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शनिवार, 27 जून 2026

जून २७, वृहदारण्यक उपनिषद, महामाया छंद, स्मृति गीत, भाभी, दोहा, वर्ष, घनाक्षरी, लघुकथा

 सलिल सृजन जून २७

मुक्तक
गाहे-बगाहे निगाहें मिलाना
झुकाना-चुराना उठाना-गिराना
हँसना कहर ढा, गिराना बिजलियाँ
मुहब्बत का लिखना नया नित फ़साना
न पर्दे में रहना, न बाहर ही आना
न सूरत दिखाना, न सूरत छिपाना
है दिलकश ये मंज़र , चला दिल पे खंजर
दबा ओंठ दाँतों में चुप मुस्कुराना
मोती सी बूँदें केशों से झरतीं
साँसों का संताप सब पल में हरतीं
मरे प्यार में इनके जो ये उसी को
करें प्यार उस पर जनम सात मरतीं
२७.६.२०१५
०००
वृहदारण्यक उपनिषद
(शुक्ल यजुर्वेद, काण्वी शाखा)
*
शांतिपाठ
ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।
ॐ पूर्ण है वह; पूर्ण है यह, पूर्ण से उत्पन्न पूर्ण।
पूर्ण में से पूर्ण को यदि निकालें, पूर्ण तब भी शेष रहता।।
प्रथम अध्याय
प्रथम ब्राह्मण : यज्ञाश्व
ॐ उषा सर यज्ञ-अश्व का, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है।
खुला हुआ मुख अग्नि देव है, संवत्सर यज्ञाश्व-आत्मा।।
पीठ द्युलोक; उदर नभ मंडल, पदस्थान भू; दिशा पार्श्व हैं।
दिशा अवांतर पसली उसकी, ऋतुएँ अंग; महीना संधि।।
दिवस-रात पद, नखत अस्थियाँ, मेघ मांस; बालू ऊवध्य है।
नाड़ी नदी; यकृत पर्वत है, ह्रदय औषधि, रोम वनस्पति।।
धड़ रवि उदयित, अधड़ अस्त रवि, तड़ित जम्हाई, सिर-गति गर्जन।
वर्षा मूत्र; वाक् हिनहिन ध्वनि, अश्व-रूप में यज्ञ सुकल्पित।१।
दिन प्रकटा बन महिमा सम्मुख, पूर्व समुद्र योनि है उसकी।
पीछे रात्रि प्रकट महिमावत, पश्चिम सिंधु योनि है उसकी।।
ये दोनों ही आगे-पीछे, महिमा संज्ञक ग्रह हैं हय के।
हय-सुर; बाजी गंधर्वों को, अर्वा-असुर; अश्व मनुजों को
वहन करे; है सिंधु बंधु अरु, सागर ही उद्गम है इसका।२।
ऊवध्य = अनपचा अन्न।
*
द्वितीय ब्राह्मण : प्रलय पश्चात् सृष्टि उत्पत्ति
पहले यहाँ नहीं था कुछ भी, मृत्यु-प्रलय से, सब आवृत्त था।
ढँका क्षुधा से, क्षुधा मृत्यु है, आत्मा होऊँ, ठान लिया यह।।
पूज-आचरण कर जल पाया, जान अर्क-अर्कत्व सुखी हो। १।
स्थूल भाग एकत्र जलार्की, पृथ्वी होकर आप थक गया।
थके-तपे तन प्रजापति के, से प्रकटा तेजाग्नि सारवत्।२।
तीन भाग हो, एक-एक दे, सूर्य-हवा को, प्राण त्रिभागी।
पूर्व शीश; दो विदिशा भुजवत, पश्चिम पूँछ; जाँघ विदिशाएँ।।
उत्तर-दक्षिण पार्श्व भाग हैं, पृष्ठ द्युलोक; उदर नभमंडल।
पृथ्वी ह्रदय; प्रजापति जल में, जो जाने; सर्वत्र प्रतिष्ठित।३।
काम्य अन्य तन हुआ; मृत्यु ने मनस त्रिवेद मिथुन को ध्याया।
उससे बीज हुआ संवत्सर, रहा गर्भ में प्रजापति के।
'भाण' वाक् कर मुख फैलाया, मारूँ; अन्न मिलेगा थोड़ा।।
सोचा, मन-वाणी से उसने, ऋक यजु साम छंद रच डाले।
यज्ञ प्रजा पशु की रचना की, जिसको रचा उसीको खाया।।
वह उपजाता-खाता सबको, यही अदिति का अदितित्व है।
जो जाने इस अदितित्व को, भोक्ता वह; सब भोग्य उसे हो।४-५।
करी कामना; यज्ञ करूँ; हो भ्रमित; किया तप मृत्यु देव ने।
थके-तपे उस मृत्युदेव का, निकला यश अरु वीर्य; प्राण यह।
निकले प्राण फूलता है तन, मन रहता तब भी शरीर में।६।
करी कामना 'मेध्य' देह हो, देहवान मैं इससे होऊँ।
मेध्य देह अश्व सम फूली, यही अश्वमेधत्व जानिए।।
जो जाने अवरोधरहित हो, करता चिंतन प्रजापति का।
देव प्रजापति इसी भाव से, पशुओं को सुर तक पहुँचाए।।
सूर्य तपे जो अश्वमेध वह, संवत्सर तन; अग्नि अर्क है।
उसके हैं ये लोक-आत्मा, अग्नि-सूर्य अर्काश्वमेध हैं।।
मत्युरूप वे एक देवता, जो जाने ले जीत मृत्यु को।
मृत्यु न मारे; आप आत्म हो, वह देवों में एक देव हो।७।
२७-६-२०२२
***
मुक्तक
अरविंद किरणों से प्रकाशित हँस रही है मंजरी।
सुवासित अरविंद को को कर खिल रही है मंजरी।।
पुलक मंजीरा बजाता झूम ध्रुव तारा सुना
राई कजरी मौन अपलक सुन रही है मंजरी
***
मात्रिक लौकिक जातीय
वार्णिक प्रतिष्ठा जातीय
महामाया छंद
सूत्र - य ला।
*
सुनो मैया
पड़ूँ पैंया
बजा वीणा
हरो पीड़ा
महामाया
करो छैंया
तुम्हीं दाता
जगत्त्राता
उबारो माँ
थमा बैंया
मनाऊँ मैं
कहो कैसे
नहीं जानूँ
उठा कैंया
तुम्हारा था
तुम्हारा हूँ
न डूबे माँ
बचा नैया
भुलाओ ना
बुलाओ माँ
तुम्हें ही मैं
भजूँ मैया
२७-६-२०२०
***
दोपदी
वक्त के बदलाव कहते हैं कि हम गंभीर हों।
सजे लब पे मुस्कुराहट पर वजह कोई तो हो।
***
स्मृति गीत:
*
भाभी श्री की पुण्य याद प्रेरक पूँजी, पाथेय मुझे है।
*
मीठी सी मुस्कान, नयन में नेह, वाक् में घुली शर्करा।
ममतामय स्पर्श शीश पर कर पल्लव का पा तन तरा।
भेद न कोई निज-पर में था, 'भैया! बहुत दिनों में आए।'
मिसरी जैसा उपालंभ जिससे असीम वात्सल्य था झरा।
भाभी श्री की मधुर-मृदुल छवि, कहूँ न पर संज्ञेय मुझे है।
*
दादा की ही चिंता हर पल, क्यों होते कमजोर जा रहे।
नयन कामना, वाक् भावना, हर्ष गीत बन होंठ गा रहे।
माथे पर सिंदूरी सूरज, उषा उजास अँजोरे चेहरा।
दादा अपलक पल भर हेरें, कहें न कुछ पर तृप्ति पा रहे।
इनमें वे या उनमें ये हैं, नहीं रहा अज्ञेय मुझे है।
२७-६-२०१९
***
दोहे बूँदाबाँदी के:
*
झरझर बूँदे झर रहीं, करें पवन सँग नृत्य।
पत्ते ताली बजाते, मनुज हुए कृतकृत्य।।
*
माटी की सौंधी महक, दे तन-मन को स्फूर्ति।
संप्राणित चैतन्य है, वसुंधरा की मूर्ति।।
*
पानी पानीदार है, पानी-पानी ऊष्म।
बिन पानी सूना न हो, धरती जाओ ग्रीष्म।।
*
कुहू-कुहू कोयल करे, प्रेम-पत्रिका बाँच।
पी कहँ पूछे पपीहा, झुलस विरह की आँच।।
*
नभ-शिव नेहिल नर्मदा, निर्मल वर्षा-धार।
पल में आतप दूर हो, नहा; न जा मँझधार।।
*
जल की बूँदे अमिय सम, हरें धरा का ताप।
ढाँक न माटी रे मनुज!, पछताएगा आप।।
*
माटी पानी सोखकर, भरती जल-भंडार।
जी न सकेगा मनुज यदि, सूखे जल-आगार।।
*
हरियाली ओढ़े धरा, जड़ें जमा ले दूब।
बीरबहूटी जब दिखे, तब खुशियाँ हों खूब।।
*
पौधे अगिन लगाइए, पालें ज्यों संतान।
संतति माँगे संपदा, पेड़ करें धनवान।।
*
पूत लगाता आग पर, पेड़ जलें खुद साथ।
उसके पालें; काटते, क्यों इसको मनु-हाथ।।
*
बूँद-बूँद जल बचाओ, बची रहेगी सृष्टि।
आँखें रहते अंध क्यों?, मानव! पूछे वृष्टि।।
27.6.2018
***
घनाक्षरी
लाख़ मतभेद रहें, पर मनभेद न हों, भाई को हमेशा गले, हँस के लगाइए|
लात मार दूर करें, दशमुख सा अनुज, शत्रुओं को न्योत घर, कभी भी न लाइए|
भाई नहीं दुश्मन जो, इंच भर भूमि न दें, नारि-अपमान कर, नाश न बुलाइए|
छल-छद्म, दाँव-पेंच, दन्द-फंद अपना के, राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइये||
*
जिसका जो जोड़ीदार, करे उसे वही प्यार, कभी फूल कभी खार, मन-मन भाया है|
पास आये सुख मिले, दूर जाये दुःख मिले, साथ रहे पूर्ण करे, जिया हरषाया है|
चाह-वाह-आह-दाह, नेह नदिया अथाह, कल-कल हो प्रवाह, डूबा-उतराया है|
गर्दभ कहे गधी से, आँख मूँद - कर - जोड़, देख तेरी सुन्दरता चाँद भी लजाया है||
(श्रृंगार तथा हास्य रस का मिश्रण)
*
शहनाई गूँज रही, नाच रहा मन मोर, जल्दी से हल्दी लेकर, करी मनुहार है|
आकुल हैं-व्याकुल हैं, दोनों एक-दूजे बिन, नया-नया प्रेम रंग, शीश पे सवार है|
चन्द्रमुखी, सूर्यमुखी, ज्वालामुखी रूप धरे, सासू की समधन पे, जग बलिहार है|
गेंद जैसा या है ढोल, बन्ना तो है अनमोल, बन्नो का बदन जैसे, क़ुतुब मीनार है||
*
ये तो सब जानते हैं, जान के न मानते हैं, जग है असार पर, सार बिन चले ना|
मायका सभी को लगे - भला, किन्तु ये है सच, काम किसी का भी, ससुरार बिन चले ना|
मनुहार इनकार, इकरार इज़हार, भुजहार, अभिसार, प्यार बिन चले ना|
रागी हो, विरागी हो या हतभागी बड़भागी, दुनिया में काम कभी, 'नार' बिन चले ना||
(श्लेष अलंकार वाली अंतिम पंक्ति में 'नार' शब्द के तीन अर्थ ज्ञान, पानी और स्त्री लिये गये हैं.)
*
बुन्देली
जाके कर बीना सजे, बाके दर सीस नवे, मन के विकार मिटे, नित गुनगाइए|
ज्ञान, बुधि, भासा, भाव, तन्नक न हो अभाव, बिनत रहे सुभाव, गुननसराहिए|
किसी से नाता लें जोड़, कब्बो जाएँ नहीं तोड़, फालतू न करें होड़, नेह सोंनिबाहिए|
हाथन तिरंगा थाम, करें सदा राम-राम, 'सलिल' से हों न वाम, देस-वारीजाइए||
छत्तीसगढ़ी
अँचरा मा भरे धान, टूरा गाँव का किसान, धरती मा फूँक प्राण, पसीनाबहावथे|
बोबरा-फार बनाव, बासी-पसिया सुहाव, महुआ-अचार खाव, पंडवानीभावथे|
बारी-बिजुरी बनाय, उरदा के पीठी भाय, थोरको न ओतियाय, टूरीइठलावथे|
भारत के जय बोल, माटी मा करे किलोल, घोटुल मा रस घोल, मुटियारीभावथे||
निमाड़ी
गधा का माथा का सिंग, जसो नेता गुम हुयो, गाँव खs बटोsर वोsट,उल्लूs की दुम हुयो|
मनखs को सुभाsव छे, नहीं सहे अभाव छे, हमेसs खांव-खांव छे, आपsसे तुम हुयो|
टीला पाणी झाड़s नद्दी, हाय खोद रएs पिद्दी, भ्रष्टs सरsकारs रद्दी, पतानामालुम हुयो|
'सलिल' आँसू वादsला, धsरा कहे खाद ला, मिहsनतs का स्वाद पा, दूरsमाsतम हुयो||
मालवी:
दोहा:
भणि ले म्हारा देस की, सबसे राम-रहीम|
जल ढारे पीपल तले, अँगना चावे नीम||
कवित्त
शरद की चांदणी से, रात सिनगार करे, बिजुरी गिरे धरा पे, फूल नभ सेझरे|
आधी राती भाँग बाटी, दिया की बुझाई बाती, मिसरी-बरफ़ घोल्यो,नैना हैं भरे-भरे|
भाभीनी जेठानी रंगे, काकीनी मामीनी भीजें, सासू-जाया नहीं आया,दिल धीर न धरे|
रंग घोल्यो हौद भर, बैठी हूँ गुलाल धर, राह में रोके हैं यार, हाय! टारे नटरे||
राजस्थानी
जीवण का काचा गेला, जहाँ-तहाँ मेला-ठेला, भीड़-भाड़ ठेलं-ठेला, मोड़तरां-तरां का|
ठूँठ सरी बैठो काईं?, चहरे पे आई झाईं, खोयी-खोयी परछाईं, जोड़ तरां-तरां का|
चाल्यो बीज बजारा रे?, आवारा बनजारा रे?, फिरता मारा-मारा रे?,होड़ तरां-तरां का||
नाव कनारे लागैगी, सोई किस्मत जागैगी, मंजिल पीछे भागेगी, तोड़तरां-तरां का||
हिन्दी+उर्दू
दर्दे-दिल पीरो-गम, किसी को दिखाएँ मत, दिल में छिपाए रखें, हँस-मुस्कुराइए|
हुस्न के न ऐब देखें, देखें भी तो नहीं लेखें, दिल पे लुटा के दिल, वारी-वारी जाइए|
नाज़ो-अदा नाज़नीं के, देख परेशान न हों, आशिकी की रस्म है कि, सिरभी मुड़ाइए|
चलिए न ऐसी चाल, फालतू मचे बवाल, कोई न करें सवाल, नखरेउठाइए||
भोजपुरी
चमचम चमकल, चाँदनी सी झलकल, झपटल लपकल, नयन कटरिया|
तड़पल फड़कल, धक्-धक् धड़कल, दिल से जुड़ल दिल, गिरलबिजुरिया|
निरखल परखल, रुक-रुक चल-चल, सम्हल-सम्हल पग, धरलगुजरिया|
छिन-छिन पल-पल, पड़त नहीं रे कल, मचल-मचल चल, चपलसंवरिया||
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घनाक्षरी: वर्णिक छंद, चतुष्पदी, हर पद- ३१ वर्ण, सोलह चरण- हर पद के प्रथम ३ चरण ८ वर्ण, अंतिम ४ चरण ७ वर्ण.
***
मैथिली हाइकु
स्नेह करब
हमर मंत्र अछि
गले लगबै
***
लघुकथा
दुहरा चेहरा
*
- 'क्या कहूँ बहनजी, सच बोला नहीं जाता और झूठ कहना अच्छा नहीं लगता इसीलिये कहीं आना-जाना छोड़ दिया. आपके साथ तो हर २-४ दिन में गपशप होती रही है, और कुछ हो न हो मन का गुबार तो निकल जाता था. अब उस पर भी आपत्ति है.'
= 'आपत्ति? किसे?, आपको गलतफहमी हुई है. मेरे घर में किसी को आपत्ति नहीं है. आप जब चाहें पधारिये और निस्संकोच अपने मन की बात कर सकती हैं. ये रहें तो भी हम लोगों की बातों में न तो पड़ते हैं, न ध्यान देते हैं.'
- 'आपत्ति आपके नहीं मेरे घर में होती है. वह भी इनको या बेटे को नहीं बहूरानी को होती है.'
= 'क्यों उन्हें हमारे बीच में पड़ने की क्या जरूरत? वे तो आज तक कभी आई नहीं.'
-'आएगी भी नहीं. रोज बना-बनाया खाना चाहिए और सज-धज के निकल पड़ती है नेतागिरी के लिए. कहती है तुम जैसी स्त्रियाँ घर का सब काम सम्हालकर पुरुषों को सर पर चढ़ाती हैं. मुझे ही घर सम्हालना पड़ता है. सोचा था बहू आयेगी तो बुढ़ापा आराम से कटेगा लेकिन महारानी तो घर का काम करने को बेइज्जती समझती हैं. तुम्हारे चाचाजी बीमार रहते हैं, उनकी देख-भाल, समय पर दवाई और पथ्य, बेटे और पोते-पोती को ऑफिस और स्कूल जाने के पहले खाना और दोपहर का डब्बा देना. अब शरीर चलता नहीं. थक जाती हूँ.'
='आपकी उअमर नहीं है घर-भर का काम करने की. आप और चाचाजी आराम करें और घर की जिम्मेदारी बहु को सम्हालने दें. उन्हें जैसा ठीक लगे करें. आप टोंका-टाकी भर न करें. सबका काम करने का तरीका अलग-अलग होता है.'
-'तो रोकता कौन है? करें न अपने तरीके से. पिछले साल मैं भांजे की शादी में गयी थी तो तुम्हारे चाचाजी को समय पर खाना-चाय कुछ नहीं मिला. बाज़ार का खाकर तबियत बिगाड़ ली. मुश्किल से कुछ सम्हली है. मैंने कहा ध्यान रखना था तो बेटे से नमक-मिर्च लगाकर चुगली कर दी और सूटकेस उठाकर मायके जाने को तैयार ही गयी. बेटे ने कहा तो कुछ नहीं पर उसका उतरा हुआ मुँह देखकर मैं समझ गई, उस दिन से रसोई में घुसती ही नहीं. मुझे सुना कर अपनी सहेली से कह रही थी अब कुछ कहा तो बुड्ढे-बुढ़िया दोनों को थाने भिजवा दूँगी. दोनों टाइम नाश्ते-खाने के अलावा घर से कोई मतलब नहीं.'
पड़ोस में रहनेवाली मुँहबोली चाची को सहानुभूति जता, शांत किया और चाय-नाश्ता कराकर बिदा किया. घर में आयी तो चलभाष पर ऊँची आवाज में बात कर रही उनकी बहू की आवाज़ सुनायी पड़ी- ' माँ! तुम काम मत किया करो, भाभी से कराओ. उसका फर्ज है तुम्हारी सेवा करे....'
मैं विस्मित थी स्त्री हितों की दुहाई देनेवाली शख्सियत का दुहरा चेहरा देखकर.
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***
मुक्तक
*
प्राण, पूजा कर रहा निष्प्राण की
इबादत कर कामना है त्राण की
वंदना की, प्रार्थना की उम्र भर-
अर्चना लेकिन न की संप्राण की
.
साधना की साध्य लेकिन दूर था
भावना बिन रूप ज्यों बेनूर था
कामना की यह मिले तो वह करूँ
जाप सुनता प्रभु न लेकिन सूर था
.
नाम ले सौदा किया बेनाम से
पाठ-पूजन भी कराया दाम से
याद जब भी किया उसको तो 'सलिल'
हो सुबह या शाम केवल काम से
.
इबादत में तू शिकायत कर रहा
इनायत में वह किफायत कर रहा
छिपाता तू सच, न उससे कुछ छिपा-
तू खुदी से खुद अदावत कर रहा
.
तुझे शिकवा वह न तेरी सुन रहा
है शिकायत उसे तू कुछ गुन रहा
है छिपाता ख्वाब जो तू बुन रहा-
हाय! माटी में लगा तू घुन रहा
.
तोड़ मंदिर, मन में ले मन्दिर बना
चीख मत, चुप रह अजानें सुन-सुना
छोड़ दे मठ, भूल गुरु-घंटाल भी
ध्यान उसका कर, न तू मौके भुना
.
बन्दा परवर वह, न तू बन्दा मगर
लग गरीबों के गले, कस ले कमर
कर्मफल देता सभी को वह सदा-
काम कर ऐसा दुआ में हो असर
२७-६-२०१७
***
दोहा सलिला
*
जिसे बसाया छाँव में, छीन रहा वह ठाँव
आश्रय मिले न शहर में, शरण न देता गाँव
*
जो पैरों पर खड़े हैं, 'सलिल' उन्हीं की खैर
पैर फिसलते ही बनें, बंधु-मित्र भी गैर
*
सपने देखे तो नहीं, तुमने किया गुनाह
किये नहीं साकार सो, जीवन लगता भार
*
दाम लागने की कला, सीख किया व्यापार
नेह किया नीलाम जब, साँस हुई दुश्वार
*
माटी में मिल गए हैं, बड़े-बड़े रणवीर
किन्तु समझ पाए नहीं, वे माटी की पीर
*
नाम रख रहे आज वे, बुला-मनाकर पर्व
नाम रख रहे देख जन, अहं प्रदर्शन गर्व
*
हैं पत्थर के सनम भी, पानी-पानी आज
पानी शेष न आँख में, देख आ रही लाज
२७-६-२०१७
***
भारत के नेताओं को अयोग्य समझा था चर्चिल ने
स्व. खुशवंत सिंह
चाहता हूं कि मेरे पाठक विशेषकर युवा पीढ़ी विजेन्द्र गुप्ता द्वारा भेजे गए इस दिलचस्प लेख को मेरे साथ साझा करें, 'जब इंग्लैंड के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने 1947 में इंडियन इंडिपेन्डेंस बिल पेश किया और ब्रिटिश पार्लियामेंट में इस पर बहस हो रही थी तो इंग्लैंड के युद्ध कालीन प्रधानमंत्री सर विंस्टन चर्चिल ने गुस्से से टिप्पणी की 'लुच्चे, बदमाशों और मुफ्तखोरों के हाथ में सत्ता चली जाएगी। सभी भारतीय नेता मामूली काबलियत वाले और तिनके की तरह होंगे। उनकी मीठी जुबान और दिल में बदमाशी होगी (मुंह में राम बगल में छुरी)। वह सत्ता के लिए आपस में लड़ेंगे और भारत राजनीतिक गुटबंदी में खो जाएगा। पानी की बोतल या रोटी का टुकड़ा तक टैक्स लगने से नहीं बचेगा। सिर्फ हवा मुफ्त मिलेगी और इन लाखों भूखे लोगों का खून एटली के सिर पर होगा।' हम निश्चय ही अतुलनीय राष्ट्र हैं। हमने बहुत मेहनत की है और निश्चित रूप से खुद को सही सिद्ध किया है।
आवारा कुत्तों की मुसीबत
मनुष्य द्वारा जानवरों या पक्षियों के साथ संबंध बनाने में सबसे अधिक नजदीकी कुत्तों के साथ देखी गई है। मैं इस बात का ताकीद अपने जर्मन शैपर्ड (एलसेशियन) के साथ अपने 14 साल के साथ को देखते हुए कह सकता हूं। मैं उसे सिमबा कहता था जिसका अर्थ सुवाहिली भाषा में शेर है। मुझे वह पिल्ले के रूप में मिला और जीवनभर मेरे साथ रहा। असली बात तो यह है कि मैंने ही उसकी मौत के वारंट पर हस्ताक्षर किए थे जब मुझे एहसास हुआ कि उसके 14 साल पूरे हो चुके हैं और वह बहुत बूढ़ा हो गया है और लगातार बीमार रहता है। मैंने एक पिक्चर भी देखी जिसमें श्रीनगर की गलियों में कुत्तों को मनुष्यों पर हमला करते हुए और खाते हुए दिखाया गया था। उनके साथ सबसे अच्छा क्या हो सकता है। मुझे कोई संदेह नहीं है कि सबसे अच्छा यही है कि उन्हें सही वक्त पर हमेशा के लिए सुला दिया जाए। मुझे यह काम अपने बहुत ही प्यारे सिमबा के लिए करना पड़ा। मैंने उसका इलाज कर रहे वेट से कहा कि उसे टॉनिक की ओवर डोज दी दी जाए। उसका अंत शांतिपूर्वक हुआ। हमारे बीच जरा भी दुर्भावना नहीं थी। दुनिया के एक बड़े हिस्से में मुनष्य कुत्ते के गोश्त पर जिंदा रहते हैं। आसाम से लेकर जापान तक के देशों में इसे अच्छा व्यंजन माना जाता है। मुझे जापान में गीशा हाउस की विदाई पार्टी में कुत्ते का गोश्त परोसा गया और मैंने इसका भरपूर स्वाद लिया जिसे कि गीश यह कहते हुए पेश कर रही थी 'अगर मैं बताऊंगी तो आप पसंद नहीं करोगे।' उसके बाद मैंने कभी भी गीश से नहीं पूछा कि जो कुछ भी मुझे दिया जा रहा था वह क्या था जो मुझे स्वादिष्ट लगा।
***
एक रचना:
*
चारु चन्द्र राकेश रत्न की
किरण पड़े जब 'सलिल' धार पर
श्री प्रकाश पा जलतरंग सी
अनजाने कुछ रच-कह देती
कलकल-कुहूकुहू की वीणा
विजय-कुम्भ रस-लय-भावों सँग
कमल कुसुम नीरजा शरण जा
नेह नर्मदा नैया खेती
आ अमिताभ सूर्य ऊषा ले
विहँस खलिश को गले लगाकर
कंठ धार लेता महेश बन
हो निर्भीक सुरेन्द्र जगजयी
सीताराम बने सब सुख-दुःख
धीरज धर घनश्याम बरसकर
पाप-ताप की नाव डुबा दें
महिमा गाकर सद्भावों की
दें संतोष अचल गौतम यदि
हो आनंद-सिंधु यह जीवन
कविता प्रणव नाद हो पाये
हो संजीव सृष्टि सब तब ही.
२७-६-२०१५
***

शुक्रवार, 26 जून 2026

जून २०, सदोका, कमलावती छंद, नागरिक अधिकार, त्रिसत सवैया, व्यंग्य कविता, लघु कथा, दोहा, शिवलिंग, शालिग्राम, पिता

सलिल सृजन जून २०
सरस्वती चालीसा
शारद माँ कलिकाल में, भव से सकतीं तार।
नित्य करें आराधना, जाएँ भव के पार।।
अक्षर-अक्षर नाद है, शब्द-शब्द ध्वनि लोक।
भाषा वाहक भाव की, लिपि लेखन आलोक।।
*
रस-सलिला माँ शारद वंदन। अर्पित श्रद्धा रोली चंदन।।
कर संजीव जीव के मन को। करो ज्ञानमय माँ जीवन को।।
श्रम संयम संतोष सफलता। शुभाशीष दो वरें विमलता।।
चित्र गुप्त छवि मन में लेखें। कंकर-कंकर शंकर देखें।।
दो विश्वास-आस मानस में। सभी इंद्रियाँ हो निज वश में।।
ध्यान लगा तव दर्शन पाएँ। चरण कमल में शीश नवाएँ।।
कृपा कटाक्ष धरोहर मैया। मिले विरासत आशिष छैंया।।
जय शारद-भारत-हिन्दी गा। सब भव बाधा दूर दे भगा।।
*
हों सितार के तार हम, चोट सहें बिन रोष।
कर तेरा गुणगान माँ!, तरें लिए संतोष।।
*
सत त्रेता द्वापर कलि युग में। तुम्हीं व्याप्त रहतीं क्षण-पल में।।
समझदार जन तुमको ध्याता। जीव नासमझ पार न पाता।।
भक्ति-शक्ति उपहार तुम्हारा। शांति-सौख्य जीवन आधारा।।
सदाचार नव जीवनदाता। अनाचार निज नाश बुलाता।।
उषा-किरण तम-तोम बुहारे। दिनकर नित जग को उजियारे।।
सुख-दुख चमक-दमकते तारे। बुझते-गिरते साँझ-सकारे।।
श्वास-आस ही नेह-नर्मदा। धवल धर्मदा विपुल वर्मदा।।
रस-सागर की लहर अनगिनत। महिमा गा करतीं मस्तक नत।।
*
जड़ को चेतन करें माँ, मूढ़ बनें मतिमान।
नीरस भी पाकर परस, हो रसज्ञ रस-खान।।
*
एक नाथ नित तुम्हें मनाते। प्रकृति-पुरुष दो नित यश गाते।।
तीन लोक हैं माँ के मंदिर। चारों युग झुक माँग रहे वर।।
पाँच गव्य शर भूत प्राण मिल। छ: दर्शन रस राग नमित खिल।।
सात दिवस करते परकम्मा। आठ योग वसु सिद्धि कहें माँ।।
नव ग्रह खड़े हाथ हैं जोड़े। दसों इंद्रियाँ हैं तव घोड़े।।
ग्यारह रुद्र माँगते हैं वर। बारह सूर्य राशि सह शंकर।।
तेरह नदियाँ पग पखारतीं। चौदह विद्या छवि निखारतीं।।
पंद्रह तिथियाँ ज्योतित तुमसे। सोलह कला समाहित तुममें।।
*
कर जोड़े हैं देवता, तैंतिस कोटी सदैव।
मंत्र एक सौ आठ जप, मेटें सकल कुटैव।।
*
नाद ताल आलाप थाप माँ। सकल सृष्टि में रहीं व्याप माँ।।
माँ उच्चार बोल स्वर सरगम। लय, गति-यति, रस, भाव असम-सम।
गीत ग़ज़ल ठुमरी चौपाई, छंद असंख्य सरस सुखदाई।।
निराकार साकार शून्य रव, पटल बिंदु रेखा कलरव नव।।
अंतरिक्ष में ऊर्जा व्यापी। मापक मापित मापन मापी।।
अपरा-परा शक्तियाँ अनुपम। अणिमा-गरिमा माँ का परचम।।
ऋद्धि-सिद्धि मिल गाएँ महिमा। सुफला सुजला सुखदा शुभदा।।
सुमति मिले सब जीव मनाएँ। शारद कृपा लक्ष्य वर पाएँ।।
*
अबला जोड़े हाथ कह, सबला कर दो मात।
प्रबला! भव-बाधा हरो, वरदानी विख्यात।।
*
शीश उठा नग करता वंदन। पवन प्रवाहित करे स्तवन।।
अग्नि आप आभित आभारी। अधरा धरा सुमंगलकारी।।
सलिल करे अभिषेक निरंतर। पद प्रक्षालन कर जाए तर।।
करें आचमन मैया जब जब। पाप मुक्ति हो जन्मों की तब।।
माँ हों रुष्ट फेर देतीं मति। हो जाती पल भर में दुर्गति।।
शुंभ-निशुंभ दशानन मिटते। संकट-बादल पल में छँटते।।
अपयश पातीं माँ कैकेई। पीड़ित उमा रमा वैदेही।।
कृष्णा कर्ण सुयोधन शापित। मातु कृपा पा पांडव दीपित।।
*
सभी देव-देवी सहज, होते परम प्रसन्न।
मातु शारदा बिन रहे, भाग्य देव भी खिन्न।।
सरस्वती कलिकाल में, सबकी तारणहार।
जिस पर हो शारद-कृपा, हो पल में उद्धार।।
माँ की महिमा अति अगम, कहें-सुनें जो धन्य।
मातु कृपा पा सफल हो, माँ सा कोई न अन्य।।
१९-२०.६.२०२६
एल एन सी टी जबलपुर
०००
सदोका सलिला
ई​ कविता में
करते काव्य स्नान ​
कवि​-कवयित्रियाँ।
सार्थक​ होता
जन्म निरख कर
दिव्य भाव छवियाँ।१।
ममता मिले
मन-कुसुम खिले,
सदोका-बगिया में।
क्षण में दिखी
छवि सस्मित मिली
कवि की डलिया में।२।
​न​ नौ नगद ​
न​ तेरह उधार,
लोन ले, हो फरार।
मस्तियाँ कर
किसी से मत डर
जिंदगी है बहार।३।
धूप बिखरी
कनकाभित छवि
वसुंधरा निखरी।
पंछी चहके
हुलस, न बहके
सुनयना सँवरी।४।
• ​
श्लोक गुंजित
मन भाव विभोर,
पुजा माखनचोर।
उठा हर्षित
सक्रिय हो नीरव
क्यों हो रहा शोर?५।
है चौकीदार
वफादार लेकिन
चोरियाँ होती रही।
लुटती रहीं
देश की तिजोरियाँ
जनता रोती रही।६।
गुलाबी हाथ
मृणाल अंगुलियाँ
कमल सा चेहरा।
गुलाब थामे
चम्पा सा बदन
सुंदरी या बगिया?७।
लिए उच्चार
पाँच, सात औ' सात
दो मर्तबा सदोका।
रूप सौंदर्य
क्षणिक, सदा रहे
प्रभाव सद्गुणों का।८।
सूरज बाँका
दीवाना है उषा का
मुट्ठी भर गुलाल
कपोलों पर
लगाया, मुस्कुराया
शोख उषा शर्माई।९।
आवारा मेघ
कर रहा था पीछा
देख अकेला दौड़ा
हाथ न आई
दामिनी ने गिराई
जमकर बिजली।१०।
हवलदार
पवन ने जैसे ही
फटकार लगाई।
बादल हुआ
झट नौ दो ग्यारह
धूप खिलखिलाई।११।
महकी कली
गुनगुनाते गीत
मँडराए भँवरे।
सगे किसके
आशिक हरजाई
बेईमान ठहरे।१२।
घर ना घाट
सन्यासी सा पलाश
ध्यानमग्न, एकाकी।
ध्यान भग्न
करना चाहे संध्या
दिखला अदा बाँकी।१३।
सतत बही
जो जलधार वह
सदा निर्मल रही।
ठहर गया
जो वह मैला हुआ
रहो चलते सदा।१४।
पंकज खिला
करता नहीं गिला
जन्म पंक में मिला।
पुरुषार्थ से
विश्व-वंद्य हुआ
देवों के सिर चढ़ा।१५।
खिलखिलाई
इठलाई शर्माई
सद्यस्नाता नवोढ़ा।
चिलमन भी
रूप देख बौराया
दर्पण आहें भरे।१६।
लहराती है
नागिन जैसी लट,
भाल-गाल चूमती।
बेला की गंध
मदिर सूँघ-सूँघ
बेड़नी सी नाचती।१७।
क्षितिज पर
मेघ घुमड़ आए
वसुंधरा हर्षाई।
पवन झूम
बिजली संग नाचा,
प्रणय पत्र बाँचा।१८।
लोकतंत्र में
नेता करे सो न्याय
अफसर का राज।
गौरैयों ने
राम का राज्य चाहा
बाजों को चुन लिया।१९।
घर को लगी
घर के चिराग से
दिन दहाड़े आग।
मंत्री का पूत
किसानों को कुचले
और छाती फुलाए। २०।
मेघ गरजे
रिमझिम बरसे
आसमान भी तर।
धरती भीगी
हवा में हवा हुआ
दुपट्टा, गाल लाल ।२१।
निर्मल नीर
गगन से भू पर
आकर मैला हुआ।
ज्यों कलियों का
दामन भँवरों ने
छूकर पंकिल किया।२२।
चुभ रही थी
गर्मी में तीखी धूप
जीव-जंतु परेशां।
धरा झुलसी
धन्य धरा धीरज
बारिश आने तक।२३।
करते पहुनाई
ढोल बजा दादुर
पत्ते बजाते ताली।
सौंधी महक
माटी ने फैला दी
झूम उठीं शाखाएँ।२४।
मेघ ठाकुर
आसमानी ड्योढी में
जमाए महफिल।
दिखाए नृत्य
कमर लचकाती
बिजली बलखाती।२५।
•••
***
ॐ सरस्वत्यै नम: ॐ
शारद वंदना
लाक्षणिक जातीय पद्मावती/कमलावती छंद
*
शारद छवि प्यारी, सबसे न्यारी, वेद-पुराण सुयश गाएँ।
कर लिए सुमिरनी, नाद जननि जी, जप ऋषि सुर नर तर जाएँ।।
माँ मोरवाहिनी!, राग-रागिनी नाद अनाहद गुंजाएँ।
सुर सरगमदात्री, छंद विधात्री, चरण - शरण दे मुसकाएँ।।
हे अक्षरमाता! शब्द प्रदाता! पटल लेखनी लिपि वासी।
अंजन जल स्याही, वाक् प्रवाही, रस-धुन-लय चारण दासी।।
हो ॐ व्योम माँ, श्वास-सोम माँ, जिह्वा पर आसीन रहें।
नित नेह नर्मदा, कहे शुभ सदा, सलिल लहर सम सदा बहें।।
कवि काव्य कामिनी, छंद दामिनी, भजन-कीर्तन यश गाए।
कर दया निहारो, माँ उपकारो, कवि कुल सारा तर जाए।।
*
२०-६-२०२०
***
विमर्श
निर्बल नागरिकों के अधिकारों का हनन
*
लोकतंत्र में निर्बल नागरिकों की जीवन रक्षा का भर जिन पर है वे उसका जीना मुश्किल कर दें और जब कोई असामाजिक तत्व ऐसी स्थिति में उग्र हो जाए तो पूरे देश में हड़ताल कर असंख्य बेगुनाहों को मरने के लिए विवश कर दिया जाए। शर्म आनी चाहिए कि बिना इलाज मरे मरीजों के कत्ल का मुकदमा आई एम् ए के पदाधिकारियों पर क्यों नहीं चलाती सरकार?
आम मरीजों के जीवन रक्षा के लिए कोर्ट में जनहित याचिका क्यों नहीं लाई जाती ?
मरीजों के मरने के बाद भी जो अस्पताल इलाज के नाम पर लाखों का बिल बनाते हैं, और लाश तक रोक लेते हैं उनके खिलाफ क्यों नहीं लाते पिटीशन?
दुर्घटना के बाद घायलों को बिना इलाज भगा देनेवाले डाक्टरों के खिलाफ क्यों नहीं होती पिटीशन?
राजस्थान में डॉक्टर ने मरीज को अस्पताल में सबके साबके मारा, उसके खिलाफ आई एम् ए ने क्या किया?
यही बदतमीजी वकील भी कर रहे हैं। एक वकील दूसरे वकील को मारे और पूरे देश में हड़ताल कर दो। न्याय की आस में घर, जमीन बेच चुके मुवक्किदिलाने ल की न्याय की चिंता नहीं है किसी वकील को।
आम आदमी को ब्लैक मेल कर रहे पत्रकारों के साथ पूरा मीडिया जुट जाता है।
कैसा लोकतंत्र बना रहे हैं हम। निर्बल और गरीब की जान बचानेवाला, न्याय
दिलाने वाला, उसकी आवाज उठाने वाला, उसके जीवन भर की कमाई देने का सपना दिखानेवाला सब संगठन बनाकर खड़े हैं। उन्हें समर्थन को संरक्षण चाहिए, और ये सब असहायकी जान लेते रहें उनके खिलाफ कुछ नहीं हो रहा।
शर्मनाक।
***
नवाविष्कृत त्रिसत सवैया 
गण सूत्र: स म त न भ स म ग ।वर्णिक यति: ७-७-७ ।
*
अँखुआए बीजों को, स्नेह सलिल से सींचो, हरियाली आयेगी।
अँकुराए पत्तों को, पाल धरणि धानी हो, खुशहाली पायेगी।
शुचिता के पौधों को, पाल कर बढ़ाओ तो, रँग होली लाएगी।
ममता के वृक्षों को, ढाल बन बचाओ तो, नव पीढ़ी गायेगी।
*
***
हिंदी का दैदीप्यमान सूर्य सलिल
आभा सक्सेना 'दूनवी'
संजीव वर्मा सलिल एक ऐसा नाम जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी ही कम है |उनकी प्रशंसा करना मतलब सूर्य को दीपक दिखाने जैसा होगा |उनसे मेरा परिचय मुख पोथी पर सन 2014 - 2015 में हुआ |उसके बाद तो उनसे दूरभाष पर वार्तालाप का सिलसिला चल रहा है| सलिल जी स्वयं में ही एक पूरा छंद काव्य हैं| उन्होने किस विधा में नहीं लिखा हर विधा के वे ज्ञानी पंडित हैं उन के व्यक्तित्व में उनकी कवियित्री बुआ महादेवी वर्मा जी की साफ झलक दिखाई देती है |
सन 2014, उस समय मैं नवगीत लिखने का प्रयास कर रही थी उस समय मुझे उन्हों ने ही नवगीत विधा की बारीकियाँ सिखाईं
मेरा नव गीत उनके कुछ सुझावों के बाद -----------
नव गीत
कुछ तो
मुझसे बातें कर लो
अलस्सुबह जा
सांझ ढले
घर को आते हो
क्या जाने
किन हालातों से
टकराते हो
प्रियतम मेरे!
सारे दिन मैं
करूँ प्रतीक्षा-
मुझ को
निज बाँहों में भर लो
थका-चुका सा
तुम्हें देख
कैसे मुँह खोलूँ
बैठ तुम्हारे निकट
पीर क्या
हिचक टटोलूँ
श्लथ बाँहों में
गिर सोते
शिशु से भाते हो
मन इनकी
सब पीड़ा हर लो
.....आभा
आज कल वे सवैया छंद पर कार्य कर रहे हैं उनका कहना है कि
“सवैया आधुनिक हिंदी की शब्दावली के लिए पूरी तरह उपयुक्त छंद' है।
यह भ्रांति है कि सरस सवैये केवल लोकभाषाओं लिखे जा सकते हैं।
सत्य यह है कि सवैया वाचिक परंपरा से विकसित छंद है। लोक गायक प्रायः अशिक्षित या अल्प शिक्षित थे। उन्होंने लोक भाषा में सवैया रचे और उन्हें पढ़कर उन्हीं की शब्दावली हमें सहज लगती है। मैं सवैया कोष पर काम कर रहा हूँ। 160 प्रकार के सवैये बना चुका हूँ। सब आधुनिक हिंदी में हैं जिनमें वर्णिक व मात्रिक गणना व यति समान हैं। के सवैये बना चुका हूँ। सब आधुनिक हिंदी में हैं जिनमें वर्णिक व मात्रिक गणना व यति समान हैं”|
एक कथ्य चार छंद:
*
जनक छंद
फूल खिल रहे भले ही
गर्मी से पंजा लड़ा
पत्ते मुरझा रहे हैं
*
माहिया
चाहे खिल फूल रहे
गर्मी से हारे
पत्ते कुम्हलाय हरे.
*
दोहा
फूल भले ही खिल रहे, गर्मी में भी मौन.
पत्ते मुरझा रहे हैं, राहत दे कब-कौन.
*
सोरठा
गर्मी में रह मौन, फूल भले ही खिल रहे,
राहत दे कब-कौन, पत्ते मुरझा रहे हैं.
रोला
गर्मी में रह मौन, फूल खिल रहे भले ही.
राहत कैसे मिलेगी, पत्ते मुरझा रहे हैं.
*
सलिल जी बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं | उनको देख कर लगता है कि उनका साहित्य के प्रति विशेष रूप से लगाव है इसी लिए उन्होने अपना जीवन साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया है |
दोहा लिखना भी मैंने उन से ही सीखा |
एक दोहा लिखा और लिख कर उन्होने मेरे नाम ही कर दिया |
आभामय दोहे नवल, आ भा करते बात। आभा पा आभित सलिल, पंक्ति पंक्ति जज़्बात ।।
इसे कहते हैं बड़प्पन |उनकी प्रतिभा दूर दूर तक देदीप्यमान है और रहेगी |
बेहद आभार आपका
अतः ऐसे व्यक्तित्व को मेरा कोटिशः नमन भविष्य में उनकी साहित्यिक प्रगति और अच्छे स्वास्थ्य एवं शतायु की कामना करते हुए .....
आभा सक्सेना दूनवी
देहरादून
***
व्यंग्य रचना:
अभिनंदन
लो
*
युग-कवयित्री!
अभिनंदन
लो....
*
सब जग अपना, कुछ न पराया
शुभ सिद्धांत तुम्हें यह भाया.
गैर नहीं कुछ भी है जग में-
'विश्व एक' अपना सरमाया.
जहाँ मिले झट झपट वहीं से
अपने माथे यश-चंदन लो
युग-कवयित्री
अभिनंदन
लो....
*
मेरा-तेरा मिथ्या माया
दास कबीरा ने बतलाया.
भुला परायेपन को तुमने
गैर लिखे को कंठ बसाया.
पर उपकारी अन्य न तुमसा
जहाँ रुचे कविता कुंदन लो
युग-कवयित्री
अभिनंदन
लो....
*
हिमगिरी-जय सा किया यत्न है
तुम सी प्रतिभा काव्य रत्न है.
चोरी-डाका-लूट कहे जग
निशा तस्करी मुदित-मग्न है.
अग्र वाल पर रचना मेरी
तेरी हुई, महान लग्न है.
तुमने कवि को धन्य किया है
खुद का खुद कर मूल्यांकन लो
युग-कवयित्री
अभिनंदन
लो....
*
कवि का क्या? 'बेचैन' बहुत वह
तुमने चैन गले में धारी.
'कुँवर' पंक्ति में खड़ा रहे पर
हो न सके सत्ता अधिकारी.
करी कृपा उसकी रचना ले
नभ-वाणी पर पढ़कर धन लो
युग-कवयित्री
अभिनंदन
लो....
*
तुम जग-जननी, कविता तनया
जब जी चाहा कर ली मृगया.
किसकी है औकात रोक ले-
हो स्वतंत्र तुम सचमुच अभया.
दुस्साहस प्रति जग नतमस्तक
'छद्म-रत्न' हो, अलंकरण लो
युग-कवयित्री
अभिनंदन
लो....
२०-६-२०१८
टीप: श्रेष्ठ कवि की रचना को अपनी बताकर २३-५-२०१८ को प्रात: ६.४० बजे काव्य धारा कार्यक्रम में आकाशवाणी पर प्रस्तुत कर धनार्जन का अद्भुत पराक्रम करने के उपलक्ष्य में यह रचना समर्पित उसे ही जो इसका सुपात्र है)
***
लघु कथा
राष्ट्रीय एकता
*
'माँ! दो भारतीयों के तीन मत क्यों होते हैं?'
''क्यों क्या हुआ?''
'संसद और विधायिकाओं में जितने जन प्रतिनिधि होते हैं उनसे अधिक मत व्यक्त किये जाते हैं.'
''बेटा! वे अलग-अलग दलों के होते हैं न.''
'अच्छा, फिर दूरदर्शनी परिचर्चाओं में किसी बात पर सहमति क्यों नहीं बनती?'
''वहाँ बैठे वक्ता अलग-अलग विचारधाराओं के होते हैं न?''
'वे किसी और बात पर नहीं तो असहमत होने के लिये ही सहमत हो जाएँ।
''ऐसा नहीं है कि भारतीय कभी सहमत ही नहीं होते।''
'मुझे तो भारतीय कभी सहमत होते नहीं दीखते। भाषा, भूषा, धर्म, प्रांत, दल, नीति, कर, शिक्षा यहाँ तक कि पानी पर भी विवाद करते हैं।'
''लेकिन जन प्रतिनिधियों की भत्ता वृद्धि, अधिकारियों-कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने, व्यापारियों के कर घटाने, विद्यार्थियों के कक्षा से भागने, पंडितों के चढोत्री माँगने, समाचारों को सनसनीखेज बनाकर दिखाने, नृत्य के नाम पर काम से काम कपड़ों में फूहड़ उछल-कूद दिखाने और कमजोरों के शोषण पर कोई मतभेद देखा तुमने? भारतीय पक्के राष्ट्रवादी और आस्तिक हैं, अन्नदेवता के सच्चे पुजारी, छप्पन भोग की परंपरा का पूरी ईमानदारी से पालन करते हैं। मद्रास का इडली-डोसा, पंजाब का छोला-भटूरा, गुजरात का पोहा, बंगाल का रसगुल्ला और मध्यप्रदेश की जलेबी खिलाकर देखो, पूरा देश एक नज़र आयेगा।''
और बेटा निरुत्तर हो गया...
*
दोहा सलिला
*
जूही-चमेली देखकर, हुआ मोगरा मस्त
सदा सुहागिन ने बिगड़, किया हौसला पस्त
*
नैन मटक्का कर रहे, महुआ-सरसों झूम
बरगद बब्बा खाँसते। क्यों? किसको मालूम?
*
अमलतास ने झूमकर, किया प्रेम-संकेत
नीम षोडशी लजाई, महका पनघट-खेत
*
अमरबेल के मोह में, फँसकर सूखे आम
कहे वंशलोचन सम्हल, हो न विधाता वाम
*
शेफाली के हाथ पर, नाम लिखा कचनार
सुर्ख हिना के भेद ने, खोदे भेद हजार
*
गुलबकावली ने किया, इन्तिज़ार हर शाम
अमन-चैन कर दिया है,पारिजात के नाम
*
गौरा हेरें आम को, बौरा हुईं उदास
मिले निकट आ क्यों नहीं, बौरा रहे उदास?
*
बौरा कर हो गया है, आम आम से ख़ास
बौरा बौराये, करे दुनिया नहक हास
२०-६-२०१६
lnct jabalpur
***
एक रचना
*
प्रभु जी! हम जनता, तुम नेता
हम हारे, तुम भए विजेता।।
प्रभु जी! सत्ता तुमरी चेरी
हमें यातना-पीर घनेरी ।।
प्रभु जी! तुम घपला-घोटाला
हमखों मुस्किल भयो निवाला।।
प्रभु जी! तुम छत्तीसी छाती
तुम दुलहा, हम महज घराती।।
प्रभु जी! तुम जुमला हम ताली
भरी तिजोरी, जेबें खाली।।
प्रभु जी! हाथी, हँसिया, पंजा
कंघी बाँटें, कर खें गंजा।।
प्रभु जी! भोग और हम अनशन
लेंय खनाखन, देंय दनादन।।
प्रभु जी! मधुवन, हम तरु सूखा
तुम हलुआ, हम रोटा रूखा।।
प्रभु जी! वक्ता, हम हैं श्रोता
कटे सुपारी, काट सरोता।।
(रैदास से क्षमा प्रार्थना सहित)
२०-११-२०१५
चित्रकूट एक्सप्रेस, उन्नाव-कानपूर
***
शिवलिंग और शालिग्राम
*
हिन्दू धर्म के तीन प्रमुख देवता हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश को क्रमश: शंख, शिवलिंगऔर शालिग्राम रूप में सर्वोत्तम माना है। शंख सूर्य व चंद्र के समान देवस्वरूप है जिसके मध्य में वरुण, पृष्ठ में ब्रह्मा तथा अग्र में गंगा और सरस्वती नदियों का वास है।
वैदिक धर्म में मूर्ति की पूजा नहीं होती। शिवलिंग और शालिग्राम की भगवान का विग्रह रूप मानकर पूजा की जानी चाहिए।
शालिग्राम का मंदिर : नेपाल में स्थित मुक्तिनाथ में स्थित शालिग्राम का प्रसिद्ध मंदिर वैष्‍णव संप्रदाय के प्रमुख मंदिरों में से एक है। काठमांडु से पोखरा, जोमसोम होकर जाना होता है। दुर्लभ शालिग्राम नेपाल के मुक्तिनाथ, काली गण्डकी नदी के तट पर पाया जाता है। काले और भूरे शालिग्राम के अलावा सफेद, नीले और ज्योतियुक्त शालिग्राम का पाया मिलना दुर्लभ है। पूर्ण शालिग्राम में भगवाण विष्णु के चक्र की आकृति अंकित होती है।
शालिग्राम के प्रकार : विष्णु के अवतारों के अनुसार शालिग्राम पाया जाता है। गोल शालिग्राम विष्णु का गोपाल रूप है। मछली के आकार काशालिग्राम मत्स्य अवतार का प्रतीक है। यदि शालिग्राम कछुए के आकार का है तो यह भगवान के कच्छप/कूर्म अवतार का प्रतीक है। शालिग्राम पर उभरने वाले चक्र और रेखाएं भी विष्णु के अन्य अवतारों और श्रीकृष्ण के कुल के लोगों को इंगित करती हैं। ३३ प्रकार के शालिग्राम में से २४ विष्णु के २४ अवतारों से संबंधित हैं। ये २४ शालिग्राम वर्ष की २४ एकादशी व्रत से संबंधित हैं।
शालिग्राम की पूजा :
* घर में सिर्फ एक ही शालिग्राम की पूजा करना चाहिए।
* विष्णु की मूर्ति से कहीं ज्यादा उत्तम है शालिग्राम की पूजा करना।
* शालिग्राम पर चंदन लगाकर उसके ऊपर तुलसी का एक पत्ता रखा जाता है।
* प्रतिदिन शालिग्राम को पंचामृत से स्नान कराया जाता है।
* जिस घर में शालिग्राम का पूजन होता है उस घर में लक्ष्मी का सदैव वास रहता है।
* शालिग्राम पूजन करने से अगले-पिछले सभी जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
* शालिग्राम सात्विकता के प्रतीक हैं। उनके पूजन में आचार-विचार की शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
शिवलिंग : शिवलिंग को भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है तो जलाधारी को माता पार्वती का प्रतीक। निराकार रूप में भगवान शिव को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है।
ॐ नम: शिवाय । यह भगवान का पंचाक्षरी मंत्र है। इसका जप करते हुए शिवलिंग का पूजन या अभिषेक किया जाता है। इसके अलावा महामृत्युंजय मंत्र और शिवस्त्रोत का पाठ किया जाता है। शिवलिंग की पूजा का विधान बहुत ही विस्तृत है इसे किसी पुजारी के माध्यम से ही सम्पन्न किया जाता है।
शिवलिंग पूजा के नियम :
* शिवलिंग को पंचांमृत से स्नानादि कराकर उन पर भस्म से तीन आड़ी लकीरों वाला तिलक लगाएं।
*शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ाना चाहिए, लेकिन जलाधारी पर हल्दी चढ़ाई जा सकती है।
*शिवलिंग पर दूध, जल, काले तिल चढ़ाने के बाद बेलपत्र चढ़ाएं।
* केवड़ा तथा चम्पा के फूल न चढाएं। गुलाब और गेंदा किसी पुजारी से पूछकर ही चढ़ाएं।
* कनेर, धतूरे, आक, चमेली, जूही के फूल चढ़ा सकते हैं।
* शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ प्रसाद ग्रहण नहीं किया जाता, सामने रखा गया प्रसाद अवश्य ले सकते हैं।
* शिवलिंग नहीं शिवमंदिर की आधी परिक्रमा ही की जाती है।
* शिवलिंग के पूजन से पहले पार्वती का पूजन करना जरूरी है
शिवलिंग का अर्थ : शिवलिंग को नाद और बिंदु का प्रतीक माना जाता है। पुराणों में इसे ज्योर्तिबिंद कहा गया है। पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है जैसे- प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, ऊर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्मांडीय स्तंभ लिंग आदि।
शिव का अर्थ 'परम कल्याणकारी शुभ' और 'लिंग' का अर्थ है- 'सृजन ज्योति'। वेदों और वेदान्त में लिंग शब्द सूक्ष्म शरीर के लिए आता है। यह सूक्ष्म शरीर 17 तत्वों से बना होता है। 1- मन, 2- बुद्धि, 3- पांच ज्ञानेन्द्रियां, 4- पांच कर्मेन्द्रियां और पांच वायु। भ्रकुटी के बीच स्थित हमारी आत्मा या कहें कि हम स्वयं भी इसी तरह है। बिंदु रूप।
ब्राह्मांड का प्रतीक : शिवलिंग का आकार-प्रकार ब्रह्मांड में घूम रही हमारी आकाशगंगा की तरह है। यह शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड में घूम रहे पिंडों का प्रतीक है। वेदानुसार ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।
अरुणाचल है प्रमुख शिवलिंगी स्थान : भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग (ज्योति) प्रकट किया था। इस लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ। इसी समय से शिव के परब्रह्म मानते हुए उनके प्रतीक रूप में लिंग की पूजा आरंभ हुई। यह घटना अरुणाचल में घटित हुई थी।
आकाशीय पिंड : ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार विक्रम संवत के कुछ सहस्राब्‍दी पूर्व संपूर्ण धरती पर उल्कापात का अधिक प्रकोप हुआ। आदिमानव को यह रुद्र (शिव) का आविर्भाव दिखा। जहां-जहां ये पिंड गिरे, वहां-वहां इन पवित्र पिंडों की सुरक्षा के लिए मंदिर बना दिए गए। इस तरह धरती पर हजारों शिव मंदिरों का निर्माण हो गया। उनमें से प्रमुख थे 108 ज्योतिर्लिंग।
संग-ए-असवद : शिव पुराण के अनुसार उस समय आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेक उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। कहते हैं कि मक्का का संग-ए-असवद भी आकाश से गिरा था।
***
स्मृति गीत:
हर दिन पिता याद आते हैं...
संजीव 'सलिल'
*
जान रहे हम अब न मिलेंगे.
यादों में आ, गले लगेंगे.
आँख खुलेगी तो उदास हो-
हम अपने ही हाथ मलेंगे.
पर मिथ्या सपने भाते हैं.हर
दिन पिता याद आते हैं...
*
लाड़, डाँट, झिड़की, समझाइश.
कर न सकूँ इनकी पैमाइश.
ले पहचान गैर-अपनों को-
कर न दर्द की कभी नुमाइश.
अब न गोद में बिठलाते हैं.
हर दिन पिता याद आते हैं...
*
अक्षर-शब्द सिखाये तुमने.
नित घर-घाट दिखाए तुमने.
जब-जब मन कोशिश कर हारा-
फल साफल्य चखाए तुमने.
पग थमते, कर जुड़ जाते हैं
हर दिन पिता याद आते हैं...
*

२०-६-२०१०

जून २६, गुलबाँस, नवगीत, सरस्वती, सत्यमित्रानंद सवैया, आल्हा, अविनाश ब्यौहार, जीएसटी, पर्यावरण गीत, हाइकु गीत

सलिल सृजन जून २६

*
हास्य रचना
लाली लालू से कहे-
होती गर अखबार
रोज सुबह ले हाथ में
करते खूब दुलार।
लालू बोला- काश तुम
हो जातीं अखबार
हर दिन नूतन छवि दिखा
रहतीं चुप मनुहार।।
२६.५.२०२५
०0०
मुक्तक
चर्चित हो रचना तभी, जब हो वह रस-खान
मन हो भाव विभोर सुन, ज्यों कोयल की तान
भाव बिंब का समन्वय, अलंकार दैदीप्य
संजीवित हो कथ्य ज्यों नभ में हो दिनमान
*
शब्द-शब्द मोती सदृश, गूँथ बनाएँ हार
धागा हो अनुभूति का, सुई अभिव्यक्त विचार
काव्य कामिनी सुसज्जित, पाठक-श्रोता मुग्ध
शैली मोती की दमक, शिल्प रूप श्रंगार
***
नवगीत
मैं गुलबाँस
मैं गुलबाँस समय पर खिलता झर जाता हूँ अपने आप
फोरो-क्लॉक मुझे कहता जग
खुश्बू जाती जग में व्याप
.
श्वेत लाल मैजेंटा पीला
कृष्ण कली भी पाया नाम
पाँच पत्तियाँ, गोल लाल फल
खुशी लुटाता हूँ बेदाम
चिकनी हरी पत्तियाँ लंबी
सब पर छोड़ें अपनी छाप
मैं गुलबाँस समय पर खिलता झर जाता हूँ अपने आप
.
है मझोल आकारी पौधा
देख-भाल की चाह नहीं
देख-भाल करता खुद खुद की
करूँ किसी से डाह नहीं
मैं न कभी वरदान चाहता
भीत न करता मुझको शाप
मैं गुलबाँस समय पर खिलता झर जाता हूँ अपने आप
.
महको, महकाओ दुनिया को
जन्नत धरती पर आए
एक दूसरे के सहभागी
संग-साथ सबको भाए
जुदा रूप-रंग है हर गुल का
अलग-अलग हैं सबके नाप
मैं गुलबाँस समय पर खिलता झर जाता हूँ अपने आप
२६.६.२०२५
...
नवगीत
तुम सोईं
*
तुम सोईं तो
मुँदे नयन-कोटर में सपने
लगे खेलने।
*
अधरों पर छा
मंद-मंद मुस्कान कह रही
भोर हो गयी,
सूरज ऊगा।
पुरवैया के झोंके के संग
श्याम लटा झुक
लगी झूलने।
*
थिर पलकों के
पीछे, चंचल चितवन सोई
गिरी यवनिका,
छिपी नायिका।
भाव, छंद, रस, कथ्य समेटे
मुग्ध शायिका
लगी झूमने।
*
करवट बदली,
काल-पृष्ठ ही बदल गया ज्यों।
मिटा इबारत,
सबक आज का
नव लिखने, ले कोरा पन्ना
तजकर आलस
लगीं पलटने।
*
ले अँगड़ाई
उठ-बैठी हो, जमुहाई को
परे ठेलकर,
दृष्टि मिली, हो
सदा सुहागन, कली मोगरा
मगरमस्त लख
लगी महकने।
*
बिखरे गेसू
कर एकत्र, गोल जूड़ा धर
सर पर, आँचल
लिया ढाँक तो
गृहस्वामिन वन में महुआ सी
खिल-फूली फिर
लगी गमकने।
*
मृगनयनी को
गजगामिनी होते देखा तो
मकां बन गया
पल भर में घर।
सारे सपने, बनकर अपने
किलकारी कर
लगे खेलने।
[टीप- मेरे गीत-नवगीत संग्रह 'ओ मेरी तुम' की सभी ५५ गीति रचनाएं जीवन संगिनी प्रो. (डॉ.) साधन वर्मा को ही समर्पित हैं। इसका विमोचन सेवा निवृत्ति पर्व पर उन्हीं के कर कमलों से हुआ था। प्रस्तुत है एक रचना]
***
कृति चर्चा
'धानी चुनर' : हिंदी गजल का लाजवाब हुनर
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
(कृति विवरण- धानी चुनर, हिंदी ग़ज़ल संग्रह, नवीन सी. चतुर्वेदी, प्रथम संस्करण 2022, पृष्ठ 95, मूल्य ₹150, आवरण पेपरबैक, बहुरंगी, प्रकाशक आर. के. पब्लिकेशन मुंबई)
हिंदी में ग़ज़ल मूलतः फारसी से आयातित साहित्यिक सृजन विधा है जिसे हिंदी ने आत्मार्पित किया है। ग़ज़ल का शिल्प और विधान दोनों फारसी से आते हैं। हर भाषा की अपने कुछ खासियतें होती हैं। फारसी से आने के कारण ग़ज़ल में भी फारसी की विशेषताएँ अंतर्निहित हैं। जब एक भाषा की साहित्यिक विधा को दूसरी भाषा स्वीकार करती है तो स्वाभाविक रूप से उसमें अपनी प्रवृत्ति, संस्कार, व्याकरण और पिंगल को आरोपित करती है। हिंदी ग़ज़ल भी इसी प्रक्रिया से गुजर रही है। भारत के पश्चिमोत्तर प्रांतों की भाषाओं और फारसी के मिश्रण से जो जुबान सैनिक छावनियों में विकसित हुई वह 'लश्करी' कही गई। आम लोगों से बातचीत के लिए यह जुबान देशज शब्द-संपदा ग्रहण कर रोजमर्रा के काम-काज की भाषा 'उर्दू' हो गई। ग़ज़ल को हिंदी में कबीर और खुसरो आम लोगों तक पहुँचाया। हिंदी में ग़ज़ल ने कई मुकाम हासिल किए। इस दौरान उसे गीतिका, मुक्तिका, तेवरी, सजल, पूर्णिका, अनुगीत इत्यादि नाम दिए गए और आगे भी कई नाम दिए जाएंगे। इसका मूल कारण यह है कि गजल हर रचनाकार को अपनी सी लगती है और इस अपनेपन को वह एक नया नाम देकर जाहिर करता है पर ग़ज़ल तो ग़ज़ल थी, है और रहेगी।
हिंदी ग़ज़ल को 'तंग गली' कहनेवाले मिर्जा गालिब और 'कोल्हू का बैल' कहकर नापसंद करनेवाले कहनेवाले शायरों को भी ग़ज़ल कहनी पड़ी और वक्त ने उन्हें ग़ज़लकार के रूप में ही याद रखा। कहते हैं 'मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना'। हिंदी ग़ज़ल को मैंने इस रूप में समझा है -
ब्रह्म से ब्रह्मांश का संवाद है हिंदी ग़ज़ल
आत्म की परमात्म से फरियाद है हिंदी ग़ज़ल
मत 'गजाला चश्म' कहना, यह 'कसीदा' भी नहीं
छंद गण लय रसों की औलाद है हिंदी ग़ज़ल
बकौल नवीन चतुर्वेदी-
ओढ़कर धानी चुनर हिंदी ग़ज़ल
बढ़ रही सन्मार्ग पर हिंदी ग़ज़ल
विश्व कविता ने चुना जिस पंथ को
है उसी पर अग्रसर हिंदी ग़ज़ल
भीड़ ने जिस पंथ को रस्ता कहा
लिख रही उसको डगर हिंदी ग़ज़ल
हत हुई गरिमा तो मन आहत हुआ
उठ खड़ी होकर मुखर हिंदी ग़ज़ल
देव भाषा की सलोनी संगिनी
मूल स्वर में है प्रबल हिंदी ग़ज़ल
19 मात्रिक महापौराणिक जातीय छंद में दी गई ग़ज़ल की यह परिभाषा वास्तव में सटीक है। 'धानी चुनर' की ग़ज़लों की भाषा संस्कृत निष्ठ हिंदी है जबकि ग़ज़ल की कहन फारसी की बह्रों पर आधारित है। मैंने ऐसे कई हिंदी ग़ज़ल संकलन देखे हैं जिनमें इसके सर्वथा विपरीत फारसी शब्द बाहुल्य की रचनाएँ हिंदी छंदों में मिली हैं। मुझे हिंदी ग़ज़ल के इन दो रूपों में अंतर्विरोध नहीं दिखता अपितु वह एक दूसरे की पूरक प्रतीत होती हैं
नवीन जी की गजलों की खासियत गज़लियत और शेरियत से युक्त होना है। आमतौर पर गजल के नाम पर या तो अत्यधिक वैचारिक रचनाएं प्राप्त होती हैं अथवा केवल तुकबंदी। संतोष है कि नवीन जी की ये गजलें दोनों दोषों से मुक्त अपनी ही तरह की हैं जिनकी समानता किसी अन्य से स्थापित कर पाना सहज नहीं। इन ग़ज़लों की हर द्विपदी (शेर) सार्थक है। ये ग़ज़लें शब्दों को उसके शब्दकोशीय अर्थ से परे नवीन अर्थ में स्थापित करती हैं।
नवीन जी की एक ग़ज़ल जो महापुराणजातीय दिंडी छंद में लिखी गई है उस का आनंद लें-
नदी के पार उतरना है गुरुजी
हमें यह काम करना है गुरु जी
विनय पथ का वरण करके हृदय का
सकल संताप हरना है गुरुजी
घुमाएँ आप अपनी चाक फिर से
हमें बनना-सँवरना है गुरुजी
इस कंप्यूटर काल में 'चाक' की चर्चा कर नवीन जी उस समय की सार्थकता बताना चाहते हैं जहाँ ऑनलाइन कक्षाएँ नहीं होती थीं, गुरु और शिष्य साथ में बैठकर शिक्षा देते और लेते थे।
एक और गजल देखें यह गजल विभिन्न पंक्तियों में अलग-अलग पदभार समाहित करती है और इसकी अलग-अलग पंक्तियों में अलग-अलग छंद हैं।
हृदय को सर्वप्रथम निर्विकार करना था
तदोपरांत विषय पर विचार करना था
कदापि ध्यान में थी ही नहीं दशा उसकी
नदी में हमको तो बस जलविहार करना था
वर्तमान राजनीति में जनहित की ओर कोई ध्यान न होने और नेताओं के द्वारा जनसेवा का पाखंड करने को नवीन ने जलविहार के माध्यम से बहुत अच्छी तरह व्यक्त किया है।
यौगिक जातीय विधाता छंद में रची गई एक और रचना देखें जिसमें सामाजिक पाखंड को उद्घाटित किया गया है-
व्यर्थ साधो बन रहे हो कामना तो कर चुके हो
उर्वशी से प्रेम की तुम याचना तो कर चुके हो
पंच तत्वों से विनिर्मित जग नियम ही से चलेगा
वर्जना के हेतु समझो गर्जना तो कर चुके हो
यहां नवीन जी सामाजिक संदर्भ में 'वर्जना' के द्वारा मानवीय आचरण के प्रति चेतावनी देते हैं। यह ग़ज़ल 'मुस्तफउलन' की चार आवृत्तियों या 'फ़ाइलातुन' की चार आवृत्तियों के माध्यम से रची जा सकती है। इससे प्रमाणित होता है कि उर्दू की बहरें, मूलत: भारतीय छंदों से ही नि:सृत हैं।
प्रेम और करुणा को एक साथ मिलाते हुए नवीन जी महाभागवत जातीय छंद में कहते हैं-
मीरा और गिरधर जैसी गरिमा से छूना था
प्रीत अगर सच्ची थी तो करुणा से छूना था
जैसे नटनागर ने स्पर्श किया राधा का मन
उसका अंतस वैसी ही शुचिता से छूना था
नवीन जी महाभागवत जाति के विष्णुपद छंद का प्रयोग करते हुए इस ग़ज़ल में पर्यावरण और राजनीति के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करते हैं-
जब जब जंगल के मंगल पर कंटक आते हैं
विश्वामित्र व्यवस्थाओं पर प्रश्न उठाते हैं
सहसभुजी जब-जब जनधन हरकर ले जाते हैं
भृगुवंशी जैसे योद्धा कर्तव्य निभाते हैं
जब-जब सत्ता धृतराष्ट्रों की दासी बनती है
तब तब शरशैया पर भीष्म लिटाए जाते हैं
इस ग़ज़ल में 'सहसभुजी' शब्द का प्रयोग, देशज शब्दों के प्रति नवीन जी के लगाव को जाहिर करता है जबकि विश्वामित्र, भगवान, श्री जगदीश दुष्यंत, शकुंतला, चरक इत्यादि पौराणिक पात्रों के माध्यम से नवीन इस युग की समस्याओं को उठाते हैं।
महापुराण जातीय सुमेरु छंद में नवीन की यह ग़ज़ल मानवीय संवेदना और संभावनाओं को उद्घाटित कर दोनों का अंतरसंबंध बताती है-
जहां संवेदना संभव नहीं है
वहां संभावना संभव नहीं है
जड़ों को त्यागना संभव नहीं है
नियति की वर्जना संभव नहीं है
स्वयं जगदीश की हो या मनुज की
सतत आराधना संभव नहीं है
महा पौराणिक जाति का दिंडी छंद नवीन का प्रिय छंद है। इसी छंद में वे व्यंजना में अपनी बात करते हैं-
इस कला में हम परम विश्वस्त हैं
काम तो कुछ भी नहीं पर व्यस्त हैं
मित्र यह उपलब्धि साधारण नहीं
त्रस्त होकर भी अहर्निश मस्त हैं
आप सिंहासन सुशोभित कीजिए
हम पराजय के लिए आश्वस्त हैं
यहाँ नवीन जी राजनीतिक वातावरण को जिस तरह संकेतित करते हैं, वह दुष्यंत कुमार की याद दिलाता है।
महाभागवत जातीय गीतिका छंद में नवीन जी मानवीय प्रयासों की महिमा स्थापित करते हैं-
कर्मवीरों के प्रयासों को डिगा सकते नहीं
शब्द संधानी पहाड़ों को हिला सकते नहीं
अस्मिता का अर्थ बस उपलब्धि हो जिनके लिए
इस तरह के झुंड निज गौरव बचा सकते नहीं
नवीन जी की ग़ज़लों में भाषिक प्रवाह, भाव बौली तथा रस वैविध्य उल्लेखनीय है-
प्रश्न करना किसी विषय के मंथन का सबसे अच्छा तरीका है। यौगिक जातीय सार छंद में रचित इस रचना में नवीन प्रश्नों के माध्यम से ही अपनी बात कहते हैं-
मान्यवर का प्रश्न है दिन रात का आधार क्या है
और ये दिन-रात हैं इस बात का आधार क्या है
एक और अद्भुत अनोखा प्रश्न है श्रीमान जी का
ज्ञात का आधार क्या अज्ञात का आधार क्या है
एक हैं जयचंद वे भी पूछते हैं प्रश्न अद्भुत
हमको यह बताओ भितरघात का आधार क्या है
नवीन चतुर्वेदी की हर ग़ज़ल पाठक को ना केवल बाँधती है अपितु चिंताऔर चिंतन की ओर प्रवृत्त करती है। हिंदी ग़ज़ल को सिर्फ मनोरंजन की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। एक और ग़ज़ल में नवीन यौगिक जातीय विद्या छंद में अपनी बात कहते हैं-
तुच्छ बरसाती नदी गंगा नदी जैसी लगी है
मोह में तो बेसुरी भी बाँसुरी जैसी लगे है
जामुनी हो या गुलाबी गौर हो या श्याम वर्णा
यामिनी में कामिनी सौदामिनी जैसी लगी है
'यामिनी', 'कामिनी', 'सौदामिनी' जैसे शब्दों का चयन नवीन जी का शब्द-सामर्थ्य बताता है और पाठक को अनुप्रास अलंकार का रसानंद करा देता है। नवीन शब्दों के जादूगर हैं, वह शब्दों के माध्यम से वह सब कह पाते हैं जो कहना चाहते हैं। बहुधा शब्द की शब्दकोशीय मर्यादा को बौना करते हुए नवीन अधिक गहरा अर्थ अपनी गजलों के माध्यम से देते हैं। योगेश जातीय विद्या छंद में ही उनकी एक और ग़ज़ल देखें-
आकलन की बात थी सो मौन रहना ही उचित था
अध्ययन की बात थी सो मौन रहना ही उचित था
तीन डग में विष्णु ने तीनों भवन को नाप डाला
आयतन की बात थी सो मौन रहना ही उचित था
नवीन जी अनुचित कार्योंको देखते हुए भी अनदेखा करने की आम जन की रीति-नीति और सत्ता व्यवस्था को व्यंजना के माध्यम से अभिव्यक्त करते है। यह व्यंजना मन को छू जाती है। कहते हैं राजनीति किसी की सगी नहीं होती। नवीन की गजलों में राजनीति पर कई जगह केवल कटाक्ष नहीं किए गए हैं अपितु राजनीति का सत्य सामने लाया गया है। एक उदाहरण देखें-
आधुनिक संग्राम के कुछ उद्धरण ऐसे भी हैं
शांति समझौते किए ग्रह युद्ध करवाया गया
पहले तो जमकर हुआ उनका अनादर और फिर
जो कहा करते थे सबसे बुद्ध करवाया गया
इसी ग़ज़ल के अंतिम शेर में नवीन जी 'दुर्गा' शब्द का उपयोग कर अपनी बात अनूठे ढंग से कहते हैं-
दुर्गा भवानी यूं ही थोड़ी ही बनी
सीधी-सादी नारियों से युद्ध करवाया गया
स्पष्ट है दृश्य जैसा दिखता है वैसा होता नहीं, वैसा दिखाने के लिए चतुरों द्वारा अनेक जतन किए जाते हैं और नवीन अपनी गजलों के माध्यम से इन्हीं चतुरों की चतुराई को बिना बख्शे उस पर शब्दाघाट करते हैं। इस संक्रांतिकाल में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 'आस्था पर चोट' की आड़ में हमले किए जा रहे हैं, अनुभूत सत्य की बेलाग अभिव्यक्ति के लिए साहस आवश्यक है। नवीन जी अभिनंदनीय हैं कि वे खतरा उठाकर भी युग सत्य सामने ला रहे हैं।
बहुधा हम अपने आप को उन सब गुणों का भंडार मान लेते हैं जो हम में होते नहीं हैं। इस भ्रम का उद्घाटन करते हुए नवीन जी कहते हैं -
गंध से सुरभित सकल उद्यान हैं
पुष्प को लगता है वह गुणवान है
जब स्वयं जगदीश को भी है नहीं
आपको किस बात का अभिमान है
इसी गजल के अंतिम शेर में नवीन कहते हैं-
रूद्र बनना है तो बन पर भूल मत
शंभु के प्रारब्ध में विषपान है
स्पष्ट ही ग़ज़लकार बताना चाहता है कि जो लोग बहुत सुखी दिखते हैं वास्तव में होते नहीं। नवीन जी की यह गजलें पंक्ति पंक्ति में योजनाओं को विडंबनाओं को उद्घाटित करती हैं, विसंगतियों पर कटाक्ष करती हैं-
मूर्तियों के अंग अंग ही न मात्र भग्न थे
मूर्तियों को भग्न करनेवाले भी कृतघ्न थे
उनकी रक्त धमनियों में राक्षसी प्रमाद था
क्या बताएँ उनके संस्कार ही प्रभग्न थे
इस संकलन का शीर्षक 'धानी चुनर' बहुत कुछ कहता है। चुनर लाज को ढकती है, चुनर की ओट में अनेक सपने पलते हैं और जब यह चुनर अपनों के द्वारा तार-तार की जाती है तब कोई द्रौपदी किसी कृष्ण का आह्वान करने को विवश होती है। गज़लकार कहता है-
मान्यवरों! जनता के हित को ताक पर रखना अनुचित है
भोले भाले जन-जीवों को मूर्ख समझना अनुचित है
भरी सभा के मध्य निहत्थे कृष्ण यही दोहराते हैं
प्रजा दुखी हो तो गद्दी से चिपके रहना अनुचित है
वर्तमान परिवेश में आकाश छूती मँहगाईऔर आम आदमी के खाली जेबों के परिप्रेक्ष्य में सत्तासीनों के लिए यह शेर वास्तव में चिंतनीय होना चाहिए-
यदा-कदा यदि विलासिता पर कर का भार बड़े तो ठीक
खाद्य पदार्थों के भागों का अनहद बढ़ना अनुचित है
यहाँ 'अनहद' शब्द का प्रयोग नवीन की भाषिक दक्षता का प्रमाण है। सामान्य तौर पर 'अनहद' (नाद) के द्वारा हम आध्यात्मिक संदर्भ में बात करते हैं लेकिन उस 'अनहद' शब्द को यहाँ मँहगाई के संदर्भ में उपयोग करना वास्तव में एक मौलिक प्रयोग हो जो मैंने इसके पहले कभी कहीं नहीं पढ़ा है।
नवीन की 'धानी चुनर' का हर पृष्ठ नवीन भावनाओं को उद्घाटित करता है ,नवीन विसंगतियां सामने लाता है और बिना कहे ही नवीन समाधान का संकेत करता है-
भव्य भावनाओं को व्यक्त सब करते नहीं
निज उपासनाओं को व्यक्त सब करते नहीं
सब को ठेस लगती है सब को कष्ट होता है
किंतु यातनाओं को व्यक्त सब करते नहीं
सबके पास कौशल है, सब के पास दलबल है
किंतु योजनाओं को व्यक्त सब करते नहीं
ख़ास ही नहीं आमजन से भी नवीन का शायर आंख में आंख मिलाकर बात करता है-
दिग्भ्रमित जग से उलझ कर क्या मिला है क्या मिलेगा
आत्म चिंतन कीजिए श्रीमान श्रेयस्कर यही है
यह आत्म चिंतन करने की इस युग में सबसे अधिक आवश्यकता हम सभी को है और नवीन इस बात को बेधड़क कहते हैं, ताल ठोंकर कहते हैं।
छांदस ग़ज़ल की संरचना में प्रवीण नवीन जी ने छोटी मापनी की एक ग़ज़ल में गागर में सागर भर दिया है-
ज्योति की उन्नायिका ने
हर लिया तुम वर्तिका ने
पृष्ठ तो पूरा धवल था
रंग उकेरे तूलिका ने
चक्षु मन के खुल गए हैं
भेद खोले पुस्तिका ने
संतुलन को भूलना मत
कह दिया है चर्चिका ने
यहाँ 'चर्चिका' शब्द का प्रयोग नवीन के शब्द भंडार को इंगित करता है। चर्चिका का अर्थ है शिव की तीसरी आंख और यह शब्द अलप प्रचलित है जिसे नवीन जी ने बहुत अच्छी तरह उपयोग किया है। इसी तरह एक और शब्द है जिसका प्रयोग बहुत कम होता है और वह है 'बिपाशा' जिसका अर्थ होता है नदी। नवीन जी ने इस शब्द का भी प्रयोग सार्थक तरीके से किया है- भोर का सुख लगे हैं बिपाशा सदृश।
'धानी चुनर' का धानीपन उसकी रसीली एवं रचनात्मक हिंदी गजलों में है। ये ग़ज़लें वास्तव में हिंदी ग़ज़ल के पाठकों को रस आनंद से भावविभोर करने में समर्थ हैं। यह विस्मय की बात है कि 2022 में प्रकाशित इस संकलन की चर्चा लगभग नहीं हुई है। मैं हिंदी ग़ज़ल के हर कद्रदान से यह कहना चाहूंगा कि वह 'धानी चुनर' की एक प्रति खरीद कर जरूर पढ़े। उसे इस दीवान में एक संभावना पूर्ण ग़ज़लकार ही नहीं मिलेगा, गजल के उद्यान में खिले हुए विभिन्न रंगों के सुमन ओ की मनोहारी सुगंध भी मिलेगी जो उसके मन प्राण को रस आनंद के माध्यम से परमानंद तक ले जाने में समर्थ है।
***
शारद वंदन
(मात्रिक लौकिक जातीय
वर्णिक सुप्रतिष्ठा जातीय
नवाविष्कृत गंगोजमुन छंद)
सूत्र - त ल ल।
*
मैया नमन
चाहूँ अमन...
ऊषा विहँस
आ सूर्य सँग
आकाश रँग
गाए यमन...
पंछी हुलस
बोलें सरस
झूमे धरणि
नाचे गगन...
माँ! हो सदय
संतान पर
दो भक्ति निज
होऊँ मगन...
माते! दरश
दे आज अब
दीदार बिन
माने न मन...
वीणा मधुर
गूँजे सतत
आनंदमय
हो शांत मन...
***
२५-६-२०२०
अभिनव प्रयोग
नवान्वेषित सत्यमित्रानंद सवैया
*
विधान -
गणसूत्र - य न त त र त र भ ल ग।
पदभार - १२२ १११ २२१ २२१ २१२ २२१ २१२ २११ १२ ।
यति - ७-६-६-७ ।
*
गए हो तुम नहीं, हो दिलों में बसे, गई है देह ही, रहोगे तुम सदा।
तुम्हीं से मिल रही, है हमें प्रेरणा, रहेंगे मोह से, हमेशा हम जुदा।
तजेंगे हम नहीं, जो लिया काम है, करेंगे नित्य ही, न चाहें फल कभी।
पुराने वसन को, है दिया त्याग तो, नया ले वस्त्र आ, मिलेंगे फिर यहीं।
*
तुम्हारा यश सदा, रौशनी दे हमें, रहेगा सूर्य सा, घटेगी यश नहीं।
दिये सा तुम जले, दी सदा रौशनी, बँधाई आस भी, न रोका पग कभी।
रहे भारत सदा, ही तुम्हारा ऋणी, तुम्हीं ने दी दिशा, तुम्हीं हो सत्व्रती।
कहेगा युग कथा, ये सन्यासी रहे, हमेशा कर्म के, विधाता खुद जयी।
*
मिला जो पद तजा, जा नई लीक पे, लिखी निर्माण की, नयी ही पटकथा।
बना मंदिर नया, दे दिया तीर्थ है, नया जिसे कहें, सभी गौरव कथा।
महामानव तुम्हीं, प्रेरणास्रोत हो, हमें उजास दो, गढ़ें किस्मत नयी।
खड़े हैं सुर सभी, देवतालोक में, प्रशस्ति गा रहे, करें स्वागत सभी।
*
२६-६-२०१९
***
पुस्तक सलिला:
'अंधी पीले कुत्ते खाएँ' खोट दिखाती हैं क्षणिकाएँ
समीक्षक: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
(पुस्तक विवरण: 'अंधी पीसे कुत्ते खाएँ' क्षणिका संग्रह, अविनाश ब्यौहार, प्रथम संस्करण २०१७, आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ १३७, मूल्य १००/-, प्रज्ञा प्रकाशन २४ जगदीशपुरम्, रायबरेली, कवि संपर्क: ८६,रॉयल एस्टेट कॉलोनी, माढ़ोताल, जबलपुर, चलभाष: ९८२६७९५३७२, ९५८४०५२३४१।)
*
सुरवाणी संस्कृत से विरासत में काव्य-परंपरा ग्रहण कर विश्ववाणी हिंदी उसे सतत समृद्ध कर रही है। हिंदी व्यंग्य काव्य विधा की जड़ें संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश तथा लोक-भाषाओं के लोक-काव्य में हैं। व्यंग्य चुटकी काटने से लेकर तिलमिला देने तक का कार्य कुछ शब्दों में कर देता है। गागर में सागर भरने की तरह दुष्कर क्षणिका विधा में पाठक-मन को बाँध लेने की सामर्थ्य है। नवोदित कवि अविनाश ब्यौहार की यह कृति 'पूत के पाँव पालने में दिखते हैं' कहावत को चरितार्थ करती है। कृति का शीर्षक उन सामाजिक कुरीतियों को लक्ष्य करता है जो नेत्रहीना द्वारा पीसे गए को कुत्ते द्वारा खाए जाने की तरह निष्फल और व्यर्थ हैं।
बुद्धिजीवी कायस्थ परिवार में जन्मे और उच्च न्यायालय में कार्यरत कवि में औचित्य-विचार सामर्थ्य होना स्वाभाविक है। अविनाश पारिस्थितिक वैषम्य को 'सर्वजनहिताय' के निकष पर कसते हैं, भले ही 'सर्वजनसुखाय' से उन्हें परहेज नहीं है किंतु निज-हित या वर्ग-हित उनका इष्ट नहीं है। उनकी क्षणिकाएँ व्यवस्था के नाराज होने का खतरा उठाकर भी; अनुभूति को अभिव्यक्त करती हैं। भ्रष्टाचार, आरक्षण, मँहगाई, राजनीति, अंग प्रदर्शन, दहेज, सामाजिक कुरीतियाँ, चुनाव, न्याय प्रणाली, चिकित्सा, पत्रकारिता, बिजली, आदि का आम आदमी के दैनंदिन जीवन पर पड़ता दुष्प्रभाव अविनाश की चिंता का कारण है। उनके अनुसार 'आजकल/लोगों की / दिमागी हालत / कमजोर पड़ / गई है / शायद इसीलिए / क्षणिकाओं की / माँग बढ़ / गई है।' विनम्र असहमति व्यक्त करना है कि क्षणिका रचना, पढ़ना और समझना कमजोर नहीं सजग दिमाग से संभव होता है। क्षणिका, दोहा, हाइकु, माहिया, लघुकथा जैसी लघ्वाकारी लेखन-विधाओं की लोकप्रियता का कारण पाठक का समयाभाव हो सकता है।अविनाश की क्षणिकाएँ सामयिक, सटीक, प्रभावी तथा पठनीय-मननीय हैं। उनकी भाषा प्रवाहपूर्ण, प्रसाद गुण संपन्न, सहज तथा सटीक है किंतु अनुर्वर और अनुनासिक की गल्तियाँ खीर में कंकर की तरह खटकती हैं। 'हँस' क्रिया और 'हंस' पक्षी में उच्चारण भेद और एक के स्थान पर दूसरे के प्रयोग से अर्थ का अनर्थ होने के प्रति सजगता आवश्यक है चूँकि पुस्तक में प्रकाशित को पाठक सही मानकर प्रयोग करता है।
इन क्षणिकाओं का वैशिष्ट्य मुहावरे का सटीक प्रयोग है। इससे भाषा जीवंत, प्रवाहपूर्ण, सहज ग्राह्य तथा 'कम में अधिक' कह सकी है। 'पक्ष हो /या विपक्ष / दोनों एक / थैली के / चट्टे-बट्टे हैं। / जीते तो / आँधी के आम / हारे तो / अंगूर खट्टे हैं।' यहाँ कवि दो प्रचलित मुहावरे का प्रयोग करने के साथ 'आँधी के आम' एक नए मुहावरे की रचना करता है। इस कृति में कुछ और नए मुहावरे रच-प्रयोगकर कवि ने भाषा की श्रीवृद्धि की है। यह प्रवृत्ति स्वागतेय है।
'चित्रगुप्त ने यम-सभा से / दे दिया स्तीफा / क्योंकि उन्हें मुँह / चिढ़ा रहा था / आतंक का खलीफा।' पंगु सिद्ध हो रही व्यवस्था पर कटाक्ष है। 'मैं अदालत / गया तो / मैंने ऐसा / किया फील / कि / झूठे मुकदमों / की पैरवी / बड़ी ईमानदारी / से करते / हैं वकील।' यहाँ तीखा व्यंग्य दृष्टव्य है। अंग्रेजी शब्द 'फील' का प्रयोग सहज है, खटकता नहीं किंतु 'ईमानदारी' के साथ 'बड़ी' विशेषण खटकता है। ईमानदारी कम-अधिक तो हो सकती है, छोटी-बड़ी नहीं।
अविनाश ने अपनी पहली कृति से अपनी पैठ की अनुभूति कराई है, इसलिए उनसे 'और अच्छे' की आशा है।
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मुक्तक:
दर्द हों मेहमां तो हँसकर मेजबानी कीजिए
मेहमानी का मजा कुछ ग़मों को भी दीजिए
बेजुबां हो बेजुबानों से करें कुछ गुफ्तगू
जिंदगी की बंदगी का मजा हँसकर लीजिए
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दाना देते परीक्षा, नादां बाँटे ज्ञान
रट्टू तोते आ रहे, अव्वल हैं अनजान
समझ-बूझ की है कमी, सिर्फ किताबी लोग
चला रहे हैं देश को, मनमर्जी भगवान
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गौ माता के नाम पर, लड़-मरते इंसान
गौ बेबस हो देखती, आप बहुत हैरान
शरण घोलकर पी गया, भूल गया तहजीब
पूत आप ही लूटते भारत माँ की आन
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*GST सार*
हे पार्थ, परिवर्तन संसार का नियम है।
जो कल Sales Tax था, आज VAT है, कल GST होगा ।
तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो ।
जो लिया customer से लिया ।
जो दिया, दूकान मे देश की सरकार को दिया ,
जो बचा वो घर आकर पत्नी ( *घर की सरकार* ) को दे दिया ।
तुम्हारे पास तो पहले भी कुछ नही था, अभी भी कुछ नही रहेगा ।
अतएव, हे वत्स, व्यर्थ विक्षोभ एवं विलाप मत करो । निष्काम भाव से कर्म किये जाओ । रण दुन्दुभि बज गई है ।
*उठ, आॅख - नाक पोंछ , हे भारत माता के लाल* ,
*वीर योद्धा की तरह हथियार सम्हाल* ।
*गोदाम मे जितना भी है माल*
*वो सारा 30 June से पहले पहले निकाल*
बाकी बाद मे देखेंगे!
तनिक समझे हो की नाही?
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दोहा सलिला
*
काम और आराम में, ताल-मेल ले सीख
जो वह ही मंजिल वरे, सबसे आगे दीख
*
सुबह उषा फिर साँझ से, खूब लड़ाया लाड़
छिपा निशा की गोद में, सूरज लेकर आड़
*
तर्क वितर्क कुतर्क से, ठगा गया विश्वास
बिन श्रद्धा के ज्ञान का, कैसे हो आभास?
*
लगा-लगा दम, आदमी, हो बेदम मजबूर
कोई न कहता आ दमी, सभी भागते दूर
*
अपने अपने है नहीं, गैर नहीं हैं गैर
खुद को खुद ही परख लें, तभी रहेगी खैर
*
पेड़ कभी लगते नहीं, रोपी जाती पौध
अब जमीन ही है नहीं, खड़े सहस्त्रों सौध
*
खेत ख़त्म कर बना लें, सडक शहर सरकार
खेती करने चाँद पर, जाओ कहे दरबार
*
पल-पल पल जीता रहा, पल-पल मर पल मौन
पल-पल मानव पूछता, पालक से तू कौन?
*
प्रथम रश्मि रवि की हँसी, लपक धरा को चूम
धरा-पुत्र सोता रहा, सुख न उसे मालूम
*
दल के दलदल में फँसा, नेता देता ज्ञान
जन की छाती पर दले, दाल- स्वार्थ की खान
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खेल रही है सियासत, दलित-दलित का खेल
भूल सिया-सत छल रही, देश रहा चुप झेल
*
मीरा मत आ दौड़कर, ये तो हैं कोविंद
भूल भई तूने इन्हें, समझ लिया गोविन्द
*
लाल कृष्ण पीछे हुए, सम्मुख है अब राम
मीरा-यादव दुखी हैं, भला करेंगे राम
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जो जनता के वक्ष पर दले स्वार्थ की दाल
वही दलित कलिकाल में, बनता वही भुआल
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हिंदी घरवाली सुघड़, हुई उपेक्षित मीत
अंग्रेजी बन पड़ोसन, लुभा रही मन रीत
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चाँद-चाँदनी नभ मकां, तारे पुत्र हजार
हम दो, दो हों हमारे, भूले बंटाढार
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काम और आराम में, ताल-मेल ले सीख
जो वह ही मंजिल वारे, सबसे आगे दीख
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अधकचरा मस्तिष्क ही, लेता शब्द उधार
निज भाषा को भूलकर, परभाषा से प्यार
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मन तक जो पहुँचा सके, अंतर्मन की बात
'सलिल' सफल साहित्य वह, जिसमें हों ज़ज्बात
*
हिंदी-उर्दू सहोदरी, अंग्रेजी है मीत
राम-राम करते रहे, घुसे न घर में रीत
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घुसी वजह बेवजह में, बिना वजह क्यों बोल?
नामुमकिन मुमकिन लिए, होता डाँवाडोल
*
खुदी बेखुदी हो सके, खुद के हों दीदार
खुदा न रहता दूर तब, नफरत बनती प्यार
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एक द्विपदी:
मैं सपनों में नहीं जी रहा, सपने मुझमें जीते हैं
कोशिश की बोतल में मदिरा, संघर्षों की पीते हैं.
*
पर्यावरण गीत
*
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
सूर्य-बल्ब
जब होता रौशन
मेक'प करते बिना छिपे.
शाखाओं,
कलियों फूलों से
मिलते, नहीं लजाते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
बऊ धरती
आँखें दिखलाये
बहिना हवा उड़ाये मजाक
पर्वत दद्दा
आँख झुकाये,
लता संग इतराते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
कमसिन सपने
देख थिरकते
डेटिंग करें बिना हिचके
बिना गये
कर रहे आउटिंग
कभी नहीं पछताते
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
२६-६-२०१७
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मुक्तिका:
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गये जब से दिल्ली भटकने लगे हैं.
मिलीं कुर्सियाँ तो बहकने लगे हैं
कहाँ क्या लिखेंगे न ये राम जाने
न पूछो पढ़ा क्या बिचकने लगे हैं
रियायत का खाना खिला-खा रहे हैं
न मँहगाई जानें मटकने लगे हैं
बने शेर घर में पिटे हर कहीं वे
कभी जीत जाएँ तरसने लगे हैं
भगोड़ों के साथी न छोड़ेंगे सत्ता
न चूकेंगे मौका महकने लगे हैं
न भूली है जनता इमरजेंसी को
जो पूछा तो गुपचुप सटकने लगे हैं
किये पाप कितने कहाँ और किसने
किसे याद? सोचें चहकने लगे हैं
चुनावी है यारी हसीं खूब मंज़र
कि काँटे भी पल्लू झटकने लगे हैं
न संध्या न वंदन न पूजा न अर्चन
'सलिल' सूट पहने सरसने लगे हैं.
२६-६-२०१५
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छंद सलिला:
आल्हा/वीर/मात्रिक सवैया छंद
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छंद-लक्षण: जाति , अर्ध सम मात्रिक छंद, प्रति चरण मात्रा ३१ मात्रा, यति १६ -१५, पदांत गुरु गुरु, विषम पद की सोलहवी मात्रा गुरु (ऽ) तथा सम पद की पंद्रहवीं मात्रा लघु (।),
लक्षण छंद:
आल्हा मात्रिक छंद सवैया, सोलह-पन्द्रह यति अनिवार्य.
गुरु-लघु चरण अंत में रखिये, सिर्फ वीरता हो स्वीकार्य..
अलंकार अतिशयता करता बना राई को 'सलिल' पहाड़.
ज्यों मिमयाती बकरी सोचे, गुँजा रही वन लगा दहाड़..
उदाहरण:
१. बुंदेली के नीके बोल... संजीव 'सलिल'
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तनक न चिंता करो दाऊ जू, बुंदेली के नीके बोल.
जो बोलत हैं बेई जानैं, मिसरी जात कान मैं घोल..
कबू-कबू ऐसों लागत ज्यौं, अमराई मां फिररै डोल.
आल्हा सुनत लगत हैं ऐसो, जैसें बाज रए रे ढोल..
अंग्रेजी खों मोह ब्याप गौ, जासें मोड़ें जानत नांय.
छींकें-खांसें अंग्रेजी मां, जैंसें सोउत मां बर्रांय..
नीकी भासा कहें गँवारू, माँ खों ममी कहत इतरांय.
पाँव बुजुर्गों खें पड़ने हौं, तो बिनकी नानी मर जांय..
फ़िल्मी धुन में टर्राउट हैं, आँय-बाँय फिर कमर हिलांय.
बन्ना-बन्नी, सोहर, फागें, आल्हा, होरी समझत नांय..
बाटी-भर्ता, मठा-महेरी, छोड़ केक बिस्कुट बें खांय.
अमराई चौपाल पनघटा, भूल सहर मां फिरें भुलांय..
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२. कर में ले तलवार घुमातीं, दुर्गावती करें संहार.
यवन भागकर जान बचाते गिर-पड़ करते हाहाकार.
सरमन उठा सूँढ से फेंके, पग-तल कुचले मुगल-पठान.
आसफ खां के छक्के छूटे, तोपें लाओ बचे तब जान.
३. एक-एक ने दस-दस मारे, हुआ कारगिल खूं से लाल
आये कहाँ से कौन विचारे, पाक शिविर में था भूचाल
या अल्ला! कर रहम बचा जां, छूटे हाथों से हथियार
कैसे-कौन निशाना साधे, तजें मोर्चा हो बेज़ार
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(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कमंद, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)
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हाइकु गीत:
आँख का पानी
*
आँख का पानी,
मर गया तो कैसे
धरा हो धानी?...
*
तोड़ बंधन
आँख का पानी बहा.
रोके न रुका.
आसमान भी
हौसलों की ऊँचाई
के आगे झुका.
कहती नानी
सूखने मत देना
आँख का पानी....
*
रोक न पाये
जनक जैसे ज्ञानी
आँसू अपने.
मिट्टी में मिला
रावण जैसा ध्यानी
टूटे सपने.
आँख से पानी
न बहे, पर रहे
आँख का पानी...
*
पल में मरे
हजारों बेनुगाह
गैस में घिरे.
गुनहगार
हैं नेता-अधिकारी
झूठे-मक्कार.
आँख में पानी
देखकर रो पड़ा
आँख का पानी...
२६-६-२०१०
***