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सोमवार, 22 जून 2026

पुरोवाक्, भक्ति गीतांजलि, शशि शर्मा

पुरोवाक्
भक्ति गीतांजलि : प्रभु को अर्पित भावांजलि
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
भक्ति काव्य और उसका अवदान 

            हिन्दी साहित्य के इतिहास के मध्यकाल को विद्वानों ने दो भागों में विभक्त किया है- पूर्व मध्यकाल तथा उत्तर मध्यकाल। पूर्व मध्यकाल का नामकरण विद्वानों ने भक्तिकाल किया है। चौदहवीं शताब्दी के बाद जो हिन्दी साहित्य रचा गया, उसमें अधिकांश साहित्य की मूल प्रेरणा भक्ति भावना रही। इस समय समाज में फैली संकीर्णता, कट्टरता, उच्छृंखलता, टकराव, बिखराव, हताशा तथा निराशा से समाज का बचाने का प्रयत्न भक्त कवियों ने भक्ति के माध्यम से किया। इस भक्ति भाव ने आगे युग चेतना का रूप धारण किया। भक्तिकाल के पदार्पण तक हिन्दी भाषा का रूप स्थापित होकर उसका साहित्य पंजाब से बंगाल और उत्तरांचल से आगे दक्षिण तक प्रसारित हो रहा था। वीरगाथा काल में जिन मुसलमान आक्रमणकर्ताओं से भारतीय जनता आतंकित हो रही थी, भक्तिकाल आते-आते वे विदेशी मुसलमान यहीं के हो चुके थे, शासकऔर शासित भी बन गए थे। सामान्य जनों के पास भक्ति से शक्ति प्राप्त करने और सामंजस्य स्थापित करने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं रह गया था। अमन परस्त यवन और नव मुस्लिम भारतीय रीति-रिवाजों का पालन करने लगे थे। हिन्दी मज़्लिन अपने उपास्य देवों की शरण में जाने के साथ-साथ एक दूसरे के इष्ट देवों को भी पूजने लगे थे। अनेक हिंदू सवारियाँ रखते, ईद और मुहर्रम मनाते तो अनेक मुस्लिम कृष्ण और राम के गीत गाते, देवी प्रतिमा अपने घरों में रखते और पूजते।


            भक्तिकाल के सभी कवियों ने गुरु-महिमा को अत्यधिक महत्व दिया है। कबीरदास ने तो गुरु-महिमा को सर्वाधिक स्थान देते हुए कहा-


गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पांय।

बलिहारी गुरु आपनी, गोविंद दियो बताय।।

            भक्त कवियों ने अपनी भक्तिमय काव्य साधना से अपने इष्टदेव रूपी लक्ष्य को प्राप्त करने का सतत और अथक प्रयास किया। नाम-महिमा, लोक-कल्याण, प्रेम-भावना, सामाजिक समरसता, पाखंड-निषेध आदि भक्ति काल की गीति रचनाओं का वैशिष्ट्य रहा कालांतर में दैन्य, समर्पण और मिलन का भाव अपने इष्ट के प्रति सीमित न रहकर अन्य देवी-देवताओं तक विस्तारित हुआ। इसमें मुख्य भूमिका गुरुओं और ग्रहणियों ने निभाई। गुरु को शिष्य और कन्याओं को ससुराल मूल से भिन्न दैवी स्वरूप की उपासक होने पर नए इष्ट के प्रति समर्पण भाव विकसित होने पर भी पुराने इष्ट को विस्मृत करना संभव न रहा। शैव,वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य आदि देवों की उपासना एक ही पूजाघर में होने लेगी। सूर और तुलसी के इष्ट राम और कृष्ण हर हिंदू के घर और अंतर्मन में बस गए। तुलसी ने शिव और राम को शिव एक दूसरे का इष्ट बनाकर सांस्कृतिक समन्वय को पुष्ट किया। यही नहीं यह भक्ति भाव धरती और राष्ट्र के साथ जुड़कर राष्ट्रीय भावधारा के साहित्य का जन्मदाता बना। भारत माता की संकल्पना अवधारणा बनकर हर भारतवासी को देश के लिए प्राणोत्सर्ग हेतु प्रेरित कर सकी। फलत:, देश स्वतंत्र हुआ।


भक्ति काव्य की भाषा

            भक्तिकालीन हिंदी काव्य की प्रमुख भाषा पछाँही, कौरवी, शौरसेनी, ब्रज, बुन्देली अवधी, और भोजपुरी है। सूरदास, तुलसीदास जगनिक और ईसुरी जैसे महान लोकप्रिय कवियों ने सांसारिकता और अलौकिकता का गंगो-जमुनी सम्मिश्रण करते हुए संस्कृत और स्थानीय भाषाओं-बोलियों का ऐसा प्रयोग किया कि उनमें भाषिक द्वैत समाप्त होकर पचमेल खिचड़ी की तरह सर्व स्वीकृत सरस स्वरूप बना। खड़ी बोली ने अपने उद्भव के साथ ही भारत की भाषिक विविधता को एकरूप में ढाला। फलत:, चैतन्य महाप्रभु, अमीर खुसरो, कबीर, गुरु नानक, मीरां, केशव आदि ही नहीं, तुकाराम, नामदेव, नरसिंह मेहता आदि भी हिन्दी के भक्ति काव्य के दैदीप्यमान नक्षत्र स्वीकारे गए।   

भक्ति काव्य रचनाओं का शिल्प और छंद 

            भक्ति साहित्य अनेक विधाओं और छंदों में लिखा गया है, किंतु गेयपद और दोहा-चौपाई में निबद्ध कड़वकबद्धता उसके प्रधान रचना रूप हैं। गेयपदों की परंपरा हिंदी में सिद्धों से प्रारंभ होती है। नामदेव, नानक, कबीर, सूर,रैदास, दादू, तुलसी, मीराबाई आदि ने गेयपदों में रचना की है। गेयपदों में काव्य और संगीत एक-दूसरे से घुल -मिल-से गए हैं। संभवत: ये कवि राग-रागिनियों को ध्यान में रखकर इन गेयपदों की रचना करते थे। गेयपदों की प्रारंभिक पंक्ति आवर्ती या टेक होती है अर्थात् वह केंद्रीय कथ्य होती है। बीच की पंक्तियों में उस कथ्य की व्याख्या होती है और अंतिम पंक्ति में रचनाकार अपना नाम डालकर गेयपद समाप्त करता है। वह अपने अनुभव से गेयपद के केंद्रीय कथ्य को सत्यापित करता है। भक्ति काव्य में चौपाई, दोहा, सोरठा,  रोला, माहिया, आल्हा, अभंग, सवैया, घनाक्षरी, गीतिका, हरिगीतिका आदि छंदों का प्रयोग प्रचुरता से हुआ। सूरदास के पद, गुरु नानक की बानी, कबीर की साखी आदि अपनी मिसाल आप है। 

भक्ति काव्य में अलंकार 

            अलंकार कविता-कामिनी के सौन्दर्य को बढ़ाने वाले तत्व  हैं।  कहा गया है - 'अलंकरोति इति अलंकारः' (जो अलंकृत करता है, वही अलंकार है।) भारतीय भक्ति साहित्य में प्रयुक्त प्रमुख अलंकार अनुप्रास, उपमा, रूपक, अनन्वय, यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा, संदेह, अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति आदि हैं। ये व्युत्पत्ति से उपमा आदि अलंकार कहलाते हैं। उपमा आदि के लिए अलंकार शब्द का संकुचित अर्थ में प्रयोग किया गया है। व्यापक रूप में सौंदर्य मात्र को अलंकार कहते हैं और उसी से काव्य ग्रहण किया जाता है। "काव्यं ग्राह्ममलंकारात्। सौंदर्यमलंकार:" - वामन। चारुत्व को भी अलंकार कहते हैं। (टीका, व्यक्तिविवेक)। भामह के विचार से वक्रार्थविजा एक शब्दोक्ति अथवा शब्दार्थवैचित्र्य का नाम अलंकार है। (वक्राभिधेतशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलं-कृति:।) रुद्रट अभिधान प्रकार विशेष को ही अलंकार कहते हैं। (अभिधानप्रकाशविशेषा एव चालंकारा:)। दंडी के लिए अलंकार काव्य के शोभाकर धर्म हैं (काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते)। सौंदर्य, चारुत्व, काव्यशोभाकर धर्म इन तीन रूपों में अलंकार शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में हुआ है और शेष में शब्द तथा अर्थ के अनुप्रासोपमादि अलंकारों के संकुचित अर्थ में। एक में अलंकार काव्य के प्राणभूत तत्व के रूप में ग्रहीत हैं और दूसरे में सुसज्जितकर्ता के रूप में। भक्ति काव्य में इष्ट के सौंदर्य, पराक्रम, दयालुता आदि के वर्णन हेतु अलंकारों का प्रयोग प्रचुरता से किया जाता है।

भक्ति गीतांजलि का प्रयोजन 

            उक्त पृष्ठभूमि में शीघ्र प्रकाश्य भक्ति काव्य धारा की कृति "भक्ति गीतांजलि'' का अवलोकन करना सुखद है। डॉ. शशि शर्मा की काव्य रचनाओं में उक्त विरासत के दर्शन सहज ही किए जा सकते हैं। शशि जी सुशिक्षित (अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, हिन्दी व संस्कृत में स्नातकोत्तर, एम.एड.तथा आयुर्वेद रत्न), सुरुचि संपन्न सुग्रहणी हैं। वे सामाजिक और सांस्कृतिक धरातल पर सतत सक्रिय हैं। वे विदुषी शिक्षिका भी रही हैं। भारतीय पुरुषार्थ चतुष्टय परंपरा आयु के चतुर्थ चरण का प्राप्य ''मोक्ष'' बताती है जिसकी राह भक्ति से होकर जाती है। शशि साधुवाद की पात्र हैं कि अंतरध्वनि तथा भक्ति गीतांजलि काव्य संग्रहों ए माध्यम से वे जीवन के आरंभ में मिले सात्विक संस्कारों को जीवन के मध्य में सहेजते हुए क्रमश: प्रगति-पथ पर अग्रसर हैं। 

            सामान्यत: साहित्य-सृजन मन-रंजनार्थ अथवा आत्म संतुष्टि हेतु किया जाता है। शशि जी द्वारा रचित भक्ति गीत साक्षी हैं कि वे लेखन कार्य को ''स्व'' तथा ''सर्व'' के उत्थान का कारक ही नहीं, उत्प्रेरक भी मानती हैं। शैशव में प्रस्फुटित, बचपन में अंकुरित, कैशौर्य में पल्लवित, यौवन में पुष्पित और वार्धक्य में फलित भक्ति-भाव की लता के सुफल समाज को देने का उदात्त भाव ही इन रचनाओं के सृजन और प्रकाशन का कारण है। ऐसी काव्य रचनाएँ लोकैषणा अथवा धन प्राप्ति हेतु सप्रयास नहीं की जातीं। ये रचनाएँ नर्मदा का अमला-धवला सलिल-धार की तरह अंतर्मन से स्वयमेव अवतरित होती हैं। इन भक्ति गीतों की भाव-धारा में अवगाहन किए बिना इनका रसास्वादन कर पाना और आनंद में सराबोर हो पाना संभव नहीं होता। भजनीक शशि स्वयं मानती हैं कि ये रचनाएँ केवल भक्ति और समर्पण का साक्ष्य हैं। 

            गोविंद के पहले गुरु के स्मरण की परंपर करते हुए शशि जी गुरु-वंदना नहीं भूलीं- 

मेरे गुरुवर कृपया बनाए रखना 

हमें स्वर व्यंजन का ज्ञान नहीं 

मात्राओं का भी भान नहीं 

ढाई अक्षर परेन पढ़ाए रखना 

            विघ्नेश्वर गणेश के पधारे बिना कोई शुभ कार्य कैसे हो सकता है- 

मेरे बिगड़े सुधारो काज, गणपति आ जाना  

            तुलसी दास जी ने लिखा है ''नारि न मोहि नारि कै रूपा'' किंतु यह सांसारिक संदर्भ में है। इन भजनों में अधिकांश नारी द्वारा नारी की ही उपासना है। आदि शक्ति के मातृ स्वरूप को आराधते हुए शशि मातृ-चरण में शयन को सौभाग्य मानती हैं- 

सौभाग्य है हम मात के चरणों में सो लिएss 

हम माँ के हो लिए sss हम माँ के हो लिए  

            शशि जी की आराध्या भवानी संसार से दूर नहीं, संसार में रहकर संसार के कार्य सुधारती हैं- 

अंबे मेरी जगतारिणी, दुनिया के सुधारे काज होs

            माँ दीन-दुर्बलों के प्रति विशेष दयावान हैं- 

निर्धन हो या बाँझ पुकारे 

माँ सबके शशि कष्ट निवारे 

देखा भक्तों ने तेरा चमत्कार रे! 

            माँ के प्रति भक्ति भाव भक्त को योग की राह पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है-  

तेरी जोगन बन जाऊँगी, मैया तोरे  दर्शन को निश-दिन आऊँगी 

न पहनूँ टीका न सोने का बेंदा चंदन का टीका लगाऊँगी

            मीरा की भक्ति धारा में बाधक स्वजन परिजन ही थे। यह परिदृश्य तब से अब तक नहीं बदला, बदलेगा भी नहीं। शशि मैया से ही व्यथा-कथा कहती हैं- 

सास ननद मैया ताने मारे 

ताने मारे मैया शोर मचावे 

छोड़ ललन कहँ जाए री 

मैया ऊँची अटरिया... 

            यहाँ 'मैया' के प्रयोग में श्लेष अलंकार दृष्टव्य है। माँ के पराक्रम का वर्णन की बिना संतान का मन न भरे, यह स्वाभाविक है। शशि लिखती हैं- 

मात की लीला तो अपंपार है, 

भक्तों का करती तू बेड़ा पार है

जब किया सुमिरन दुखों में मात को 

कर कृपा  सुनती वो आधी रात को  

            भक्ति गीतांजलि के कृष्ण भजनों में वात्सल्य, नटखटपन और उपालंभ आनंदप्रद है- 

बड़ो री शैतान मैया! कृष्ण कन्हाई 

नटखट लाला तेरो बड़ो हरजाई 

वरंदावन की कुंज गलिन में, बैठो राह निकारे 

गुजरेंगीं जब बाँकी गुजरिया, छुप-छुप कंकण मारे 

फोड़े री मटकिया, दध-माखन खाई 

            श्री राम भारत के हर सनातन घर में मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में विराजमान हैं। राम मंदिर बनने की प्रसन्नता एक भजन में अभिव्यक्त हुई है- 

सजी है अयोध्या, श्री राम जी हैं आए 

बड़े भाग्य हमने दर्शन जो पाए

            भक्ति भाव धारा का राष्ट्रीय भाव धारा से संगम ''हिंदू राष्ट्र'' शीर्षक रचना में है-  

बन जैहे हिंदू राष्ट्र सबई संतों ने करी है तैयारी 

            इस रचना का वैशिष्ट्य है कि हिंदू राष्ट्र निर्माण का श्रेय किसी राजनेता, आंदोलन या राजनैतिक दल को न देते हुए संतों को दिया गया है किंतु हिंदू राष्ट्र निर्माण के लिए आजीवन अन्न और नमक ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा करने और निभाने तथा गौ हत्या बंद करने के लिए सकल भारत में अनशन करने वाले स्वामी रामचन्द्र शर्मा 'वीर' (आचार्य धर्मेन्द्र के पिता), हिंदू राष्ट्र के लिए त्याग करने वाले करपात्री जी आदि का स्मरण सोने में सुहाग होता। 

            जगतपिता-जगतमाता शिव-पार्वती के विवाह का प्रसंग भक्तों का मन मोहता है- 

आज गौरा को बिहाने चले हैं भोलेनाथ 

शीश चंद्रमा गंग बिराजे, जटाओं में रहीं समाय 

चंदन और त्रिपुण्ड तिलक कर मृगछाला लपटाय 

अंग भभूत रमाय लिए हैं, डमरू त्रिशूल है हाथ 

            भक्ति गीतांजलि का वैशिष्ट्य वीरांगना-वंदन है। नारी भारत की शान शीर्षक रचना पारंपरिक भक्ति गीत न होते हुए भी राष्ट्र-भक्ति परक भजनों का नवाचार है। शिक्षिका के नाते शशि जी ने अनेक नवाचार की होंगे, भजनीक के नाते यह नवाचार स्वागतेय है- 

नारी भारत की शान रही 

है शक्ति अपार महान रही 

            इस रचना में सीता जी, अहल्याबाई, लक्ष्मीबाई, जीजा बाई, दुर्गावती आदि से लेकर भारतीय स्वतंत्रता सत्याग्रह में सम्मिलित नारी रत्नों को स्मरण  किया गया है। यदि महादेवी जी जैसे साहित्यकार, इसरो के चंद्र विजय अभियान में संलग्न वैगणिक महिलाओं को जोड़ा जा सकता तो उत्तम होता। 

            सारत: यह निस्संकोच कहा जा सकता है की शशि जी ने भक्ति काव्य के आकाश में आपनी कारयित्री ज्योत्सना की आभा सफलतापूरवाक बेकहेरी है। इस भक्ति गीत संग्रह में भक्ति गीतों की भावधारा के नए आयामों का संकेत समाहित होना ही इसकी सफलता है। मुझे विश्वास है कि यह कृति भविष्य में कई कर्तियों की प्रेरणा स्तोत्र बनेगी। 

***

संपर्क- विश्ववाणी हिन्दी संस्थान अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१ 

चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com

जून २२, बरसाती जंगल दिवस, सॉनेट, न्याय प्रक्रिया, कहमुकरी, सड़गोड़ासनी, सरस्वती, अभियंता, सवैया

 सलिल सृजन जून २२

बरसाती जंगल दिवस
*
ग़ज़लिका १ ० सीधी अँगुली घी न निकलता है प्यारे! हर जसुदा को लगे लला उसके न्यारे . हो जिसका नापाक इरादा, वह खुद ही हारा करता हिम्मत, खुद को खुद मारे . भक्त लूट ले मंदिर तो अचरज मत कर उसे पता प्रभु भटक रहे द्वारे-द्वारे . सूर निहारें लीला प्रभु की बिन नैना नैना रोएँ प्रभु आ दरस दिखा जा रे! . रहना है बेदाग अगर तो गुर सीखो आपस में मिल बाँट माल गुपचुप खा रे! ००० ग़ज़लिका २ ० भीतर से तो हम सब बिखरे-बिखरे हैं। हैं ढपोरशंखी कहलाते चतुरे हैं।। . पंक लपेटे मुख पर बनते हैं पंकज लेकिन दिखा रहे सबको हम निखरे हैं।। . छुट्टे सिक्के लिए फिरें बाजारों में। सौदागर हैं छुरे लिए हम बकरे हैं।। . आशाओं ने भाषाओं को बदल दिया। तन से नहीं जवान, न मन से डुकरे हैं।। . मीमांसाकारों को पढ़कर बड़े हुए। जो कुछ लिखा-कहा वह सब तो फिकरे हैं।। . मनमानी कर कहते हैं मन की बातें। समझ सके जो वे सज्जन जन सिहरे हैं।। . ऊपर ऊपर तैर रहे हो भेंट चढ़ा। गोलमाल करते जो उतरे गहरे हैं।। . रामालय को लूटालय में बदल दिया। हैं अंगद के पाँव, न सुनते बहरे हैं।। . जाँच कमेटी में भी भक्त हमीं से हैं। बहता सलिल न निर्मल, चंपत ठहरे हैं।। २२.६.२०२६ ०००
सॉनेट
खत्म नहीं जिज्ञासा होती
हर जिज्ञासु अमर होता
ज्ञान समुद में खाता गोता
मति निकाल लाती मोती।
आशा नव सपने बोती
पौरुष नहीं हारकर रोता
धैर्य नहीं विपदा में खोता
पंक सलिल-धारा धोती।
सरगम लय-रस ताना-बाना
शब्द भाव के रंग चढ़ाए
निशि नित चादर बुने मौन रह।
कहे कबीर न जोड़-बचाना
खाली हाथों आए-जाए
रहा हमेशा कभी कौन कह?
२२.६.२०२५
०0०
ग़ज़लिका
भोर भई सूरज टेरत रे!
उसा बुलाउत पथ हेरत रे!
.
छिमा माँग भू माँ पे पग धर
बिलम नें कर आलस घेरत रे!
.
बगुला भगत बजाउत घंटी
भोग तके, माला फेरत रे!
.
आस किरन कुररी की नाईँ
अँधियारा लोफर छेरत रे!
.
'सलिल' दनादन भोग गटक खें
भगतन खौं ठाकुर पेरत रे!
२२.६.२०२५
०0०
विमर्श:
न्याय प्रक्रिया बदलाव जरूरी
*
न्याय क्या?
निर्बल-असहाय को उसका अधिकार दिलाना।
देनेवाला- न्यायाधीश
माध्यम- अधिवक्ता
प्रक्रिया- वाद स्थापित करना।
सुलभता नहीं, सहजता नहीं, सरलता नहीं।
अत्यंत खर्चीली, समयखाऊ, जटिल, उलझन भरी, कानूनी दाँव-पेंच में सत्य की हत्या।
वकालतनामा- मुवक्किल से सभी अधिकार छीनकर वकील को देता है।
वकील मनमानी करता है। फीस लेकर भी पेशी पर नहीं जाता, तारीख बढ़ना कर बार-बार पैसे माँगता है, वाद के सत्य को छिपाकर जीत के लिए झूठे साक्ष्य और साक्षी गढ़कर न्यायालय की आँख में धूल झोंकता है।
कोढ़ में खाज यह कि मुवक्किल के हित संरक्षण के स्थान पर वकील और न्यायपालिका अपने संरक्षण की माँग करते हैं।
अनेक असामाजिक तत्व वकील बन गए हैं जो न्याय पालिका और मुवक्किल दोनों में दहशत फैलाते हैं।
सड़-गल रही व्यवस्था बदलें।
न्याय प्राप्ति के लिए वकील की आवश्यकता समाप्त की जाए।
जूरी प्रणाली लागू की जाए। वाद स्थापित करते समय ही वादी पूरा घटनाक्रम और दस्तावेज न्यायालय और प्रतिवादी को दे। प्रतिवादी अपना उत्तर न्यायालय व वादी को निर्धारित समय सीमा में उपलब्ध कराए। पहली पेशी में जूरी दोनों को सुनकर शेष दस्तावेज या साक्षी प्रस्तुत करने हेतु दूसरी पेशी दे। सामान्य प्रकरणों में तीसरी, महत्वपूर्ण प्रकरणों में पाँचवी पेशी में फैसला हो। न्यायडीश की सहायता के लिए वकील जूरी सदस्य हो जीसे मानदेय/भत्ता मिले। वादी-प्रतिवादी जूरी शुल्क न्यायालय में जमा करें, वकील को फीस न दें।
इससे न्याय प्रक्रिया सरल, सस्ती, सुलभ, शीघ्र तथा निष्पक्ष होगी।
कुछ वर्षों में वाद प्रकरणों के अंबार कम और समाप्त होने लगेंगे।
२२.४.२०२३
***
कविता के शब्द
यदि "आपके दिमाग़ में कविता के शब्द उस तरह नहीं आते हैं जैसे पेड़ों पर पत्ते, तो बेहतर होगा कि आप कविता लिखने के बारे में सोचें ही नहीं। यानी अच्छी कविता वही लिख सकते हैं जिन्हें कविता के शब्द सोचने की ज़रूरत न पड़े । वे ख़ुद-ब-ख़ुद आने शुरू हो जाएँ और कविता बनती जाए ।"
- जाॅन कीट्स
कथा लिखती हूँ इतिहास नहीं
"मैंने जितना भी लिखा है शत-प्रतिशत मेरा भोगा हुआ यथार्थ है, यह मैं नहीं कह सकती क्योंकि मैं कथा लिखती हूँ, इतिहास नहीं । मेरा काम है कहानी को ढूँढ़ना, किन्तु अगाध जलराशि से इस कथा-मीन को पकड़ने में केवल कल्पना के काँटे से ही काम नहीं चलता, यथार्थ के आटे की गोली भी उतनी ही आवश्यक होती है।"
- शिवानी (रमेश बतरा/सतीश चंद्र धींगड़ा के किसी प्रश्न पर - 1983)
*
कहमुकरी
जिसने जन्म दिया पाला है
कदम-कदम देखा-भाला है
जिसका सिर पर हाथ हमेशा
क्या सखि! दाता?
ना सखि पिता।
थाम कलाई नाजुक कोमल
बात करे मुस्काकर पल-पल
मैं न सकी उसको फटकार
क्या सखि सजना?
ना, मनिहार।
जैसे ही आए, छा जाए
बिना कारण ही शोर मचाए
पड़े न उसको पल भर कल
क्या सखि प्रियतम?
न, सखी बादल।
पता नहीं पड़ती गहराई
रौद्र नहीं, छवि शांत सुहाई
दे उपहार न पूर्व बताकर
सखि! घरवाला
नहिं रत्नाकर।
जब मिलती तभी मिलता चैन
मिलती नहीं तो मन बेचैन
अँखियों को भाए ज्यों सखियाँ
उत्तर बिंदिया?
नहिं सखी निंदिया।
याद भुलाए से नहिं भूले
पलक बंद नैनों में झूले
संग सेज पर आए, भाए
यारां बन्नी?
ना रे! निन्नी।
बीन बिना वह बीन बजा ले
गैरों से अपनापन पाले
नहीं तनिक भी रखता अंतर
बूझूँ? मच्छर
ना रे! झींगुर।
बिन मंडप वह डाले फेरे
मंत्र पढ़े, सजनी को टेरे
भैंस बराबर उसको अक्षर
लालबुझक्कड़?
नहिं रे मच्छर।
बिन चेताए करता हमला
रोक न पाता कोई अमला
बिन कारण होता हमलावर
पाक-चाइना?
ना सखि! मच्छर।
जब बोले तब मन को भाए
मौन रहे तो याद न जाए
पंथ हेर मन होता बेकल
क्या वह नूपुर?
ना रे हूटर।
सचमुच है वह बिल्कुल अपना
नाप न पाता कोई नपना
जब दिखता तब बहुत लुभाता
गुइयाँ सजना?
ना सखि! सपना।
स्वप्न दिखाकर तोड़ा करता
मँझधारों में छोड़ा करता
करा न कहता, कहा न करता
समझी, बेटा
ना सखि! नेता।
२२-६-२०२२
•••
मैया शारदे! पत रखियो
*
छंद - सड़गोड़ासनी।
पद - ३, मात्राएँ - १५-१२-१५।
पहली पंक्ति - ४ मात्राओं के बाद गुरु-लघु अनिवार्य।
गायन - दादरा ताल ६ मात्रा।
*
मैया शारदे! पत रखियो
मोखों सद्बुधि दइयो
मैया शारदे! पत रखियो
जा मन मंदिर मैहरवारी
तुरतइ आन बिरजियो
मैया शारदे! पत रखियो
माया-मोह राच्छस घेरे
झट सें मार भगइयो
मैया शारदे! पत रखियो
अनहद नाद सुनइयो माता!
लागी नींद जगइयो
मैया शारदे! पत रखियो
भासा-आखर-कवित मोय दो
लय-रस-भाव लुटइयो
मैया शारदे! पत रखियो
मात्रा-वर्ण; प्रतीक बिम्ब नव
अलंकार झलकइयो
मैया शारदे! पत रखियो
२५-११-२०१९
***
शारद वंदन
*
बीना लेकर प्रगट हों, बीनावादिनी साथ
कृपा कोर कर हो सदय, रखो सीस पै हाथ
मोरी मति चकरानी है, ऐ मैया! मोए बचा लइयो
मो खों गैल भुलानी है, ऐ मैया! पार लगा दइयो
जनम-जनम की मैली चादर
रीती सत करमन की गागर
सदय नईं नटराज हो रए
दया नईँ कर रए नटनागर
प्रभु की कृपा करानी है, रमा-उमा लै आ जइयो
तनक न जानौं पूजन-वंदन
नईँ जुट रए अच्छत्-चंदन
प्रगट नें होते चित्रगुप्त जू
सदय नें होते गिरिजानंदन
दरसन की जिद ठानी है, ऐ मैया! दरस दिला दइयो
सारद! हंसबाहिनी माता
सकल भुवन तुमरे जस गाता
नीर-छीर मति दो ममतामई!
कलम लए कर रऔ जगराता
अलंकार रस छंद न जानूँ, भगतें सुझा लिखा लइयो
११-६-२०२०
***
शारद वंदना
सतमात्रिक नवान्वेषित छंद
सूत्र : ननल।
*
सुर सति नमन
नित कर अमन
*
मुख छवि प्रखर
स्वर-ध्वनि मधुर
अविचल अजर
अविकल अमर
कर नव सृजन
सुरसति नमन
*
पद दल असुर
रच पद स-सुर
कर जननि घर
मम हृदयपुर
कर गह सु मन
सुरसति नमन
*
रस बन बरस
नित धरणि पर
शुभ कर मुखर
सुख रच प्रचुर
शुभ मृदु वचन
सुरसति नमन
२२-६-२०२०
***
त्रिअष्टक सवैया
गणसूत्र - जरज रजर जर।
वर्ण यति - ८-८-८ ।
मात्रा यति - १२-१२-१२।
*
तलाशते रहे कमी, न खूबियाँ निहारते, प्रसन्नता कहाँ मिले?
विरासतें रहे हमीं, न और को पुकारते, हँसी-खुशी कहाँ मिले?
बटोरने रहे सदा, न रंकबंधु हो सके, न आसमां-जमीं मिले।
निहारते रहे छिपे, न मीत प्रीत पा सके, मिले- कभी नहीं मिले ।
२२-६-२०१९
९४२५१८३२४४
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हम अभियंता...
*
हम अभियंता!, हम अभियंता!!
मानवता के भाग्य-नियंता...
*
माटी से मूरत गढ़ते हैं,
कंकर को शंकर करते हैं.
वामन से संकल्पित पग धर,
हिमगिरि को बौना करते हैं.
नियति-नटी के शिलालेख पर
अदिख लिखा जो वह पढ़ते हैं.
असफलता का फ्रेम बनाकर,
चित्र सफलता का मढ़ते हैं.
श्रम-कोशिश दो हाथ हमारे-
फिर भविष्य की क्यों हो चिंता...
*
अनिल, अनल, भू, सलिल, गगन हम,
पंचतत्व औजार हमारे.
राष्ट्र, विश्व, मानव-उन्नति हित,
तन, मन, शक्ति, समय, धन वारे.
वर्तमान, गत-आगत नत है,
तकनीकों ने रूप निखारे.
निराकार साकार हो रहे,
अपने सपने सतत सँवारे.
साथ हमारे रहना चाहे,
भू पर उतर स्वयं भगवंता...
*
भवन, सड़क, पुल, यंत्र बनाते,
ऊसर में फसलें उपजाते.
हमीं विश्वकर्मा विधि-वंशज.
मंगल पर पद-चिन्ह बनाते.
प्रकृति-पुत्र हैं, नियति-नटी की,
आँखों से हम आँख मिलाते.
हरि सम हर हर आपद-विपदा,
गरल पचा अमृत बरसाते.
'सलिल' स्नेह नर्मदा निनादित,
ऊर्जा-पुंज अनादि-अनंता...
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विमर्श
प्रश्न: भारतीय बोलियाँ हिंदी का हिस्सा हैं या नहीं?
हिस्सा हैं तो अलग मान्य क्यों?,
हिस्सा नहीं हैं तो उनके साहित्यकारों को हिंदी का माना जाए या नहीं??
*
भारत की सभी बोलियाँ भाषाएँ हिंदी की बहनें हैं. विद्यापति भारत और हिंदी के भी हैं. आपस में फूट डालने का कार्य निंदनीय है. सूर को ब्रज, तुलसी को अवधी, जगनिक और ईसुरी को बुंदेली, चंद बरदाई को राजस्थानी, खुसरो-कबीर को उर्दू का कवि बताकर हिंदी को विपन्न करने की दुर्बुद्धि हमें कदापि स्वीकार्य नहीं है. हम हिंदीभाषी तो भारत की हर भाषा और बोली के हर रचनाकार को अपनाते हैं. हिंदी महासागर है. होना तो यह चाहिए कि हर भाषा बोली के सामान्य प्रयोग में आनेवाले शब्द हिंदी शब्दकोष में उसी तरह सम्मिलित किये जाएँ जैसे अंग्रेजी विश्व की विविध भाषाओँ के शब्द लेती है. भारत की सब भाषाओँ केबहु उपयोगी शब्दों से समृद्ध हिंदी उन्हें तभी अपनी लगेगी जब हिंदी में वे अपने शब्द भी पायेंगे. आवश्यकता डॉ. प्रभाकर माचवे जैसे बहुभाषा-बोलीविद होने की है. सब एक-दुसरे की बोलीओं में लिखें. साहित्यकार को राजनीति में पड़ने की कोई जरूरत नहीं है. सियासत सिया के सत से पूरी तरह दूर है. साहित्यकार शब्द-सेतु बनाकर ही सद्भावना-सेतु बना सकेगा.
२२-६-२०१७
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विमर्श :
हिंदी की शब्द सलिला
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आजकल हिंदी विरोध और हिनदी समर्थन की राजनैतिक नूराकुश्ती जमकर हो रही है। दोनों पक्षों का वास्तविक उद्देश्य अपना राजनैतिक स्वार्थ साधना है। दोनों पक्षों को हिंदी या अन्य किसी भाषा से कुछ लेना-देना नहीं है। सत्तर के दशक में प्रश्न को उछालकर राजनैतिक रोटियाँ सेंकी जा चुकी हैं। अब फिर तैयारी है किंतु तब आदमी तबाह हुआ और अब भी होगा। भाषाएँ और बोलियाँ एक दूसरे की पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं। खुसरो से लेकर हजारीप्रसाद द्विवेदी और कबीर से लेकर तुलसी तक हिंदी ने कितने शब्द संस्कृत. पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, बुंदेली, भोजपुरी, बृज, अवधी, अंगिका, बज्जिका, मालवी निमाड़ी, सधुक्कड़ी, लश्करी, मराठी, गुजराती, बांग्ला और अन्य देशज भाषाओँ-बोलियों से लिये-दिये और कितने अंग्रेजी, तुर्की, अरबी, फ़ारसी, पुर्तगाली आदि से इसका कोई लेख-जोखा संभव नहीं है.
इसके बाद भी हिंदी पर संकीर्णता, अल्प शब्द सामर्थ्य, अभिव्यक्ति में अक्षम और अनुपयुक्त होने का आरोप लगाया जाना कितना सही है? गांधी जी ने सभी भारतीय भाषाओँ को देवनागरी लिपि में लिखने का सुझाव दिया था ताकि सभी के शब्द आपस में घुलमिल सकें और कालांतर में एक भाषा का विकास हो किन्तु प्रश्न पर स्वार्थ की रोटी सेंकनेवाले अंग्रेजीपरस्त गांधीवादियों और नौकरशाहों ने यह न होने दिया और ७० के दशक में हिन्दीविरोध दक्षिण की राजनीति में खूब पनपा।
संस्कृत से हिंदी, फ़ारसी होकर अंग्रेजी में जानेवाले अनगिनत शब्दों में से कुछ हैं: मातृ - मातर - मादर - मदर, पितृ - पितर - फिदर - फादर, भ्रातृ - बिरादर - ब्रदर, दीवाल - द वाल, आत्मा - ऐटम, चर्चा - चर्च (जहाँ चर्चा की जाए), मुनिस्थारि = मठ, -मोनस्ट्री = पादरियों आवास, पुरोहित - प्रीहट - प्रीस्ट, श्रमण - सरमन = अनुयायियों के श्रवण हेतु प्रवचन, देव-निति (देवों की दिनचर्या) - देवनइति (देव इस प्रकार हैं) - divnity = ईश्वरीय, देव - deity - devotee, भगवद - पगवद - pagoda फ्रेंच मंदिर, वाटिका - वेटिकन, विपश्य - बिपश्य - बिशप, काष्ठ-द्रुम-दल(लकड़ी से बना प्रार्थनाघर) - cathedral, साम (सामवेद) - p-salm (प्रार्थना), प्रवर - frair, मौसल - मुसल(मान), कान्हा - कान्ह - कान - खान, मख (अग्निपूजन का स्थान) - मक्का, गाभा (गर्भगृह) - काबा, शिवलिंग - संगे-अस्वद (काली मूर्ति, काला शिवलिंग), मखेश्वर - मक्केश्वर, यदु - jude, ईश्वर आलय - isreal (जहाँ वास्तव इश्वर है), हरिभ - हिब्रू, आप-स्थल - apostle, अभय - abbey, बास्पित-स्म (हम अभिषिक्त हो चुके) - baptism (बपतिस्मा = ईसाई धर्म में दीक्षित), शिव - तीन नेत्रोंवाला - त्र्यम्बकेश - बकश - बकस - अक्खोस - bachenelion (नशे में मस्त रहनेवाले), शिव-शिव-हरे - सिप-सिप-हरी - हिप-हिप-हुर्राह, शंकर - कंकर - concordium - concor, शिवस्थान - sistine chapel (धर्मचिन्हों का पूजास्थल), अंतर - अंदर - अंडर, अम्बा- अम्मा - माँ मेरी - मरियम आदि।
हिंदी में प्रयुक्त अरबी भाषा के शब्द : दुनिया, ग़रीब, जवाब, अमीर, मशहूर, किताब, तरक्की, अजीब, नतीज़ा, मदद, ईमानदार, इलाज़, क़िस्सा, मालूम, आदमी, इज्जत, ख़त, नशा, बहस आदि ।
हिंदी में प्रयुक्त फ़ारसी भाषा के शब्द : रास्ता, आराम, ज़िंदगी, दुकान, बीमार, सिपाही, ख़ून, बाम, क़लम, सितार, ज़मीन, कुश्ती, चेहरा, गुलाब, पुल, मुफ़्त, खरगोश, रूमाल, गिरफ़्तार आदि ।
हिंदी में प्रयुक्त तुर्की भाषा के शब्द : कैंची, कुली, लाश, दारोगा, तोप, तलाश, बेगम, बहादुर आदि ।
हिंदी में प्रयुक्त पुर्तगाली भाषा के शब्द : अलमारी, साबुन, तौलिया, बाल्टी, कमरा, गमला, चाबी, मेज, संतरा आदि ।
हिंदी में प्रयुक्त अन्य भाषाओ से: उजबक (उज्बेकिस्तानी, रंग-बिरंगे कपड़े पहननेवाले) = अजीब तरह से रहनेवाला,
हिंदी में प्रयुक्त बांग्ला शब्द: मोशाय - महोदय, माछी - मछली, भालो - भला,
हिंदी में प्रयुक्त मराठी शब्द: आई - माँ, माछी - मछली,
अपनी आवश्यकता हर भाषा-बोली से शब्द ग्रहण करनेवाली व्यापक में से उदारतापूर्वक शब्द देनेवाली हिंदी ही भविष्य की विश्व भाषा है इस सत्य को जितनी जल्दी स्वीकार किया जाएगा, भाषायी विवादों का समापन हो सकेगा।
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गीत
अपने अम्बर का छोर
*
मैंने थाम रखी
अपनी वसुधा की डोर
तुम थामे रहना
अपने अंबर का छोर.…
*
हल धर कर
हलधर से, हल ना हुए सवाल
पनघट में
पन घट कर, पैदा करे बवाल
कूद रहे
बेताल, मना वैलेंटाइन
जंगल कटे,
खुदे पर्वत, सूखे हैं ताल
पजर गयी
अमराई, कोयल झुलस गयी-
नैन पुतरिया
टँगी डाल पर, रोये भोर.…
*
लूट सिया-सत
हाय! सियासत इठलायी
रक्षक पुलिस
हुई भक्षक, शामत आयी
अँधा तौले
न्याय, कोट काला ले-दे
शगुन विचारे
शकुनी, कृष्णा पछतायी
युवा सनसनी
मस्ती मौज मजा चाहें-
आँख लड़ायें
फिरा, न पोछें भीगी कोर....
*
सुर करते हैं
भोग प्रलोभन दे-देकर
असुर भोगते
बल के दम पर दम देकर
संयम खो,
छलकर नर-नारी पतित हुए
पाप छिपायें
दोष और को दे-देकर
मना जान की
खैर, जानकी छली गयी-
चला न आरक्षित
जनप्रतिनिधि पर कुछ जोर....
*
सरहद पर
सर हद करने आतंक डटा
दल-दल का
दलदल कुछ लेकिन नहीं घटा
बढ़ी अमीरी
अधिक, गरीबी अधिक बढ़ी
अंतर में पलता
अंतर, बढ़ नहीं पटा
रमा रमा में
मन, आराम-विराम चहे-
कहे नहीं 'आ
राम' रहा नाहक शोर....
*
मैंने थाम रखी
अपनी वसुधा की डोर
तुम थामे रहना
अपने अंबर का छोर.…
२२-६-२०१४
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सनातन साहित्य : वेद, पुराण स्मृतियाँ
हमारा पारम्परिक सनातन साहित्य विश्व मानवता की अमूल्य धरोहर है. इसकी एक झलका निम्न है। इस में आप भी अपनी जानकारी जोड़िये:
*
वेद हमारे धर्मग्रन्थ हैं । वेद संसार के पुस्तकालय में सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं । वेद का ज्ञान सृष्टि के आदि में परमात्मा ने अग्नि , वायु , आदित्य और अंगिरा – इन चार ऋषियों को एक साथ दिया था । वेद मानवमात्र के लिये हैं ।
वेद चार हैं ----
१. ऋग्वेद – इसमें तिनके से लेकर ब्रह्म – पर्यन्त सब पदार्थो का ज्ञान दिया हुआ है । इसमें १०,५२२ मन्त्र हैं ।
२. यजुर्वेद – इसमें कर्मकाण्ड है । इसमें अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन है । इसमें १,९७५ मन्त्र हैं ।
३. सामवेद – यह उपासना का वेद है । इसमें १,८७५ मन्त्र हैं ।
४. अथर्ववेद – इसमें मुख्यतः विज्ञान – परक मन्त्र हैं । इसमें ५,९७७ मन्त्र हैं ।
उपवेद – चारों वेदों के चार उपवेद हैं । क्रमशः – आयुर्वेद , धनुर्वेद , गान्धर्ववेद और अर्थवेद ।
वेदांग - ज्योतिष: नेत्र (सौरमंडल, मुहूर्त आदि), निरुक्त, कान: (वैदिक शब्द-व्याख्या आदि), शिक्षा: नासिका ( वेद मंत्र उच्चारण), व्याकरण: मुख (वैदिक शब्दार्थ), कल्प: हाथ (सूत्र / कल्प साहित्य- धर्म सूत्र: वर्ण, आश्रम आदि, श्रोत सूत्र: वृहद यज्ञ विधान, गृह्य सूत्र: लघु यज्ञ विधान, संस्कार, शुल्व सूत्र: वेदी निर्माण), छंद: पैर (काव्य लक्षण, आदि) ।
पुराण - मुख्य १८ ब्रम्ह, पद्म, विष्णु, शिव, नारदीय, श्रीमद्भागवत, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रम्हवैवर्त, लिंग, वाराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़, वायु (ब्रम्हांड) । स्कंद पुराण का एक भाग नर्मदापुराण के नाम से प्रकाशित है। सेठ गोविन्ददास ने गांधी पुराण लिखा किन्तु वह इस श्रेणी में नहीं है।
उपनिषद – अब तक प्रकाशित होने वाले उपनिषदों की कुल संख्या २२३ है , परन्तु प्रामाणिक उपनिषद ११ ही हैं । इनके नाम हैं --- ईश , केन , कठ , प्रश्न , मुण्डक , माण्डूक्य , तैत्तिरीय , ऐतरेय , छान्दोग्य , बृहदारण्यक और श्वेताश्वतर ।
ब्राह्मण ग्रन्थ – इनमें वेदों की व्याख्या है । चारों वेदों के प्रमुख ब्राह्मणग्रन्थ ये हैं ---
ऐतरेय , शतपथ , ताण्ड्य और गोपथ ।
दर्शनशास्त्र – आस्तिक दर्शन छह हैं – न्याय , वैशेषिक , सांख्य , योग , पूर्वमीमांसा और वेदान्त ।
स्मृतियाँ – स्मृतियों की संख्या ६५ है। मुख्य १८ स्मृतियाँ मनु, याज्ञवल्क्य, अत्रि, विष्णु, अंगिरस, यम, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शंख, दक्ष, गौतम, शातातप तथा वशिष्ठ रचित हैं।
इनके अतिरिक्त आरण्यक, विमानशास्त्र आदि अनेक ग्रन्थ हैं।
२२-६-२०१४
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रविवार, 21 जून 2026

जून २१, योग दिवस, महाभारत में व्यूह, लघुकथा, सदोका, दोहा, महाकाव्य, नवगीत, दाँत, पिता

सलिल सृजन जून २१

दोहा सलिला ० योग एक अरु एक का, दो नहिं ग्यारह मान। योग 'सलिल' सार्थक तभी, जब हो कीर्ति वितान।। ० योग दिवस से दूर रह, आ न जाए आयोग। आए तो जाए नहीं, है असाध्य दुर्योग।। ० योग दिवस पर भोग कर, भूल भुला दे जोग। प्रभु प्रसन्न होते नहीं, जब तक लगे न भोग।। ० योग दिवस पर कर रहे, भोर प्रदर्शन लोग। गुणा-भाग से कर रहे, शेष दिवस संभोग।। ० सुबह योग के नाम है, दिन भर काम तमाम। सांझ उतार थकान दें, रात करें आराम।। योग दिवस २०२६ ०००

दोहा सलिला ० योग एक अरु एक का, दो नहिं ग्यारह मान। योग 'सलिल' सार्थक तभी, जब हो कीर्ति वितान।। ० योग दिवस से दूर रह, आ न जाए आयोग। आए तो जाए नहीं, है असाध्य दुर्योग।। ० योग दिवस पर भोग कर, भूल भुला दे जोग। प्रभु प्रसन्न होते नहीं, जब तक लगे न भोग।। ० योग दिवस पर कर रहे, भोर प्रदर्शन लोग। गुणा-भाग से कर रहे, शेष दिवस संभोग।। ० सुबह योग के नाम है, दिन भर काम तमाम। सांझ उतार थकान दें, रात करें आराम।। योग दिवस ०००

विश्व योग दिवस
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महाभारत में व्यूह रचना
कुरुक्षेत्र में रचे गए कुछ प्रमुख व्यूह: चक्रव्यूह, गरुड़ व्यूह, क्रौंच व्यूह, मकर व्यूह, कच्छप व्यूह, अर्धचंद्राकार व्यूह, वज्र व्यूह, सर्वतोभद्र व्यूह, श्रीन्गातका व्यूह आदि थे।
गरुड़ व्यूह
महाभारत युद्ध में कौरव सेना की ओर से सेनापति भीष्म पितामह ने गरुड़ व्यूह की रचना की थी। वे स्वयं इसके अग्र स्थान पर थे। गरुड़ व्यूह भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के आकार में रचा गया था। इसी आकार में कौरवों की सेना ने पांडवों पर आक्रमण किया था। जिस तरह गरुण अपनी चोंच से प्रहार करता है वैसे ही सर्वाधिक घटक प्रहार भीष्म कर रहे थे। गरुण के पंखों की तरह दायें-बायें पक्ष से शेष योद्धा भीष्म को मदद कर रहे थे
अर्ध चंद्र व्यूह
अर्धचंद्र व्यूह
कौरव सेना के गरुड़ व्यूह के जवाब में पांडव पक्ष से अर्जुन ने अर्धचंद्र व्यूह की रचना की थी। अर्धचंद्र अर्थात आधे चंद्र के आकार के इस व्यूह में सबसे आगे सर्वाधिक पराक्रमी योद्धा अर्जुन ने आक्रमण की बागडोर थाम रखी थी। मध्य भाग में पांडव पक्ष के सेनापति युधिष्ठिर थे जो कि कमजोर योद्धा थे किंतु ज्येष्ठ पांडव और सेनापति होने के नाते उनकी सुरक्षा सर्वोपरि थी। शत्रु युधिष्ठिर पर हमला करने के पूर्व अर्जुन से लड़ना पड़ता और दाहिने-बायें लड़ रहे योद्धा युधिष्ठिर की रक्षा हेतु बीच में आ जाते। अर्धचंद्र व्यूह से ही पांडवों ने कौरवों के गरुड़ व्यूह को कड़ी चुनौती दी थी। कौरव पक्ष किसी भी तरह युधिष्ठिर को बंदी बनाकर पांडवों को पराजित करना चाहता ठा किंतु पांडवों ने शत्रु की यह चाल नाकाम कार दी थी।
क्रौंच व्यूह
क्रौंच व्यूह
महाभारत युद्ध में क्रौंच व्यूह की रचना पांडवों और कौरवों, दोनों के द्वारा अलग-अलग समय पर की गई थी। क्रौंच एक पक्षी का नाम है। यह सारस की प्रजाति का होता है। इसी क्रौंच पक्षी के आकार में सेना सज गई थी और पांडवों ने कौरव सेना पर आक्रमण किया था। इस क्रौंच व्यूह में सिर, आँख, गर्दन, पंख आदि अंगों पर अलग-अलग महारथी अपनी-अपनी सेना के साथ तैनात थे। सभी महारथियों ने क्रौंच व्यूह में अपने-अपने क्षेत्र की सुरक्षा करते हुए सामने वाली सेना पर आक्रमण किया। यह व्यूह बहुत ताकतवर और सुरक्षा की दृष्टि से श्रेष्ठ था। इसी वजह से दोनों ही पक्षों ने इस व्यूह की रचना की थी।
चक्र व्यूह
चक्र व्यूह की संरचना चक्र के आकार में की जाती थी। इस व्यूह को भेदने का पूरा रहस्य सिर्फ अर्जुन को मालूम था, लेकिन उस समय अर्जुन कौरवों के महारथी सुशर्मा से युद्ध कर रहा था। इस वजह से चक्र व्यूह को भेदने के लिए अभिमन्यु सहित सभी पांडव महारथी तैनात हो गए। चक्र व्यूह के द्वार पर जयद्रथ तैनात था, जिसने अभिमन्यु के अतिरिक्त किसी और पांडव को चक्र व्यूह में प्रवेश नहीं करने दिया। चक्र व्यूह में योद्धाओं की ७ परतें (पंक्तियाँ) थीं। अभिमन्यु चक्र व्यूह की सभी परतों को भेदते हुए मध्य भाग में पहुँच गया। वहाँ कौरवों के सात महारथियों ने एक साथ मिलकर अभिमन्यु की हत्या कर दी थी। जबकि उस युद्ध के नियमों के अनुसार एक योद्धा के साथ एक से अधिक योद्धा नहीं लड़ सकते थे। अभिमन्यु वध से क्रुद्ध अर्जुन ने अगले दिन सूर्यास्त होने के पूर्व जयद्रथ के वध का प्राण किया था।
मंडल व्यूह
कौरवों के सेनापति भीष्म पितामह ने कुरुक्षेत्र में सातवें दिन बहुत कठिन व्यूह रचा था, जिसका नाम है मंडल व्यूह। इस व्यूह की गणना सबसे कठिन व्यूहों में की जाती है। यह व्यूह रचना एक वृत्त या चक्र के आकार की होती है, जिसमें सैनिक एक घेरे में खड़े होते हैं। इस व्यूह में कौरव सेना ने पूरी शक्ति के साथ पांडवों पर आक्रमण किया था। मंडल व्यूह अलग-अलग मंडलों के समूह के समान दिखाई देता था। चारों ओर से सुरक्षित इस व्यूह को भेद पाना अत्यंत कठिन होता है। इसके जवाब में पांडवों की ओर से वज्र व्यूह रचा गया था। वज्र व्यूह के आक्रमण से कौरव सेना का मंडल व्यूह को भेद दिया था।
वज्रव्यूह
कुरुक्षेत्र में युद्ध के पहले दिन पांडवों की ओर से धनुर्धर अर्जुन ने वज्र व्यूह की रचना की थी। वज्र व्यूह की रचना देवराज इंद्र के वज्र के आकार के समान की गई थी। वज्र के आकार का व्यूह होने की वजह से इसे वज्र व्यूह कहा गया। पांडवों की पूरी सेना वज्र के आकार में सज गई थी। इस व्यूह में अर्जुन और भीम सेना को आगे रखते थे। वज्र के अग्र भाग में अर्जुन स्वयं की रक्षा से निश्चिंत होकर दोनों पक्षों की सेनाओं को न केवल देख सकता था अपितु जब जिस दिशा में चाहे धनुष से संधान कर शत्रु पर आक्रमण और जरूरत पड़ने पर अपने पक्ष की रक्षा कर सकता था।
ओर्मी व्यूह
मंडल व्यूह की असफलता के बाद कौरव सेना ने ओर्मी व्यूह की रचना की थी। इस व्यूह में पूरी सेना समुद्र के समान सज गई थी। जिस प्रकार समुद्र में लहरें दिखाई देती हैं, ठीक उसी आकार में कौरव सेना ने पांडवों पर आक्रमण किया था। इसके जवाब में पांडवों ने श्रीन्गातका व्यूह की रचना की थी। इस व्यूह का आकार किसी भव्य भवन के समान दिखाई देता था।
चक्रशकट व्यूह
अभिमन्यु की हत्या के बाद अगले दिन कौरव सेना ने जयद्रथ को बचाने के लिए चक्रशकट व्यूह की रचना की थी। इस व्यूह के मध्य भाग में जयद्रथ को रखा गया, ताकि अर्जुन उसे मार न सके और स्वयं अग्नि को समर्पित हो जाए। अर्जुन के न होने से कौरव आसानी से युद्ध जीत सकते थे। इसी वजह से कौरव सेना ने चक्रशकट व्यूह की रचना कर जयद्रथ को बचाने का प्रयास किया। इस व्यूह का आकार भी चक्र के समान की दिखाई देता है और इसमें अलग-अलग परतों में सेना सजी रहती है। सभी परतों पर अलग-अलग कौरव महारथी तैनात किए गए थे, लेकिन अर्जुन ने इस व्यूह को भेद दिया और जयद्रथ को मार दिया था।
सर्वतोभद्र व्यूह:
यह एक व्यापक व्यूह था जिसका उपयोग कौरवों द्वारा किया गया था.
श्रीन्गातका व्यूह:
यह एक भवन के समान दिखने वाला व्यूह था जिसका उपयोग अर्जुन ने किया था.
***
लघुकथा
दूसरा चेहरा
साहित्य सेवा को अपना जूनून बताकर उन्होंने संपर्क किया।उनके शहर जाना हुआ तो बहुत आग्रह के साथ अपने आवास पर आमंत्रित किया, सास, पति, पुत्र आदि से परिचय कराकर स्वादिष्ट भोजन कराया, आते-जाते समय चरण स्पर्श किए।
मेरे शहर में उनका आगमन हुआ तो उन्हें गृह आमंत्रित कर मैंने अपने परिवारजनों से मिलवाया, उनके स्वागत में गोष्ठी आदि का आयोजन किया। वे जिस विधा में लेखन कर रही थीं, उसकी कुछ अनुपलब्ध पुस्तकें भेंट कीं, कुछ योजनाएँ बनाई गईं, उनकी संस्था की अपने शहर में ईकाई आरंभ कराई।
सार यह कि बहुत आत्मीय, मधुर और पारिवारिक संबंध हो गए।
कुछ वर्ष बाद उनका पुनरागमन हुआ। अब तक वे अपनी विधा की प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हो गयी थीं, अपना प्रकाशन गृह आरंभ कर चुकी थीं। प्रकाशन गृह संबंधी कई समस्याओं की चर्चा उन्होंने की। एक महिला रचनाकार के बारे में बताया जिसने उनके अनुसार, उन्हें विश्वास में लेकर अपनी पुस्तक छपाकर भुगतान ही नहीं किया।
मैंने उन्हें सहयोग करने की भावना से अपनी एक पुस्तक की पी डी एफ और नगर के मुद्रक ने जो राशि बताई थी, वह अग्रिम देते हुए उनके प्रकाशन की सफलता हेतु शुभकामना दी।
इसके बाद माह पर माह बीतते रहे पर पुस्तक की प्रगति नहीं हो पाई। इस मध्य बेटे का विवाह तय हुआ तो सोचा कि नव दंपत्ति से नव प्रकाशित पुस्तक का विमोचन कराऊँ। उन्होंने अन्य कार्यों में व्यस्त होने का कारण बताकर पुस्तक उपलब्ध कराने में असमर्थता व्यक्त कर दी। लंबी चर्चा के बाद कहा कि दस प्रतियाँ भिजवा देती हूँ। मैंने यह सोचकर संतोष किया कि शेष २९० प्रतियाँ कुछ विलंब से ही सही, मिलेंगी तो।
बेटे का विवाह हुए डेढ़ साल बीत चुका है, अब तक पुस्तक की शेष प्रतियाँ अप्राप्त हैं। अब वे निरंतर प्रकाशकीय गतिविधियाँ बढ़ाती जा रही हैं पर मेरी पुस्तक का भेजने या का अवकाश नहीं है उनके पास।
मैं स्तब्ध हूँ यह देखकर कि एक सुसंस्कारी महिला के सुपरिचित चेहरे पर हावी हो गया है व्यावसायिक प्रकाशक का दूसरा चेहरा।
•••
द्विपदी
मौन दर-दीवार हैं; चौपाल चुप
दोस्त भी मिलते हैं अंतरजाल पर।
शब्द सलिला सूखती जा रही है
जमाना अब इमोजी का आ आ गया।
सदोका सलिला ५
योग-वियोग
जग की रीत-नीत
जीवन का संगीत।
योग-संयोग
ऐसे होते प्रतीत
जैसे प्रीत-संगीत।२६।
रिश्ते-नाते
सत्य ही बताते
कोई नहीं किसी का।
कोई न गैर
वही अपना सगा
जो मनाता है खैर।२७।
वादा निभाना
आदमी की निशानी
दुनिया आनी-जानी।
वादा भुलाना
सुरासुरी चलन
स्वार्थ-भोग अगन।२८।
देर सबेर
मिलता कर्म-फल
मत होना विकल।
धीरज धर
तलाश अवसर
वर देगा ईश्वर।२९।
मन उन्मन
हरि का सुमिरन
लगी रहे लगन।
दूर हो भ्रांति
जब न हो संक्रांति
तभी मिलेगी शांति।
२१-६-२०२२
•••
दोहा सलिला
*
दोहा सलिला-स्नान दे, ग्रहण दोष से मुक्ति।
ग्रहण करें रस भाव लय, गति-यति कल संयुक्ति।।
*
ग्रहण करे सुख-दुख धरा, दे-पा सह समभाव।
ग्रहण न लगता इसलिए, हर ग्रह रखे लगाव।।
*
ग्रहण न रवि-शशि कुछ करें, देते जग उजियार।
राहु-केतु निज स्वार्थ हित, फैलाते अँधियार।।
*
राहु-केतु पथ रोकते,बनें आप दीवार।
नहीं अधिग्रहण कर सकें, हटें विवश लाचार।।
*
अब तक ग्रहण किया सलिल, जो तूने दे बाँट
दुष्प्रभाव हर ग्रहण का, दूर करो झट छाँट।।
*
संग्रहणी का योग ही, सबसे सरल इलाज।
सद्गृहणी संयोग से, मिले राज बिन राज।।
*
योग-भोग सम भोग ही, तन-मन का संभोग।
मिलन आत्म-परमात्म का, दूर करे हर रोग।।
*
जोड़-घटाना व्यर्थ है, गुणा-भाग फलहीन।
योग मात्र संतोष है, पाकर रहें न दीन।।
*
२२-६-२०२०
***
विमर्श
हिंदी वांग्मय में महाकाव्य विधा
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संस्कृत वांग्मय में काव्य का वर्गीकरण दृश्य काव्य (नाटक, रूपक, प्रहसन, एकांकी आदि) तथा श्रव्य काव्य (महाकाव्य, खंड काव्य आदि) में किया गया है। आचार्य विश्वनाथ के अनुसार 'जो केवल सुना जा सके अर्थात जिसका अभिनय न हो सके वह 'श्रव्य काव्य' है। श्रव्य काव्य का प्रधान लक्षण रसात्मकता तथा भाव माधुर्य है। माधुर्य के लिए लयात्मकता आवश्यक है। श्रव्य काव्य के दो भेद प्रबंध काव्य तथा मुक्तक काव्य हैं। प्रबंध अर्थात बंधा हुआ, मुक्तक अर्थात निर्बंध। प्रबंध काव्य का एक-एक अंश अपने पूर्व और पश्चात्वर्ती अंश से जुड़ा होता है। उसका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। पाश्चात्य काव्य शास्त्र के अनुसार प्रबंध काव्य विषय प्रधान या करता प्रधान काव्य है। प्रबंध काव्य को महाकाव्य और खंड काव्य में पुनर्वर्गीकृत किया गया है।
महाकाव्य के तत्व -
महाकाव्य के ३ प्रमुख तत्व है १. (कथा) वस्तु , २. नायक तथा ३. रस।
१. कथावस्तु - महाकाव्य की कथा प्राय: लंबी, महत्वपूर्ण, मानव सभ्यता की उन्नायक, होती है। कथा को विविध सर्गों (कम से कम ८) में इस तरह विभाजित किया जाता है कि कथा-क्रम भंग न हो। कोई भी सर्ग नायकविहीन न हो। महाकाव्य वर्णन प्रधान हो। उसमें नगर-वन, पर्वत-सागर, प्रात: काल-संध्या-रात्रि, धूप-चाँदनी, ऋतु वर्णन, संयोग-वियोग, युद्ध-शांति, स्नेह-द्वेष, प्रीत-घृणा, मनरंजन-युद्ध नायक के विकास आदि का सांगोपांग वर्णन आवश्यक है। घटना, वस्तु, पात्र, नियति, समाज, संस्कार आदि चरित्र चित्रण और रस निष्पत्ति दोनों में सहायक होता है। कथा-प्रवाह की निरंतरता के लिए सरगारंभ से सर्गांत तक एक ही छंद रखा जाने की परंपरा रही है किन्तु आजकल प्रसंग परिवर्तन का संकेत छंद-परिवर्तन से भी किया जाता है। सर्गांत में प्रे: भिन्न छंदों का प्रयोग पाठक को भावी परिवर्तनों के प्रति सजग कर देता है। छंद-योजना रस या भाव के अनुरूप होनी चाहिए। अनुपयुक्त छंद रंग में भंग कर देता है। नायक-नायिका के मिलन प्रसंग में आल्हा छंद अनुपतुक्त होगा जबकि युद्ध के प्रसंग में आल्हा सर्वथा उपयुक्त होगा।
२. नायक - महाकव्य का नायक कुलीन धीरोदात्त पुरुष रखने की परंपरा रही है। समय के साथ स्त्री पात्रों (सीता, कैकेयी, मीरा, दुर्गावती, नूरजहां आदि), किसी घटना (सृष्टि की उत्पत्ति आदि), स्थान (विश्व, देश, शहर आदि), वंश (रघुवंश) आदि को नायक बनाया गया है। संभव है भविष्य में युद्ध, ग्रह, शांति स्थापना, योजना, यंत्र आदि को नायक बनाकर महाकव्य रचा जाए। प्राय: एक नायक रखा जाता है किन्तु रघुवंश में दिलीप, रघु और राम ३ नायक है। भारत की स्वतंत्रता को नायक बनाकर महाकाव्य लिखा जाए तो गोखले, तिकल। लाजपत राय, रविंद्र नाथ, गाँधी, नेहरू, पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद आदि अनेक नायक हो सकते हैं। स्वातंत्र्योत्तर देश के विकास को नायक बना कर महाकाव्य रचा जाए तो कई प्रधान मंत्री और राष्ट्रपति अलग-अलग सर्गों में नायक होंगे। नायक के माध्यम से उस समय की महत्वाकांक्षाओं, जनादर्शों, संघर्षों अभ्युदय आदि का चित्रण महाकाव्य को कालजयी बनाता है।
३. रस - रस को काव्य की आत्मा कहा गया है। महाकव्य में उपयुक्त शब्द-योजना, वर्णन-शैली, भाव-व्यंजना, आदि की सहायता से अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न की जाती हैं। पाठक-श्रोता के अंत:करण में सुप्त रति, शोक, क्रोध, करुणा आदि को काव्य में वर्णित कारणों-घटनाओं (विभावों) व् परिस्थितियों (अनुभावों) की सहायता से जाग्रत किया जाता है ताकि वह 'स्व' को भूल कर 'पर' के साथ तादात्म्य अनुभव कर सके। यही रसास्वादन करना है। सामान्यत: महाकाव्य में कोई एक रस ही प्रधान होता है। महाकाव्य की शैली अलंकृत, निर्दोष और सरस हुए बिना पाठक-श्रोता कथ्य के साथ अपनत्व नहीं अनुभव कर सकता।
अन्य नियम - महाकाव्य का आरंभ मंगलाचरण या ईश वंदना से करने की परंपरा रही है जिसे सर्वप्रथम प्रसाद जी ने कामायनी में भंग किया था। अब तक कई महाकाव्य बिना मंगलाचरण के लिखे गए हैं। महाकाव्य का नामकरण सामान्यत: नायक तथा अपवाद स्वरुप घटना, स्थान आदि पर रखा जाता है। महाकाव्य के शीर्षक से प्राय: नायक के उदात्त चरित्र का परिचय मिलता है किन्तु पथिक जी ने कारण पर लिखित महाकव्य का शीर्षक 'सूतपुत्र' रखकर इस परंपरा को तोडा है।
महाकाव्य : कल से आज
विश्व वांग्मय में लौकिक छंद का आविर्भाव महर्षि वाल्मीकि से मान्य है। भारत और सम्भवत: दुनिया का प्रथम महाकाव्य महर्षि वाल्मीकि कृत 'रामायण' ही है। महाभारत को भारतीय मानकों के अनुसार इतिहास कहा जाता है जबकि उसमें अन्तर्निहित काव्य शैली के कारण पाश्चात्य काव्य शास्त्र उसे महाकाव्य में परिगणित करता है। संस्कृत साहित्य के श्रेष्ठ महाकवि कालिदास और उनके दो महाकाव्य रघुवंश और कुमार संभव का सानी नहीं है। सकल संस्कृत वाङ्मय के चार महाकाव्य कालिदास कृत रघुवंश, भारवि कृत किरातार्जुनीयं, माघ रचित शिशुपाल वध तथा श्रीहर्ष रचित नैषध चरित अनन्य हैं।
इस विरासत पर हिंदी साहित्य की महाकाव्य परंपरा में प्रथम दो हैं चंद बरदाई कृत पृथ्वीराज रासो तथा मलिक मुहम्मद जायसी कृत पद्मावत। निस्संदेह जायसी फारसी की मसनवी शैली से प्रभावित हैं किन्तु इस महाकाव्य में भारत की लोक परंपरा, सांस्कृतिक संपन्नता, सामाजिक आचार-विचार, रीति-नीति, रास आदि का सम्यक समावेश है। कालांतर में वाल्मीकि और कालिदास की परंपरा को हिंदी में स्थापित किया महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस में। तुलसी के महानायक राम परब्रह्म और मर्यादा पुरुषोत्तम दोनों ही हैं। तुलसी ने राम में शक्ति, शील और सौंदर्य तीनों का उत्कर्ष दिखाया। केशव की रामचद्रिका में पांडित्य जनक कला पक्ष तो है किन्तु भाव पक्ष न्यून है। रामकथा आधारित महाकाव्यों में मैथिलीशरण गुप्त कृत साकेत और बलदेव प्रसाद मिश्र कृत साकेत संत भी महत्वपूर्ण हैं। कृष्ण को केंद्र में रखकर अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने प्रिय प्रवास और द्वारिका मिश्र ने कृष्णायन की रचना की। कामायनी - जयशंकर प्रसाद, वैदेही वनवास हरिऔध, सिद्धार्थ तथा वर्धमान अनूप शर्मा, दैत्यवंश हरदयाल सिंह, हल्दी घाटी श्याम नारायण पांडेय, कुरुक्षेत्र दिनकर, आर्यावर्त मोहनलाल महतो, नूरजहां गुरभक्त सिंह, गाँधी परायण अम्बिका प्रसाद दिव्य, उत्तर भगवत तथा उत्तर रामायण डॉ. किशोर काबरा, कैकेयी डॉ.इंदु सक्सेना देवयानी वासुदेव प्रसाद खरे, महीजा तथा रत्नजा डॉ. सुशीला कपूर, महाभारती डॉ. चित्रा चतुर्वेदी कार्तिका, दधीचि आचार्य भगवत दुबे, वीरांगना दुर्गावती गोविन्द प्रसाद तिवारी, क्षत्राणी दुर्गावती केशव सिंह दिखित 'विमल', कुंवर सिंह चंद्र शेखर मिश्र, वीरवर तात्या टोपे वीरेंद्र अंशुमाली, सृष्टि डॉ. श्याम गुप्त, विरागी अनुरागी डॉ. रमेश चंद्र खरे, राष्ट्रपुरुष नेताजी सुभाष चंद्र बोस रामेश्वर नाथ मिश्र अनुरोध, सूतपुत्र महामात्य तथा कालजयी दयाराम गुप्त 'पथिक', आहुति बृजेश सिंह आदि ने महाकाव्य विधा को संपन्न और समृद्ध बनाया है।
समयाभाव के इस दौर में भी महाकाव्य न केवल निरंतर लिखे-पढ़े जा रहे हैं अपितु उनके कलेवर और संख्या में वृद्धि भी हो रही है, यह संतोष का विषय है।
२१-६-२०१९
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विमर्श:
योग दिवस...
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- योग क्या?
= जोड़ना, संचय करना.
- संचय क्या और क्यों करना?
= सृष्टि का निर्माण और विलय का कारक है 'ऊर्जा', अत: संचय ऊर्जा का... लक्ष्य ऊर्जा को रूपांतरित कर परम ऊर्जा तक आरोहण कर पाना.
- ऊर्जा संचय और योग में क्या संबंध है?
= योग शारीरिक, मानसिक और आत्मिक ऊर्जा को चैतन्य कर, उनकी वृद्धि करता है .फलत: नकारात्मकता का ह्रास होकर सकारात्मकता की वृद्धि होती है. व्यक्ति का स्वास्थ्य और चिंतन दोनों का परिष्कार होता है.
- योग धनाढ्यों और ढोंगियों का पाखंड है.
= योग के क्षेत्र में कुछ धनाढ्य और ढोंगी हैं. धनाढ्य होना अपराध नहीं है, ढोंगी होना और ठगना अपराध है. पहचानना और बचना अपनी जागरूकता और विवेक से ही संभव है, गेहूं के बोर में कुछ कंकर होने से पूरा गेहूं नहीं फेंका जा सकता. इसी तरह कुछ पाखंडियों के कारण पूरा योग त्याज्य नहीं हो सकता.
- दैनिक जीवन की व्यस्तता और समयाभाव के कारण योग करने नहीं जाया जा सकता.
= योग करने के लिए कहीं जाना नहीं है, न अलग से समय चाहिए. एक बार सीखने के बाद अभ्यास अपना काम करते हुए भी किया जा सकता है. कार्यालय, कारखाना, खेत, रसोई हर जगह योग किया जा सकता है, वह भी अपना काम करते-करते.
- योग कैसे कार्य करता है?
= योग मुद्राएँ शरीर की शिराओं में रक्त प्रवाह की गति को सुधरती हैं. मन को प्रसन्न करती है. फलत: थकान और ऊब समाप्त होती है. प्रसन्न मन काम करने पर परिणाम की मात्रा और गुण दोनों में वृद्धि होती है. इससे मिली प्रशंसा और सफलता अधिक अच्छा करने की प्रेरणा देती है.
- योग खर्ची ला है.
= नहीं योग बिन किसी अतिरिक्त व्यय के किया जा सकता है. योग रोग घटाकर बचत कराता है.
- कैसे?
= योग से सही आसन सीख कर कार्य करते समय शरीर को सही स्थिति में रखें तो थकान कम होगी, श्वास-प्रश्वास नियमित हो तो रक्त प्रवाह की गति और उनमें ओषजन की मात्रा बढ़ेगी.फलत: ऊर्जा, उत्साह, प्रसन्नता और सामर्थ्य में वृद्धि होगी.
- योग सिखाने वाले बाबा ढोंगी और विलासी होते हैं.
= निस्संदेह कुछ बाबा ऐसे हो सकते हैं. उन्हें छोड़कर सच्च्ररित्र प्रशिक्षक को चुना जा सकता है. दूरदर्शन, अंतरजाल आदि की मदद से बिना खर्च भी सीखा जा सकता है.
- योग और भोग में क्या अंतर है?
= योग और भोग एक सिक्के के दो पहलू हैं. 'दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा', जीने के लिए अन्न, वस्त्र, मकान का भोग करना ही होगा. बेहतर जीवन स्तर और आपदा-प्रबंधन हेतु संचय भी करना होगा. राग और विराग का संतुलन और समन्वय ही 'सम्भोग' है. इसे केवल दैहिक क्रिया मानना भूल है. 'सम्भोग' की प्राप्ति में योग सहायक होता है. 'सम्भोग' से 'समाधि' अर्थात आत्म और परमात्म के ऐक्य की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है. अत्यधिक योग और अत्यधिक भोग दोनों अतृप्ति, अरुचि और अंत में विनाश के कारण बनते हैं. 'योग; 'भोग' का प्रेरक और 'भोग' 'योग' का पूरक है.
- योग कौन कर सकता है?
= योग हर जीवित प्राणी कर सकता है. पशु-पक्षी स्वचेतना से प्रकृति अनुसार आचरण करते हैं जो योग है. मनुष्य में बुद्धितत्व की प्रधानता उसे सर्वार्थ से दूर कर स्वार्थ के निकट कर देती है. योग उसे आत्म तत्व के निकट ले जाकर ब्रम्हांश होने की प्रतीति कराता है. कंकर-कंकर में शंकर होने की अनुभूति होते ही वह सृष्टि के कण-कण से आत्मीयता अनुभव करता है. योग मौन से संवाद की कला है. बिन बोले सुनना-कहना और ग्रहण करना और बाँट देना ही सच्चा योग है.
- योग दिवस क्यों?
योग दिवस केवल स्मरण करने के लिए कि अगले योग दिवस तक योगरत रहकर अपने और सबके जीवन को बेहतर और प्रसन्नता पूर्ण बनाएँ.
२१.६.२०१८
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नवगीत
राम रे!
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राम रे!
कैसो निरदै काल?
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भोर-साँझ लौ गोड़ तोड़ रए
कामचोर बे कैते।
पसरे रैत ब्यास गादी पै
भगतन संग लपेटे।
काम पुजारी गीता बाँचें
गोपी नचें निढाल-
आँधर ठोंके ताल
राम रे!
बारो डाल पुआल।
राम रे!
कैसो निरदै काल?
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भट्टी देह, न देत दबाई
पैलउ माँगें पैसा।
अस्पताल मा घुसे कसाई
थाने अरना भैंसा।
करिया कोट कचैरी घेरे
बकरा करें हलाल-
बेचें न्याय दलाल
राम रे !
लूट बजा रए गाल।
राम रे!
कैसो निरदै काल?
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झिमिर-झिमिर-झम बूँदें टपकें
रिस रओ छप्पर-छानी।
दागी कर दई रौताइन की
किन नें धुतिया धानी?
अँचरा ढाँके, सिसके-कलपे
ठोंके आपन भाल
राम रे !
जीना भओ मुहाल।
राम रे!
कैसो निरदै काल?
२१-६-२०१६
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स्मृति गीत
हर दिन पिता याद आते हैं...
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जान रहे हम अब न मिलेंगे.
यादों में आ, गले लगेंगे.
आँख खुलेगी तो उदास हो-
हम अपने ही हाथ मलेंगे.
पर मिथ्या सपने भाते हैं.
हर दिन पिता याद आते हैं...
*
लाड, डांट, झिडकी, समझाइश.
कर न सकूँ इनकी पैमाइश.
ले पहचान गैर-अपनों को-
कर न दर्द की कभी नुमाइश.
अब न गोद में बिठलाते हैं.
हर दिन पिता याद आते हैं...
*
अक्षर-शब्द सिखाये तुमने.
नित घर-घाट दिखाए तुमने.
जब-जब मन कोशिश कर हारा-
फल साफल्य चखाए तुमने.
पग थमते, कर जुड़ जाते हैं
हर दिन पिता याद आते हैं...
*
लाड, डांट, झिडकी, समझाइश.
कर न सकूँ इनकी पैमाइश.
ले पहचान गैर-अपनों को-
कर न दर्द की कभी नुमाइश.
अब न गोद में बिठलाते हैं.
हर दिन पिता याद आते हैं...
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अक्षर-शब्द सिखाये तुमने.
नित घर-घाट दिखाए तुमने.
जब-जब मन कोशिश कर हारा-
फल साफल्य चखाए तुमने.
पग थमते, कर जुड़ जाते हैं
हर दिन पिता याद आते हैं...
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बाल कविता:
मेरे पिता
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जब तक पिता रहे बन साया!
मैं निश्चिन्त सदा मुस्काया!
*
रोता देख उठा दुलराया
कंधे पर ले जगत दिखाया
उँगली थमा,कहा: 'बढ़ बेटा!
बिना चले कब पथ मिल पाया?'
*
गिरा- उठाकर मन बहलाया
'फिर दौड़ो' उत्साह बढ़ाया
बाँह झुला भय दूर भगाया
'बड़े बनो' सपना दिखलाया
*
'फिर-फिर करो प्रयास न हारो'
हरदम ऐसा पाठ पढ़ाया
बढ़ा हौसला दिया सहारा
मंत्र जीतने का सिखलाया
*
लालच करते देख डराया
आलस से पीछा छुड़वाया
'भूल न जाना मंज़िल-राहें
दृष्टि लक्ष्य पर रखो' सिखाया
*
रवि बन जाड़ा दूर भगाया
शशि बन सर से ताप हटाया
मैंने जब भी दर्पण देखा
खुद में बिम्ब पिता का पाया
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दोहा का रंग दाँत के संग:
*
दाँतों काटी रोटियाँ, रहें हमेशा याद
माँ-हाथों के कौर सा, पाया कहीं न स्वाद
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दाँत निपोरो तो मिटे, मन का 'सलिल' तनाव
दाँत दिखाओ चमकते, अच्छा पड़े प्रभाव
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पाँत दाँत की दमकती, जैसे मुक्ता-माल
अधर-कमल के मध्य में, शोभित लगे कमाल
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दाँत तले उँगली दबा, लगते खूब जनाब
कभी शांत नटखट कभी, जैसे कली गुलाब
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दाँतों से नख कुतरते, देते नहीं जवाब
नज़र झुकी बिजली गिरी, पलकें हुईं नकाब
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दाँत बज रहे- काँपता, बदन चढ़ा ज्वर तेज
है मलेरिया बुला लें, दवा किसी को भेज
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दाँत न टूटे दूध के,चले निभाने प्रीत
दिल के बिल को देखकर, बिसर गया लव-गीत
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दाँतों में पल्लू दबा, चला नज़र के तीर
लूट लिया दिल ध्वस्त कर, अंतर की प्राचीर
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दाँत तोड़कर शत्रु के, सैन्य बचाती देश
जान हथेली पर लिये, कसर न छोड़ें लेश
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दाँतों लोहे के चने, चबा रहे रह शांत
धीरज को करिये नमन, 'सलिल' न होते भ्रांत
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दहशतगर्दों के करें, मिलकर खट्टे दाँत
'सलिल' रहम मत खाइये, खींच लीजिए आँत
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दाँत मिलें तो चनों का, होता रहा अभाव
चने मिले बेदाँत को, कैसे करें निभाव?
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दाँत खोखले हो गये, समझें खिसकी नींव
सजग रहें खुद सदय हों, पल-पल करुणासींव
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और दिखाने के 'सलिल', खाने के कुछ और
दाँतों की महिमा अमित, करिए इन पर गौर
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हैं कठोर बाँटें नहीं, अलग-अलग रह पीर
दाँत टूटते जीभ झुक, बच जाती धर धीर
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दाँत दीन चुप पीसते, चक्की बिना पगार
जी भर रस ले जीभ चुप, पेट गहे आहार
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खट्टा मीठा चिरपरा, चाबे निस्पृह संत
आह-वाह रसना करे, नहीं स्वार्थ का अंत
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जिव्हा बहिन रक्षित-सुखी, गाती मधुरिम छंद
बंधु दाँत रक्षा करे, मिले अमित आनंद
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योग कर रहा शांत रह, दाँत न करता बैर
जिए ऐक्य-सद्भाव से, हँसी-खुशी निर्वैर
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दाँत स्वच्छता-दूत है, नित्य हो रहा साफ़
जो घिसता उसको करे, तत्क्षण ही यह माफ़
*
क्षुधा मिटाता उदर की, चबा-चबा दे भोज्य
बचा मसूढ़ों को रहा, दाँत नमन के योग्य
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उगे टूट गिर फिर बढ़े, दाँत न माने हार
कर्मवीर है सूर्य सा, करे नहीं तकरार
*दाँत पीस मत कीजिए, भोजन लगे न अंग। भोज्य चबाएँ दाँत से, मधु-रस सा सत्संग।।
२१-६-२०१५
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गीत :
उड़ने दो…
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पर मत कतरो
उड़ने दो मन-पाखी को।
कहो कबीरा
सीख-सिखाओ साखी को...
*
पढ़ो पोथियाँ,
याद रखो ढाई आखर।
मन न मलिन हो,
स्वच्छ रहे तन की बाखर।
जैसी-तैसी
छोड़ो साँसों की चादर।
ढोंग मिटाओ,
नमन करो सच को सादर।
'सलिल' न तजना
रामनाम बैसाखी को...
*
रमो राम में,
राम-राम सब से कर लो।
राम-नाम की
ज्योति जला मन में धर लो।
श्वास सुमरनी
आस अंगुलिया संग चले।
मन का मनका,
फेर न जब तक सांझ ढले।
माया बहिना
मोह न, बांधे राखी को…
२१-६-२०१३
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