - डैफोडिल
I wandered lonely as a cloud मैं एकाकी बादल जैसे भटक रहा था
That floats on high o'er vales and hills, जो उड़ता है ऊपर घाटी अरु पर्वत के
When all at once I saw a crowd, एकाएक झुण्ड देखा मैंने जब एक
A host, of golden daffodils, आतिथेय ज्यों एक सुनहरे डैफोडिल का
Beside the lake, beneath the trees, बाजू में सरवर के; पेड़ों की छाया में
Fluttering and dancing in the breeze. झूम- झूमकर नाच रहा साथ पवन के।
Continuous as the stars that shine लगातार जैसे तारे चमका करते हैं
And twinkle on the milky way, झिलमिल करते आकाशी गंगा के पथ में
They stretch'd in never-ending line बँधे हुए वे अंतहीन रेखा में जैसे
Along the margin of a bay: साथ-साथ खाड़ी की तटरेखा के मैंने
Ten thousand saw I at a glance दस हजार को देखा एक साथ ही मैंने
Tossing their heads in sprightly dance. झुमा रहे अपने सर होकर मुदित, नाचते।
The waves beside them danced, but they लहरें उनके बाजू में नाचीं लेकिन वे
Out-did the sparkling waves in glee:-- अनदेखा करते लहरों को निज मस्ती में
A Poet could not but be gay एक कवि हो सकता नहीं और नाकारा
In such a jocund company! ऐसी अद्भुत और अलौकिक प्रिय संगति में
I gazed--and gazed--but little thought देखा, रहा देखता, तुक फिर मैंने सोचा
What wealth the show to me had brought; क्या निधि दृश्य अनोखा मुझ तक ले आया है।
For oft, when on my couch I lie जब फुरसत में लेटा होता हूँ मैं कोच पर
In vacant or in pensive mood, खालीपन में या चिंतन में लीन हुआ मैं
They flash upon that inward eye वे दमका करते मेरी अंतर्दृष्टि में
Which is the bliss of solitude; जो वरदान अकेलेपन का मैंने पाया
And then my heart with pleasure fills तब मेरा हृद प्रफुल्लता से पूर्ण भर गया
And dances with the daffodils. और उठा मैं नाच संग में डैफोडिल के।
हिंदी काव्यानुवाद : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
२३-३-२०२२
***
मनहरण घनाक्षरी (३१ वर्ण)
*
मनहरण घनाक्षरी में १६,१५ वर्ण पर यति तथा चरणांत में गुरू होता है।
शालिनी हो, माननी हो, नहीं अभिमाननी हो,
श्वास-आस स्वामिनी हो मीत मेरी कविता
गति यति लय रस भाव बिंब रूप जस,
प्राण मन आत्मा हो प्रीत मेरी कविता
साधना हो वंदंना हो प्रार्थना हो अर्चना हो
मोहिनी आराधना हो रीत मेरी कविता
शब्द शब्द हो निशब्द सुनें सभी श्रोता गण
हो अतीत अव्यतीत गीत मेरी कविता
२३-३-२०१९
***
पुस्तक सलिला:
'जिस जगह यह नाव है' नवगीत का वह घाट है
*
[कृति विवरण- जिस जगह यह नाव है, नवगीत संग्रह, राजा अवस्थी, वर्ष २००६, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, पृष्ठ १३६, मूल्य १२०रु., अनुभव प्रकाशन, ई २८ लाजपत नगर, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद २०१००५, ०१२० ४११२२१०, रचनाकार संपर्क- गाटरघाट मार्ग, आजाद चौक, कटनी ४८३५०१, चलभाष ९६१७९१३२८७}
*
सनातन सलिला नर्मदा के अंचल में आधुनिक हिंदी के उद्भव काल से ही साहित्य की हर विधा में सतत सत्साहित्य का सृजन होता रहा है। वर्तमान पीढ़ी के सृजनशील नवगीतकारों में राजा अवस्थी का नाम साहित्य सृजन को सारस्वत पूजन की तरह समर्पित भाव से निरंतर कर रहे रचनाकारों में सम्मिलित है। हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ हस्ताक्षर डॉ. देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र' तथा नर्मदांचल के वरिष्ठ साहित्य साधक श्यामनारायण मिश्र द्वारा आशीषित 'जिस जगह यह नाव है' ७८ समसामयिक, सरस नवगीतों का पठनीय संग्रह है। मध्य प्रदेश के बड़े जंक्शन कटनी में बसे राजा के नवगीत विंध्याटवी के नैसर्गिक सौंदर्य, ग्राम्यांचल के संघर्ष, नगरीकरण की घुटन, राजनीति के दिशाभ्रम, आम जन के अंतर्द्वंद तथा युवाओं के सपनों के बहुदिशायी रेलगाड़ियों में यात्रारत मनोभावों को मन में बसाते हैं। करुणा और व्यथा काव्य का उत्स है. गाँव की माटी की व्यथा-कथा गाँव के बेटों तक न पहुँचे यह कैसे संभव है?
आज गाँव की व्यथा बाँचती / चिट्ठी मेरे नाम मिली
विधवा हुई रमोली की भी / किस्मत कैसी फूटी
जेठ-ससुर की मैली नज़रें / अब टूटीं, तब टूटीं
तमाम विसंगतियों से लड़ते-जूझते हुए भी अक्षर आराधना किसी सैनिक के पराक्रम से कम नहीं है।
चंदन वन काट-काट / शव का श्रृंगार करें
शिशुओं को दें शव सा जीवन
यौवन में सन्नाटा / मरघट सा छाता है
आस-ओस दुर्लभ आजीवन
यश अर्जन को होता
भूख को हमारी, साहित्य में उतारना
माँ शारदा को क्षुधा-दीप समर्पित करती कलम का संघर्ष गाँव और शहर हर जगह एक सा है। विडम्बनाओं व विसंगतियों से जूझना ही नियति है-
स्वार्थ-पोषित आचरण को / यंत्रवत निष्ठुर शहर को / सौपने बैठा
भाव की पहचान भूले / चेहरे पढ़ना कठिन है
धुंध, सन्नाटा, अँधेरा / और बहरापन कठिन है
विवशताएँ, व्यस्तताएँ / ह्रदय में छल वर्जनाएं / थोपने बैठा
अनचाही पीड़ाएँ प्रकृति प्रदत्त कम, मनुष्य रचित अधिक हैं-
गाँव के पंचों ने मिलकर / फिर खड़ी दीवार की
फिर वही हालत, नियति / वह ही प्रकृति के प्यार की
किशनवा-रधिया की / घुटती साँस का मौसम।
किसी समाज के सामने सर्वाधिक चिंतनीय स्थिति तब होती है जब बिखराव के कारण मानव-मन दूर होने लगें। राजा इस परिस्थिति का अनुमान कर अपनी चिंता नवगीत में उड़ेल देते हैं-
अंतस के समतल की / चिकनाई गायब अब
रोज बढ़े, फैले, ज़हरीला बिखराव
रिश्तों का ताप चुका / आ बैठा ठंडापन
चहक-पुलक में में पसरा जाता ठहराव
कैसी इच्छाओं के / ज्वार और भाटे ये
दूर हुए जाते मन, सदियों के द्वीप
विषमताओं के कुम्भ में सपनों की आहट बेमानी प्रतीत होने लगे तो नवगीत मन की पीड़ा को स्वर देता है -
किसलिए सजें / सपने, तो बस विशुद्ध रेत हैं
नरभक्षी पौधों से / आश्रय की आशा क्या?
सब के सब इक जैसे / टोला क्या, माशा क्या?
कोई भी अमृत फल / इन पर आ पायेगा?
छोडो भी आशा, ये बेंत हैं
बेशर्मी जेहन से / आँखों में उतरी
ढंकेंगी कब तक / ये पोशाकें सुथरी
बच पाना मुश्किल है / ये भोंडे संस्कार
दम लेंगे हंसकर ही, ये करैत हैं
राजा केवल नाम के ही नहीं अनुभूतियों और अभिव्यक्ति-क्षमता के भी राजा हैं। लोकतंत्र में भी सामंतवादी प्रवृत्तियों का बढ़ते जाना, प्रगति की मरीचिका मैं आम आदमी का दर्द बढ़ते जाना उनके मन की पीड़ा को बढ़ाता है-
फिर उसी सामंतवादी / जड़ प्रकृति को रोपता
एक विध्वंसक समय को / हाथ बाँधे न्योतता
जड़ तमाचे पर तमाचे / अमन के मुँह पर
पढ़ कसीदे पर कसीदे / दमन के मुँह पर
गर्व से मुस्की दबाये / है प्रगति का देवता
मुहावरेदार भाषा राजा अवस्थी के नवगीतों की जान है। रेवड़ी बेभाव बाँटी / प्रगति को दे दी धता, ढिबरी का तेल चुका / फैला अँधियार, खेतिहर बिजूकों से / भय खाएं राम, मस्तक में बोकर नासूर / टोपी के ये नकली बाल क्या सँवारना?, संविधान के मकड़जाल में / उलझा अक्सर न्याय हमारा, तार पर दे जीवन आघात / बेसुरे सुर दे रहे धता, कुँवारी इच्छाएं ऐसी / खिले ज्यों हरसिंगार के फूल जैसी अभिव्यक्तियाँ कम शब्दों में अधिक अनुभूतियों से पाठक का साक्षात करा देती हैं।
ग्राम्यांचली पृष्ठभूमि राजा अवस्थी को देशज शब्दों के उस ख़ज़ाने से संपन्न करती है जो शहरों के कोंवेंटी कवि के लिए आकाश कुसुम है। बरुआ, ठकुरवा, छप्पर, छुअन, झरोखा, निठुराई, बिजूका, झोपड़, जांगर. कहतें, पांग, बढ़ानी, हिय, पर्भाती, सुग्गे, ढिबरी, किशनवा, कुछबन्दियों, खटती, बहुँटा, अंकुई, दलिद्दर, चरित्तर, पैताने आदि ग्रामीण शब्दों के साथ उर्दू लफ्ज़ खातिर, रैयत, खबर, गुजरे, बैर, ज़ुल्मों, खस्ताहाल, नज़रें, ख्याल, आमद, बदन, यकीन, ज़ेहन, नुस्खे, नासूर, इन्तिज़ार, ज़हर, आफत, एहसान, तकादा, एहसान, चस्पा, लफ़्फ़ाज़ी आदि मिलकर उस गंगो-जमुनी जीवन की बानगी पेश करते हैं जिसमें शुद्ध हिंदी के अनुपूरित, प्रतिकार, अंतर्मन, उल्लास, ग्रसित, व्याल, आतंकित, प्रतिबंधित, मराल, भ्रान्ति, आलिंगन, उत्कंठा, वीथिकाएँ, वर्जनाएं,अंतस, निष्कलुष, बड़वानल, हिमगलित, संभरण आदि पुलाव में मेवे की तरह प्रतीत होते हैं। राजा अवस्थी ने शब्द-युग्मों की शक्ति और उपदेयता को पहचाना और उपयोग किया है। खबर-दबर, जेठ-ससुर, माँ-दद्दा, रात-दिन, हम-तुम, मन-मान, आस-ओस, उठना-गिरना, साँझ-सँझवाती, लड़ी-फड़ी, डगर-मगर, सुख-दुःख, घर-गाँव, सुबह-शाम, दोपहरी-रात, नून-तेल, आस-पास, दूध-भात, मरते-कटते, चोर-लबार, अमन-चैन, चहक-पुलक, सीलन-सन्नाटे, दंभ-छ्ल्, है-मेल, हवा-पानी, प्रीति-गीति-रीति, मोह-ममता-नेह, तन-मन-जेहन आदि शब्द युगन इन नवगीतों की भाषा को जीवंतता देते हैं।
राजा अवस्थी की प्रयोगधर्मी वृत्ति फाइलबाजों, कंठ-लावनी, वर्ण-कंपित, हिटलरी डकार, श्रध्दाशा, ममता की अलगनी, सुधियों की डोर, काँटों की गलियाँ, मुस्कानों के झोंके, शब्दों का संत्रास, पीड़ाओं के शिलाखंड जैसे शब्दावलियों से पाठक को बाँध पाये हैं। शब्द-सामर्थ्य, भाषा-शैली, नव बिम्ब, नए प्रतीक, मौलिक कथ्य की कसौटी पर ये गीत खरे उतरते हैं। इन नवगीतों में मात्रिक छंदों का प्रयोग किया गया है। दो से लेकर चार पंक्तियों तक के मुखड़े तथा आठ पंक्तियों तक के अंतरे प्रयुक्त हुए हैं। नवगीतों में अंतरों की संख्या दो या तीन है।
हिंदी के समर्थ समीक्षक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने इन गीतों में 'समकालीन जीवन व् उसके यथार्थ के प्रति अत्यधिक सजगता एवं संवेदनशीलता, स्थानीयता के रंगों से कुछ अधिक रंगीनियत' ठीक ही लक्षित की है। इस कृति के प्रकाशन के एक दशक बाद राजा अवस्थी की कलम अधिक पैनी हुई है, उनके नवगीतों के नये संकलन की प्रतीक्षा स्वाभाविक है।
२३-३-२०१६
***
छंद सलिला:
कज्जल छंद
*
लक्षण: सममात्रिक छंद, जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, चरणांत लघु-गुरु
लक्षण छंद:
कज्जल कोर निहार मौन,
चौदह रत्न न चाह कौन?
गुरु-लघु अंत रखें समान,
रचिए छंद सरस सुजान
उदाहरण:
१. देव! निहार मेरी ओर,
रखें कर में जीवन-डोर
शांत रहे मन भूल शोर,
नयी आस दे नित्य भोर
२. कोई नहीं तुमसा ईश
तुम्हीं नदीश, तुम्ही गिरीश।
अगनि गगन तुम्हीं पृथीश
मनुज हो सके प्रभु मनीष।
३. करेंगे हिंदी में काम
तभी हो भारत का नाम
तजिए मत लें धैर्य थाम
समय ठीक या रहे वाम
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, मानव, माली, माया, माला, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)
२३-३-२०१४
***
विज्ञापन या ठगी ??????
1) घोटालों से परेशान ना हों, Tata की चाय पीयें, इससे देश बदल
जाएगा|
2) पानी की जगह Coca Cola और Pepsi पीयें और प्यास बुझायें|
3) Lifebuoy और Dettol 99.9% कीटाणु मारते है पर 0.1 %
पुनः प्रजनन के लिए छोड़ ही देते हैं|
4) महिलाओं को बचाने और बटन खुले होने
की चेतावनी देने का ठेका केवल Akshay Kumar ने लिया है|
5) अगर आप Sprite पीते हैं तो लड़की पटाना आपके बाये हाँथ
का खेल है|
6) Salman Khan के अनुसार
महीने भर का Wheel Detergent ले आओ
और कई किलो सोने के मालिक बन जाओ.
आपको नौकरी करने की कोई जरुरत नहीं|
7) Saif Ali Khan और Kreena Kapoor ने शादी एक दुसरे के सर
का Dandruff देख कर की है|
8)यदि किसी के Toothpaste में नमक है तो; यह पूछने के लिए आप
किसी के भी घर का बाथरूम तोड़ सकते हैं|
9) Samsung Galaxy S3 फोन के
अलावा बाकी सभी फोन बंदरों के लिए बने हैं| केवल यही फ़ोन
इंसानों के लिए है!
10) Mountain Dew पीकर पहाड़ से कूद जाइये, कुछ नहीं होगा|
11) Cadbury Dairy Milk Silk Chocolate खाएं कम और मुंह
पर ज्यादा लगायें|
12) Happident चबाइए और बिजली का कनेक्शन कटवा लीजिये|
13) आपके insurance Agents को अपने पापा से
ज्यादा आपकी फ़िक्र रहती हैं|
14) फलमंडी से ज्यादा फल आपके Shampoo में होते हैं|
15) अपने घर का Toilet सदा साफ़ रखें अन्यथा एक Handsome
सा लड़का Harpic और Camera लेकर आपकेToilet की सफाई
का Live Broadcast
करने लगेगा|
16) अगर आपने घर में Asian Paints किया है तो आप दुनिया के
सबसे Intelligent इन्सान हैं|
17) अगर आपने Lux Cozy Big Shot
नहीं पहनी तो आपको मर्द कहलाने काकोई हक़ नहीं|
18) अगर तुम्हारा बेटा Bournvita
नहीं पीता तो वो मंदबुद्धि हो जायेगा|
***
होली की कुण्डलियाँ:
मनायें जमकर होली
*
होली अनहोली न हो, रखिए इसका ध्यान.
मही पाल बन जायेंगे, खायें भंग का पान..
खायें भंग का पान, मान का पान न छोड़ें.
छान पियें ठंडाई, गत रिकोर्ड को तोड़ें..
कहे 'सलिल' कविराय, टेंट में खोंसे गोली.
भोली से लग गले, मनायें जमकर होली..
*
होली ने खोली सभी, नेताओं की पोल.
जिसका जैसा ढोल है, वैसी उसकी पोल..
वैसी उसकी पोल, तोलकर करता बातें.
लेकिन भीतर ही भीतर करता हैं घातें..
नकली कुश्ती देख भ्रनित है जनता भोली.
एक साथ मिल भत्ते बढ़वा करते होली..
*
होली में फीका पड़ा, सेवा का हर रंग.
माया को भाई सदा, सत्ता खातिर जंग..
सत्ता खातिर जंग, सोनिया को भी भाया.
जया, उमा, ममता, सुषमा का भारी पाया..
मर्दों पर भारी है, महिलाओं की टोली.
पुरुष सम्हालें चूल्हा-चक्की अबकी होली..
***
फागुन के मुक्तक
*
बसा है आपके ही दिल में प्रिय कब से हमारा दिल.
बनाया उसको माशूका जो बिल देने के है काबिल..
चढ़ायी भाँग करके स्वांग उससे गले मिल लेंगे-
रहे अब तक न लेकिन अब रहेंगे हम तनिक गाफिल..
*
दिया होता नहीं तो दिया दिल का ही जला लेते.
अगर सजती नहीं सजनी न उससे दिल मिला लेते..
वज़न उसका अधिक या मेक-अप का कौन बतलाये?
करा खुद पैक-अप हम क्यों न उसको बिल दिला लेते..
*
फागुन में गुन भुलाइए बेगुन हुजूर हों.
किशमिश न बनिए आप अब सूखा खजूर हों..
माशूक को रंग दीजिए रंग से, गुलाल से-
भागिए मत रंग छुड़ाने खुद मजूर हों..
२३-३-२०१३
*
पर्वत शिखरों पर बसी, धूप-छाँव सँग शाम.
वृक्षों पर कलरव करें, नभचर आ आराम..
000
गीत
*
वक़्त ने दिल को दिए हैं
घाव कितने?...
*
हम समझ ही नहीं पाए
कौन क्या है?
और तुमने यह न समझा
मौन क्या है?
साथ रहकर भी रहे क्यों
दूर हरदम?
कौन जाने हैं अजाने
भाव कितने?
वक़्त ने दिल को दिए हैं
घाव कितने?...
*
चाहकर भी तुम न हमको
चाह पाए.
दाहकर भी हम न तुमको
दाह पाए.
बाँह में थी बाँह लेकिन
राह भूले-
छिपे तन-मन में रहे
अलगाव कितने?
वक़्त ने दिल को दिए हैं
घाव कितने?...
*
अ-सुर-बेसुर से नहीं,
किंचित शिकायत.
स-सुर सुर की भुलाई है
क्यों रवायत?
नफासत से जहालत क्यों
जीतती है?
बगावत क्यों सह रही
अभाव इतने?
वक़्त ने दिल को दिए हैं
घाव कितने?...
*
खड़े हैं विषधर, चुनें तो
क्यों चुनें हम?
नींद गायब तो सपन
कैसे बुनें हम?
बेबसी में शीश निज अपना
धुनें हम-
भाव नभ पर, धरा पर
बेभाव कितने?
वक़्त ने दिल को दिए हैं
घाव कितने?...
*
साँझ सूरज-चंद्रमा सँग
खेलती है.
उषा रुसवाई, न कुछ कह
झेलती है.
हजारों तारे निशा के
दिवाने है-
'सलिल' निर्मल पर पड़े
प्रभाव कितने?
वक़्त ने दिल को दिए हैं
घाव कितने?...
***
नवगीत
विडंबना
*
कोई न चाहे
पुत्र बने निज
भगत गुरु सुखदेव.
नेता जी से पूछो भाई .
व्यापारी से पूछो भाई .
अधिकारी से पूछो भाई .
न्यायमूर्ति से पूछो भाई
वकील साब से पूछो भाई
सब चाहें केवल यश गाना.
भाषण देना चित्र छपाना.
कोई न चाहे
पुत्र बने निज
भगत गुरु सुखदेव.
*
कोई न चाहे
पत्नि-सुता हो
रानी लक्ष्मी बाई.
नेता जी से पूछो भाई .
व्यापारी से पूछो भाई .
अधिकारी से पूछो भाई .
न्यायमूर्ति से पूछो भाई
वकील साब से पूछो भाई
सब चाहें केवल यश गाना.
भाषण देना चित्र छपाना.
कोई न चाहे
पत्नि-सुता हो
रानी लक्ष्मी बाई.
*
मेरे घर में
रहे लक्ष्मी
तेरे घर में काली.
तू ले ले वनवास विरासत
सत्ता मैंने पा ली.
वादे किये न पूरे लेकिन
मुझसे तू मत पूछ.
मुँह मत खोल भले ही मैंने
दी जी भर कर गाली.
चार साल की पूछ न बातें
सत्तर की बतला दे.
अपना वोट मुझे दे दे
जुमलेबाजी बिसरा दे.
२३-३-२०१०

***