सलिल सृजन मार्च १२
दिव्य नर्मदा .......... Divya Narmada
दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.
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गुरुवार, 12 मार्च 2026
मार्च १२, राम किंकर, सॉनेट, सोरठा, नीरा आर्य, लीलावती, शिव, भव छंद, सवैया, ग़ज़लिका, नवगीत, सरहद
बुधवार, 11 मार्च 2026
भारतीय रेल, ओशो,
ओशो और भारतीय रेल
यह बात वर्ष 1960 की है। ओशो इटारसी (म.प्र.) के एक महाविद्यालय में व्याख्यान देने आये थे। व्याख्यान के तुरंत बाद उन्हें ट्रेन से जबलपुर के लिये रवाना होना था। स्टेशन आते समय रास्ते में किसी कारण थोड़ी देर हो गई। कुछ मित्र उन्हें विदा करने रेलवे स्टेशन आये थे। इटारसी बड़ा रेलवे जंक्शन हैं जिसमें कई प्लेटफॉर्म्स हैं, जिनमें फुट ओवरब्रिज से जाना होता है। अभी ओशो फुट ओवरब्रिज पर ही थे, देखा कि उन्हें जिस ट्रेन से जाना था वह चलना शुरू हो गयी है। मित्रों ने कहा भी कि अब नीचे जाने का कोई फ़ायदा नहीं है, जब तक हम नीचे पहुँचेंगे तब तक ट्रेन निकल चुकी होगी। चलिए वापस चलते हैं।
ओशो मुस्कुराए, बोले नहीं, नीचे चल कर देखते हैं। उन्होंने कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई, अपनी सामान्य चाल से चलते हुए आराम से सीढ़ियाँ उतर कर प्लेटफार्म पर पहुँचे। न चाहते हुए भी मित्र उनके साथ नीचे आये। देखा गाड़ी प्लेटफार्म के बाहर निकल कर अचानक रुक गई और वापस पीछे आने लगी। जिस डिब्बे में ओशो का आरक्षण था वह ठीक वहीं आकर रुका जहां वे खड़े हुए थे। कंडक्टर बाहर आया और बोला, आइये आचार्य जी। मित्रों से विदा ले ओशो गाड़ी में सवार हुए और गाड़ी चल दी। आश्चर्यचकित मित्र देखते ही रह गये।
बाद में इस बारे में किसी ने ओशो से पूछा भी तो उन्होंने हँस कर टाल दिया। कहा कि शायद कुछ ज़रूरी सामान लोड होने से रह गया होगा जिसे लोड करने गाड़ी को पीछे लौटना पड़ा और यह मात्र एक संयोग था कि डिब्बा ठीक मेरे सामने आकर रुका।
दूसरी घटना भी रेलयात्रा से ही संबंधित है।
उन दिनों, 1960 के दशक में सूचनाओं का आदान-प्रदान मुख्यतः पत्राचार द्वारा ही हुआ करता था। भारतीय डाक सेवा भी अपनी श्रेष्ठ कार्यक्षमता के लिए जानी जाती थी। भारत के किसी भी कोने में पत्र केवल ३-४ दिन में पहुँच जाता था।
ओशो के प्रवचन एवम ध्यान के कार्यक्रम देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित हुआ करते थे। ओशो 1-2 सप्ताह पूर्व ही आयोजकों को पत्र द्वारा सूचित कर दिया करते थे कि वे किस ट्रेन से किस समय वहाँ पहुँचेंगे। गुजरात में एक ध्यान शिविर आयोजित था। ओशो ने सप्ताह पूर्व ही आयोजकों को पत्र लिख कर ट्रेन और उसके वहाँ पहुँचने का समय सूचित कर दिया।
आयोजक मित्रों को पत्र पढ़ कर हैरानी हुईं, ओशो ने जिस ट्रेन का नाम लिखा था और उसके पहुँचने का जो समय लिखा था वह उस ट्रेन के नियत समय से मेल नहीं खाता था। ख़ैर, नियत दिन पर आयोजक मित्र उस ट्रेन के नियत समय पर उन्हें लेने स्टेशन पहुँचे। स्टेशन पहुँच कर पता चला कि ट्रेन कुछ देर से चल रही हैं। बाद में घोषणा हुई कि और लेट हो गई हैं। मित्रों के विस्मय का तब ठिकाना न रहा जब ट्रेन ठीक उसी समय पहुँची जो ओशो ने अपने पत्र में लिखा था। ओशो के ट्रेन से उतरते ही मित्रों का पहला प्रश्न यही था कि आपको कैसे पता था कि आज ट्रेन इस समय यहाँ पहुँचेगी?
ओशो हँसने लगे और बोले मुझे कुछ पता नहीं था वह गलती से लिख दिया होगा। भूल तो सभी से हो जाती है।
गोविंद बल्लाल खेर / गोविंद पंत बुंदेला
22 अक्टूबर 1758 दोपहर 2 बजे , दोआब मोर्चा , कानपुर
पेशवाओ ने सरदार रघुनाथ पंडितराव के हमलों के फलस्वरूप सन 1751 से उत्तर में अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी । वे जाट राजा सुरजमाल के साथ रोहिल्लो को जकड़ने में लगे थे । इस काम मे पेशवाओ के साथ आगरा से साबाजी शिन्दे और तुकोजी होल्कर भी मजबूती से घेराव कर रहे थे । सारा ध्यान रोहिल्ला मुल्ला नजीब जंग और मुग़ल की राजपूत रानी मालिका ज़मानी को पूर्वी दिल्ली और मेरठ में निस्तनाबूत करने में था कि अचानक पठानों ने हरमिंदर साहिब , अमृतसर को नापाक कर दिया और स्वर्ण मंदिर तोड दिया ।।
सिख सरदार अवाक रह गए , उनके सबसे पवित्र स्थान स्वर्ण मंदिर के तालाब में पठानों का कब्जा हो गया था । गिनती के 15 हज़ार सिख अब पठानों की 40 हजारी फौज़ से कैसे लड़ते ?
सरहिन्द में सिखों के तीन बेहतरीन सरदार
१. जस्सासिंह आहलूवालिया
२. अला जाट
३. जस्ससिंह रामगढ़िया
ने लाहौर के पुराने मुघल गवर्नर अदीना बेग से मुलाकात की और चारो ने अमृतसर को मुक्त कराने पेशवा पंडितराओ रॉघोबा को संदेसे भेजे ।। संदेसे 6 थे और इस प्रकार है ।
पंडितराव राजा रॉघोबा ।।
सिरहिन्द में तुर्क
पठान अब्दुस्समन्द खान आ गए है ।
हरमिंदर साहब नापाक कर दिया है ।
पवित्र मंदिर में बेग़ैरत लाशें है ।
ढक्क्न की मदद जरूरी ।
हिन्दूख़लसा का सफ़ाया होना ।
रॉघोबा उर्फ रघुनाथराव ने पूर्व की मुहिम रोक दी और सिरहिन्द की ओर निकल पड़े और फरवरी में पेशवा , मराठो की भयंकर फौज़ के साथ पंजाब में घुस आए ।
अब यहां से शुरू हुई अमृतसर को मुक्त करने की कवयाद ।। इसमे मराठाओ के भगवा के नीचे निम्मनलिखित सरदार पहुंचे और सिखों के सबसे पवित्र स्थान को मुक्त करने , शुरू हुआ पठान - पेशवा सँघर्ष ।।
24 फरवरी : कुंजपुरा की जंग : पेशवा कृष्णराव काले ( दीक्षित ) और शिवनायरायन गोसाइँ बुन्देला ने 2400 पठानों को मार कर खूनी जंग लड़ी । 8 घण्टे की जंग के बाद यह किला जीत लिया गया । पंजाब में नंगी तलवारों के साथ पेशवाओ का प्रवेश ।
8 मार्च : सिरहिन्द की जंग : पेशवा रघुनाथ राओ रॉघोबा , सरदार हिग्निस , सरदार तुकोजी राओ होल्कर , सरदार संताजी सिन्धिया , सरदार रेंकोजी आनाजी , सरदार रायजी सखदेव , सरदार पेशवा अंताजी मानकेश्वर , पेशवा गोविंद पंत बुंदेला सागर , पेशवा मानसिंग भट्ट कॉलिंजर , पेशवा गोपालराव बर्वे , पेशवा नरोपण्डित , पेशवा गोपालराव बाँदा और कश्मीरी हिन्दूराव की 22 हज़ार हुज़ूरात फौज़ ने 3 दिन में सिरहिन्द जीत लिया । 10 हज़ार पठान मारे गए और उनका सरदार अब्दुस समंद खान को बंदी बना लिया गया ।। अब अमृतसर की मुक्ति और पेशवाओ के बीच केवल एक जगह शेष थी - लाहौर ।।
लाहौर और अमृतसर की जंग : 14 मार्च 1758 :
800 सालो में पहली बार किसी हिन्दू फौज़ का लाहौर में हमला ।। भगवामय पेशवा विजय , हिन्दू फौज़ पहली बार लाहौर में पहुंचे ।
लाहौर में पठानो का राजकुमार " तैमूर खान " और " जहान खान " मजबूती के साथ मोर्चाबंदी किये हुए थे । पेशवा घुनाथराव ने नरोपण्डित , संताजी और तुकोजीराव होल्कर के साथ लाहौर के ऊपर पूरी ताकत से हमला किया । बाकी सरदारों ने लाहौर के साथ अमृतसर में धावा बोला । यह हमला इतना जोरदर था कि 5 km दूर खड़ी सिखों की फौज़ को पठानों की चीखें सुनाई देने लगी । मराठो के आ जाने से सिखों में जोश आ गया । अमृतसर और लाहौर के बीच 22 km में पठानों का क़त्लेआम शुरू हुआ । उनको हरमिंदर साहेब की सजा मिलनी शुरू हुई । शाम तक लाहौर से तुर्क और पठान निकाल दिए गए और अमृतसर में रघुनाथराव रॉघोबा का कब्जा हुआ ।
सिखों के स्वर्ण मंदिर में पेशवा फौज़ ने प्रवेश किया और राघोबा पंडितराओ ने आला जाट को मंदिर पुनर्निर्माण के लिए अफ़ग़ानों से लूटे गए दरफ़ात भेंट दिये । सिखों ने आदिना बेग और अहलूवालिया की सेनाओं ने अमृतसर को घेर लिया और हरमंदिर साहिब के ऊपर खालसा का ध्वज , पेशवाओं की मर्यादा से फिर फहराने लगा ।
मजे की बात और तो इस पेशवा - पठान युद्ध का अंत है ।
जब दो वर्ष बाद पेशवाओ को पनीपतः में जरूरत पड़ती है तो सिख शांत रहते है और मदद को नही आते । हमने जितने सरदारों के नाम लिखे है , सभी पनीपत मे पठानों से लड़ते मारे जाते है । लेकिन मरते समय भी यह मराठे , पठानों की हवा इतनी टाइट कर देते है कि पठान फिर भारत मे नही घुसते । पठान वापस अपने गरीब देश लौट जाते है । पेशवा अपना बदला नजीब जंग से लेने मेरठ चले जाते है और खाली रह जाता है पंजाब और यहां के लोग । दूसरो की लड़ाई लड़ने प् प [ परिणाम हुआ पानीपत की मौतें और पेशवा वंश का अंत ।
साभार- भाऊसाहेब प्रभाकर भट्ट श्रीमन्तकॉलिंजर किरवी हुक़ूक़, सरदार मानसिंघा भट्ट - हर्मिन्दरसाहेब शहीदी शिर्का ।।
प्रभाकर भट्ट 🙏
गोविंद पंत बुंदेला सागर
गोविंद बल्लाल खेर (1710 – 17 दिसंबर 1760), जिन्हें ऐतिहासिक रूप से गोविंद पंत बुंदेला के नाम से जाना जाता है , 1733 से 1760 के दौरान उत्तरी भारत में पेशवाओं के सैन्य जनरल थे। पेशवा बाजीराव ने उन्हें बुंदेलखंड में महाराजा छत्रसाल द्वारा उन्हें दिए गए राज्य के एक तिहाई हिस्से का न्यासी नियुक्त किया था । उन्होंने कालपी नगर पर शासन किया और बाद में यह उनके वंशज नाना गोविंद राव को जागीर के रूप में दिया गया । इसके बाद गोविंद राव ने जालौन राज्य पर शासन किया। 1
गोविंद पंत का जन्म लगभग 1710 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के 'नेवारे' गाँव में एक करहाड़े ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता गाँव के कुलकर्णी थे और अपने पिता की असामयिक मृत्यु के बाद गोविंद पंत को यह पद विरासत में मिला। हालाँकि, घुमंतू होने के कारण, उन्हें यह पद और अपना गृहनगर दोनों छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा और इस प्रकार वे नौकरी की तलाश में भटकने के लिए विवश हो गए. उन्होंने उत्तर भारत के स्थापित मराठा जनरलों: मल्हारराव होल्कर और अंताजी मानकेश्वर गांधे के अधीन काम किया। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध और प्रशासन में अच्छा अनुभव प्राप्त किया। देशस्थ ब्राह्मण अंताजी की सिफारिश पर, बाजीराव पेशवा ने गोविंद पंत को कुछ काम सौंपे और उन्हें बेहद उपयोगी पाया। जल्द ही वह बाजीराव के सबसे पसंदीदा जनरलों में से एक बन गए। जब बाजीराव को 1733 में महाराजा छत्रसाल से बुंदेलखंड मिला, तो उन्होंने गोविंद पंत को इस नव-अधिग्रहित भूमि के लिए अपना प्रशासक और पावर ऑफ अटॉर्नी नियुक्त किया। उन्हें मराठा साम्राज्य के सबसे बड़े ' धन संग्राहक ' के रूप में जाना जाता था ।
पानीपत की लड़ाई में योगदान
पानीपत के युद्ध के दौरान गोविंद पंत ने सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व में मराठा सेना की सहायता के लिए अपनी पूरी कोशिश की । उन्होंने स्वयं अहमद शाह अब्दाली को गंगा और यमुना के बीच स्थित दोआब क्षेत्र में घेर लिया था और उसे पूरी तरह से असहाय कर दिया था। लेकिन जब गोविंद को मौका मिला, तो उन्होंने दिल्ली में नारो शंकर को बड़ी मात्रा में सामग्री सौंपी और अहमद शाह अब्दाली की आपूर्ति पर हमला शुरू कर दिया। 2 दुर्भाग्यवश, एक गलतफहमी के कारण अब्दाली के सेनापति अताईखान की सेना के साथ अप्रत्याशित झड़प में उनकी जान चली गई।
अनुभवी इतिहासकार वी.के. राजवाडे, गोविंद पंत को पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों की पराजय के लिए जिम्मेदार मानते हैं । वे गोविंद को एक महत्वपूर्ण व्यक्ति भी नहीं मानते। इसके अलावा, वे उन पर हमेशा भ्रष्ट होने का आरोप लगाते हैं। जबकि सुरेश शर्मा के अनुसार, "पानीपत में हार के लिए बालाजी बाजीराव का भोग-विलास जिम्मेदार था। वे पैठन में अपनी दूसरी शादी का जश्न मनाते हुए 27 दिसंबर तक रुके रहे, जब तक बहुत देर हो चुकी थी।" 3
संदर्भ
- भवन सिंह राणा (2014). झांसी की रानी . डायमंड पॉकेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड. ISBN 9789350830031.
- आभास वर्मा द्वारा लिखित पानीपत का तीसरा युद्ध ISBN 9788180903397भारतीय कला प्रकाशन
- शर्मा, सुरेश के. (2006). हरियाणा: अतीत और वर्तमान . मित्तल प्रकाशन. पृ. 173. ISBN 97881832404687 मार्च 2019 को पुनः प्राप्त किया गया
- 'मराठी रियासत खंड I' ( मराठी ) गोविंद सखाराम सरदेसाई द्वारा
- 'पेशव्यांची बखर' (मराठी) संपादकीय नोट्स आरवी हेरवाडकर द्वारा
- 'भाऊसाहिबाची बखर' (मराठी) संपादकीय नोट्स आरवी हेरवाडकर द्वारा
- वीके राजवाड़े द्वारा 'ऐतिहासिक प्रस्थान' (मराठी)।
- आभास वर्मा द्वारा लिखित 'पानीपत का तीसरा युद्ध' (ISBN) 9788180903397भारतीय कला प्रकाशन
मार्च ११, रामकिंकर, श्रद्धा, गीत, दोहा, त्रिभंगी, छंद, बुंदेली, सरस्वती, सॉनेट, सुजाता, वर्ण पिरामिड, लघुकथा, हाइकु, साई
सलिल सृजन मार्च ११