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गुरुवार, 12 मार्च 2026

मार्च १२, राम किंकर, सॉनेट, सोरठा, नीरा आर्य, लीलावती, शिव, भव छंद, सवैया, ग़ज़लिका, नवगीत, सरहद

 सलिल सृजन मार्च १२

*
ग़ज़लिका ० बहुत बोला, तनिक सुन भी आँख मूँदे, ख्वाब बुन भी . पढ़ रहा तो समझ भी ले समझकर सच जरा गुन भी . गला है तो गा सकेगा सीख पगले! सही धुन भी . समय की चक्की निठुर है साथ गेहूँ पिसे घुन भी . है महज़ बाज़ार दुनिया क्या जरूरी 'सलिल' चुन भी १२.३.२०२६ ०००
०००
स्मरण युग तुलसी
मुक्तक
युगतुलसी के ग्रंथ पढ़ें नित।
रामभक्ति के सूत्र गुनें नित॥
भवसागर से मुक्ति मिलेगी-
रखें भरोसा स्वप्न बुनें नित॥
*
रामभक्ति मंदाकिनी पावन।
रूप राम जी का मनभावन॥
युगतुलसी का हाथ पकड़ बढ़-
राम नाम जप पाप नसावन॥
*
हनुमत कृपा मिलेगी उसको।
सिया-राम रुचते हैं जिसको॥
अगर न किंकर-धर्म सुहाता-
जन्म-जन्म भव सागर भटको॥
*
किंकर का किंकर बन जा मन।
सिया-राम जी के गुन गा मन॥
हनुमत चरण न छोड़ रख हृदय-
भक्ति-भाव रस में सन जा मन॥
*
रामायणम् सुपावन आश्रम।
राम-नाम गुंजित हो हर दम॥
मूर्ति मनोहर किंकर जी की-
कार दर्शन मिट जाते दुख-गम॥
***
सॉनेट
नटखट
*
नटखट चंचल पवन छेड़ता,
आँचल उड़ा-उड़ा मुस्काता,
भँवरा गुन-गुन गीत सुनाता,
ज़ुल्फ़ों से हँस खेल खेलता।
तिरस्कार रह मौन झेलता,
कली-कली पर जान लुटाता,
रंग देख जग दूर भगाता,
मन बेदाग न कोई देखता।
नटखट भ्रमर न धर्म छोड़ता,
सुंदरता की करता पूजा,
जिसको जो कहना हो कह ले।
नटखट पवन न हृदय तोड़ता,
मंदिर मन समान नहिं दूजा,
प्रेम भाव से इसमें रह ले।
१२.३.२०२४
***
सोरठा सलिला
*
मन के अंदर झाँक, सुन्दरतम है ह्रदय में।
नहीं रूप को ताक, मिट्टी मिट्टी में मिले।।
*
गेह गेह का नाथ, है केवल विश्वास तक।
देह देह के साथ, रहती केवल श्वास तक।।
*
करने रास का पान, भँवरा झूमे कली पर।
कली न छोड़े आन, नहीं शाख को छोड़ती।।
*
नहीं गुलामी नाम, अनुशासन को दीजिए।
आजादी का काम, उच्छंखलता करती नहीं।।
*
चरणबद्ध हो कार्य, हो विकास केवल तभी।
मनमानी स्वीकार्य, उन्नति को होती नहीं।।
*
ग्यारह होते रूद्र, त्रयोदिशी तिथि तेरहीं।
पीकर शोक समुद्र, शिव भज अमृत पाइए।।
*
नेह नर्मदा स्नान, सलिल पान कर मौन हो।
करिए तट पर ध्यान, नाद अनहद भी सुनें।।
१२-३-२०२३
***
अमर शहीद नीरा आर्य
एक थीं श्रीमती नीरा आर्य ( ०५-०३-१९०२ / २६-०७-१९९८) - नेताजी सुभाषचंद्र बोस की रक्षा के लिए इस बहादुर महिला का "स्तन" तक काट दिया गया। नीरा आर्य ने श्रीकांत जोइरोंजोन दास से शादी की, जो ब्रिटिश पुलिस में एक सीआईडी ​​इंस्पेक्टर थे।
नीरा आर्य एक सच्ची राष्ट्रवादी थीं, उनके पति एक सच्चे ब्रिटिश नौकर थे। देशभक्त होने के नाते नीरा सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय सेना की झांसी रेजिमेंट में शामिल हुईं। नीरा आर्य के पति इंस्पेक्टर श्रीकांत जोइरोंजोन दास सुभाषचंद्र बोस की जासूसी कर रहे थे और जोइरोंजोन दास ने एक बार सुभाषचंद बोस पर गोलियाँ चला दीं लेकिन सौभाग्य से सुभाष चंद जी बाल-बाल बच गए। सुभाष चंद बोस को बचाने के लिए नीरा आर्य ने अपने पति की चाकू मार कर हत्या कर दी थी।
I.N.A के आत्म समर्पण के बाद लाल किले में फ़ौज के सैनिकों पर एक मुकदमा नवंबर-१९४५ से मई-१९४६ तक चला। नीरा आर्य को छोड़कर सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया । वहीं उसे सेलूर जेल, अंडमान ले जाया गया, जहाँ उसे हर दिन प्रताड़ित किया जाता था। एक लोहार लोहे की जंजीरें और बेड़ियाँ हटाने आया। उसने जान बूझकर बेड़ियाँ हटाने के बहाने उनकी त्वचा का थोड़ा सा हिस्सा भी काट दिया और उनके पैरों को हथौड़े से कई बार जानबूझ चोट पहुँचाई। नीरा आर्य ने असहनीय दर्द को असाधारण धैर्य रखकर सहा। जेलर, जो इस पर पीड़ा का आनंद ले रहा था, जेलर ने नीरा को रिहा करने की पेशकश इस शर्त के साथ की कि वह सुभाष चंद बोस के ठिकाने का भेद बता दें। नीरा आर्य ने जवाब दिया कि बोस की मृत्यु एक विमान दुर्घटना में हुई थी और पूरी दुनिया इसके बारे में जानती है।
जेलर ने विश्वास करने से इनकार कर दिया और जवाब दिया, तुम झूठ बोल रही हो, सुभाष चंद बोस अभी भी जीवित हैं। तब नीरा आर्य ने कहा "हाँ, वो ज़िंदा हैं, वो मेरे दिल में रहते हैं ! जेलर ने गुस्से में आकर कहा, "फिर हम सुभाष चंद बोस को तुम्हारे दिल से निकाल देंगे" जेलर ने उनको गलत तरीके से छुआ और कपड़ों को फाड़ दिया। कपड़े अलग किए और लोहार को उनके स्तन काटने का आदेश दिया। लोहार ने तुरंत ब्रेस्ट रिपर लिया और उसके दाहिने शरीर को कुचलने लगा। बर्बरता यहीं नहीं रुकी, जेलर ने उनकी गर्दन पकड़ ली और कहा कि मैं आपके दोनों 'हिस्सों" को उनके स्थान से अलग कर दूँगा।
उन्होंने आगे बर्बर मुस्कान के साथ कहा गनीमत है "ये ब्रेस्ट रिपर गर्म नहीं हुआ है वरना आपके ब्रेस्ट पहले ही कट चुके होते"। नीरा आर्य ने अपने जीवन के अंतिम दिन फूल बेचने में बिताए और वह फलकनुमा, भाग्य नगरम में एक छोटी सी झोपड़ी में रहती थीं। सरकार ने उनकी झोपड़ी को सरकारी जमीन पर बनाने का आरोप लगाते हुए गिरा दिया।
नीरा आर्य की मृत्यु २६-०७- १९९८ को एक बेसहारा, लावारिस, अनजानी के रूप में हुई, जिसके लिए पूरी पृथ्वी पर कोई रोने वाला तक नहीं था।
***
लीलावती
गणितज्ञ लीलावती का नाम हममें से अधिकांश लोगों ने नहीं सुना है। उनके बारे में कहा जाता है कि वो पेड़ के पत्ते तक गिन लेती थी। आज यूरोप सहित विश्व के सैंकड़ो देश जिस गणित की पुस्तक से गणित को पढ़ा रहे हैं, उसकी रचयिता भारत की एक महान गणितज्ञ महर्षि भास्कराचार्य की पुत्री “लीलावती” है।
दसवीं सदी की बात है, दक्षिण भारत में भास्कराचार्य नामक गणित और ज्योतिष विद्या के एक बहुत बड़े पंडित थे। उनकी कन्या का नाम लीलावती था। वही उनकी एकमात्र संतान थी। उन्होंने ज्योतिष की गणना से जान लिया कि वह विवाह के थोड़े दिनों के ही बाद विधवा हो जाएगी। उन्होंने बहुत कुछ सोचने के बाद ऐसा लग्न खोज निकाला, जिसमें विवाह होने पर कन्या विधवा न हो। विवाह की तिथि निश्चित हो गई। जलघड़ी से ही समय देखने का काम लिया जाता था।
एक बड़े कटोरे में छोटा-सा छेद कर पानी के घड़े में छोड़ दिया जाता था। सूराख के पानी से जब कटोरा भर जाता और पानी में डूब जाता था, तब एक घड़ी होती थी। कहते हैं अपने मन कुछ और है, कर्ता के कुछ और, होनी होकर ही रहती है। लीलावती सोलह श्रृंगार किए सजकर बैठी थी, सब लोग उस शुभ लग्न की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक मोती लीलावती के आभूषण से टूटकर कटोरे में गिर पड़ा और सूराख बंद हो गया; शुभ लग्न बीत गया और किसी को पता तक न चला।
विवाह दूसरे लग्न पर ही करना पड़ा। लीलावती विधवा हो गई, पिता और पुत्री के धैर्य का बांध टूट गया। लीलावती अपने पिता के घर में ही रहने लगी। पुत्री का वैधव्य-दु:ख दूर करने के लिए भास्कराचार्य ने उसे गणित पढ़ाना आरंभ किया। उसने भी गणित के अध्ययन में ही शेष जीवन की उपयोगिता समझी। थोड़े ही दिनों में वह उक्त विषय में पूर्ण पंडिता हो गई। पाटी-गणित, बीजगणित और ज्योतिष विषय का एक ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ भास्कराचार्य ने बनाया है। इसमें गणित का अधिकांश भाग लीलावती की रचना है।
पाटीगणित के अंश का नाम ही भास्कराचार्य ने अपनी कन्या को अमर कर देने के लिए ‘लीलावती’ रखा है। भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो काव्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे। उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे। कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे। वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, “हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं…।” बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने “लीलावती” रख दिया।
आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है। लीलावती का एक उदाहरण देखें- ‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई।
अये, बाले लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे..?‘
उत्तर-कमल के १२० फूल।
वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं ‘अये बाले,लीलावती, वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है। दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है। इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।‘
‘मूल” शब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ के अर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था ‘वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात् वर्ग एक भुजा‘।
इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं।
लीलावती के प्रश्नों का जबाब देने के क्रम में ही “सिद्धान्त शिरोमणि” नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया, जिसके चार भाग हैं- (१) लीलावती (२) बीजगणित (३) ग्रह गणिताध्याय और (४) गोलाध्याय।
‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।
बादशाह अकबर के दरबार के विद्वान फैजी ने सन् १५६७ में “लीलावती” का फारसी भाषा में अनुवाद किया। अंग्रेजी में “लीलावती” का पहला अनुवाद जे. वेलर ने सन् १७१६ में किया। कुछ समय पहले तक भी भारत में कई शिक्षक गणित को दोहों में पढ़ाते थे। जैसे कि पन्द्रह का पहाड़ा…तिया पैंतालीस, चौके साठ, छक्के नब्बे… अट्ठ बीसा, नौ पैंतीसा…।
इसी तरह कैलेंडर याद करवाने का तरीका भी पद्यमय सूत्र में था-
सित अप जू नव तीस के, बाकी के इकतीस।
अट्ठाइस की फरवरी चौथे सन उनतीस।।
गणित अपने पिता से सीखने के बाद लीलावती भी एक महान गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री के रूप में जानी गयी। मनुष्य के मरने पर उसकी कीर्ति ही रह जाती है। आज गणितज्ञो को गणित के प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में "लीलावती पुरूस्कार" से सम्मानित किया जाता है।
***
शिव पूजन
शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, चंदन और अक्षत चढ़ाने से शंकर भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं।शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है? जानिए-
जल से रुद्राभिषेक करने पर वृष्टि होती है।
- कुशा जल से अभिषेक करने पर रोग व दु:ख से छुटकारा मिलता है।
- दही से अभिषेक करने पर पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।
- गन्ने के रस से अभिषेक करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
- मधुयुक्त जल से अभिषेक करने पर धनवृद्धि होती है।
- तीर्थ जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- इत्र मिले जल से अभिषेक करने से रोग नष्ट होते हैं।
- दूध से अभिषेक करने से पुत्र प्राप्ति होगी। प्रमेह रोग की शांति तथा मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
- गंगा जल से अभिषेक करने से ज्वर ठीक हो जाता है।
- दूध-शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है।
- घी से अभिषेक करने से वंश विस्तार होता है।
१२-३-२०२२
***
मुक्तक
सूरज चमक रहा माथे पर, बिखरी धूप कपोलों पर
नव विचार कर रहे सवारी, बहते पवन-झकोरों पर
शांत सलिल में बिंबित रवि-छवि, लहर-लहर सिंदूरी कर
कांति नई पाकर कांता से, हो कविता दृग-कोरों पर
*
क्षणिका
*
जानेमन
अब तक रही
क्यों दुश्मने-जां हो गई?
चैन उसके बिन न था
बेचैनियाँ क्यों बो रही?
आस मेरी
प्यास मेरी
श्वास की दुश्मन बनी
हास को छोड़ा नहीं
संत्रास फिर-फिर बो गई।
*
अठ सलल सवैया
११२-११२-११२-११२-११२-११२-११२-११२-११
*
जय हिंद कहें, सब संग रहें, हँस हाथ गहें, मिल जीत वरें हम
अरि जूझ थकें, हथियार धरें, अरमान यही, कबहूँ न डरें हम
मत-भेद भले, मन-भेद नहीं, हम एक रहे, सच नेक रहें हम
अरि मार सकें, रण जीत तरें, हँस स्वर्ग वरें, मर के न मरें हम
१२-३-२०१९
***
नवगीत:
सरहद
*
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, सरहद पार
गया मैं लेने।
*
उठा हुआ सर
हद के पार
चला आया तब
अनजाने का
हाथ थाम कर।
मैं बहुतों के
साथ गया था
तुम आईं थीं
निपट अकेली।
किन्तु अकेली
कभी नहीं थीं,
सँग आईं
बचपन-यौवन की
यादें अनगिन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, पहुँच गया
मैं खुद को देने।
*
था दहेज भी
मैके की
शुभ परम्पराओं
शिक्षा, सद्गुण,
संस्कार का।
ले पतवारें
अपनेपन की
नाव हमें थी
मिलकर खेनी।
मतभेदों की
खाई, अंतरों के
पर्वत लँघ
मधुर मिलन के
सपने बुन-बुन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, संग हुए हम
अंतर खोने।
*
खुद को खोकर
खुद को पाकर
कही कहानी
मन से मन ने,
नित मन ही मन।
खन-खन कंगन
रुनझुन पायल
केश मोगरा
लटें चमेली।
शंख-प्रार्थना
दीप्ति-आरती
सांध्य-वंदना ,
भुवन भारती
हँसी कीर्ति बन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, मिली राजश्री
सार्थक होने।
*
भवसागर की
बाधाओं को
मिल-जुलकर
था हमने झेला
धैर्य धारकर।
सावन-फागुन
खुशियाँ लाये
सोहर गूँजे
बजी ढोलकी।
किलकारी
पट्टी पूजन कर,
धरा नापने
नभ को छूने
बढ़ी कदम बन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, अँगना खेले
मूर्त खिलौने।
*
देख आँख पर
चश्मे की
मोहिनी हँसे हम,
धवल केश की
आभा देखें।
नव पीढ़ी
दौड़े, हम थकते
शांति अंजुला
हुई सहेली।
अन्नपूर्णा
कम साधन से
अधिक लक्ष्य पा
अर्थशास्त्र को
करतीं सार्थक।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, सपने देखे
संग सलोने।
१२-३-२०१६
***
छंद सलिला:
भव छंद
*
लक्षण: जाति रौद्र, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ११, चरणान्त लघु गुरु गुरु या गुरु
लक्षण छंद:
एकादश पग रखो, भवसिंधु पार करो
चरण आदि मन चाहा, चरण अंत गुरु से हो
उदाहरण:
१. आशा का बीज बो, कोशिश से फसल लो
श्रम सीकर नर्मदा, भव तारें वर्मदा
२. सूर्य चन्द्र सितारा, सकल जगत निखारा
भव को जब निहारा, खुद को भी बिसारा
रूप-रंग सँवारा, असुंदर न गवारा
सच जिसने बिसारा, रण न लड़ रण हारा
३. समय शिला पर लिखो, सबसे आगे दिखो
शब्द नये उकेरो, नव उजास बिखेरो
४. नित्य हरि गुण गाओ, मन में शांति पाओ
छन्दों में मन रमा, कष्टों को दो भुला
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, माया, माला, ऋद्धि, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)
१२-३-२०१४
***
नव गीत:
ऊषा को लिए बाँह में
*
ऊषा को लिए बाँह में,
संध्या को चाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
पानी के बुलबुलों सी
आशाएँ पल रहीं.
इच्छाएँ हौसलों को
दिन-रात छल रहीं.
पग थक रहे, मंजिल
कहीं पाई न राह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
तृष्णाएँ खुद ही अपने
हैं हाथ मल रहीं.
छायाएँ तज आधार को
चुपचाप ढल रहीं.
मोती को रहे खोजते
पाया न थाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
शिशु शशि शशीश शीश पर
शशिमुखी विलोकती.
रति-मति रतीश-नाश को
किस तरह रोकती?
महाकाल ही रक्षा करें
लेकर पनाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
***
कुण्डलिया
*
हिंदी की जय बोलिए, हो हिंदीमय आप.
हिंदी में नित कार्य कर, सकें विश्व में व्याप..
सकें विश्व में व्याप, नाप लें सकल ज्ञान का.
नहीं व्यक्ति का, बिंदु 'सलिल' राष्ट्रीय आन का..
नेह-नरमदा नहा बोलिए होकर निर्भय.
दिग्दिगंत में गूँज उठे, फिर हिंदी की जय..
१२-३-२०१०
***

बुधवार, 11 मार्च 2026

भारतीय रेल, ओशो,

 ओशो और भारतीय रेल 

यह बात वर्ष 1960 की है। ओशो इटारसी (म.प्र.) के एक महाविद्यालय में व्याख्यान देने आये थे। व्याख्यान के तुरंत बाद उन्हें ट्रेन से जबलपुर के लिये रवाना होना था। स्टेशन आते समय रास्ते में किसी कारण थोड़ी देर हो गई। कुछ मित्र उन्हें विदा करने रेलवे स्टेशन आये थे। इटारसी बड़ा रेलवे जंक्शन हैं जिसमें कई प्लेटफॉर्म्स हैं, जिनमें फुट ओवरब्रिज से जाना होता है। अभी ओशो फुट ओवरब्रिज पर ही थे, देखा कि उन्हें जिस ट्रेन से जाना था वह चलना शुरू हो गयी है। मित्रों ने कहा भी कि अब नीचे जाने का कोई फ़ायदा नहीं है, जब तक हम नीचे पहुँचेंगे तब तक ट्रेन निकल चुकी होगी। चलिए वापस चलते हैं।

ओशो मुस्कुराए, बोले नहीं, नीचे चल कर देखते हैं। उन्होंने कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई, अपनी सामान्य चाल से चलते हुए आराम से सीढ़ियाँ उतर कर प्लेटफार्म पर पहुँचे। न चाहते हुए भी मित्र उनके साथ नीचे आये। देखा गाड़ी प्लेटफार्म के बाहर निकल कर अचानक रुक गई और वापस पीछे आने लगी। जिस डिब्बे में ओशो का आरक्षण था वह ठीक वहीं आकर रुका जहां वे खड़े हुए थे। कंडक्टर बाहर आया और बोला, आइये आचार्य जी। मित्रों से विदा ले ओशो गाड़ी में सवार हुए और गाड़ी चल दी। आश्चर्यचकित मित्र देखते ही रह गये।

बाद में इस बारे में किसी ने ओशो से पूछा भी तो उन्होंने हँस कर टाल दिया। कहा कि शायद कुछ ज़रूरी सामान लोड होने से रह गया होगा जिसे लोड करने गाड़ी को पीछे लौटना पड़ा और यह मात्र एक संयोग था कि डिब्बा ठीक मेरे सामने आकर रुका।

दूसरी घटना भी रेलयात्रा से ही संबंधित है।

उन दिनों, 1960 के दशक में सूचनाओं का आदान-प्रदान मुख्यतः पत्राचार द्वारा ही हुआ करता था। भारतीय डाक सेवा भी अपनी श्रेष्ठ कार्यक्षमता के लिए जानी जाती थी। भारत के किसी भी कोने में पत्र केवल ३-४ दिन में पहुँच जाता था।

ओशो के प्रवचन एवम ध्यान के कार्यक्रम देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित हुआ करते थे। ओशो 1-2 सप्ताह पूर्व ही आयोजकों को पत्र द्वारा सूचित कर दिया करते थे कि वे किस ट्रेन से किस समय वहाँ पहुँचेंगे। गुजरात में एक ध्यान शिविर आयोजित था। ओशो ने सप्ताह पूर्व ही आयोजकों को पत्र लिख कर ट्रेन और उसके वहाँ पहुँचने का समय सूचित कर दिया।

आयोजक मित्रों को पत्र पढ़ कर हैरानी हुईं, ओशो ने जिस ट्रेन का नाम लिखा था और उसके पहुँचने का जो समय लिखा था वह उस ट्रेन के नियत समय से मेल नहीं खाता था। ख़ैर, नियत दिन पर आयोजक मित्र उस ट्रेन के नियत समय पर उन्हें लेने स्टेशन पहुँचे। स्टेशन पहुँच कर पता चला कि ट्रेन कुछ देर से चल रही हैं। बाद में घोषणा हुई कि और लेट हो गई हैं। मित्रों के विस्मय का तब ठिकाना न रहा जब ट्रेन ठीक उसी समय पहुँची जो ओशो ने अपने पत्र में लिखा था। ओशो के ट्रेन से उतरते ही मित्रों का पहला प्रश्न यही था कि आपको कैसे पता था कि आज ट्रेन इस समय यहाँ पहुँचेगी?

ओशो हँसने लगे और बोले मुझे कुछ पता नहीं था वह गलती से लिख दिया होगा। भूल तो सभी से हो जाती है।

गोविंद बल्लाल खेर / गोविंद पंत बुंदेला

 22 अक्टूबर 1758 दोपहर 2 बजे , दोआब मोर्चा , कानपुर

पेशवाओ ने सरदार रघुनाथ पंडितराव के हमलों के फलस्वरूप सन 1751 से उत्तर में अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी । वे जाट राजा सुरजमाल के साथ रोहिल्लो को जकड़ने में लगे थे । इस काम मे पेशवाओ के साथ आगरा से साबाजी शिन्दे और तुकोजी होल्कर भी मजबूती से घेराव कर रहे थे । सारा ध्यान रोहिल्ला मुल्ला नजीब जंग और मुग़ल की राजपूत रानी मालिका ज़मानी को पूर्वी दिल्ली और मेरठ में निस्तनाबूत करने में था कि अचानक पठानों ने हरमिंदर साहिब , अमृतसर को नापाक कर दिया और स्वर्ण मंदिर तोड दिया ।।

सिख सरदार अवाक रह गए , उनके सबसे पवित्र स्थान स्वर्ण मंदिर के तालाब में पठानों का कब्जा हो गया था । गिनती के 15 हज़ार सिख अब पठानों की 40 हजारी फौज़ से कैसे लड़ते ?

सरहिन्द में सिखों के तीन बेहतरीन सरदार

१. जस्सासिंह आहलूवालिया

२. अला जाट

३. जस्ससिंह रामगढ़िया

ने लाहौर के पुराने मुघल गवर्नर अदीना बेग से मुलाकात की और चारो ने अमृतसर को मुक्त कराने पेशवा पंडितराओ रॉघोबा को संदेसे भेजे ।। संदेसे 6 थे और इस प्रकार है ।

पंडितराव राजा रॉघोबा ।।

सिरहिन्द में तुर्क

पठान अब्दुस्समन्द खान आ गए है ।

हरमिंदर साहब नापाक कर दिया है ।

पवित्र मंदिर में बेग़ैरत लाशें है ।

ढक्क्न की मदद जरूरी ।

हिन्दूख़लसा का सफ़ाया होना ।

रॉघोबा उर्फ रघुनाथराव ने पूर्व की मुहिम रोक दी और सिरहिन्द की ओर निकल पड़े और फरवरी में पेशवा , मराठो की भयंकर फौज़ के साथ पंजाब में घुस आए ।

अब यहां से शुरू हुई अमृतसर को मुक्त करने की कवयाद ।। इसमे मराठाओ के भगवा के नीचे निम्मनलिखित सरदार पहुंचे और सिखों के सबसे पवित्र स्थान को मुक्त करने , शुरू हुआ पठान - पेशवा सँघर्ष ।।

24 फरवरी : कुंजपुरा की जंग : पेशवा कृष्णराव काले ( दीक्षित ) और शिवनायरायन गोसाइँ बुन्देला ने 2400 पठानों को मार कर खूनी जंग लड़ी । 8 घण्टे की जंग के बाद यह किला जीत लिया गया । पंजाब में नंगी तलवारों के साथ पेशवाओ का प्रवेश ।

8 मार्च : सिरहिन्द की जंग : पेशवा रघुनाथ राओ रॉघोबा , सरदार हिग्निस , सरदार तुकोजी राओ होल्कर , सरदार संताजी सिन्धिया , सरदार रेंकोजी आनाजी , सरदार रायजी सखदेव , सरदार पेशवा अंताजी मानकेश्वर , पेशवा गोविंद पंत बुंदेला  सागर , पेशवा मानसिंग भट्ट कॉलिंजर , पेशवा गोपालराव बर्वे , पेशवा नरोपण्डित , पेशवा गोपालराव बाँदा और कश्मीरी हिन्दूराव की 22 हज़ार हुज़ूरात फौज़ ने 3 दिन में सिरहिन्द जीत लिया । 10 हज़ार पठान मारे गए और उनका सरदार अब्दुस समंद खान को बंदी बना लिया गया ।। अब अमृतसर की मुक्ति और पेशवाओ के बीच केवल एक जगह शेष थी - लाहौर ।।

लाहौर और अमृतसर की जंग : 14 मार्च 1758 :

800 सालो में पहली बार किसी हिन्दू फौज़ का लाहौर में हमला ।। भगवामय पेशवा विजय , हिन्दू फौज़ पहली बार लाहौर में पहुंचे ।

लाहौर में पठानो का राजकुमार " तैमूर खान " और " जहान खान " मजबूती के साथ मोर्चाबंदी किये हुए थे । पेशवा घुनाथराव ने नरोपण्डित , संताजी और तुकोजीराव होल्कर के साथ लाहौर के ऊपर पूरी ताकत से हमला किया । बाकी सरदारों ने लाहौर के साथ अमृतसर में धावा बोला । यह हमला इतना जोरदर था कि 5 km दूर खड़ी सिखों की फौज़ को पठानों की चीखें सुनाई देने लगी । मराठो के आ जाने से सिखों में जोश आ गया । अमृतसर और लाहौर के बीच 22 km में पठानों का क़त्लेआम शुरू हुआ । उनको हरमिंदर साहेब की सजा मिलनी शुरू हुई । शाम तक लाहौर से तुर्क और पठान निकाल दिए गए और अमृतसर में रघुनाथराव रॉघोबा का कब्जा हुआ ।

सिखों के स्वर्ण मंदिर में पेशवा फौज़ ने प्रवेश किया और राघोबा पंडितराओ ने आला जाट को मंदिर पुनर्निर्माण के लिए अफ़ग़ानों से लूटे गए दरफ़ात भेंट दिये । सिखों ने आदिना बेग और अहलूवालिया की सेनाओं ने अमृतसर को घेर लिया और हरमंदिर साहिब के ऊपर खालसा का ध्वज , पेशवाओं की मर्यादा से फिर फहराने लगा ।

मजे की बात और तो इस पेशवा - पठान युद्ध का अंत है ।

जब दो वर्ष बाद पेशवाओ को पनीपतः में जरूरत पड़ती है तो सिख शांत रहते है और मदद को नही आते । हमने जितने सरदारों के नाम लिखे है , सभी पनीपत मे पठानों से लड़ते मारे जाते है । लेकिन मरते समय भी यह मराठे , पठानों की हवा इतनी टाइट कर देते है कि पठान फिर भारत मे नही घुसते । पठान वापस अपने गरीब देश लौट जाते है । पेशवा अपना बदला नजीब जंग से लेने मेरठ चले जाते है और खाली रह जाता है पंजाब और यहां के लोग । दूसरो की लड़ाई लड़ने प् प [ परिणाम हुआ पानीपत की मौतें और पेशवा वंश का अंत ।

साभार- भाऊसाहेब प्रभाकर भट्ट श्रीमन्तकॉलिंजर किरवी हुक़ूक़, सरदार मानसिंघा भट्ट - हर्मिन्दरसाहेब शहीदी शिर्का ।।

प्रभाकर भट्ट 🙏

 गोविंद पंत बुंदेला सागर 

गोविंद बल्लाल खेर (1710 – 17 दिसंबर 1760), जिन्हें ऐतिहासिक रूप से गोविंद पंत बुंदेला के नाम से जाना जाता है , 1733 से 1760 के दौरान उत्तरी भारत में पेशवाओं के सैन्य जनरल थे। पेशवा बाजीराव ने उन्हें बुंदेलखंड में महाराजा छत्रसाल द्वारा उन्हें दिए गए राज्य के एक तिहाई हिस्से का न्यासी नियुक्त किया था । उन्होंने कालपी नगर पर शासन किया और बाद में यह उनके वंशज नाना गोविंद राव को जागीर के रूप में दिया गया । इसके बाद गोविंद राव ने जालौन राज्य पर शासन किया।  1 

गोविंद पंत का जन्म लगभग 1710 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के 'नेवारे' गाँव में एक करहाड़े ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता गाँव के कुलकर्णी थे और अपने पिता की असामयिक मृत्यु के बाद गोविंद पंत को यह पद विरासत में मिला। हालाँकि, घुमंतू होने के कारण, उन्हें यह पद और अपना गृहनगर दोनों छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा और इस प्रकार वे नौकरी की तलाश में भटकने के लिए विवश हो गए.  उन्होंने उत्तर भारत के स्थापित मराठा जनरलों: मल्हारराव होल्कर और अंताजी मानकेश्वर गांधे के अधीन काम किया। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध और प्रशासन में अच्छा अनुभव प्राप्त किया। देशस्थ ब्राह्मण अंताजी की सिफारिश पर, बाजीराव पेशवा ने गोविंद पंत को कुछ काम सौंपे और उन्हें बेहद उपयोगी पाया। जल्द ही वह बाजीराव के सबसे पसंदीदा जनरलों में से एक बन गए। जब ​​बाजीराव को 1733 में महाराजा छत्रसाल से बुंदेलखंड मिला, तो उन्होंने गोविंद पंत को इस नव-अधिग्रहित भूमि के लिए अपना प्रशासक और पावर ऑफ अटॉर्नी नियुक्त किया।  उन्हें मराठा साम्राज्य के सबसे बड़े ' धन संग्राहक ' के रूप में जाना जाता था 

पानीपत की लड़ाई में योगदान

पानीपत के युद्ध के दौरान गोविंद पंत ने सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व में मराठा सेना की सहायता के लिए अपनी पूरी कोशिश की । उन्होंने स्वयं अहमद शाह अब्दाली को गंगा और यमुना के बीच स्थित दोआब क्षेत्र में घेर लिया था और उसे पूरी तरह से असहाय कर दिया था। लेकिन जब गोविंद को मौका मिला, तो उन्होंने दिल्ली में नारो शंकर को बड़ी मात्रा में सामग्री सौंपी और अहमद शाह अब्दाली की आपूर्ति पर हमला शुरू कर दिया। 2   दुर्भाग्यवश, एक गलतफहमी के कारण अब्दाली के सेनापति अताईखान की सेना के साथ अप्रत्याशित झड़प में उनकी जान चली गई।

अनुभवी इतिहासकार वी.के. राजवाडे, गोविंद पंत को पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों की पराजय के लिए जिम्मेदार मानते हैं । वे गोविंद को एक महत्वपूर्ण व्यक्ति भी नहीं मानते। इसके अलावा, वे उन पर हमेशा भ्रष्ट होने का आरोप लगाते हैं। जबकि सुरेश शर्मा के अनुसार, "पानीपत में हार के लिए बालाजी बाजीराव का भोग-विलास जिम्मेदार था। वे पैठन में अपनी दूसरी शादी का जश्न मनाते हुए 27 दिसंबर तक रुके रहे, जब तक बहुत देर हो चुकी थी।"  3 

संदर्भ

  1.  भवन सिंह राणा (2014). झांसी की रानी . डायमंड पॉकेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड. ISBN 9789350830031.
  2.  आभास वर्मा द्वारा लिखित पानीपत का तीसरा युद्ध ISBN 9788180903397भारतीय कला प्रकाशन
  3.  शर्मा, सुरेश के. (2006). हरियाणा: अतीत और वर्तमान . मित्तल प्रकाशन. पृ. 173. ISBN  97881832404687 मार्च 2019 को पुनः प्राप्त किया गया
  • 'मराठी रियासत खंड I' ( मराठी ) गोविंद सखाराम सरदेसाई द्वारा
  • 'पेशव्यांची बखर' (मराठी) संपादकीय नोट्स आरवी हेरवाडकर द्वारा
  • 'भाऊसाहिबाची बखर' (मराठी) संपादकीय नोट्स आरवी हेरवाडकर द्वारा
  • वीके राजवाड़े द्वारा 'ऐतिहासिक प्रस्थान' (मराठी)।
  • आभास वर्मा द्वारा लिखित 'पानीपत का तीसरा युद्ध' (ISBN) 9788180903397भारतीय कला प्रकाशन

मार्च ११, रामकिंकर, श्रद्धा, गीत, दोहा, त्रिभंगी, छंद, बुंदेली, सरस्वती, सॉनेट, सुजाता, वर्ण पिरामिड, लघुकथा, हाइकु, साई

 सलिल सृजन मार्च ११

*
छंदशाला दोहा-रोला-कुंडलिया ० केशराशि हो भूमि तक, मुख पर अप्रतिम तेज। नयन काम के बाण हों, मधुरस अधर सहेज।। -अशोक व्यग्र मधुरस अधर सहेज, दहेज मिला मन को मन। रखना सदा सहेज, कभी मन रहे न उन्मन।। मुश्किल किंचित नहीं, हे प्रभु! आए दरपेश।। तन्मय हो हों संग, कुछ अंतर रहे न लेश।। ०००
साई! भव सागर से तार
0
तुझ सम नहीं जगत में दूजा
मन भरमाया तुझे न पूजा
कंकर कंकर में शंकर है
मुझे सहारा तेरा सूझा
तेरी कृपा अपार
साई! भव सागर से तार
.
दीनबंधु हे अंतर्यामी
मैं सेवक तुम मेरे स्वामी
चरण शरण आ क्षण में तरते
भक्त तुम्हारे निज सुखगामी
करिए दया निहार
साई! भव सागर से तार
.
गहिए हाथ सहारा देकर
स्वामी! निज छाया में लेकर
पग-पग पर ठोकर खा हारा
पार करो भव नैया खेकर
बिगड़ी बना सँवार
साई! भव सागर से तार
.
कार्यशाला
दोहा-रोला-कुंडलिया ० नयन रत्न धन प्राप्त कर, नयन हो गये धन्य। धन्यवाद कहते नहीं, सुने न कोई अन्य।। -अशोक व्यग्र सुने न कोई अन्य, नहीं फैलाए र् यूमर। फैले नहीं प्रवाद, नहीं हो चर्चा-ह्यूमर।। नयन सिया अरु राम, करें मर्यादा मंचन। नयन राधिका-श्याम, रास रच करते मंथन।। ११.३.२६
000
गीत
जो मेरा सो तेरा साधो! जो मेरा सो तेरा रे!
आए आज चले जाना कल, किसका सदा बसेरा रे!
.
काया छाया माया ने भरमाया सारी दुनिया को
सबने सबसे लिया, दिया हँस वह ही समझ दुनिया को।
सबका सबको गर न मिले तो आपस में होती तकरार-
अपना जो आखिर में वह भी दे जाना है दुनिया को।
चार दिनों के लिए ठिकाण फिर उठना है डेरा रे!
जो मेरा सो तेरा साधो! जो मेरा सो तेरा रे!
.
तेरा तुझको अर्पण कर दूँ, मैंने कुछ भी नहीं तहा
आया खाली हाथ, न हाथों में कुछ अपने कभी रहा।
गड्ढा जल रोके रखता जो वह जाता है जल्दी सूख
वही नदी जिंदा रह पुजती जिसमें हर पल सलिल बहा।
भोर रात काली दे, देती काली रात सवेरा रे!
जो मेरा सो तेरा साधो! जो मेरा सो तेरा रे!
.
लिए अंजली में सुर सातों, प्रीति किरण प्रभु को अर्पित
करे साधना सरला चित नित, मुकल मना कर यश अर्जित
शारद-इला-उमा बिन विधि-हरि-हर को जग में पूछे कौन-
ऋद्धि-सिद्धि सह ही विघ्नेश्वर होते सकल सृष्टि पूजित।
आता-जाता, जाता-आता हर जन हो पग फेरा रे!
११.३.२०२५
000
स्मरण युग तुलसी
मुक्तक
भज मन राम सिया निश-दिन हो भवसागर से पार।
बन जा किंकर हनुमत का तब ही होगा उद्धार।।
रिश्ते-नाते मोह न माया हो सकते निष्काम-
करना है तो कर गुरुवर के श्री चरणों से प्यार।।
श्री रामकिंकर को सुमिर हनुमत कृपा हो जाएगी।
हनुमत कृपा ही जानकी- रघुवर कृपा दिलवाएगी।।
भव ताप सारे पाप क्षण में आप ही जल जाएँगे।
सब जीव हो संजीव भव से आप ही तर जाएँगे।।
दोहा सलिला
सूर्य बिंदु संघर्ष का, बढ़े हताशा-व्यास।
कम न पड़े संभावना-परिधि बँधाए आस।।
द्वेष-ईर्ष्या मुक्त मति, ले अंतर्मन जीत।
सूर्य सांख्य योगी तपे, सबसे कर सम प्रीत।।
सूर्य बिंदु रेखा किरण, आभा वर्तुल वृत्त।
ठोस वायु द्रव पिंड है, गोल न अस्थिर चित्त।।
काया की छाया नहीं, माया सके न व्याप।
सूर्य तूर्य दस दिशा में, व्याप रहा चुपचाप।।
११.३.२०२४
•••
गीत
श्रद्धा के टुकड़े-टुकड़े कर
ठठा रहे लिव इन की जय जय।
धन्य-धन्य नारी विमर्श यह
रहे निर्भया जहाँ न निर्भय।।
पोथी पढ़, बढ़-चढ़ बातें कर
कमा रुपैया मनमानी कर।
तज संयम की लछमन रेखा
सिर्फ देह को रजधानी कर।
कन्यादान न करने देना
बाबुल को ठेंगा दिखला दो-
वरो शाप वरदान समझकर
ढक्कन धरो समझदानी पर।
बनना बोल्ड, बोल्ड हो चाहे
मर्यादा कुचलो हो निर्दय
ठठा रहे लिव इन की जय जय।
परंपरा पिछड़ापन बोलो
निष्ठा को सिक्कों से तोलो।
आजादी को उच्छृंखलता
मानो अमृत में विष घोलो।
देह दान को युवा क्रांति कह
गैरों की बाँहों में झूलो।
ढाँको कम तन अधिक दिखा
हो प्रगतिशील मन ही मन फूलो।
बिन ब्याहे पर्यंकशायिनी
हो सतीत्व का कर डालो क्षय
ठठा रहे लिव इन की जय जय।
अवसरवादी की लफ्फाजी
सुनो मान लो वादा सच्चा।
मात-पिता रोकें, कह दुश्मन
भागो घर से देकर गच्चा।
हवस कुंड को खुद दहकाओ
साथी अदल-बदल मुस्काओ।
अपनी गलती कभी न मानो-
दुनिया को दोषी बतलाओ।
बिना नींव की बने इमारत
जो उसका गिरना ही है तय।
ठठा रहे लिव इन की जय जय
११.३.२०२३
•••
सॉनेट
बुंदेली शारद वंदना
बन्दौं सारद मैहरवारी!
किरपा कर मों पै महतारी!
मैंने सबरी बात बिगारी।।
मैया! काय नें तुरत सँवारी।।
थक आओ मैं सरन तिहारी।
पाछूँ पर गए जे संसारी।
कैत बनो रय तैं पंसारी।।
मोखों भा रय प्रभु त्रिपुरारी।।
राजहंस की किए सवारी।
बिनती सुन माँ!, मत ठुकरा री!
मोरी पीरा मत बिसरा री!
जबसें मोहक छबि निहारी।
कर जोरे मैं बनो भिखारी।
भव से तारो बीनाबारी!
•••
सॉनेट
चिंता-चिंतन
चिंतन कर ले, चिंता तज दे
चिंता तुझको सतत जलाती
जीते जी मरघट पहुँचाती
चिंतन अमृत घट हरि भज ले
अधरों पर मुस्कान सजा ले
गा ले गीत, मीत! निज स्वर में
रह पगले! खुशियों के घर में
होनी होती देख मजा ले
छोड़ बड़प्पन, बच्चा बन जा
सपने देख न कर कंजूसी
कुछ झूठा कुछ सच्चा बन जा
धरती बिछा, ओढ़ नीला नभ
ओढ़ दिशाएँ सुन कर कलरव
उड़े पखेरू पल में संभव
११-३-२०२३
•••
सुजाता
सुजाता कठोर तप कार चुके मरणासन्न बुद्ध को खीर खिलाकर नया जीवन और जीवन के प्रति संतुलित दृष्टि पाने में सहायक हुई थी। वह बोधगया के पास सेनानी ग्राम के एक धनी व्यक्ति अनाथपिण्डिका की अहंकारी, वाचाल और उद्दंड पुत्रवधू थी। उसने मनौती माँगी थी कि पुत्रवती होने पर वह वह वृक्ष-देव को पायस (खीर) का भीग लगाएगी। उसने अपनी दासी पूर्णा को वृक्ष और उसके आसपास सफाई के लिए भेजा ताकि वृक्ष को खीर अर्पित कर मनौती पूर्ण कर सके। पूर्णा ने वृक्ष नीचे बैठे कृशकाय बुद्ध को देखा और उन्हें वृक्ष का देवता समझ बैठी। वह भागती हुई अपनी स्वामिनी को बुला लाई। सुजाता ने तत्काल वहाँ पहुँचकर सोने की कटोरी में बुद्ध को खीर और शहद अर्पण करते हुए कहा- ‘जैसे मेरी पूरी हुई, आपकी भी मनोकामना पूरी हो।'
उसी दिन कृशकाय बुद्ध को बोध हुआ 'तत्तु समन्वयात्' अर्थात जीवन के विविध तत्वों में समन्वय रखना ही श्रेष्ठ है। अति किसी भी वस्तु की ठीक नहीं - न भोग की, न योग की। यह बोध होने पर मरणासन्न बुद्ध ने नदी में स्नान कर सुजाता द्वारा दी गई खीर खाई। अगले दिन आभार प्रकट करने बुद्ध सुजाता के घर गए। वहाँ घर में लड़ाई-झगड़े का शोर था। पूछने पर अनाथपिण्डिका ने बताया कि उनकी बहू सुजाता अत्यंत अभिमानी और झगड़ालू स्त्री है जो घर में सास-ससुर-पति किसी की एक नहीं सुनती।
बुद्ध ने सुजाता को बुलाकर उसे सात प्रकार की पत्नियों के किस्से बताकर उसकी भूल का बोध कराया और सफल गृहस्थ जीवन के कई सूत्र दिए। सुजाता ने सबसे क्षमा माँगी और उसी दिन से सास-ससुर के साथ पुत्री और पति के साथ मित्र रूप से रहने की सौगंध खाई।
अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में सुजाता बुद्ध के प्रभामंडल से प्रभावित होकर साकेत के पास एक मठ में बौद्ध भिक्षुणी बनी थी और बुद्ध की उपस्थिति में ही वैशाली के पास स्थित किसी आश्रम में उसने अंतिम सांस ली थी। बौद्ध ग्रंथ 'थेरीगाथा' में दूसरी कई प्रख्यात बौद्ध-भिक्षुणियों के साथ भिक्षुणी सुजाता की भी एक पाली कविता संकलित है, जिसका ध्रुव गुप्ताद्वारा अंग्रेजी से किया भावानुवाद प्रस्तुत है-
गीत
कहे सुजाता
पवन सुगंधित सुंदर झीने मंहगे परदे
गहने पहने बेशकीमती सुमन हार भी।
भोग रही सुख दास-दसियों से सेवा ले,
दुर्लभ खाद्य-पेय,
जीवन की सुख-सुविधाएँ,
देखे सब ऐश्वर्य और
क्रीड़ाएँ मैंने।
जिस दिन देखा दिव्य
प्रकाश बुद्ध का अनुपम
जा समीप चरणों में
झुक मैं हुई समर्पित।
परिवर्तित हो गया
पलों में मेरा जीवन।
उपदेशों से जाना मैंने
धर्म-मर्म क्या?
बिना वासना के रहना
कैसा होता है?
इच्छाओं से परे रहो तो
कैसा-क्या सुख?
जान लिया मैंने सचमुच
अमरत्व-सत्य को।
और उसी दिन पाया
मैंने ऐसा जीवन
जो है दुःख के परे
न जिसमें होता है घर।
•••
सॉनेट
चाह
अंतर्मन में ज्योति जला प्रभु!
कलुष न किंचित कहीं शेष हो।
तिमिर न बाकी कहीं लेश हो।।
अंधकार में राह दिखा विभु!
काट सकें कर्मों की कारा।
राग-द्वेष से मुक्त हो सकें।
प्रभु! तुमसे संयुक्त हो सकें।।
जग जग को बाँटें उजियारा।।
कोई न हमको लगे पराया।
सबमें देखें खुद की छाया।
व्याप न पाए मिथ्या माया।।
अहंकार दे विहँस मिटा प्रभु!
काम-क्रोध, मद-लोभ हटा विभु!
नामामृत की चाट चटा प्रभु!
११-३-२०२२
•••
गीत
*
समय न उगता खेत में
समय न बिके बजार
कद्र न जिनको समय की
वही हुए लाचार
नाथ समय के नमन लें
दें मुझको वरदान
असमय करूँ न काम मैं
बनूँ नहीं अनजान
खाली हाथ न फिरे जो
याचक आए द्वार
सीमित घड़ियाँ करी हैं
हर प्राणी के नाम
उसने जो सकता बना
सबके बिगड़े काम
सौ सुनार पर रहा है
भारी एक लुहार
श्वास खेत में बोइए
कर्म फसल बिन देर
ईश्वर के दरबार में
हो न कभी अंधेर
सौदा करिए नगद पर
रखिए नहीं उधार
११-३-२०२०
***
वर्ण पिरामिड
१.
'रे
नर!'
वानर
बोल पड़ा :
अभिनंदन
कर, मैं हूँ तेरा
पुरखा सचमुच।'
*
२.
है
छाया
काया से
ज्यादा लंबी,
मत समझो
महत्वपूर्ण है
केवल लंबाई ही।
११-३-२०१९
***
दोहा दुनिया
*
मन की मन में क्यों रहे, कर मनमानी खूब।
मन उन्मन क्यों हो रहा? बेमन पूछ, न ऊब।।
*
भाई-भतीजावाद के, हारे ठेकेदार
चचा-भतीजे ने किया, घर का बंटाढार
*
दुर्योधन-धृतराष्ट्र का, हुआ नया अवतार
नाव डुबाकर रो रहे, तोड़-फेंक पतवार
*
माया महाठगिनी पर, ठगी गयी इस बार
जातिवाद के दनुज सँग, मिली पटकनी यार
*
लग्न-परिश्रम की विजय, स्वार्थ-मोह की हार
अवसरवादी सियासत, डूब मरे मक्कार
*
बादल गरजे पर नहीं, बरस सके धिक्कार
जो बोया काटा वही, कौन बचावनहार?
*
नर-नरेंद्र मिल हो सके, जन से एकाकार
सर-आँखों बैठा किया, जन-जन ने सत्कार
*
जन-गण को समझें नहीं, नेतागण लाचार
सौ सुनार पर पड़ गया,भारी एक लुहार
*
गलती से सीखें सबक, बाँटें-पाएँ प्यार
देश-दीन का द्वेष तज, करें तनिक उपकार
*
दल का दलदल भुलाकर, असरदार सरदार
जनसेवा का लक्ष्य ले, बढ़े बना सरकार
***
लघुकथा
कन्हैया
*
नामकरण संस्कार को इतना महत्त्व क्यों दिया जाता है? यह तो व्यक्ति के जीवन का एक पल मात्र है, उसे किस नाम से पुकारा जाता है इससे औरों को क्या फर्क पड़ता है? मित्र ने पूछा।
नामकरण किसी को पुकारना मात्र नहीं है। नाम रखना, नाम धरना, नाम थुकाना, नाम करना और नाम होना सबका अलग-अलग बहुत महत्त्व है। किसी जातक के संभावित गुणों का पूर्वानुमान कर तदनुसार पुकारना नामकरण करना है- जनक वह जो पिता की तरह प्रजा का पालन करे, शंकर वह जो शंका का अरि हो अर्थात शंका का अंत कर विश्वास का सृजन करे, श्याम अँधेरे का अंत कर सके, भारत जो प्रकाश फ़ैलाने में रत हो। नाम देते समय औचित्य का विचार अपरिहार्य है। किसी का नाम रखना या नाम धरना एक मुहावरा है जिसका अर्थ किसी त्रुटी के लिए दोषी ठहराना है। 'नाम थुकाना' अर्थात बदनामी कराना। नाम करना या नामवर होना का आशय यश पाना है। नाम होना का मतलब कीर्ति फैलाना है।
जन मानस गुण-धर्म को स्मरण रखता है। भाई से द्रोह करने वाले विभीषण, सबको रुलानेवाले रावण, शासक की पीठ में छुरा भोंकनेवाले मीरजाफर, स्वामिनी को गलत सलाह देनेवाली मंथरा, शिशु वध का प्रयास करनेवाली पूतना, अत्याचारी कंस, अहंकारी दुर्योधन आदि के नाम आज तक कोई अपनी सन्तान क्या पशुओं तक को नहीं देता।
तब तो भविष्य में 'कन्हैया' नाम भी इसी श्रेणी में सम्मिलित हो जाएगा, मित्र ने कहा।
***
***
रसानंद दे छंद नर्मदा २० :
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला,गीतिका,घनाक्षरी तथा बरवैछंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए त्रिभंगी से।
छंद सलिला : छंद त्रिभंगी
तीन बार हो भंग त्रिभंगी, तीन भंगिमा दर्शाये
*
त्रिभंगी ३२ मात्राओं का छंद है जिसके हर पद की गति तीन बार भंग होकर चार चरणों (भागों) में विभाजित हो जाती है। प्राकृत पैन्गलम के अनुसार:
पढमं दह रहणं, अट्ठ विरहणं, पुणु वसु रहणं, रस रहणं।
अन्ते गुरु सोहइ, महिअल मोहइ, सिद्ध सराहइ, वर तरुणं।
जइ पलइ पओहर, किमइ मणोहर, हरइ कलेवर, तासु कई।
तिब्भन्गी छंदं, सुक्खाणंदं, भणइ फणिन्दो, विमल मई।
(संकेत: अष्ट वसु = ८, रस = ६)
संकेत : प्रथम यति १० मात्रा पर, दूसरी ८ मात्रा पर, तीसरी ८ मात्रा पर तथा चौथी ६ मात्रा पर हो। हर पदांत में गुरु हो तथा जगण (ISI लघु गुरु लघु ) कहीं न हो।
केशवदास की छंद माला में वर्णित लक्षण:
विरमहु दस पर, आठ पर, वसु पर, पुनि रस रेख।
करहु त्रिभंगी छंद कहँ, जगन हीन इहि वेष।।
(संकेत: अष्ट वसु = ८, रस = ६)
भानुकवि के छंद-प्रभाकर के अनुसार:
दस बसु बसु संगी, जन रसरंगी, छंद त्रिभंगी, गंत भलो।
सब संत सुजाना, जाहि बखाना, सोइ पुराना, पन्थ चलो।
मोहन बनवारी, गिरवरधारी, कुञ्जबिहारी, पग परिये।
सब घट घट वासी मंगल रासी, रासविलासी उर धरिये।
(संकेत: बसु = ८, जन = जगण नहीं, गंत = गुरु से अंत)
सुर काज सँवारन, अधम उघारन, दैत्य विदारन, टेक धरे।
प्रगटे गोकुल में, हरि छिन छिन में, नन्द हिये में, मोद भरे।
त्रिभंगी का मात्रिक सूत्र निम्नलिखित है
"बत्तिस कल संगी, बने त्रिभंगी, दश-अष्ट अष्ट षट गा-अन्ता"
लय सूत्र: धिन ताक धिना धिन, ताक धिना धिन, ताक धिना धिन, ताक धिना।
नाचत जसुदा को, लखिमनि छाको, तजत न ताको, एक छिना।
उक्त में आभ्यंतर यतियों पर अन्त्यानुप्रास इंगित नहीं है किन्तु जैन कवि राजमल्ल ने ८ चौकल, अंत गुरु, १०-८-८-६ पर विरति, चरण में ३ यमक (तुक) तथा जगण निषेध इंगित कर पूर्ण परिभाषा दी है।
गुजराती छंद शास्त्री दलपत शास्त्री कृत दलपत पिंगल में १०-८-८-६ पर यति, अंत में गुरु, तथा यति पर तुक (जति पर अनुप्रासा, धरिए खासा) का निर्देश दिया है।
सारतः: त्रिभंगी छंद के लक्षण निम्न हैं:
१. त्रिभंगी ३२ मात्राओं का (मात्रिक) छंद है।
२. त्रिभंगी समपाद छंद है।
३. त्रिभंगी के हर चरणान्त (चौथे चरण के अंत) में गुरु आवश्यक है। इसे २ लघु से बदलना नहीं चाहिए।
४. त्रिभंगी के प्रत्येक चरण में १०-८-६-६ पर यति (विराम) आवश्यक है। मात्रा बाँट ८ चौकल अर्थात ८ बार चार-चार मात्रा के शब्द प्रावधानित हैं जिन्हें २+४+४, ४+४, ४+४, ४+२ के अनुसार विभाजित किया जाता है। इस तरह २ + (७x ४) + २ = ३२ मात्राएँ हर एक पंक्ति में होती है।
५. त्रिभंगी के चौकल ७ मानें या ८ जगण का प्रयोग सभी में वर्जित है।
६. त्रिभंगी के हर पद में पहले दो चरणों के अंत में समान तुक हो किन्तु यह बंधन विविध पदों पर नहीं है।
७. त्रिभंगी के तीसरे चरण के अंत में लघु या गुरु कोई भी मात्रा हो सकती है किन्तु कुशल कवियों ने सभी पदों के तीसरे चरण की मात्रा एक सी रखी है।
८. त्रिभंगी के किसी भी मात्रिक गण में विषमकला नहीं है। सम कला के मात्रिक गण होने से मात्रिक मैत्री का नियम पालनीय है।
९. त्रिभंगी के प्रथम दो पदों के चौथे चरणों के अंत में समान तुक हो। इसी तरह अंतिम दो पदों के चौथे चरणों के अंत में समान तुक हो। चारों पदों के अंत में समान तुक होने या न होने का उल्लेख कहीं नहीं मिला।
उदाहरण:
१. महाकवि तुलसीदास रचित निम्न पंक्तियों में तीसरे चरण की ८ मात्राएँ अगले शब्द के प्रथम अक्षर पर पूर्ण होती हैं, यह आदर्श स्थिति नहीं है, किन्तु मान्य है।
धीरज मन कीन्हा, प्रभु मन चीन्हा, रघुपति कृपा भगति पाई।
पदकमल परागा, रस अनुरागा, मम मन मधुप करै पाना।
सोई पद पंकज, जेहि पूजत अज, मम सिर धरेउ कृपाल हरी।
जो अति मन भावा, सो बरु पावा, गै पतिलोक अनन्द भरी।
२. तुलसी की ही निम्न पंक्तियों में हर पद का हर चरण आपने में पूर्ण है।
परसत पद पावन, सोक नसावन, प्रगट भई तप, पुंज सही।
देखत रघुनायक, जन सुख दायक, सनमुख हुइ कर, जोरि रही।
अति प्रेम अधीरा, पुलक सरीरा, मुख नहिं आवै, वचन कही।
अतिशय बड़भागी, चरनन लागी, जुगल नयन जल, धार बही।
यहाँ पहले २ पदों में तीसरे चरण के अंत में 'प' तथा 'र' लघु (समान) हैं किन्तु अंतिम २ पदों में तीसरे चरण के अंत में क्रमशः 'वै' गुरु तथा 'ल' लघु हैं।
३.महाकवि केशवदास की राम चन्द्रिका से एक त्रिभंगी छंद का आनंद लें:
सम सब घर सोभैं, मुनिमन लोभैं, रिपुगण छोभैं, देखि सबै।
बहु दुंदुभि बाजैं, जनु घन गाजैं, दिग्गज लाजैं, सुनत जबैं।
जहँ तहँ श्रुति पढ़हीं, बिघन न बढ़हीं, जै जस मढ़हीं, सकल दिसा।
सबही सब विधि छम, बसत यथाक्रम, देव पुरी सम, दिवस निसा।
यहाँ पहले २ पदों में तीसरे चरण के अंत में 'भैं' तथा 'जैं' गुरु (समान) हैं किन्तु अंतिम २ पदों में तीसरे चरण के अंत में क्रमशः 'हीं' गुरु तथा 'म' लघु हैं।
४. श्री गंगाप्रसाद बरसैंया कृत छंद क्षीरधि से तुलसी रचित त्रिभंगी छंद उद्धृत है:
रसराज रसायन, तुलसी गायन, श्री रामायण, मंजु लसी।
शारद शुचि सेवक, हंस बने बक, जन कर मन हुलसी हुलसी।
रघुवर रस सागर, भर लघु गागर, पाप सनी मति, गइ धुल सी।
कुंजी रामायण, के पारायण, से गइ मुक्ति राह खुल सी।
टीप: चौथे पद में तीसरे-चौथे चरण की मात्राएँ १४ हैं किन्तु उन्हें पृथक नहीं किया जा सकता चूंकि 'राह' को 'र'+'आह' नहीं लिखा जा सकता। यह आदर्श स्थिति नहीं है। इससे बचा जाना चाहिए। इसी तरह 'गई' को 'गइ' लिखना अवधी में सही है किन्तु हिंदी में दोष माना जाएगा।
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त्रिभंगी छंद के कुछ अन्य उदाहरण निम्नलिखित हैं
०१. री शान्ति जिनेशं, नुतशक्रेशं, वृषचक्रेशं चक्रेशं।
हनि अरिचक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाऽमृतेशं, मक्रेशं ।।।
मंदार सरोजं, कदली जोजं, पुंज भरोजं, मलयभरं।
भरि कंचनथारी, तुमढिग धारी, मदनविदारी, धीरधरं।। --रचनाकार : ज्ञात नहीं
संजीव 'सलिल'
०२. रस-सागर पाकर, कवि ने आकर, अंजलि भर रस-पान किया।
ज्यों-ज्यों रस पाया, मन भरमाया, तन हर्षाया, मस्त हिया।।
कविता सविता सी, ले नवता सी, प्रगटी जैसे जला दिया।
सारस्वत पूजा, करे न दूजा, करे 'सलिल' ज्यों अमिय पिया।।
०३. ऋतुराज मनोहर, प्रीत धरोहर, प्रकृति हँसी, बहु पुष्प खिले।
पंछी मिल झूमे, नभ को चूमे, कलरव कर भुज भेंट मिले।।
लहरों से लहरें, मिलकर सिहरें, बिसरा शिकवे भुला गिले।
पंकज लख भँवरे, सजकर सँवरे, संयम के दृढ़ किले हिले।।
०४. ऋतुराज मनोहर, स्नेह सरोवर, कुसुम कली मकरंदमयी।
बौराये बौरा, निरखें गौरा, सर्प-सर्पिणी, प्रीत नयी।।
सुरसरि सम पावन, जन मन भावन, बासंती नव कथा जयी।
दस दिशा तरंगित, भू-नभ कंपित, प्रणय प्रतीति न 'सलिल' गयी।।
०५. ऋतु फागुन आये, मस्ती लाये, हर मन भाये, यह मौसम।
अमुआ बौराये, महुआ भाये, टेसू गाये, को मो सम।।
होलिका जलायें, फागें गायें, विधि-हर शारद-रमा मगन।
बौरा सँग गौरा, भूँजें होरा, डमरू बाजे, डिम डिम डम।।
०६. ऋतुराज मनोहर, सुनकर सोहर, झूम-झूम हँस नाच रहा।
बौराया अमुआ, आया महुआ, राई-कबीरा बाँच रहा।।
पनघट-अमराई, नैन मिलाई के मंचन के मंच बने।
कजरी-बम्बुलिया आरोही-अवरोही स्वर हृद-सेतु तने।।
शम्भुदान चारण
०७. साजै मन सूरा, निरगुन नूरा, जोग जरूरा, भरपूरा।
दीसे नहि दूरा, हरी हजूरा, परख्या पूरा, घट मूरा।।
जो मिले मजूरा, एष्ट सबूरा, दुःख हो दूरा, मोजीशा।
आतम तत आशा, जोग जुलासा, श्वांस ऊसासा, सुखवासा।।
डॉ. प्राची.सिंह
०८.मन निर्मल निर्झर, शीतल जलधर, लहर लहर बन, झूमे रे।
मन बनकर रसधर, पंख प्रखर धर, विस्तृत अम्बर, चूमे रे।।
ये मन सतरंगी, रंग बिरंगी, तितली जैसे, इठलाये।
जब प्रियतम आकर, हृदय द्वार पर, दस्तक देता, मुस्काये।।
स्व. सत्यनारायण शर्मा 'कमल'
०९ छंद त्रिभंगी षट -रस रंगी अमिय सुधा-रस पान करे।
छवि का बंदी कवि-मन आनंदी स्वतः त्रिभंगी-छंद झरे।।
दृश्यावलि सुन्दर लोल-लहर पर अलकावलि अतिशय सोहे।
पृथ्वी-तल पर सरिता-जल पर पसरी कामिनि मन को मोहे।।
१०. उषाकाल नव-किरण जाल जल का उछाल चुप रह लख रे
रति सद्यस्नाता कंचन गाता रूप लजाता दृश्य अरे
मुद सस्मित निरखत रूप-सुधा घट चितवत नेह-पगा छिप रे
हँस गगन मुदित रवि नैसर्गिक छवि विस्मित मौन ठगा कित रे
११. नम श्यामल केश कमल-मुख श्वेत रुचिर परिवेश प्रदान करे।
नत नयन खुले से निमिष-तजे से अधर मंद मुस्कान भरे।।
उभरे वक्षस्थल जल क्रीडास्थल लहर उछल मन प्राण हरे।
सोई सुषमा सी विधु ज्योत्स्ना सी शरद पूर्णिमा नृत्य करे।।
१२. था तन रोमांचित मन आलोड़ित सिकता-कण शत-शत बिखरे।
सस्मित आकृति अनमोल कलाकृति मुग्ध प्रकृति भी इस पल रे।।
उतरीं जल-परियाँ सिन्धु-लहर सी प्रात प्रहर सुर-धन्या सी।
नव दीप-शिखा सी नव-कलिका सी इठलाती हिम-कन्या सी।।
संजीव 'सलिल'
१३. हम हैं अभियंता नीति नियंता, अपना देश सँवारेंगे।
हर संकट हर हर मंज़िल वरकर, सबका भाग्य निखारेंगे।।
पथ की बाधाएँ दूर हटाएँ, खुद को सब पर वारेंगे।
भारत माँ पावन जन मन भावन, सीकर चरण पखारेंगे।।
१४. अभियंता मिलकर आगे चलकर, पथ दिखलायें जग देखे।
कंकर को शंकर कर दें हँसकर मंज़िल पाएं कर लेखे।।
शशि-मंगल छूलें, धरा न भूलें, दर्द दीन का हरना है।
आँसू न बहायें , जन-गण गाये, पंथ वही तो वरना है।।
१५. श्रम-स्वेद बहाकर, लगन लगाकर, स्वप्न सभी साकार करें।
गणना कर परखें, पुनि-पुनि निरखें, त्रुटि न तनिक भी कहीं वरें।।
उपकरण जुटायें, यंत्र बनायें, नव तकनीक चुनें न रुकें।
आधुनिक प्रविधियाँ, मनहर छवियाँ, उन्नत देश करें न चुकें।।
१६. नव कथा लिखेंगे, पग न थकेंगे, हाथ करेंगे काम काम सदा।
किस्मत बदलेंगे, नभ छू लेंगे, पर न कहेंगे 'यही बदा'।।
प्रभु भू पर आयें, हाथ बटायें, अभियंता संग-साथ रहें।।
श्रम की जयगाथा, उन्नत माथा, सत नारायण कथा कहें।।
जनश्रुति / क्षेपक- रामचरितमानस में बालकाण्ड में अहल्योद्धार के प्रकरण में चार (४) त्रिभङ्गी छंद प्रयुक्त हुए हैं. कहा जाता है कि इसका कारण यह है कि अपने चरण से अहल्या माता को छूकर प्रभु श्रीराम ने अहल्या के पाप, ताप और शाप को भङ्ग (समाप्त) किया था, अतः गोस्वामी जी की वाणी से सरस्वतीजी ने त्रिभङ्गी छन्द को प्रकट किया.
११-३-२०१६
***
हाइकु
*
धरने पर
बैठा मुख्यमंत्री
आँखें चुराए
*
रंग-बिरंगे
नमो गुजरात को
रोज भुनाएं
*
ममो का मौन
अनकहनी कह
होली मनाए
*
झोपड़ी में जा
शहजादा लालू को
गले लगाए
*
नारी बेचारी
ममता की मारी है
ख्वाब सजाए
*
अन्ना हजारे
मुसीबत के मारे
खोजें सहारे
*
माया की काया
दे न किसी को कभी
थोड़ी भी छाया
*
बाल्टी का रंग
अम्मा को पड़े कम
करुणा दंग
***
मुक्तिका:
खुली आँख सपने…
*
खुली आँख सपने बुने जा रहे हैं
कहते खुदी खुद सुने जा रहे हैं
वतन की जिन्हें फ़िक्र बिलकुल नहीं है
संसद में वे ही चुने जा रहे हैं
दलतंत्र मलतंत्र है आजकल क्यों?
जनता को दल ही धुने जा रहे हैं
बजा बीन भैसों के सम्मुख मगन हो
खुश है कि कुछ तो सुने जा रहे हैं
निजी स्वार्थ ही साध्य सबका हुआ है
कमाने के गुर मिल गुने जा रहे हैं
११-३-२०१४
***
नव गीत:
ऊषा को लिए बाँह में,
संध्या को चाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
पानी के बुलबुलों सी
आशाएँ पल रहीं.
इच्छाएँ हौसलों को
दिन-रात छल रहीं.
पग थक रहे, मंजिल कहीं
पाई न राह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
तृष्णाएँ खुद ही अपने
हैं हाथ मल रहीं.
छायाएँ तज आधार को
चुपचाप ढल रहीं.
मोती को रहे खोजते
पाया न थाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
मुक्तक:
समय बदला तो समय के साथ ही प्रतिमान बदले.
प्रीत तो बदली नहीं पर प्रीत के अनुगान बदले.
हैं वही अरमान मन में, है वही मुस्कान लब पर-
वही सुर हैं वही सरगम 'सलिल' लेकिन गान बदले..
*
रूप हो तुम रंग हो तुम सच कहूँ रस धार हो तुम.
आरसी तुम हो नियति की प्रकृति का श्रृंगार हो तुम..
भूल जाऊँ क्यों न खुद को जब तेरा दीदार पाऊँ-
'सलिल' लहरों में समाहित प्रिये कलकल-धार हो तुम.
*
नारी ही नारी को रोके इस दुनिया में आने से.
क्या होगा कानून बनाकर खुद को ही भरमाने से?.
दिल-दिमाग बदल सकें गर, मान्यताएँ भी हम बदलें-
'सलिल' ज़िंदगी तभी हँसेगी, क्या होगा पछताने से?
*
ममता को समता के पलड़े में कैसे हम तौल सकेंगे.
मासूमों से कानूनों की परिभाषा क्या बोल सकेंगे?
जिन्हें चाहिए लाड़-प्यार की सरस हवा के शीतल झोंके-
'सलिल' सिर्फ सुविधा देकर साँसों में मिसरी घोल सकेंगे?
*
११-३-२०१०
***