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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

हरिहर झा, पुरोवाक्,



पुरोवाक्
दृष्टि : सत्य शोधक विचारों की वृष्टि
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*  
                    भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार साहित्य में सबका हित समाहित होन आवश्यक है किसी एक वर्ग, समूह या विचारधारा का नहीं। संस्कृत में 'साहित्य' शब्द की व्युत्पत्ति "सहितस्य भावः साहित्यम्" (हितकारी भाव भरी रचना) के रूप में हुई है। ''साहित्यस्य कर्म साहित्यम्'' अर्थात सबके लिए हितकर कर्म (लेखन) ही साहित्य है। ''हितेन सह सहितं, तस्य भाव: साहित्यम्'' अर्थात् हित या कल्याण से युक्त अथवा अथवा कल्याणकारी भाव वाला लेखन साहित्य है।साहित्य सत्य, शिव और सुंदर  को अभिव्यक्त कर सत्-चित्- आनंद की प्राप्ति में सहायक होता है। राजशेखर के अनुसार साहित्य पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र इन चार विद्याओं का निचोड़ अर्थात पंचमी विद्या है।

                प्राच्य से भिन्न पाश्चात्य चितन में साहित्य कोई भी लिखित रचना है। लैटिन शब्द litaritura/litteratura का अर्थ है "अक्षरों द्वारा किया गया साहित्यिक गुणों से युक्त लेखन" जिसमें वाचिक पाठ भी शामिल हैं। 

                साहित्य को मुख्यत: लौकिक (सांसारिक) - अलौकिक (वैदिक/आध्यात्मिक) तथा गद्य ( निबंध, उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, जीवनी, आत्मकथा, लघुकथा, समालोचना आदि) - पद्य (कविता, गीत, महाकाव्य, खंडकाव्य आदि) में वर्गीकृत किया जाता है। विषयों (अभियांत्रिकी, कृषि, चिकित्सा, विधि, संगीत, चित्रकला, वाणिज्य आदि) के आधार पर भी साहित्य को वर्गीकृत किया जा सकता है। लक्ष्य पाठक वर्ग के आधार पर साहित्य को बाल, प्रौढ़, तरुण आदि, कथ्य के आधार पर राष्ट्रीय, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक आदि वर्ग की जा सकते हैं। 

            वर्तमान में भारतीय शिक्षा तथा चितन पर पश्चिम का व्यापक प्रभाव है। भारत में सर्व कल्याण का भाव प्रमुख है जबकि पश्चिम में वर्ग विशेष का। इस कारण आजकल साहित्य में वैचारिक प्रतिबद्धता को महत्व मिल रहा है। अखंड को खंड उसे प्रकार बाहर कर रहा है जैसे बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को बाजार से बाहर कर देती है। इसका परिणाम स्त्री विमर्श, प्रवासी साहित्य, ग्राम्य साहित्य, लोक साहित्य आदि विभाजनों के रूप में सामने आ रहा है। 

                श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार हरिहर झा की नवीनतम कृति ''दृष्टि'' भारतीय साहित्यिक चिंतन परंपरा को आगे बढ़ाते हुए खंडित दृष्टि पर अखंडित दृष्टि को वरीयता देती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्य को समाज का दर्पण कहा किन्तु वास्तव में साहित्य को समाज का दर्पण कहना भी खंड-सत्य है। दर्पण किसी बिम्ब का हू- ब-हू प्रतिबिंब तो दिखाता है किंतु दाहिने को बायाँ और बाएँ को दाहिना कर देता है। दर्पण बिम्ब का प्रतिबिंब दिखाते समय कोई परिवर्तन नहीं कर सकता जबकि साहित्य सामाजिक परिवर्तनों / क्रांतियों और नव अनुसंधानों का कारक होता है। साहित्य में बिम्ब के साथ भाव, रस, अलंकार, मिथक, रुपक आदि अनेक तत्व अंतर्निहित होते हैं जबकि दर्पण केवल और केवल बिम्ब तक सीमित होता है। इसलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहना सही नहीं है। 

                ''दृष्टि'' में आलेख/शोधालेख, संस्मरण/रेखाचित्र, व्यंग्य, समीक्षा तथा यात्रा वृत्तान्त आदि का सारगर्भित संकलन किया गया है। शोधालेखों के विषय स़ीता का व्यक्तित्व, धर्म के सरोकार, कृत्रिम बुद्धि, गांधी तथा संत साहित्य भारतीय तथा वैश्विक दोनों परिदृश्यों में सामयिक और उपयोगी हैं। शोधसलेखों में 'मौलिकता' का बहुत महत्व है। यह मौलिकता है क्या? किसी विषय या कथानक में जो कुछ कहा या लिखा जा चुका है उससे हटकर कुछ 'नया' कहना। यह नयापन काल्पनिक ही होता है। युगों पहले की घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी तो हुआ नहीं जा सकता। रचनाकार पूर्वलिखित सब कुछ पढ़ भी नहीं सकता। उपलब्ध साहित्य का अध्ययन कर उस पर मन-चिंतन कर अपनी राय बनाना और उसे पूर्व ज्ञात तथ्यों के निकष पर कसकर रचनाबद्ध करना ही 'नयापन' है। राम कथा ही नहीं, कृष्ण कथा, शिव-आख्यान जैसे पौराणिक ही नहीं ऐतिहासिक और सम-सामयिक विषयों पर भी 'नयापन' विमर्श और विवाद का विषय बनता रहा है। उत्तर रामायण को प्रक्षिप्त या प्रामाणिक मानना भी नयेपन को अपने विवेक के निकष पर कसना ही है। उत्तर रामायण- डॉ. किशोर काबरा, उत्तर कथा - डॉ. प्रतिभा सक्सेना, महिजा - डॉ. सुशीला कपूर, वैदेही के राम - डॉ. चित्रा चतुर्वेदी, राम का मनस्ताप - डॉ. एम.एल.खरे, स्वयं धरित्री ही थी - रमाकान्त श्रीवास्तव, मर्यादा पुरुषोत्तम - डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र, कैकेयी के राम -जयसिंह व्यथित, महाकाव्य कैकेयी - डॉ. इंदु सक्सेना, महारानी कैकेयी -पं. रामकिंकर उपाध्याय आदि में राम कथा संबंधी 'नवता' मत वैभिन्नय से युक्त है। इस कृति में डॉ. साहू प्रणीत महाकाव्य 'सीता' को लेकर लेखक ने तर्क सम्मत विमर्श किया है।  कृत्रिम बुद्धि जैसे सामयिक विषय पर हिन्दी में बहुत कम लिखा गया है। लेखक की परिपक्व कलम विविध तकनीकी और वैज्ञानिक विषयों पर लेखन कर हिन्दी वांगमय को समृद्ध कर सकती है। 

                    'प्रवासी साहित्य' शीर्षक के अंतर्गत अमेरिका-आस्ट्रेलियन संस्कृति, आस्ट्रेलिया की लोक भाषाओं, आस्ट्रेलिया में भारतीय-आस्ट्रेलियन महिलाओं, आस्ट्रेलिया में शिक्षा और धर्म, भारत वंशियों पर हमले और पहचान का संकट जैसे विचारोत्तेजक विषयों पर संयमित-गंभीर विमर्श सर्वोपायोगी है। 'चर्च और नास्तिकता में संघर्ष', 'कांट और सार्त्र' पर जितनी चर्चा की जाए, काम है किन्तु लेखक ने गागर में सागर संहित कर दिया है। आस्ट्रेलिया जाने के इच्छुक पर्यटकों को आस्ट्रेलिया जाने के पहले हरिहर जी द्वारा लिखे गए आलेख पढ़ना चाहिए। इन्हें भारतव आस्ट्रेलिया की सरकारॉन/दूतावासों द्वारा पर्यटकों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए। 

                    'आलेख' शीर्षक में समाहित  कबीर, तुलसी, कुँवर नारायण जैसे प्रेरक व्यक्तित्वों के साथ जीवन मूल्यों, पुरुषार्थ, कानून, न्याय, बैंकिंग, कृत्रिम बुद्धि, राजधर्म, भाषाई विवाद आदि विषयों पर स्वस्थ्य चिंतनपरक लोकोपयोगी सामग्री प्रस्तुत करते हैं। समकालीन जीवन मूल्यों तथा चार पुरुषार्थ जैसे लेख नव पीढ़ी ही नहीं वार्धक्य की ओर कदम बढ़ा रहे पाठकों के लिए भी उपयोगी है। हरिहर झा जी विषयों अपर विचार अभिव्यक्त करते समय आक्रामक नहीं होते, वे पूरी सह्रदयता के साथ सरल-सहज प्रसाद गुण संपन्न शैली में जटिल और कठिन विषयों पर इस तरह बात कहते हैं कि असहमति को भी सद्भाव पूर्वक विचारकरना रुचिकर लगे। 

                    संस्मरण तथा रेखाचित्र अपेक्षाकृत कम चर्चित विधाएँ हैं किन्तु हरिहर झा जी ने इन दोनों विधाओं को समृद्ध करते हुए व्यंग्य लेख भी कृति में सम्मिलित की है। व्यंग्य लेखों की भाषा चुटीली और सरस है।  समीक्षाएँ, भूमिकाएँ, रिपोर्ताज तथा यात्रा संस्मरण सममूलित करने से कृति समृद्ध हुई है। हरिहर झा जी की यह कृति समय साक्षी बनते हुए तीन पीढ़ियों को एक साथ बाँधती है। हिन्दी के सजग पाठकों को चिंतन-मनन के लिए बहुविषयी सामग्री लिए 'दृष्टि' उनकी दृष्टि की समर्थ्य बढ़ाने में सक्षम है। एक उत्तम कृति प्रस्तुत करने के लिए लेखक को साधुवाद दिया ही जाना चाहिए। दृष्टि को पढ़ने के बाद आस्ट्रेलिया घूमने का मन बनना स्वाभाविक है। भाई हरिहर झा ने इस कृति के माध्यम से एक अभाव की पूर्ति की है। इसका विमोचन/लोकार्पण भारत में आस्ट्रेलिया दूतावास और आस्ट्रेलिया में भारतीय के माध्यम से हो तो बेहतर होगा। दोनों देशों में घनिष्ठ संबंध हैं उन्हें और अधिक निकट करने में ऐसे ग्रंथ सहायक होते हैं। हरिहर झ जी को बहुत बधाई। 
००० 
संपर्क: विश्ववाणी हिन्दी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ भारत 
चल भाष ९१ ९४२५२ ८३२४४, ईमेल salil.sanjv@gmail.com          
     


 

अप्रैल १७, सॉनेट, भजन, सामी, हरिऔध, मुक्तक, नवगीत, चामर छंद, रेवा मैया, मुक्तक, कुंडलिया


सलिल सृजन अप्रैल १७
मुक्तिका
हरिऔध का वंदन करें
हृद-भाव हम चंदन करें
.
जीवन मरुस्थल में सृजन
जल का सतत सिंचन करें
.
वनवास वैदेही नहीं
फिर पा सके मंथन करें
.
हो हृदय में प्रवास प्रिय का
विहँस मन मधुवन करें
.
चौपदे चोखे न चुभते
पढ़ नित्य नव चिंतन करें
.
हिंदी जिह्वा-श्रंगार हो
लिख-बोल अध्यापन करें
.
हरिऔध जी की विरासत
मिल बचाएँ, कंचन करें
१७.४.२०२६
०००
छंद शाला
दोहा+रोला=कुंडलिया
नयन ताल में तैरती, श्यामल गोलक नाव।
नयन छलकते अश्रु में, बढ़ता पृष्ठ तनाव।। -अशोक व्यग्र
बढ़ता पृष्ठ तनाव, बाढ़ का पानी उतरे।
शांत नयन-मन मौन, लगा कज्जल फिर सँवरे।।
नयन नयन से लड़े, वधिक नहिं वध्य दें वचन।
होते विस्मित-चकित, ताल में नाव सम नयन।।
नयन-झील में तैरतीं, दो पुतली हो नाव।
नयन छलकते अश्रु भर, कारण पृष्ठ तनाव।। -अशोक व्यग्र
कारण पृष्ठ तनाव, कीजिए योग ध्यान नित।
अगर हो गया रोग, खोजिए डॉक्टर इत-उत।।
खाली होगी जेब, सलिल औषधि खा खो धन।
शीतल रखिए सदा, व्यग्र हों कभी मत नयन।।
३.
नयन सरोवर तैरतीं, दो मछली हो मौन।
नहीं जानतीं जगत में, कब क्यों लाया कौन?
कब क्यों लाया कौन, जागकर जगत देखतीं।
शयन करें तो स्वप्न, देख क्या क्या न लेखतीं।
हों अशोक या व्यग्र, सहेजें शांति धरोहर।
करुणा जल से भरे, रहें द्वय नयन सरोवर।।
मध्य नयन में तैरती, उन नयनों की नाव।
नयन छलकते अश्रु में, बढ़ता पृष्ठ तनाव।। -अशोक व्यग्र
बढ़ता पृष्ठ तनाव, घटाएँ शांत मौन रह।
अधिक अन्य की सुनें, कथा कुछ अपनी भी कह।।
नयन तीर लें साध, लक्ष्य नहीं रहे अवध्य।
कर्णार्जुन के साथ, नयन रहते रण मध्य।।
मध्य नयन में तैरती, चुप नयनों की नाव।
नयन छलकते अश्रु भर, बढ़ता पृष्ठ तनाव।। -अशोक व्यग्र
बढ़ता पृष्ठ तनाव, रूस-यूक्रेन की तरह।
इजराइल - ईरान, सम बढ़े ताप बेवजह।।
काँप रही है धरा, अधीरा पीर घेरती।
शोकाकुल हों नैन, व्यथा नयन में तैरती।।
१७.४.२०२६
टीप- छंद प्रेमी ध्यान दें कि दोहा तथा रोला में शब्द परिवर्तन से कथ्य का भाव किस तरह बदलता है। रचना प्रकाशन के पूर्व शब्द बदल-बदल कर सबसे अच्छे रूप को चुनें।

सॉनेट
कौन?
कौन है तू?, कौन जाने?
किसी ने तुझको न देखा।
कहीं तेरा नहीं लेखा।।
जो सुने जग सत्य माने।।
देह में है कौन रहता?
ज्ञात है क्या कुछ किसी को?
ईश कहते क्या इसी को?
श्वास में क्या वही बहता?
कौन है जो कुछ न बोले
उड़ सके पर बिना खोले
जगद्गुरु है आप भोले।।
कौन जो हर चित्र में है?
गुप्त वह हर मित्र में है।
बन सुरभि हर इत्र में है।।
१७-४-२०२२
•••
भजन
*
प्रभु!
तेरी महिमा अपरम्पार
*
तू सर्वज्ञ व्याप्त कण-कण में
कोई न तुझको जाने।
अनजाने ही सारी दुनिया
इष्ट तुझी को माने।
तेरी दया दृष्टि का पाया
कहीं न पारावार
प्रभु!
तेरी महिमा अपरम्पार
*
हर दीपक में ज्योति तिहारी
हरती है अँधियारा।
कलुष-पतंगा जल-जल जाता
पा मन में उजियारा।
आये कहाँ से? जाएँ कहाँ हम?
जानें, हो उद्धार
प्रभु!
तेरी महिमा अपरम्पार
*
कण-कण में है बिम्ब तिहारा
चित्र गुप्त अनदेखा।
मूरत गढ़ते सच जाने बिन
खींच भेद की रेखा।
निराकार तुम,पूज रहा जग
कह तुझको साकार
प्रभु!
तेरी महिमा अपरम्पार
***
नवगीत:
बहुत समझ लो
सच, बतलाया
थोड़ा है
.
मार-मार
मनचाहा बुलावा लेते हो.
अजब-गजब
मनचाहा सच कह देते हो.
काम करो,
मत करो, तुम्हारी मर्जी है-
नजराना
हक, छीन-झपट ले लेते हो.
पीर बहुत है
दर्द दिखाया
थोड़ा है
.
सार-सार
गह लेते, थोथा देते हो.
स्वार्थ-सियासत में
हँस नैया खेते हो.
चोर-चोर
मौसेरे भाई संसद में-
खाई पटकनी
लेकिन तनिक न चेते हो.
धैर्य बहुत है
वैर्य दिखाया
थोड़ा है
.
भूमि छीन
तुम इसे सुधार बताते हो.
काला धन
लाने से अब कतराते हो.
आपस में
संतानों के तुम ब्याह करो-
जन-हित को
मिलकर ठेंगा दिखलाते हो.
धक्का तुमको
अभी लगाया
थोड़ा है
***
चलते-फिरते विश्वविद्यालय महादेव प्रसाद 'सामी'
*
प्रोफेसर महादेव प्रसाद 'सामी' एक ऐसी शख्सियत का नाम जो आदमी के चोले में चलता-फिरता विश्वविद्यालय था। बीसवीं सदी के चंद चुनिंदा शायरों की फहरिस्त में सामी जी का नाम अव्वल हो सकता है। सामी साहब का जन्म बाबू देवीप्रसाद (सुपरिन्टेन्डेन्ट कमिश्नर ऑफिस लखनऊ) के घर में २० जुलाई १८९५ को कस्बा जैदपुर, हरदोई उत्तर प्रदेश में तथा निधन २ अक्टूबर १९७१ को जबलपुर मध्य प्रदेश में हुआ। वे गोमती और नर्मदा के बीच की ऐसी अदबी कड़ी थे जो शायरी को पूजा की तरह मुकद्द्स मानते थे। उनका एक मात्र दीवान 'कलामे सामी' उनके इंतकाल के २ साल बाद साल १९७३ में अंजुमन तरक्किये उर्दू ने साया किया। इसका संपादन मशहूर शायर, वकील जनाब पन्नालाल श्रीवास्तव 'नूर' (मेयर जबलपुर) और भगवान दयाल डग ने किया। दीवान की शुरुआत में 'दो शब्द' लिखते हुए हिंदी-संस्कृत-अंग्रेजी के विद्वान् कृष्णायनकार द्वारका प्रसाद मिश्र (मुख्य मंत्री मध्य प्रदेश, कुलपति सागर विश्वविद्यालय) ने लिखा - 'प्रोफेसर सामी में काव्य प्रतिभा एवं आचार्यत्व का सुंदर समागम था। आजीवन आत्म प्रकाशन से दूर रहकर उनहोंने काव्य रचना की थी..... उनकी रचनाओं में उनके भाषा पर असाधारण अधिकार के साथ ही उनकी मौलिक सूझ-बूझ एवं हृदयानुभूति के भी दर्शन होते हैं। यत्र-तत्र उनके कलाम में दार्शनिकता की भी झलक है जो किसी भी भारतीय कवि के लिए, चाहे वह किसी भी भाषा का कवि हो सर्वथा स्वाभाविक है। ग़ज़लों के विषय प्राय: परंपरागतबपरंपरागत तो होते ही हैं फिर भी 'सामी' के काव्य में अनेक नवीन उद्भावनाएँ हैं। भाषा में अभिव्यंजन कौशल के साथ प्रवाह है और अर्थ गांभीर्य के साथ सरलता। कल्पना की उड़ान के साथ पार्थिव जीवन की सच्चाई उनके काव्य को उनकी निजी विशेषता प्रदान करती है।'
सामीजी ने शाने अवध कहे जानेवाले शहर लखनऊ में मैट्रिक तक उर्दू-फ़ारसी का अध्ययन किया। आपने स्वध्याय से दोनों भाषाओँ का इतना गहन एवं व्यापक ज्ञान अर्जित किया कि आपकी गिनती 'उस्तादों' में होने लगी। विद्यार्थी काल में पढ़ने के साथ साथ अपने ट्यूशन भी लीं। आपके विद्यार्थियों में मशहूर शायर जोश मलीहाबादी भी थे। जोश ने आपने शायरी कफ़न नहीं विज्ञान सीखा। वे ऐसी शख्सियत थे की सिर्फ मैट्रिक होते हुए भी सागर विश्वविद्यालय द्वारा विशेष अनुमति से हितकारिणी सिटी कॉलेज जबलपुर में उर्दू-फ़ारसी' के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष बनाए गए। उर्दू अदब में 'उस्ताद परंपरा' है मगर सामी जी अपने उस्ताद आप ही थे। रायबरेली उत्तर प्रदेश निवासी मुंशी नर्मदा प्रसाद वर्मा (इंस्पेक्टररजिस्ट्रेशन विभाग जबलपुर) की पुत्री लक्ष्मी देवी के साथ ८ मई १९१८ को आपका विवाह संपन्न हुआ। १९२१ में आप नार्मल स्कूल बिलासपुर में गणित तथा विज्ञान के शिक्षक होकर आए। पहले साल में ही इनकी विद्वता, योगयता और कुशलता की धाक ऐसी जमी की आपको टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज जबलपुर में चुन लिया गया और आप ट्रेनिंग का २ वर्ष का कोर्स एक वर्ष में पूर्ण कर परीक्षा में अव्वल आए। आपको मॉडल हाई स्कूल जबलपुर में नियुक्त कर दिया गया। आप १९४० तक लगभग २० वर्ष मॉडल हाई स्कूल में ही रहे। विज्ञान और गणित पढ़ाने में आपका सानी नहीं था। आपने शृंगारिक ग़ज़लों के साथ देश हुए समाज की गिरी हुई हालत को सुधारने के नज़रिए से नैतिकता और दार्शनिकता से भरपूर ग़ज़लें लिखकर नाम कमाया। इसके अलावा आपने अरबी-फ़ारसी व संस्कृत सीखकर उसके साहित्य का गहराई से अध्ययन किया। आप अपनी विद्वता गणित, विज्ञान के अतिरिक्त अरबी-फ़ारसी-उर्दू विषयों के लिए भी बोर्ड तथा विश्वविद्यालय की कमेटियों में परीक्षक बनाए जाते थे। वे अलस्सुबह उठाकर पढ़ना शुरू कर देते हुए देर रात तक पढ़ते-पढ़ाते रहते थे। उनके घर पर दिन भर किसी स्कूल की तरह पढ़नेवाले आते रहते। वे किसी को खाली हाथ लौटाते नहीं थे।
खुद केवल मैट्रिक तक पढ़ाई करने के बाद भी वे बी.ए,. एम. ए. के विद्यार्थियों को गणित, विज्ञान, भौतिकी, उर्दू तथा फारसी आदि पढ़ाते थे। और तो और की बार खुद प्रफेसर आदि भी अपनी मुश्किलात आपसे हल कराते थे। हिंदी साहित्य और हिंदी साहित्यकारों को भी आपसे लगातार मदद मिलती रहती थी। आपने अपना एक भी दीवान साया नहीं कराया। पूछने पर कहते 'पढ़ने-पढ़ाने-सोचने से ही फुरसत नहीं मिलती'। आपके मार्गदर्शन में केशव प्रसाद पाठक ने उमर खय्याम के साहित्य का हिंदी अनुवाद किया। आपने पत्रिका प्रेमा के संपादक रामानुजलाल श्रीवास्तव 'ऊँट बिलहरीवी' का महाकवि अनीस और महाकवि ग़ालिब की टीका करने में मार्गदर्शन किया। आप हिंदी छंद शास्त्र के विद्वान् थे। सेठ गोविंददास और सुभद्रा कुमारी चौहान आदि आपके प्रशंसक थे।
भारत की लालफीताशाही की ताकत का पार नहीं है। सामी जी भी इसके शिकार हुए। एक तरफ जहाँ आपकी विद्वता की धाक पूरे प्रान्त में थी, दूसरी और १८ साल नौकरी करते हुए अपने पद और वेतन से ऊपर का काम करने पर भी आप को कोई पदोन्नति नहीं गई। गज़ब तो यह की १९४० में जबलपुर में पहला कॉलेज हितकारिणी सिटी कॉलेज स्थापित होने पर विश्वविद्यालय से विशेष अनुमति लेकर आपको उर्दू-फारसी का प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष बनाया गया, दूसरी और समय से पूर्व शालेय शिक्षा विभाग से सेवा निवृत्ति के कारन आपको पेंशन नहीं दी गई। उन्हें अपने घर का खर्च चलने के लिए ट्यूशन करनी पड़ी। तब बिजली नहीं थी। जमीन पर बैठकर लगातार झुककर पढ़ने के कारण आपकी कमर झुक गई और आप को लकड़ी का सहर लेना पड़ा। कॉलेज से आप १०७० में सेवा मुक्त हुए। अपनी खुद के संतान न होने पर भी आपने दिवंगत बड़े भाई के ३ पुत्रों तथा १ पुत्र की पूरी जिम्मेदारी उठाई। उन्हें पढ़ा-लिखकर, विवाहादि कराए।
निरंतर कमजोर होती विवाह और परिवार संस्थाओं के इस संक्रमण काल में सामी जी का जीवन एक उदाहरण है की किस तरह अपना जीवन खुद की सुख-सुविधा तक सीमित ना रखकर सूर्य की तरह सबको प्रकाशित कार जिया जाता है। वैदुष्य, समर्पण, निष्ठा, मेधा, और वीतरागता के पर्याय महादेव प्रसाद सामी जी दर्शन शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, धर्म शास्त्र, तर्क शास्त्र, इतिहास आदि में अपनी विद्वत के लिए सर्वत्र समादृत थे।
***
विरासत :
कोरोना काल में आराम करने के फायदे जानिए हास्यावतार गोपाल प्रसाद व्यास से
* जन्म १३ फ़रवरी १९१५
* निधन २८ मई २००५
*जन्म स्थान महमदपुर, जिला मथुरा, उ. प्र ।
विविध शलाका सम्मान से सम्मानित।
कविता
* आराम करो , आराम करो *
एक मित्र बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छटांक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो
क्या रक्खा माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो"
हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।
आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है
आराम सुधा की एक बूँद, तन का दुबलापन खोती है
आराम शब्द में 'राम' छिपा जो भव-बंधन को खोता है
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।
यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ, है मज़ा मूर्ख कहलाने में
जीवन-जागृति में क्या रक्खा, जो रक्खा है सो जाने में।
मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ
दीप जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ
मेरी गीता में लिखा हुआ, सच्चे योगी जो होते हैं
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।
अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है
जब 'सुख की नींद' कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।
मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।
मुक्तिका
*
कबिरा जो देखे कहे
नदी नरमदा सम बहे
जो पाये वह बाँट दे
रमा राम में ही रहे
घरवाली का क्रोध भी
बोल न कुछ हँसकर सहे
देख पराई चूपड़ी
कभी नहीं किंचित् दहे
पल की खबर न है जरा
कल के लिये न कुछ गहे
राम नाम ओढ़े-बिछा
राम नाम चादर तहे
न तो उछलता हर्ष से
और न गम से घिर ढहे
*
मुक्तक
*
है प्राची स्वर्णाभित हे राधेमाधव
दस दिश कलरव गुंजित है राधेमाधव
कोविद का अभिशाप बना वरदान 'सलिल'
देश शांत अनुशासित है राधेमाधव
*
तबलीगी जमात मजलिस को बैन करो
आँखें रहते देखो बंद न नैन करो
जो कानून तोड़ते उनको मरने दो
मत इलाज दो, जीवन काली रैन करो
*
मतभेदों को सब हँसकर स्वीकार करें
मनभेदों की ध्वस्त हरेक दीवार करें
ये जय जय वे हाय हाय अब बंद करें
देश सभी का, सब इसके उद्धार करें
*
जीवन कैसे जिएँ मिला अधिकार हमें
हानि न औरों को हो पथ स्वीकार हमें
जो न चिकित्सा चाहें, वे सब साथ रहें
नहीं शेष से मिलें, न दें दीदार हमें
*
कोरोना कम; ज्यादा घातक मानव बम
सोच प्रदूषित ये सारे हैं दानव बम
बिन इलाज रह, आएँ-जाएँ कहीं नहीं
मर जाएँ तो जला, कहो बम बम बम बम
१७-४-२०२०
***
मुक्तक
चीर तिमिर को प्रकट हुई शुचि काव्य कामिनी।
दिप-दिप दमक रही मेघों में दिव्य दामिनी।
दिखती लुकती चपल चंचला मन भरमाती-
उषा-साँझ सखियों सह शोभित 'सलिल' यामिनी।।
***
नवगीत
आओ भौंकें
*
आओ भौंकें
लोकतंत्र का महापर्व है
हमको खुद पर बहुत गर्व है
चूक न जाए अवसर भौंकें
आओ भौंकें
*
क्यों सोचें क्या कहाँ ठीक है?
गलत बनाई यार लीक है
पान मान का नहीं सुहाता
दुर्वचनों का अधर-पीक है
मतलब तज, बेमतलब टोंकें
आओ भौंकें
*
दो दूनी हम चार न मानें
तीन-पाँच की छेड़ें तानें
गाली सुभाषितों सी भाए
बैर अकल से पल-पल ठानें
देख श्वान भी डरकर चौंकें
आओ भौंकें
*
बिल्ला काट रास्ता जाए
हमको नानी याद कराए
गुंडों के सम्मुख नतमस्तक
हमें न नियम-कायदे भाए
दुश्मन देखें झट से पौंकें
आओ भौंकें
*
हम क्या जानें इज्जत देना
हमें सभ्यता से क्या लेना?
ईश्वर को भी बीच घसीटे-
पालेे हैं चमचों की सेना।
शिष्टाचार भाड़ में झौंकें
आओ भौंकें
१७-४-२०१९
*
छंद बहर का मूल है: ५
*
छंद परिचय:
संरचना: SIS ISI SIS ISI SIS
सूत्र: रजरजर।
पन्द्रह वार्णिक अतिशर्करी जातीय चामर छंद।
तेईस मात्रिक रौद्राक जातीय छंद।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं मुफ़ाइलुं मुफ़ाइलुं।
*
देश का सवाल है न राजनीति खेलिए
लोक को रहे न शोक लोकनीति कीजिए
*
भेद-भाव भूल स्नेह-प्रीत खूब बाँटिए
नेह नर्मदा नहा, न रीति-प्रीति भूलिए
*
नीर के बिना न जिंदगी बिता सको कभी
साफ़ हों नदी-कुएँ सभी प्रयास कीजिए
*
घूस का न कायदा, न फायदा उठाइये
काम-काज जो करें, न वक्त आप चूकिए
*
ज्यादती न कीजिए, न ज्यादती सहें कभी
कामयाब हों, प्रयास बार-बार कीजिए
*
पीढ़ियाँ न एक सी रहीं, न हो सकें कभी
हाथ थाम लें गले लगा, न आप जूझिए
*
घालमेल छोड़, ताल-मेल से रहें सुखी
सौख्य पालिए, न राग-द्वेष आप घोलिए
*
१७.४.२०१७
***
***
रेवा मैया
*
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
जग-जीवन की नाव खिवैया
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
भाव सागर से पार लगैया
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
रोग-शोक भव-बाधा टारें
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
सब जनगण मिल जय उच्चारें
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
अमृत जल है जीवनदाता
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
पुण्य अनंत भक्त पा जाता
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
ब्रम्हा-शिव-हरि तव गुण गायें
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
संत असुर सुर नर तर जाएँ
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
विन्ध्य, सतपुड़ा, मेकल हर्षित
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
निंगादेव हुए जन पूजित
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
नरसिंह कनककशिपु संहारे
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
परशुराम ने क्षत्रिय मारे
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
राम-सिया तव तीरे आये
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
हनुमत-जामवंत मिल पाए
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
बाणासुर ने रावण पकड़ा
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
काराग्रह में जमकर जकड़ा
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
पांडवगण वनवास बिताएँ
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
गुप्तेश्वर के यश जन गायें
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
गौरी घाट तीर्थ अतिसुन्दर
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
घाट लम्हेटा परम मनोहर
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
तिलवारा बैठे तिल ईश्वर
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
गौरी-गौरा भेड़े तप कर
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
धुआंधार में कूद लगाई
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
चौंसठ योगिनी नाचें माई
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
संगमरमरी छटा सुहाई
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
नौकायन सुख-शांति प्रदाई
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
बंदर कूदनी कूदे हनुमत
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
महर्षि-ओशो पूजें विद्वत
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
कलकल लहर निनाद मनोहर
रेवा मैया! रेवा मैया!!
*
हो संजीव हरो विपदा हर
रेवा मैया! रेवा मैया!!
१७-४-२०१७
***
कृति परिचय:
आधुनिक अर्थशास्त्र: एक बहुउपयोगी कृति
चर्चाकार- डॉ. साधना वर्मा
सहायक प्रध्यापक अर्थशास्त्र
शासकीय महाकौसल स्वशासी अर्थ-वाणिज्य महाविद्यालय जबलपुर
*
[कृति विवरण: आधुनिक अर्थशास्त्र, डॉ. मोहिनी अग्रवाल, अकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द, लेमिनेटेड, जेकेट सहित, पृष्ठ २१५, मूल्य ५५०/-, कृतिकार संपर्क: एसो. प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, महिला महाविद्यालय, किदवई नगर कानपुर, रौशनी पब्लिकेशन ११०/१३८ मिश्र पैलेस, जवाहर नगर कानपूर २०८०१२ ISBN ९७८-९३-८३४००-९-६]
अर्थशास्त्र मानव मानव के सामान्य दैनंदिन जीवन के अभिन्न क्रिया-कलापों से जुड़ा विषय है. व्यक्ति, देश, समाज तथा विश्व हर स्तर पर आर्थिक क्रियाओं की निरन्तरता बनी रहती है. यह भी कह सकते हैं कि अर्थशास्त्र जिंदगी का शास्त्र है क्योंकि जन्म से मरण तक हर पल जीव किसी न किसी आर्थिक क्रिया से संलग्न अथवा उसमें निमग्न रहा आता है. संभवतः इसीलिए अर्थशास्त्र सर्वाधिक लोकप्रिय विषय है. कला-वाणिज्य संकायों में अर्थशास्त्र विषय का चयन करनेवाले विद्यार्थी सर्वाधिक तथा अनुत्तीर्ण होनेवाले न्यूनतम होते हैं. कला महाविद्यालयों की कल्पना अर्थशास्त्र विभाग के बिना करना कठिन है. यही नहीं अर्थशास्त्र विषय प्रतियोगिता परीक्षाओं की दृष्टि से भी बहुत उपयोगी है. उच्च अंक प्रतिशत के लिये तथा साक्षात्कार में सफलता के लिए इसकी उपादेयता असिंदिग्ध है. देश के प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों में अनेक अर्थशास्त्र के विद्यार्थी रहे हैं.
आधुनिक जीवन प्रणाली तथा शिक्षा प्रणाली के महत्वपूर्ण अंग उत्पादन, श्रम, पूँजी, कौशल, लगत, मूल्य विक्रय, पारिश्रमिक, माँग, पूर्ति, मुद्रा, बैंकिंग, वित्त, विनियोग, नियोजन, खपत आदि अर्थशास्त्र की पाठ्य सामग्री में समाहित होते हैं. इनका समुचित-सम्यक अध्ययन किये बिना परिवार, देश या विश्व की अर्थनीति नहीं बनाई जा सकती.
डॉ. मोहिनी अग्रवाल लिखित विवेच्य कृति 'आधुनिक अर्थशास्त्र' एस विषय के अध्यापकों, विद्यार्थियों तथा जनसामान्य हेतु सामान रूप से उपयोगी है. विषय बोध, सूक्ष्म अर्थशास्त्र, वृहद् अर्थशास्त्र, मूल्य निर्धारण के सिद्धांत, मजदूरी निर्धारण के सिद्धांत, मांग एवं पूर्ति तथा वित्त एवं विनियोग शीर्षक ७ अध्यायों में विभक्त यह करती विषय-वस्ती के साथ पूरी तरह न्याय करती है. लेखिका ने भारतीय तथा पाश्चात्य अर्थशास्त्रियों के मताभिमतों की सरल-सुबोध हिंदी में व्याख्या करते हुए विषय की स्पष्ट विवेचना इस तरह की है कि प्राध्यापकों, शिक्षकों तथा विद्यार्थियों को विषय-वस्तु समझने में कठिनाई न हो.आमजीवन में प्रचलित सामान्य शब्दावली, छोटे-छोटे वाक्य, यथोचित उदाहरण, यथावश्यक व्याख्याएँ, इस कृति की विशेषता है. विषयानुकूल रेखाचित्र तथा सारणियाँ विषय-वास्तु को ग्रहणीय बनाते हैं.
विषय से संबंधित अधिनियमों के प्रावधानों, प्रमुख वाद-निर्णयों, दंड के प्रावधानों आदि की उपयोगी जानकारी ने इसे अधिक उपयोगी बनाया है. कृति के अंत में परिशिष्टों में शब्द सूची, सन्दर्भ ग्रन्थ सूचि तथा प्रमुख वाद प्रकरणों की सूची जोड़ी जा सकती तो पुस्तक को मानल स्वरुप मिल जाता. प्रख्यात अर्थशास्त्रियों के अभिमतों के साथ उनके चित्र तथा जन्म-निधन तिथियाँ देकर विद्यार्थियों की ज्ञानवृद्धि की जा सकती थी. संभवतः पृष्ठ संख्या तथा मूल्य वृद्धि की सम्भावना को देखते हुए यह सामग्री न जोड़ी जा सकी हो. पुस्तक का मूल्य विद्यार्थियों की दृष्टि से अधिक प्रतीत होता है. अत: अल्पमोली पेपरबैक संस्करण उपलब्ध कराया जाना चाहिए.
सारत: डॉ. मोहिनी अग्रवाल की यह कृति उपयोगी है तथा इस सारस्वत अनुष्ठान के लिए वे साधुवाद की पात्र हैं.
१७-४-२०१५
***
मुक्तक
सूर्य छेडता उषा को हुई लाल बेहाल
क्रोधित भैया मेघ ने दंड दिया तत्काल
वसुधा माँ ने बताया पलटा चिर अनुराग-
गगन पिता ने छुड़ाया आ न जाए भूचाल
*
वन काटे, पर्वत मिटा, भोग रहे अभिशाप
उफ़न-सूख नदिया कहे, बंद करो यह पाप
रूठे प्रभु केदार तो मनुज हुआ बेज़ार-
सुधर न पाया तो असह्य, होगा भू का ताप
*
मोहन हो गोपाल भी, हे जसुदा के लाल!
तुम्हीं वेणुधर श्याम हो, बाल तुम्हीं जगपाल
कमलनयन श्यामलवदन, माखनचोर मुरार-
गिरिधर हो रणछोड़ भी, कृष्ण कान्ह इन्द्रारि।
*
श्वास तुला है आस दण्डिका, दोनों पल्लों पर हैं श्याम
जड़ में वही समाये हैं जो खुद चैतन्य परम अभिराम
कंकर कंकर में शंकर वे, वे ही कण-कण में भगवान-
नयन मूँद, कर जोड़ कर 'सलिल', आत्मलीन हो नम्र प्रणाम
*
व्यथा--कथा यह है विचित्र हरि!, नहीं कथा सुन-समझ सके
इसीलिए तो नेता-अफसर सेठ-आमजन भटक रहे
स्वयं संतगण भी माया से मुक्त नहीं, कलिकाल-प्रभाव-
प्रभु से नहीं कहें तो कहिये व्यथा ह्रदय की कहाँ कहें?
१७-४-२०१४
***
विमर्श
भारत में प्रजातंत्र, गणतंत्र और जनतंत्र की अवधारणा और शासन व्यवस्था वैदिक काल में भी थी. पश्चिम में यह बहुत बाद में विकसित हुई, वह भी आधी-अधूरी. पश्चिम की डेमोक्रेसी ग्रीस में 'डेमोस' आधारित शासन व्यवस्था की भौंडी नकल है, जो बिना डेमोस के बिना ही खड़ी की गई है.
१७-४-२०१०

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

अप्रैल १६, सरस्वती, छत्तीसगढ़ी, कुण्डलिया, गीत, दोहा-जनक छंद, मुक्तक, कुंडल छंद, शादी, आरोग्य,

 सलिल सृजन अप्रैल १६

*
ग़ज़लिका
मुर्दे बन जाते इतिहास
जिंदा दिल करते परिहास
कमी हौसलों की गर हो
लगे जिंदगी तब संत्रास
खुद पर भी मानव हँसते
दानव सहें नहीं उपहास
अपनों के शुभ हेतु करें
बिना कहे अपने उपवास
तोड़ न पाएँ तारे पर
नहीं टूटती फिर भी आस
आती-जाती मुसीबतें
रहे हमेशा कब खग्रास
तम हो घोर निशा का जब
देता दीपक तभी उजास
श्रम-सीकर की धार बहा
मरुथल में कर दे मधुमास
ठोकर लगती लगने दे
बंद न करना 'सलिल' प्रयास
आस राधिका श्वास किशन
जीवन जमुना तट हो रास
०००
छंद शाला दोहा+रोला=कुंडलिया ० १ इकलौते थे दो कभी, नयन हुए दो चार। नयन चार होकर हुए, फिर से एकाकार।। -अशोक व्यग्र फिर से एकाकार, नयन खुलते जग दिखता। पलक झपकते नयन मुँदे, सारा जग मिटता।। खुलते-मुँदते नयन, मित्र संबंधी न्यौते। नयन हुए जो चार, कभी दो थे इकलोते।। २ इकलौते थे दो कभी, नयन हुए दो चार। नयन चार होकर हुए, फिर से एकाकार।। -अशोक व्यग्र फिर से एकाकार, हो नयन सपने बुनते। सुलझ-उलझते उलझ-सुलझते, या सिर धुनते।। नयन मिलाते हाथ, छुड़ाते पा-खोते थे। दो होकर भी एक देखते इकलौते थे।। ३. इकलौते थे दो कभी, नयन हुए दो चार। नयन चार होकर हुए, फिर से एकाकार।। -अशोक व्यग्र फिर से एकाकार, द्वैत-अद्वैत पथिक हैं। सोते-जगते नयन रात-दिन नहीं थकित हैं।। गत-आगत-अब नयन, प्रशंसक सृष्टि है सभी। नय न त्यागते नयन, इकलौते थे दो कभी।। १६.४.२०२६ ०००
पूर्णिका
.
बगिया में लिली
आँगन में लली
.
बढ़ाती शोभा
नाज़ों से पली
.
लाड़ पाए-दे
मिसरी की डली
.
उदास हो लगे
विकल साँझ ढली
.
रखो दूर शूल
है कोमल कली
.
न रुचे बुराई
भोली अरु भली
.
मेहनत न व्यर्थ
नेक नियत फली
१६.४.२०२५
०००
बेला कहि रह्यौ बेला भई रे जे साजन के आवन की।
फगुनाई में महक रह्यो मन जैसे ऋतु हो सावन की।।
नैन बोल रए निशा निमंत्रण पायो साँसें धन्न भईँ-
मिल आँखोँ से आँख बसा रईँ मन में छब मनभावन की।।
१६.४.२०२५
मुक्तक
आमंत्रण या आवश्यकता अगर नहीं तो चुप ही रहिए।
सीख सीखिए, मत सिखाइए, नहीं सहारा नाहक गहिए।।
बिन माँगे सलाह बेमानी, कोई उस पर गौर न करता-
हो संजीव जीव सब लखिए, जो हो श्रेष्ठ उसी को तहिए।।
***
विमर्श :
हिंदी धर्म में कन्या को लक्ष्मी कहा जाता है तो कन्यादान क्यों किया जाता है?
कुण्डलिया
सुता लक्ष्मी सत्य है, करिए उसका दान।
नहीं किया तो टैक्स भर, हो जाएँ हैरान।।
हो जाएँ, हैरान, लगे जी एस टी भारी।
वैल्थ टैक्स दे लगे, भार कन्या बेचारी।।
सौंप और को भार, हुआ बेफिक्र हर पिता।
शीघ्र खोज दामाद, सौंपिए योग्य को सुता।
चंचल होती लक्ष्मी, बंधन देती तोड़।
जहाँ न हो उपयोग वह, घर देती है छोड़।।
घर देती है छोड़, बेहतर विदा कीजिए।
साँस चैन की आप, बैठ मौन हो आप लीजिए।।
गृह-लक्ष्मी बेचैन, पल-पल नाथ रखे विकल।
रह प्रसन्न दिन-रैन, लक्ष्मी हो जाती अचल।।
१६-४-२०२३
***
जीवन में अनमोल क्या है?
कुण्डलिया
जीवन में अनमोल है, आती-जाती श्वास।
रंग श्वास में भर रही, मन में पलती आस।।
मन में पलती आस, सास साली अरु सलहज।
अगर न हों तो, करें किस तरह श्वसुरालय हज।।
कहता कवि संजीव, पत्नि बिन सकल सृष्टि वन।
खटिया करती खड़ी, मगर संजीवित जीवन।।
१६-४-२०२३
***
गीत:
जीवन के ढाई आखर को
*
बीती उमर नहीं पढ़ पाए, जीवन के ढाई आखर को
गृह स्वामी की करी उपेक्षा, सेंत रहे जर्जर बाखर को...
*
रूप-रंग, रस-गंध चाहकर, खुदको समझे बहुत सयाना
समझ न पाये माया-ममता, मोहे मन को करे दिवाना
कंकर-पत्थर जोड़ बनाई मस्जिद, जिसे टेर हम हारे-
मन मंदिर में रहा विराजा, मिला न लेकिन हमें ठिकाना
निराकार को लाख दिये आकार न छवि उसकी गढ़ पाये-
नयन मुँदे मुस्काते पाया चित्रगुप्त को, नटनागर को
गृह स्वामी की करी उपेक्षा, सेंत रहे जर्जर बाखर को...
*
श्लोक-ऋचाएँ, मंत्र-प्रार्थना, प्रेयर सबद अजान न सुनता
भजन-कीर्तन,गीत-ग़ज़ल रच, मन अनगिनती सपने बुनता
पूजा-अनुष्ठान, मठ-महलों में रहना कब उसको भाया-
मेवे छोड़ पंजीरी फाँके, देख पुजारी निज सर धुनता
खाए जूठे बेर, चुराए माखन, रागी परम विरागी
एक बूँद पा तृप्त हुआ पर है अतृप्त पीकर सागर को
गृह स्वामी की करी उपेक्षा, सेंत रहे जर्जर बाखर को...
*
अर्थ खोज-संचित कर हमने, बस अनर्थ ही सदा किया है
अमृत की कर चाह गरल का, घूँट पिलाया सतत पिया है
लूट तिजोरी दान टके का कर खुद को पुण्यात्मा माना-
विस्मित वह पाखंड देखकर मनुज हुआ पाषाण-हिया है
कैकट्स उपजाये आँगन में, अब तुलसी पूजन हो कैसे?
देश निकाला दिया हमीं ने चौपालों पनघट गागर को
गृह स्वामी की करी उपेक्षा, सेंत रहे जर्जर बाखर को...
१६-४-२०२१
...
पुस्तक सलिला
'सही के हीरो' साधारण लोगों की असाधारणता की मार्मिक कहानियाँ
*
[पुस्तक विवरण- सही के हीरो, कहानी संग्रह, ISBN 9789385524400, डॉ. अव्यक्त अग्रवाल, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण पेपर बैंक बहुरंगी, कहानीकार संपर्क- डी ७ जसूजा सिटी, जबलपुर ४८२००३]
*
मनुष्य में अनुभव किये हुए को कहने की अदम्य इच्छा वाक् क्षमता के रूप में विकसित हुई। अस्पष्ट स्फुट ध्वनियाँ क्रमशः सार्थक संवादों के रूप में आईं तो लयबद्ध कहन कविता के रूप में और क्रमबद्ध कथन कहानी के रूप में विकसित हुए। कहानी, कथा, किस्सा, गल्प, गप्प और चुटकुले विषयवस्तु के आकार और कथ्य के अनुरूप प्रकाश में आये। गद्य में निबन्ध, संस्मरण, यात्रावृत्त, व्यंग्य लेख, आत्मकथा, समीक्षा आदि विधाओं का विकास होने के बाद भी कहानी की लोकप्रियता सर्वकालों में सर्वाधिक थी, है और रहेगी। कहानी वह जो कही जाए, अर्थात उसमें कहे जाने और सुने जाने योग्य तत्व हों। वर्तमान पूँजीवादी राजनीति-प्रधान व्यक्तिपरक जीवन शैली में साहित्य संसाधनों और पहुँच के सफे पर हाशिये में रखे जा रहे जीवट और संघर्ष को पुनर्जीवन दे रहा है।
स्वतंत्रता के पश्चात अहिंसा की माला जपते दल विशेष ने सत्ता पर और हिंसा पर भरोसा करनेवाले अन्य दल विशेष ने शिक्षा संस्थानों और साहित्यिक अकादमियों पर कब्ज़ा कर साहित्यिक विधाओं में वैषम्य और विसंगतियों के अतिरेकी चित्रण को सामने लाकर सामाजिक संघर्ष को तेज करनेवाले साहित्य और साहित्यकारों को पुरस्कृत किया। फलतः, आम आदमी के नाम पर स्त्री-पुरुष, संपन्न-विपन्न, नेता-जनता, श्रमिक-उद्योगपति, छात्र-शिक्षक, हिन्दू-मुस्लिम आदि के नाम पर टकराव ने सद्भाव, सहयोग, सहकार, विश्वास, निष्ठा आदि को अप्रासंगिक बनने का काम किया। इस पृष्ठभूमि में अत्यन्त अल्प संसाधनों और पिछड़े क्षेत्र से संघर्ष कर स्वयं को विशेषज्ञ चिकित्सक के रूप में स्थापित कर, अपने मरीजों के इलाज के साथ-साथ उनके जीवन-संघर्ष को पहचान कर मानसिक संबल देनेवाले डॉ. अव्यक्त अग्रवाल ने निर्बल का बल बनने के अपने महाभियान में विवेच्य कहानी संग्रह के माध्यम से पाठकों को भी सहभागी बनने का अवसर दिया है।
इस कहानी संग्रह के अधिकांश पात्र निम्न जीवन स्तर और विपन्नता की मेंड़ पर लगातार चुभ रहे काँटों के बीच पैर रखते हुए आगे बढ़ते हैं। नियति ने भले ही इन्हें मरने के लिए पैदा किया हो पर अपनी जिजीविषा के सहारे ये मौत के अनुकूल परिस्थितियों से जूझकर जीवन का राजमार्ग तलाश पाते हैं। साहित्य के प्रभाव, उपयोगिता और पठनीयता पर प्रश्न उठानेवाले इस संग्रह को पढ़ें तो उनके जीवन की नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मकता का वरण कर सकेगी। परिस्थितियों के चक्रव्यूह में फँसकर लहूलुहान होते हुए भी ऊपर उठने और आगे बढ़ने को प्रेरित करते इस कथा-संग्रह में कथाकार शिल्प पर कथ्य को वरीयता देता है। कहानी के पात्र पारिस्थितिक वैषम्य और विसंगति के हलाहल को कंठ में धारकर अपने सपने पूरे होते देखने का अमृत पान करते हुए कहीं काल्पनिक प्रतीत नहीं होते। ये कहानियाँ वास्तव में कल से प्राप्त विरासत को आज सँवार-सुधार कर कल को उज्जवल थाती देने का सारस्वत अनुष्ठान हैं।
'सही के हीरो' शीर्षक और मुखपृष्ठ पर अंकित देबाशीष साहा द्वारा निर्मित चित्र ही यह बता देता कि आम आदमियों के बीच में से उभरते हुए चरित नायक अपनी भाषा, भूषा, सोच और संघर्ष के साथ पाठक से रू-ब-रू होंगे। मर्मस्पर्शी कहानियाँ तथा प्रेरक कहानियाँ और संस्मरण दो भागों में क्रमशः १० + १८ कुल २८ हैं। संस्मरणात्मक कहानियाँ, पाठक को देखकर भी अनदेखे किये जाते पलों और व्यक्तियों से आँखें मिलाने का सुअवसर उपलब्ध कराते हैं। पात्रों और परिवेश के अनुकूल शब्द-चयन और वाक्य-संरचना कथानक को विश्वसनीयता प्रदान करते हैं। अंतर्जाल पर सर्वाधिक बिकनेवाले संग्रहों में सम्मिलित इस कृति की प्रथम कहानी 'लाइफगार्ड' के नायक एक बेसहारा बच्चे विक्टर को फ्रांसिस पालता है, युवा विक्टर अन्य बेसहारा बच्चे एडम को अपना लेता है और उसे विमाता से बचाने के लिए अपनी प्रेमिका से विवाह करने से कतराता है। डूबते फ्रांसिस को बचाते हुए मौत के कगार पर पहुँचे विक्टर की चिकित्सा अवधि के मध्य विक्टर की प्राणरक्षा की दुआ माँगते एडम और मारिया एक दूसरे के इतने निकट आ जाते हैं कि नन्हा एडम विक्टर से मारिया मम्मी की माँग कर उसे नया जीवन देता है।
कहानी 'चने के दाने' एक न हो सके किशोर प्रेमियों के पुनर्मिलन की मर्मस्पर्शी गाथा है। कठोर ह्रदय पाठकों की भी ऑंखें नम कर सकने में समर्थ 'आधी परी' तथाकथित समझदारों द्वारा स्नेह-प्रेम की आड़ में अल्पविकसित का शोषण करने पर आधारित है। तरुणी प्रीति के बहाने जीवनसाथी चुनते समय स्वस्थ्य - समझ का संदेश देती है 'पासवर्ड' कहानी। 'एक अलग प्रेम कहानी' साधनहीन ग्रामीण दंपति के एकांतिक प्रेम के समान्तर चिकित्सक-रोगी के बीच महीन विश्वास तन्तु के टूटने तथा बढ़ते व्यवसायीकरण को इंगित करती व्यथा-कथा है। पारिवारिक रिश्तों के बिखरने पर केंद्रित चलचित्र 'बावर्ची' में नायक घरेलू नौकर बनकर परिवार के सदस्यों के बीच मरते स्नेह बंधन को जीवित करता है। कहानी जादूगर में नायिका के कैशोर्य काल का प्रेमी जो अब मनोचिकित्सक है, नायिका में उसके पति के प्रति घटते प्रेम को पुनर्जीवित करता है। 'बहुरुपिया' में साधनहीन भाई-बहिन का निर्मल प्रेम, 'आइसक्रीम कैंडी' में राजनेताओं के कारण आहत होते आमजन, 'ज़िंदगी एक स्टेशन' में बदलते सामाजिक ढाँचे के कारण स्थापित व्यवसायों के अलाभप्रद होने की समस्या और समाधान तथा 'मेरा चैंपियन' में पिता के सपने को पूरा करते पुत्र की कहानी है।
दूसरे भाग में 'सही का हीरो' एक साधनहीन किन्तु अपने सपने साकार करने के प्रति आत्मविश्वास से भरे बच्चे की कथा है। 'गूगल' किसी घटना को देखने के दो भिन्न दृष्टिकोण, 'मैं ठीक हूँ' मौत के मुख से लौटी नन्हीं बच्ची द्वारा जीवन की हर साँस का आनंद लेने की सीख, 'दुश्वारियाँ एक अवसर' अपंग बच्चे के संकल्प और सफलता, 'सफलता मंत्र' जीवन का आनंद लेने, 'मेरी पचमढ़ी और मैं' संस्मरण, 'आसान है' में सच को स्वीकार कर औरों को ख़ुशी देने, 'उमैया एक तमाशा' विपन्न बच्चों में छिपी प्रतिभा, 'एक और सुबह' बचपन की यादों, 'फाँस' जीवनानंद की खोज, 'लोकप्रियता का रहस्य' अपनी क्षमताओं की पहचान, 'वो अधूरी कहानी' जीवन के उद्देश्य की पहचान, 'सफलता सबसे शक्तिशाली मंत्र ' निज सामर्थ्य से साक्षात्, 'स्वतः प्रेरणा' मन की आवाज़ सुनने, 'हम सब रौशनी पुंज' निराशा में आशा, 'हवा का झौंका समीर' में बेसहारा बच्चों के लालन-पालन तथा 'ज़िन्दगी एक चैस बोर्ड' में अपने उद्देश्य की तलाश को केंद्र में रखकर कथा का ताना-बाना बुना गया है।
'सही का हीरो' कहानी संग्रह की विशेषता इसमें साधारणता का होना है। अधिकांश कहानियाँ जीवन में घटी वास्तविक घटनाओं पर आधारित हैं। यथार्थ को कल्पना का आवरण पहनाते समय यह ध्यान रखा गया है कि मूल घटना और पात्रों की विश्वसनीयता, उपयोगिता और सन्देशवाहकता बनी रहे। अधिकांश घटनाएँ और पात्र पाठक के इर्द-गिर्द से ही उठाये गए हैं किन्तु उन्हें देखने की दृष्टि, उनके मूल्याङ्कन का नज़रिया और उसने सीख लेने का हौसला बिलकुल नया है। इन कहानियों में अभाव-उपेक्षा, टकराव-बिखराव, सपने-नपने, गिराव-उठाव, निराशा-आशा, अवनति-उन्नति, विफलता-सफलता, नासमझी और समझदारी अर्थात जीवन रूपी इंद्रधनुष का हर रंग अपनी चमक और चटख के साथ उपस्थित है। नकारात्मकता पर सकारात्मकता की विजय, पाठक को लड़ने, बदलने और जीतने का सन्देश देती है। शिल्प की दृष्टि से ये रचनाएँ कहानी, लघुकथा, संस्मरण, शब्द चित्र आदि विधाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं।
डॉ. अव्यक्त अग्रवाल की भाषा सहज, सरस, सुगम, विषय, पात्र और परिवेश के अनुकूल है। किसी पहाड़ी से नि:सृत निर्झर की तरह अनगढ़पने में देने की आकुलता, नया ग्रहण करने की आतुरता और सबको अपना लेने की उत्सुकता पात्रों को जीवंत और प्रेरणादायी बनाती है। अव्यक्त जी खुद घटना को व्यक्त नहीं करते, वे पात्र या घटना को सामने आने देते हैं। कम से कम में अधिक से अधिक कहने का कौशल सहज नहीं होता किन्तु अव्यक्त जी इसे कुशलतापूर्वक साध सके हैं। वे पात्र के मुँह में शब्द ठूँसने या कहलाने का कोई प्रयास नहीं करते। उनके पात्र न तो भदेसी होने का दिखावा करते हैं, न सुसंस्कृत होने का पाखण्ड। कथ्य संक्षिप्त - गठा हुआ, संवाद सारगर्भित, भाषा शैली सहज - प्रचलित, शब्द चयन सम्यक - उपयुक्त, मुहावरों का यथोचित प्रयोग, हिंदी, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी शब्दों का प्रचलन के अनुसार प्रयोग पाठक को बाँधता है। इस उद्देश्यपूर्ण कृति का सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्य में शुमार होना आश्वस्त करता है कि हिंदी तथा साहित्य के प्रेमी पाठकों का अभाव नहीं है। सही के हीरो' ही देश और समाज का गौरव बढ़ाकर मानवता को परिपुष्ट करते हैं। अव्यक्त जी को इस कृति हेतु
बधाई
। उनकी आगामी कृति की प्रतीक्षा होना स्वाभाविक है।
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दोहा सलिला
*
अरुणचूर दे रहा है, अरुण देखकर बाँग
जो सोये वे कह रहे, व्यर्थ अड़ाता टाँग
*
कन्याएँ धरना धरे, पूर्ण कीजिए माँग
क्वाँरे झट सिंदूर ले, पहुँचे भरने माँग
*
वह बोली यह टाँग दे, वह भागा हो भीत
टाँग न दूँ मैं तो कभी, कैसी है यह रीत
१६-४-२०२०
***
दोहा रत्न :
दोहे का वैशिष्ट्य है उक्ति वैचित्र्य और अर्थ गांभीर्य। इस दोहे में लक्ष्मी की कृपा अनवरत बनी रहे, इस भाव को असाधारण ढंग से कहा गया है। ऐसे दोहों को समझ पाना सबके बस की बात नहीं है।
अम्बुज अरि पति ता सुता ता पति उर को हार।
ता अरि पति कि भामिनी आई बसै यही द्वार।।
अर्थ "पान (ताम्बूल) के शत्रु हिम (बर्फ) के स्वामी हिमालय की पुत्री पार्वती के पति भगवान शंकर के हार नाग (सर्प) के शत्रु गरुण के स्वामी भगवान विष्णु की भार्या लक्ष्मी मेरे द्वार पर सदैव विराजमान रहें।"
शब्दों के अर्थ -
सारंग -पान, हिन्दी में इसके अनेकानेक अर्थ होते हैं।
सारंग अरि - हिम, बर्फ
सारंग अरिपति - हिमालय
सारंग अरिपति ता सुता - पार्वती
सारंग अरिपति ता सुता ता पति -शंकर
सारंग अरिपति ता सुता ता पति उर के हार -नाग, सर्प
सारंग अरिपति ता सुता ता पति उर के हार ता अरि -गरुण
सारंग अरिपति ता सुता ता पति उर के हार ता अरिपति -विष्णु
सारंग अरिपति ता सुता ता पति उर के हार ता अरिपति की भामिनी -लक्ष्मी
***
वास्तु विमर्श
*
पूर्व, पूर्वोत्तर व उत्तर दिशा में भगवान का चित्र स्थापित कर, उसकी ओर मुँह कर पूजन करें।
पूर्व सूर्य भगवान के प्रागट्य की दिशा है।
उत्तर में दिशादर्शक ध्रुवतारा है।
एक दिन में पथ प्रदर्शन करता है दूसरा रात में राह दिखाता है। दोनों के मध्य ईशान दिशा को ईश का स्थान मानता है वास्तुशास्त्र।
यह विज्ञान सम्मत भी है। सूर्य प्रकाश और ऊर्जा के अक्षय स्रोत हैं। वे जीवनदाता हैं। सूर्य किरणें प्रकाश देती हैं, विषाणुओं को नष्ट करती हैं, विटामिन डी देती हैं, आतिशी शीशे का प्रयोग कर इनसे आग सुलगाई जा सकती है।
विश्व के प्रतापी राजवंश खुद को सूर्यवंशी कहते रहे हैं।
'भा' धातु का अर्थ प्रकाशित करना है इसलिए जग प्रकाशित करनेवाला सूर्य 'भास्कर' मानव मस्तिष्क को ज्ञान से प्रकाशित करने वाली ध्वनि 'भाषा' और हमारा देश 'भारत' है। हमें इंडिया नहीं होना है।
सूर्योपासना कुष्ठ रोग निवारक बताई गई है।
वास्तु के अनुसार आवास में सूर्य प्रकाश आना आवश्यक है। यदि न आता हो तो यथासंभव रोज या सप्ताह में एक दिन धूप में कुछ घंटे बिताएँ। पश्चिमी देशों में लोग समुद्र तट पर जाकर 'सन बाथ' लेते हैं अर्थात नयूनतम वस्त्रों में देह को सूर्य प्रकाश ग्रहण कराते हैं। यह फैशन या निर्लज्जता नहीं, प्राकृतिक चिकित्सा है। हमारे गाँवों में पनघट, नदी, तालाब या कुएँ पर स्नान करने की परंपरा इसीलिए है कि शुद्ध प्राणवायु और सूर्यप्रकाश का मणिकांचन संयोग हो सके।
कुंभादि पर्वों पर अगणित मनुष्यों के स्नान के समय सूर्य किरणें विषाणु नष्ट करती रहती हैं। वर्तमान कोरोना संकट का विकरालतम रूप वहीं है जहाँ सूर्य देव की कृपा कम है। हम रोज सवेरे सूर्योदय के समय उन्हें प्रणाम कर दीर्घ - निरोगी तथा कर्मप्रधान जीवन की कामना करें। सूर्य स्वानुशासन, कर्मठता, नियमितता तथा निष्काम कर्म के जीवंत प्रतीक हैं।
*
नव प्रयोग
दोहा-जनक छंद
*
विधि-विधान से कार्य कर, ब्रह्मा रहें प्रसन्न
याद रखें गुरु-सीख तो, विपद् न हो आसन्न
बात मीठी ही कहिए
मुकुल मन हँसते रहिए
स्नेह सलिला सम बहिए
*
मुक्तक
*
पंडित को पेट हेतु राम की जरूरत है
मंदिर को छत हेतु खाम की जरूरत है
सीता को दंडित कर राजदंड ठठा रहा
काल कहे नाश परिणाम की जरूरत है
*
रोजी और रोटी ही अवाम की जरूरत है
हाथों को भीख नहीं काम की जरूरत है
स्वाति सलिल मोतियों के ढेर लगा देंगे पर
मोल लेने के लिए दाम की जरूरत है
*
शीत कहे सूर्य तपो घाम की जरूरत है
जेठ कहे अब न तपो शाम की जरूरत है
सूर्य ठिठक सोच रहा, जो कहते कहने दो
पहले कर काम फिर आराम की जरूरत है
*
आधुनिका को चिकने चाम की जरूरत है
मद्यप को साकी को जाम की जरूरत है
सत्ता को अमन-चैन से न रहा वास्ता
कैसे भी, कहीं भी हो लाम की जरूरत है
*
कोरोना को तुरत लगाम की जरूरत है
घर में खुश रह कहें विराम की जरूरत है
मदद करें यथाशक्ति, पढ़ें-लिखें, योग करें
साहस सुख शांति दे, अनाम की जरूरत है
*
१६-४-२०२०
***
भक्ति गीत :
कहाँ गया
*
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
कण-कण में तू रम रहा
घट-घट तेरा वास.
लेकिन अधरों पर नहीं
अब आता है हास.
लगे जेठ सम तप रहा
अब पावस-मधुमास
क्यों न गूंजती बाँसुरी
पूछ रहे खद्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
श्वास-श्वास पर लिख लिया
जब से तेरा नाम.
आस-आस में तू बसा
तू ही काम-अकाम.
मन-मुरली, तन जमुन-जल
व्यथित विधाता वाम
बिसराया है बोल क्यों?
मिला ज्योत से ज्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!,
जला प्रेम की ज्योत
*
पल-पल हेरा है तुझे
पाया अपने पास.
दिखता-छिप जाता तुरत
ओ छलिया! दे त्रास.
ले-ले अपनीं शरण में
'सलिल' तिहारा दास
दूर न रहने दे तनिक
हम दोनों सहगोत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
***
दोहा दुनिया
*
नेह-नर्मदा नहा ले, गर्मी होगी शांत
जी भर जलजीरा गटक, चित्त न पित्त अशांत
*
नित्य निनादित नर्मदा, कलकल सलिल प्रवाह
ताप किनारे ही रुका, लहर मिटाती दाह
*
परकम्मा करते चरण, वरते पुण्य असीम
छेंक धूप को छाँह दें, पीपल, बरगद, नीम
*
मन कठोर चट्टान सा, तप पा-देता कष्ट
जल संतों सा तप करे, हरता द्वेष-अनिष्ट
*
मग पर पग पनही बिना, नहीं उचित इस काल
बाल न बाँका लू करे, पनहा पी हर हाल
*
गाँठ प्याज की संग रख, लू से करे बचाव
मट्ठा पी ठट्ठा करो, व्यर्थ न खाओ ताव
*
भर गिलास लस्सी पियो, नित्य मलाईदार
कहो 'नर्मदे हर' सलिल, एक नहीं कई बार
*
पीस पोदीना पत्तियाँ, मिर्ची-कैरी-प्याज
काला नमक व गुड़ मिला, जमकर खा तज लाज
*
मीठी या नमकीन हो, रुचे महेरी खूब
सत्तू पी ले घोलकर, जा ठंडक में डूब
*
खरबूजे-तरबूज से, मिले तरावट खूब
लीची खा संजीव नित, मस्ती में जा डूब
*
गन्ना-रस ग्लूकोज़ का, करता दूर अभाव
गुड़-पानी अमृत सदृश, पार लगाता नाव
*
***
छंद बहर का मूल है: ४
कुंडल छंद
*
छंद परिचय:
बाईस मात्रिक महारौद्र जातीय कुंडल छंद
चौदह वार्णिक शर्करी जातीय छंद।
संरचना: SIS ISI SIS ISI SS
सूत्र: रजरजगग।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं मुफ़ाइलुं फ़ऊलुं।
*
प्रात, शाम, रात रोज आप ही सुहाए
मौन हेरता रहा न आज आप आए
*
छंद-गीत, राग-रीत कौन सीखता है?
शारदा कृपा करें तभी न सीख पाए
*
है कहाँ छिपा हुआ, न चाँद दीखता है
दीप बाल-बाल रात ही न हार जाए
*
दूर बैठ ताकती , न भू भुला सकी है
सूर्य रश्मि-रूप धार श्वास में समाए
*
आसमान छेदता, दिशा-हवा न रोके
कामदेव चित्त को अशांत क्यों बनाये?
*
प्रेमिका न ज्ञान-दान प्रेम चाहती है
रुठती न, रूठना दिखा-दिखा खिझाए
*
हारता न, हार-हार प्रेम जीतता है
जीतता न जीत-जीत, प्रेम ही हराए
*
१६.४.२०१७
***
* शादी या बर्बादी **
1. आ बैल मुझे मार = पत्नी से पंगा लेना।
2. दीवार से सिर फोड़ना = पत्नी को कुछ समझाना।
3. चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात = पत्नी का मायके से वापस आना।
4. आत्महत्या के लिए उकसाना = शादी की राय देना।
5. दुश्मनी निभाना = दोस्तों की शादी करवाना।
6. खुद का स्वार्थ देखना = शादी ना करना।
7. ओखली में सिर देना = शादी के लिए हां करना।
8. दो पाटों में पिसना = दूसरी शादी करना।
9. खुद को लुटते हुऐ देखना = पत्नी को पर्स से पैसे निकालते हुए देखना।
10. पैरों तले जमीन खिसकना = पत्नी का अचानक साक्षात सामने आना।
11. सिर मुंडाते ही ओले पड़ना = परीक्षा में फेल होते ही शादी हो जाना।
12. शादी के लिए हां करना = स्वेच्छा से जेल जाना।
13. साली आधी घर वाली = वह स्कीम जो दूल्हे को बताई जाती है लेकिन दी नहीं जाती।
आभार: गुड्डो दादी
***
नवगीत
.
बांसों के झुरमुट में
धांय-धांय चीत्कार
.
परिणिति
अव्यवस्था की
आम लोग
भोगते.
हाथ पटक
मूंड पर
खुद को ही
कोसते.
बाँसों में
उग आये
कल्लों को
पोसते.
चुभ जाती झरबेरी
करते हैं सीत्कार
.
असली हो
या नकली
वर्दी तो
है वर्दी.
असहायों
को पीटे
खाखी हो
या जर्दी.
गोलियाँ
सुरंग जहाँ
वहाँ सिर्फ
नामर्दी.
बिना किसी शत्रुता
अनजाने रहे मार
.
सूखेंगे
आँसू बह.
रक्खेंगे
पीड़ा तह.
बलि दो
या ईद हो
बकरी ही
हो जिबह.
कुंठा-वन
खिसियाकर
खुद ही खुद
होता दह
जो न तर सके उनका
दावा है रहे तार
***
नवगीत:
.
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
कथ्य अमरकंटक पर
तरुवर बिम्ब झूमते
डाल भाव पर विहँस
बिम्ब कपि उछल लूमते
रस-रुद्राक्ष माल धारेंगे
लोक कंठ बस छंद कन्त रे!
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
दुग्ध-धार लहरें लय
देतीं नवल अर्थ कुछ
गहन गव्हर गिरि उच्च
सतत हरते अनर्थ कुछ
निर्मल सलिल-बिंदु तर-तारें
ब्रम्हलीन हों साधु-संत रे!
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
विलय करे लय मलय
न डूबे माया नगरी
सौंधापन माटी का
मिटा न दुनिया ठग री!
ढाई आखर बिना न कोई
किसी गीत में तनिक तंत रे!
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
***
नव गीत:
.
अपने ही घर में
बेबस हैं
खुद से खुद ही दूर
.
इसको-उसको परखा फिर-फिर
धोखा खाया खूब
नौका फिर भी तैर न पायी
रही किनारे डूब
दो दिन मन में बसी चाँदनी
फिर छाई क्यों ऊब?
काश! न होता मन पतंग सा
बन पाता हँस दूब
पतवारों के
वार न सहते
माँझी होकर सूर
अपने ही घर में
बेबस हैं
खुद से खुद ही दूर
.
एक हाथ दूजे का बैरी
फिर कैसे हो खैर?
पूर दिये तालाब, रेत में
कैसे पायें तैर?
फूल नोचकर शूल बिछाये
तब करते है सैर
अपने ही जब रहे न अपने
गैर रहें क्यों गैर?
रूप मर रहा
बेहूदों ने
देखा फिर-फिर घूर
अपने ही घर में
बेबस हैं
खुद से खुद ही दूर
.
संबंधों के अनुबंधों ने
थोप दिये प्रतिबंध
जूही-चमेली बिना नहाये
मलें विदेशी गंध
दिन दोपहरी किन्तु न छटती
फ़ैली कैसी धुंध
लंगड़े को काँधे बैठाकर
अब न चल रहे अंध
मन की किसको परख है
ताकें तन का नूर
१६-४-२०१५
***
छत्तीसगढ़ी दोहा
*
हमर देस के गाँव मा, सुन्हा सुरुज विहान.
अरघ देहे बद अंजुरी, रीती रोय किसान..
*
जिनगानी के समंदर, गाँव-गँवई के रीत.
जिनगी गुजरत हे 'सलिल', कुरिया-कुंदरा मीत..
*
महतारी भुइयाँ असल, बंदत हौं दिन-रात.
दाई! पैयाँ परत हौं. मूंडा पर धर हात..
*
जाँघर तोड़त सेठ बर, चिथरा झूलत भेस.
मुटियारी माथा पटक, चेलिक रथे बिदेस..
*
बाँग देही कुकराकस, जिनगी बन के छंद.
कुररी कस रोही 'सलिल', मावस दूबर चंद..
१६.४.२०१०
***
आरोग्य-आशा:
स्व. शान्ति देवी वर्मा के नुस्खे
पारंपरिक चिकित्सा-विधि
*
आपको ऐसे नुस्खे ज्ञात हों तो भेजें। इनका प्रयोग स्वविवेक से करें।
वायु भगाएँ दूर :
एक चुटकी अजवाइन में नीबू रस की कुछ बूँदें डालकर थोड़े से नमक के साथ मिलाकर रगड़ लें। आधा कप पानी के साथ सेवन करने पर कुछ देर बाद वायु निकलना प्रारम्भ हो जायेगी।
पांडु रोग / पीलिया :
अदरक की पतली-पतली फाँकें नीबू के रस में डूबा दें। इसमें अजवाइन के दाने तथा स्वाद के अनुसार नमक मिला दें. अदरक का रंग लाल होने पर तीन-चार बार सेवन करने पर पांडु रोग में लाभ होगा.
इसक् साथ रोज सवेरे तथा शाम को किसी बगीचे या मैदान में जहाँ खूब पेड़-पौधे हों घूमना लाभदायक है। बगीचे में खूब गहरी-गहरी साँसें लें ताकि अधिक से अधिक ओषजन वायु शरीर में पहुँचे।
जोड़ों का दर्द:
सरसों के तेल में लहसुन तथा अजवाइन दल कर आग पर गरम करें। लहसुन काली पड़ने पर ठंडा कर छान लें और किसी शीशी में भर लें। इसकी मालिश करते समय ठंडी हवा न लगे। धीरे-धीरे दर्द कम होकर आराम मिलेगा।
यह तेल कान के दर्द को भी दूर करेगा. दाद, खारिश, खुजली में इसके उपयोग से लाभ होगा. कब्ज से बचें तथा कढ़ी, चांवल जैसा वायु बढ़ने वाला आहार न लें.
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*सरस्वती वंदना* (*छत्तीसगढ़ी*)
देश के विकास बर सबन उजास बर, सुरसति दाई! माई!! दया बरसाय दे।
नवां नवां काम होय देश स्वर्ग धाम होय, धरती में धान बोय फसल उगाय दे।।
टूरा-टूरी गुनी होय मिहनती धुनी होय, जीवन जीने का सही सलीका सिखाए दे।
डौका-डौकी चाह पाल, हाथन में हाथ डाल डाल, ऊँचा ही रखे कपाल, रीत नव बनाय दे।।
(घनाक्षरी: ८-८-८-७ वर्णों पर यति)
***