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बुधवार, 22 अप्रैल 2026

बुंदेली लो क गी तों में रा म डॉ रमा आर्य

 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 बुंदेली लो क गी तों में रा म डॉ रमा आर्य 1 शो धपत्र सा रां शरां - भा रत का हृदय स्थल बुंदेलखंड जहां कई संस्कृति यों आकर मि लती हैं या कहें कि संस्कृति जहां से शुरू हो कर संपूर्ण भा रत में फैलती है वह स्था न है बुंदेलखंड यहां की संस्कृति यहां कल लो क सा हि त्य यहां का सां स्कृसां स्कृति क वैभव सरलता से कि सी का भी मन अपनी और आकर्षि त कर ही लेता है यह कहना भी अति शयो क्ति नहीं हो गा कि बुंदेलखंड का लो क सा हि त्य संपूर्ण भा रत में अत्यधि क समृद्ध है । कि सी भी समा ज का प्रति बिं ब हम वहां की लो क संस्कृति में व्या प्तम लो कगी तों के मा ध्यम से समझ सकते हैं । लो कगी तों में लो क संस्कृति अपनेमूल स्वरूप में चि त्रि त हो ती है या कहीं लो क जी वन का सी धा सा धा परि चय लो कगी तों के मा ध्यम से मि ल जा ता है यह लो कगी त व्यक्ति की भा वनाओं आस्था वि चा र दर्शन जी वन शैली सब कुछ व्यक्त कर देते हैं । बुंदेलखंड की लो क आस्था का एक मजबूत आधा र है भगवा न श्री रा म । इस भक्ति सा गर केंद्र ओरछा है जि सके आसपा स रा म भक्ति सा गर के लो कगी तों में हेलोहे लोरे ले रहा है यहां के जन-जन के रगों में श्री रा म बसा करते हैं दूर- दूर से लो ग ओरछा आते हैं रा त भर अपने लो कगी तों के मा ध्यम से रा म जी को ले जा ते हैं और सुबह प्रा त बेरछा जी (नदी )में स्ना न कर रा म जी के दर्शन कर पुख़्य(पुष्य) नक्षत्र को केंद्र मा न कर अपना जी वन सुखद बना लेते हैं । यहां के लो कगी तों में रा म वि भि न्न रूपों में दर्शनीय है । मुख्य शब्द - बुंदेली लो कगी त, संस्कृति , सभ्यता , परंपरा , श्री रा म, लो कजी वन, लो क मा न्यता एँ, व्यवहा र एवं आचा र । प्रस्ता वना - बुंदेलखंड ऐति हा सि क, सा हि त्य, सां स्कृति क दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है बुंदेलखंड में सुवि धा ओं में भी एकता देखनेको सहज ही प्रा प्त हो ती है । बुंदेलखंड की लो क संस्कृति सभी लो क संस्कृति यों से समृद्ध प्रती त हो ती है । यहां का लो क सा हि त्य इतना समृद्ध है कि भा रत के 1 सहा यक प्रा ध्या पक (हि न्दी ), श्री पी तां बतां रा पी ठ संस्कृत महा वि द्या लय, दति या (मध्य प्रदेश) । Page 42 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 अन्यत्र कि सी क्षेत्र का सा हि त्य इतना समृद्ध और प्रसि द्ध नहीं हुआ । यहां लो कगी त , लो क कथा , लो क गा था , पहेलिहेलियां इत्या दि अत्यंत सहजता से देखनेको मि लती हैं । लो क जी वन के सुख-दुखदु उल्लास हर्ष वि षा द संघर्ष को अभि व्यक्त करनेके लि ए लो कगी त सर्वश्रेष्ठ मा ध्यम प्रती त हो ते हैं । यह लो कगी त जनजी वन में इतना रच बस गए हैं की यह सा मा न्य जी वन का अभि न्न हि स्सा बन चुके हैं । इन लो कगी तों के द्वा रा ही बुंदेली संस्कृति को समझा जा सकता है यह भी कह सकते हैं कि इन लो कगी तों के दर्पण से संस्कृति का प्रति बिं ब देखा जा सकता है । असल में लो क संस्कृति ही लो कगी तों की कहा नी है और इन कहा नि यों में जनसा मा न्य का जी वन मा नसि क उद्वेग, वि चा र, अभि व्यक्ति , व्यंजना, संस्का र, संस्कृति सब कुछ सूक्ष्मता से समा हि त हैं । यह लो कगी त संक्षि प्त सरल स्पष्ट स्वभा व एक सुंदर संगी त में हो ते हैं । बुंदेलखंड में प्रचलि त लो कगी त बुंदेली जि नके संस्का र, आचा र-वि चा र, उत्सव, अध्या त्मि क, दर्शन इत्या दि का तो परि चय देते हैं सा थ ही इन के मा ध्यम से सा मा जि क जी वन शैली का भी सा क्षा त्का र हो ता है । इन लो कगी तों का स्वस्थ भा व प्रवणता ला लि त्य दर्शनीय है । बुंदेलखंड का केंद्र झां सीझां सी से 17 कि लो मी टर दूर ओरछा मध्य प्रदेश के नि मा ड़ी जि ले में आता है । यहां प्रभु श्री रा म रा जा के रूप में वि रा जमा न हैं । प्रभु श्री रा म की भक्ति यहां के लो गों की रगों में बसी हुई है ।दूर-दूर से लो ग पुख्य नक्षत्र पर (ज्यो ति षी य गणना में पड़नेवा ला एक वि शेष नक्षत्र) यहां आते हैं अपनेरा जा रा म की प्रां गप्रां ण में पूरी रा त गी तों के मा ध्यम से अपनी भा वनाओं को व्यक्त कर अपनी धा र्मि क आस्था ओं की पूर्ति करते हैं । उनका प्रया स रहता है कि श्री रा म कि सी प्रकार एक नजर उन पर डा ल दें । यहां रा म जी लो कगी तों में उसी प्रकार समा हि त हैं जैसे ब्रज में श्री कृष्ण । रा म यहां वि भि न्न रूपों में व्या प्त है । बुंदेलखंड वह स्था न है जहां श्री रा म अपनेभक्तों की भा वना से वि भो र हो कर अवध से ओरछा पधा रे । कहा जा ता है कि ओरछा की महा रा नी कुंवर गणेशी श्री रा म के अनन्य भक्त थीं और उन्हीं की भक्ति व प्रेम पर री झ कर या कहें अपनेइस भक्त के हट से वि वश हो कर श्री रा म को ओरछा धा म आना पड़ा । भगवा न श्री रा म रा नी कुंवर गणेशी जी के नि वा स महल ओरछा में वि रा जमा न हुए और इस तरह बुंदेलखंड के क्षेत्र में श्री रा म रा जा के रूप में यहां वि रा जमा न हुए एक लो कगी त के अनुसा ररा जा मधुकर शा ह की रा नी कुंवर गणेश । अवधपुरी से ओरछा ला ई अवध नरेश ।। आज भी यहां की धरती से रा म जी के जन्म उत्सव पर उठनेवा ली बधा इयां हर घर में गा ई जा ती हैं क्यों किक्योंकि जब घर में बा लक हो ता है तो वह यहां रा मजी का स्वरूप ही हो ता है और मा ता एं गां वगां उठते हैं - कोसल्ला ले लो बधा ई अवध में लल्ला भये हि ल मि ल गा दो बधा ई अवध में लल्ला भये….. Page 43 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 एक भक्तों के द्वा रा श्री रा म के प्रां गप्रां ण में लो गों से आवा हन कि या जा रहा है कि वे रा मचंद्र से या री करनेएक लो कगी त का आनंदमयी अंदा ज रा मचंद्र से या री कर लो रा मचंद्र से या री जि नेभजे नर नारी कर लो रा मचंद्र से या री ….. झूठे बेर शबरी के खा ए रस्ता ता कि बेचा री ….. कर लो रा मचंद्र से या री …. रा मचंद्र से या री …….. तुलसी दा स भजो रे भगवा न तो आ गई वि पदा टा री … कर लो रा मचंद्र से या री ….. ईश्वर की कृपा से महा रा ज दशरथ को एक सा थ चा र पुत्रों की प्रा प्ति हुई । रा जपरि वा र सहि त पूरी अयो ध्या हर्षा ति रेक में डूबी हुई हैं । तो उसनेउत्तर दि या खवा सन ( नाइन ) बंदनवा र ले जा रही हैं । लो गों नेजि ज्ञा सा वश पूछा - जो बंदनवा रों कहां लयें जा ती , जो बंदनवा रों …रों … । नगर अयो ध्या में सुत भये सजनी , रा जा मही पतके नाती । रा जा दशरथ के पुत्रा भये हैं रघुकूल जो त उजया र दई बा ती । उजया र दई बा ती , उजया र दई बा ती । जो बंदनवा रों ... .. रा नी कौशल्या की कूँख जुड़ा नी " सब सखि यन की शी तल भई छा ती । नगर अयो ध्या में दा न भयें हैं लै लै दा न मगन भई सखि याँ । मगन भई सखि याँ , मगन भई सखि याँ जो बंदनबा रों कहाँ लये जा ती । दा ई नारा छी ननेके पूर्व नेग माँ गमाँ ती हैं । कोई हा र दे रही है, है कोई ति लरी और कोई मो ति यों का था र । परंतु वह तो प्रभु शि शु का दर्शन करना चा हती हैं । यहाँ के लो कगी तों मधुरता का ऐसा समरस चि त्र अंकि त हुआ है जि ससे समझ आता है कि यहां की संस्कृति कि तनी समृद्धि और मधुर है । एक अन्य गी त के द्वा रा रा नी मैत्रेयी के द्वा रा दशरथ जी से दो वरदा न मां गनेकी पूरी कथा वर्णि त है । रा जा दशरथ अपनी रा नी को मनानेकी पूरी कोशि श कर रहे हैं पर रा नी मैत्रेयी कि जि द हैं कि रा म को वनवा स पर भेजना है । रा जा दशरथ भरत को रा जगद्दी देनेके लि ए तैया र हैं किं तु मैत्रेयी के द्वा रा रा म को वनवा स देनेकी नहीं किं तु मैत्रेयी अपनी मनमा नी कर रही है और वह नहीं मा न रही - Page 44 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 रा जा तो पौ ढ़े पलंग पै रा नी मलें पी ड़ौ ली ' महा रा ज । हँस - हँस पूछे रा जा दशरथ कैसी धन- अनमनी महा रा ज । भौ तक ' तो कहि ये रा जा अन्न धन भौ तक लक्ष्मी महा रा ज । सूनो अयो ध्या को रा ज अकेली संचत बि ना महा रा ज । तुम रा जा जइयो बा जा रै ' संचत भो ल ल्या इयों महा रा ज । तुम रा नी मूरख अजा न कहाँ लौं समझा इयें महा रा ज । हा टों में हति यां बि कायें संचत नहीं पा इयों महा रा ज । नगर को नौवा ' बुला ओं छुरा मँगा इयों महा रा ज । ची रौ अभा गि न को कूँख रा जा गँवा रि न कहै महा रा ज । काशी के पंडि त बुलवा इयों वेद बचवा इयों महा रा ज । रा जा जनम के गो गि या ग्या वन ' हि रनी मा रि यों महा रा ज । सो नेकी हि रनी गढुवा य रूपे के गबैलुवा " महा रा ज । बन बन देव छुड़ा य संचत तब हुइयें महा रा ज । तुम रा जा जइयों पहा रैं सजी वन ल्या इयों महा रा ज । घि स लुड़ि या " बँटवा इयों कटोरन छा नि यों महा रा ज । पि यो हैं बाँ टबाँ - बडा र ती नई रा नी अधन 2 से महा रा ज भये हैं नों दस मा स ललन चा र हो गये महा रा ज । बा जन लगी आनन्द बधैया सखी गा वें सो हरें महा रा ज । गौ वा के गो बर मँगइयों अंगन लि पवा इयों महा रा ज । गजमो ति न के चौ क पुरा कलश धरवा इयों महा रा ज । काशी के पंडि त बुला वेद पढ़ वइयों महा रा ज । बा रा " बरस के हुइयें रा म तब वन खाँ जइये महा रा ज । इतनी तो सुन रा जा दशरथ अटा रि यों चढ़ गयो । महा रा ज पा हू से गई कौशि ल्या पूछें कैसे रा जा अनमनेमहा रा ज । बा रा बरस के हुई हैं रा म वन खों जइहैं महा रा ज । वन खो जैहैं तो जा न दे फेर घर आहे महा रा ज । मो रो मि ट गओ बाँ झबाँ को नाँवनाँ तुम्हारों वंश चलो महा रा ज । Page 45 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 भगवा न रा म के जन्म पर दा ई को देनेके लि ए महा रा ज दशरथ कौशल्या केकई सुमि त्रा सभी उपहा र लेकर खड़े हैं किं तु दा ई को बा हर नहीं भगवा न रा म की चतुर्भुज रूप में दर्शन चा हि ए इसी प्रसंग में एक लो कगी त - ' कैसी मचल रई " दा ई अवध में , कैसी मचल रई दा ई । सुरंग चूनरी कैकई लयें ठा ड़ी , बई " न लैवे दा ई । सो नेको हा र कौशल्या लयें ठा ड़ी , कूलों " मरो र गई दा ई । सो नेकी ति लरी सुमि त्रा लयें ठा ड़ी , मुखई " न बो ले दा ई । मुति यन था र रा जा लयें ठा ड़ें , नजर न फेरे दा ई । नरा तुमा रों जबई हम छी न दरसन दें रघुरा ई । रूप चतुरभुज प्रभु दरसा यों , खुशी भई तब दा ई । दरसन लै दा ई घर खौ घर - घर हो त बड़ा ई । एक और लो क गी त जि समें रा म जी के हो नेपर दि न सो नेके समा न प्रकाशमा न प्रती त हो ता है डा ई आकर रा जा दशरथ को बधा ई दे रही है और कह रही है कि आज दि न सो नेका है महा रा ज जैसा कि हम सभी जा नते हैं कि अयो ध्या स्वर्णमई है और रा म जी के जन्म उत्सव पर सो नेके कलश का ही प्रयो ग हो रहा है और रा जा दशरथ प्रसन्न हो कर भा इयों को स्वर्ण आभूषण ही भेंट कर रहे हैं - आज दि न सो नेकौ महा रा ज । रा जा दशरथ के पुत्र भये हैं । सो नेके कलश धरा ये महा रा ज । सो नेके सब दि न सो नेकी सब रा तें , सो नेदि अल उजा रे महा रा ज । सुरा गऊ के गो बर मंगा ये ढि कधर आंगन लि पा ये महा रा ज । ननदी जू आइ सां ति या धरा एँ खुसि यन नाँचनाँ दि खा ये महा रा ज । Page 46 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 शा दी की रस्मों के गी त भी बुंदेली लो क भा षा की शा न है । शा दी कि सी भी घर में हो रही है पर यह लो कगी त हर घर लि खी खुशि यां बढ़ा नेका कारण बनते हैं । भगवा न रा म की वि वा ह में तेल चढ़ा नेकी रस्म का एक सुंदर लो क गी त - 'सो आज मो रे रा म जू खों तेल चढत है । तेल चढ़त है , फुलेल चढ़त है । सो नेकटोरा में तेल भरा यो , सो हल्दी मि ला के कैसों झलकत है । सो आज ..... । कुँवा रि न नेमि ल तेल चढ़ा यों , सो नारी न मंगल गी त मढ़त है । सौ आज मो रे रा म जू खों लगुन चढ़त है । लगुन चढ़त है आनन्द बढ़त है । कानन कुंडल मो रे रा म जू खों सो हैं । सो गा लन बि च मो ति यन लर ” सरकत हैं । केसर खौ र मो रे रा म जू खों सो हैं । सो गर बि च गो प " जंजी र लसत हैं । कंकन चूरा मो रे रा म जू खों सो हैं सों हा तन * बि च गजरा दरसत हैं । रा म जू के दरशन खों जि यरा तरसत हैं । मों आज मो रे रा म जू खों लगुन चढ़त हैं । कै आज मो रे ...... इस प्रकार जनक जी के यहां दुल्हदु न ( बन्नी ) बनी सी ता जी की स्थि ति देखि ये । जब श्री रा म बा रा त लेकर रा जा जनक के द्वा र पर पहुंचहुं ते हैं उस समय का सुंदर चि त्र लो कगी तों के मा ध्यम से कि या गया है ।द्वा रचा र के समय यह गी त गा ये जा नेवा ला यह लो कगी त जो मंडप इत्या दि के वि षय का सुंदर उल्लेख कर रहा है - हरे बाँ स मंडप छा ये सि या जू को रा म ब्या हन आये । जब सि या जू की लि खत लगुनि या , रकम - रकम कागज आये । सि या जू को रा म ब्या हन आये । हरे बां स ………. Page 47 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 जब सि या जू को चढ़त चढ़ा ओं,ओं रकम रकम गहना आये । सि या जू को रा म ब्या हन आये । हरे बाँ स .. । जब सि या जू की परत भां वरे ब्रह्मा पंडि त बन आये । सि या जू को ..... जब सि या की हो त बि दा हैं सब सखि यन आँसू आये । सि या जू को रा म ...... हरे बाँ स मंडप छा ये , सि या जू को रा म ब्या हन आये । एक अन्य लो कगी त के मा ध्यम से वि वा ह का सुंदर चि त्र अत्यंत मनभा वन प्रती त हो रहा है । इसमें मंडप की सुंदरता , बा रा ति यों के द्वा रा चढ़ा वा , बां स का मंडप, मो ती के चौ क, सो नेके कलश इत्या दि का मनोहर वर्णन है - एक समय मुनि जी जा कहैं मो रे रंजन भौं राभौं रा । चलि ये जनकपुर गाँ व मंडप सि या रा म के, मन रंन भौ रा । काहे के मंडप मो रे रंजन भौं राभौं रा । काहे के दो ई खंभ जनक - मंडप तरें मौ रे रंजन भौं राभौं रा । हरे बां सबां मंडप बनेमो रे रंजन भौं राभौं रा । मलया गि र के खंभ भौ रे रंजना भौं राभौं रा । सो हत सी ता रा म जनक मंडप तरैं मो रे रंजन भौं राभौं रा । कारी घटा घनश्या म सि या है दा मि नी मो रें रंजन भौं राभौं रा । (मंडप के नीचे चढ़ा वा चढ़ा या जा रहा है अनगि नत अमूल्य रत्नों का ढेर , जि नकी गि नती नहीं की जा सकती हैं ) चली है बा रा त मंडवा तरें आई अब चढ़ा व की भई तया री ¨ । सुरहन गऊ के गो बर मँगा ये ढि गधर आँगन लि पा ये । गजमुति यन के चौ क पुरा ये, कंचन कलश उजि या र धरा ये । पा ट पी ता म्बर उल्लन - पल्लन " सो नेरूपे को पा र नौ " पा ओ । चढ़ो है चढ़ा व जनक सुख पा ओ भली भां ति कन्या पहि रा ओ । Page 48 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 ‘ज्यो नार’ (जेवनार) गी त वि वा ह के समय गा ए जा नेवा ले लो कगी तो में बुंदेली ज्यो नार गी त अत्यंत प्रसि द्ध हैं । ज्यो नार वि वा ह के समय खि ला ए जा नेभो जन की एक रस्म है जो आज हुई बुंदेली लो क में हर्ष के सा थ मनाई जा ती है । रा म जी को सी ता मैया की सखि यां भो जन करा रही हैं । कि सी सखी नेआलू ,कि सी नेपूरी , कि सी नेकचौ ड़ी , कि सी नेलड्डू, तो ,कि सी नेगुजि या और पेड़े परो से हैं - मो रे रा म से करो न ररि याँ " जनकपुर की सखि याँ उननेआतर परसी सो पा तर" परसी परस दई दुनिदुनियाँ । जनकपुर .... उननेरा मरस परसो , मि र्चा परसो , परत दई अमि यां । जनकपुर .... उननेआलू परसे, रता लू परसे, परस दई घुईयां । जनकपुर .... उननेपूड़ी परसी , कचौ ड़ी परसी , परस दई पुईयाँ । जनकपुर .... उननेलड्डू परसे, पेड़ा परसे, परस दई गुझि यां । जनकपुर … उसी समय एक मजा क हो गया । परो सनेवा ले नेबा रा ती पर दो ना गि रा दि ये जि ससे उसके कपड़े खरा ब हो गये - मा ड़े जो परसे झा बक झो ला " भर गई पा तर उलंग गये दौ ना । खाँ ड़ जो परसी मुठी बगरा ई, ऊपर घी की धा र लगा ई । मैली सी धो ती फैर धुआरहो " गरय " से सा जन फि र कहो पा ड़ों जेउँत - जेउँत बड़ी रुचि आई, बा र - बा र हरि करत बड़ा ई । कंकन खो लना - वि वा ह के पश्चा त दूल्हे के द्वा रा दुल्हदु न का कंगन खो ला जा ता है इस रस्म को बड़े हुए सुंदर ढंग से मनाया जा ता है ये रस्में दूल्हा दुल्हदु न के सा थ सा थ परि वा र के सभी सदस्य करी ब ले आती हैं - जो नै¨ हो वे धनुष को टो रबो , कठि न कंकन गाँ ठगाँ छो रबों । तुमनेजनक पुरी पग धा रे , शि व के धनुष टो र कै डा रे । Page 49 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 जो न हो वे मा री च को मा रि वों । कठि न कंकन को . जनकपुरी की नारी आखि र सा री ¨ लगें तुम्हा री । जि नको बि न हथया रन मा रि बों कठि न कंकन … वे तो जनकपुरी की नारी हाँ सी करें तुम्हारी । अब तो सी खों सि या को जो रबों । कठि न कंकन को छो रबो । वन गमन गी त - जब भगवा न रा म को अपनेपि ता के वचन की रक्षा के लि ए वन जा ना हो ता है तो मा ता सी ता और भा ई लक्ष्मण जी रा म जी के सा थ या त्रा पर चल पड़ते हैं । वन की या त्रा की गा ए जा ने वा ला एक बुंदेली लो कगी त जो उस समय की पति को मनोहरी ढंग से प्रकट करता है - कर घर तन को , चले सि या रा म लखन बन को । रा म लखन बन को चले , रहा अवध में न कोय हो रा म .. नर - नारी व्या कुल हो ई रो वे , धी र धरे न कोय । हो रा मा ..... । खुशी भई कैकई मइया को चले सि या रा म बन को । रा म लखन तपसी दूनो भइया सा धु बनेचले जा य मो रे ला ल । जां य . चलत - चलत सा धु बा गों में पहुंचेहुं चेमा लि न नेपूछी है बा त मो रेला ल । तनक तो छइयाँ बि लमा लों मो रे सा धू " गजरा पहर चले जा वें मो रेला ल । तुम्हरें छुयें गजरा ना पहि रें मा लि न , सा धु धरम घट जा य मो रेला ल । 'कि लपें¨ अवधपुरी नर नारी , कोमल जनक दुलादु लारी जूँ । जब मा ता सी ता वन गमन के समय चलते चलते अपनेलगते हैं तो मा ता लक्ष्मण से कहते हैं थो ड़ा धी रे चलो - धी रे चलों मैं हा री लक्ष्मन , धी रे चलो मैं हा री । एक तो हा री , दूजें सुकुमा री , ती जे मजल कीं मा री । लक्ष्मण धी रे ..... सँकरी गलि याँ काँटकाँ - कटीलें , फा टत हैं तन सा री Page 50 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 लक्ष्मण धी रे ... गैल " चलत मो य " प्या स लगत हैं , दूजे पवन प्रचा री । धी रे चलों मैं हा री लक्ष्मन , धी रे चलो मैं हा री । वट - पूजन गी त - 'नगर अजुध्या की गैल में इक महुआ इक आम । जे तरैं " बैठे दो जने" इक लक्ष्मन दूजे रा म । ली ली बछेरन "लक्ष्मन आइयो , रथ चढ़ " आओ श्री रा म । सा त संखि न के संग में बैठी सी ता सपरन " जा यें । बी च मि ले दो ऊ पा हुँनेसी ता रही सकुचा य । सपरखो र घर आई बा री सी ता भौ जी नेदये पलँग बि छा य । टेरों " जनक जू के नौवा बा रे लक्ष्मन को डेरा दुवादु वाव । कौशल्या मा ता श्री रा म जी के जनकपुरी से लौ टनेपर पूछती है कि बेटा तुम्हारे ससुरा ल कैसी है?है वहां सब कैसा है?है तुम्हारा आवभगत केसे की? और वहां के लो ग कैसे हैं?हैं रा म जी बता ते हैं कि ससुरा ल हमा री ती र्थ जैसी है । सा स-ससुर गंगा और यमुना की तरह है । रा त को दूध की बया री मेरी सा स देती थीं और सा ले हमें घुड़सवा री करा नेले जा ते थे । इस तरह रा म जी अपने ससुरा ल की बढ़ा ई अपनी मा ता से करते हैं - हँस - हँस पूछे मा त कौशि ल्या बेटा कैसी बनी ससुरा र सा स हमा री गंगा जमना ससुर है ती रथ धा म । सा स हमा री अधि कपि या री देती है दूध बि या री । सा रे " हमा रे घुड़ला फि रा वे सा रा जें तपें रसो ई । जैसी मा त मढ़ ” भी तर लि खीं पुतरि या बैसी है बहु तुमा र । 'नौ दस मा स बेटा गरभ में रा खें वरस दसक लौं सेये । ती न दि ना खों बेटा गये ससुरा रे सौं जा य सि रा ही ससुरा ल । 'दुहादुहाई खँचों पि ता दशरथ की अब न जैहों ससुरा ल । अपनेरा म जी सों रही 10 करत हों बेटा नि त उठ जैंओं ससुरा र । बुंदेलखंड में प्रचलि त गा री के गी त इसमें हंसीहं सी मजा क के मा ध्यम से नोकझों कझों का आनंद लि या जा ता है इनके उदा हरण इस प्रकार हैं - Page 51 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 चढ़ा वे का लो कगी त ( गा री ) - आज श्री सि या जू को चढ़त चढ़ा व । हरे मण्डप के नीचे जू ।। धन्य धन्य दशरथ नेऐसा समय पा व । सेन्दुरन्दु की माँ गमाँ शी श फूल पहि रा व हरे मण्डप ………. ती न खा य घा गरे में जरकसी भरा व । मुक्तन को सा री में झलक रयौ भा व हरे मण्डप ………. बिं दि या अजूब ति लक वेंदा छवि छा व । कंचन के करण फूल सा करें सजा ब हरे मण्डप ………. ठुसी बी च ही रन को जड़ौ है जड़ा व । देखो सरमा ला को उत्तम सजा ब हरे मण्डप ………. नौ लखा सुहा र हि य ऊपर लटकाव । पां वपां पो स और दसऊ आंगरौ चढ़ा व हरे मण्डप ………. दा स कहे देख - देख अधि क सुख पा व हरे मण्डप ………. इस प्रकार जनकपुर की सखी श्री रा म से नौकझौं कझौं कर रही हैं, हैंयहाँ के लो कगी त की झाँ की झाँ देखि ये । यह भी एक गा री गी त है - रघुवंशी सुनेजइयो गा री , ओसर नोनो बनो ।। महा रा जा को भो रे बनाय लये ।। ओसर नोनो …… अलवेली अवध पति नारी ।। ओसर नोनो . ।। संगै लई ना सेज गये ।। ओसर नोनो ।। कैसे जा ये ललनवा चा रि ।। ओसर ।। गो रि न के कारे काय भयै ।। ओसर . ।। रा जा झगरौ दि यो नि रबा र ।। ओसर ।। कै गुन्डा गढी में कूद गये ।। ओसर ।। कै कामें बनायो मा र ।। ओसर ।। अवलौ वि नीत बड़ैहि रयै ।। ओसर . ।। मि थि ला में भयो नि रधा र ।। ओसर नोनो बनो ।। Page 52 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 रा म जी की भक्ति के द्वा रा एक गी त कि सके द्वा रा रा म जी के गुणों का बखा न कि या गया है जो रा म जी की शरण में एक बा र आ जा ता है ईश्वरी के अनुसा र उन्हों नेन्हों सदैव अपनेभक्तों की रक्षा की है और सभी कष्टों से उसे मुक्त कि या है - जि नके रा मचन्द्र रखवा रे, को कर सकत दगा रे । बड़े भये प्रह्ला द पक्ष में, हि रना कुश को मा रे । रा ना जहर दऔं मी रा खों ,खों प्री तम प्रा न समा रे । मसकी जा य ग्रा ह की गरदन, गह गजरा ज नि कारे । 'ईसुर' प्रभु नेला ज बचा ई , सि रपै गि रत हमा रे । नि ष्कर्ष - रा मचंद्र जी के प्रति लो गों में व्या प्त प्रेम एवं समर्पण उनकी भक्ति का ही प्रति बिं ब है वहीं रा मचंद्र जी उनके जी वन का दर्पण । रा म जी पर आधा रि त बुंदेली लो कगी तों में हम सा फ-सा फ बुंदेली संस्कृति एवं परंपरा ओं का दर्शन कर सकते हैं अर्था त यह कहना अनुचि त नहीं हो गा कि इन बुंदेली लो कगी तों के द्वा रा हम बुंदेलखंड की लो क संस्कृति को आसा नी से समझ सकते हैं जो परंपरा गत अभी स्वयं को संरक्षि त कि ए हुए हैं । यह समझना कठि न है कि इन लो कगी त के कारण संस्कृति संरक्षि त है अथवा संस्कृति का यह प्रवा ह लो कगी त को संरक्षि त कि ए हुए है । सरल शब्दों में कहा जा ए तो लो कगी त ही कि सी भी संस्कृति की सबसे सटी क परि चा यक हो ते हैं । लो क सा हि त्य की दृष्टि से बुंदेली भा षा स्वयं अन्य संस्कृति यों के बजा य अधि क समृद्ध प्रती त हो ती है । यहां के लो ग गी तों से भी यही अभि व्यंजना हो ती है अर्था त यह कहना उचि त हो गा कि बुंदेली लो कगी तों के श्री रा म बुंदेली संस्कृति में प्रा ण समा न है जो यहां की संस्कृति और वैभव को स्वयं में समेटे हुए हैं । संदर्भ ग्रंथ - 1. https://vimisahitya.wordpress.com/tag/bundeli/ 2. बुंदेली भा षा सा हि त्य का इति हा स, डॉ क्टर रा म नारा यण शर्मा , वा णी प्रकाशन, नई दि ल्ली । 3. बुंदेली , आरती दुबेदु बे, सा हि त्य अकादमी , दि ल्ली । 4. www.Bundelijalak.com 5. बुन्देली बि बि धा , डॉ क्टर गंगा प्रसा द बरसेया , अयन प्रकाशन, नई दि ल्ली । 6. बुंदेलखंड समग्र, संपा दक हरि वि ष्णु अवस्थी , मा धवरा व सप्रे संग्रहा लय एवं शो ध संस्था न भो पा ल । Page 53

अप्रैल २२, सॉनेट, सोरठे, हरिऔध, ट्रेन, श्री श्री, त्रिपदि, कुंडलिया, राम, सीता छंद, गीतिका छंद, दोहा, रोला, फतवा, नवगीत


सलिल सृजन अप्रैल २२
.
हरिऔध कथा २ 
सोरठा 
सुमिर नवाए माथ, हर हिंदी प्रेमी ऋणी। 
हिंदी मैया साथ, श्वास आखिरी तक रहे।। 

चूम 'लाल' कह माथ, मैया पहला दर्श कर। 
अंत 'राम' हों साथ, हिंदी साथ न छोड़ती।। 
चौपाई 
है हरिऔध कथा अति पावन। पढ़िए सुनिए करिए गायन।। 
श्रम निष्ठा आशा का परचम।‌सूर्य उगाए नित हरकर तम।। 
भारत माँ का पुत्र अनोखा।जिसका पूरा जीवन अनोखा।। 
था सामान्य असाधारण भी। हिंदी सुत, हिंदी सुत हिंदी चारण भी।। 
बृज अवधी उर्दू के झगड़े। भोजपुरी के दावे तगड़े।। 
बुंदेली कन्नौजी बोली। मेवाड़ी हाड़ौती टोली।। 
झगड़ मालवी संग निमाड़ी। खुद की जय खुद कर मरवाड़ी।। 
कठियावाड़ी शेखावाटी, सबका दावा सबकी माटी।। 
मन मुटाव की गठरी खोली। अंग्रेजी ने ताकत तोली।। 
सोरठा 
दो समूह हिंदी बँटी, संस्कृत-उर्दू द्वंद में। 
लड़कर निज ताकत घटी, फँसी विकट छल-छंद में।। 
चौपाई 
न्याय- प्रशासन का गुलाम मन। गौर मालिकों का बंदी तन।। 
लोक उपेक्षित है जब देखा। सिंह अयोध्या का कर लेखा।। 
टकसाली हिंदी का परचम। मैदां में आया ले दमखम।। 
अन्यों को दे सका चुनौती। हिंदी को मत मान बपौती।। 
सबकी हिंदी सबके हित हो। मत प्रधान इसमें निज हित हो।। 
सब देशज भाषाएँ सखियाँ। हिंदी सँग डालें गलबहियाँ।। 
सब हिंदी में घुल-मिल जाएँ। भारत भू की जय-जय गाएँ।। 
दयानंद स्वामी जी रचकर। कृति 'सत्यार्थ प्रकाश' दिवाकर।। 
'चंद्रकांता संतति' हिंदी में। लिख देवकीनंदन खत्री ने।। 
दिखलाई जो राह उसी पर। बढ़े अयोध्या सिंह चरण धर।। 
सोरठा 
तनिक न की परवाह, हुई बहुत आलोचना। 
रख हिंदी प्रति चाह, जुटे रहे हरिऔध जी।। 
२२.४.२०२६ 
०००
मुक्तक
नर पर दो दो मात्रा भारी।
खुश हो चलवा नर पर आरी।।
कभी न बोले 'हाँ', नित ना री!
कमजोरी ताकत भी नारी।।
सॉनेट
मुसाफ़िर
हम सब सिर्फ मुसाफिर यारो!
दुनिया प्लेटफार्म पर आए।
छीनो-झपटो व्यर्थ न प्यारो!
श्वास ट्रेन की टिकिट कटाए।।
सफर जिंदगी का हसीन हो।
हँस-बोलो तो कट जाएगा।
बजती मन में आस बीन हो।
संग न तू कुछ ले पाएगा।।
नाहक नहीं झमेला करना।
सबसे भाईचारा पालो।
नहीं टिकिटचैकर से डरना।।
जो चढ़-उतरे उसे सम्हालो।।
सफर न सफरिंग होने देना।
सर्फिंग कर भव नैया खेना।।
२२-४-२०२३●●●
मुसाफ़िरी सोरठे
*
ट्रेन कर रही ट्रेन, मुसाफिरों को सफर में।
सफर करे हमसफ़र, अगर मदद उसकी करें।।
*
जबलपूर आ गया, क्यों कहता है मुसाफिर।
आता-जाता आप, शहर जहाँ था है वहीं।।
*
करे मुसाफिर भूल, रेल रिजर्वेशन कहे।
बिछी जमीं पर रेल, बर्थ ट्रेन में सुरक्षित।।
*
बिना टिकिट चल रहे, रवि-शशि दोनों मुसाफिर।
समय ट्रेन पर रोज, टी सी नभ क्यों चुप रहे।।
*
नहीं मुसाफिर कौन, सब आते-जाते यहाँ।
प्लेटफ़ॉर्म का संग, नहीं सुहाता किसी को।।
*
देख मुसाफिर मौन, सिग्नल लाल हरा हुआ।
जा ले मंजिल खोज, प्रभु से है मेरी दुआ।।
*
सोरठा गीत
नाहक छोड़ न ठाँव।
*
रहे सुवासित श्वास,
श्रम सीकर सिंचित अगर।
मिले तृप्ति मिट प्यास,
हुई भोर उठ कर समर।।
कोयल कूके नित्य,
कागा करे न काँव
नाहक छोड़ न ठाँव।
*
टेर रही है साँझ,
नभ सिंदूरी हो रहा।
पंछी लौटे नीड़,
मानव लालच बो रहा।
थकी दुपहरी मौन
रोक कहीं तो पाँव,
नाहक छोड़ न ठाँव।
*
रात रुपहली जाग,
खनखन बजती चूड़ियाँ।
हेरे तेरी राह,
जयी न हों मजबूरियाँ।
पथिक भटक मत और
बुला रहा है गाँव।
नाहक छोड़ न ठाँव।
२२-४-२०२३
*
सॉनेट
मौसम
मौसम करवट बदल रहा है
इसका साथ निभाएँ कैसे?
इसको गले लगाएँ कैसे?
दहक रहा है, पिघल रहा है
बेगाना मन बहल रहा है
रोज आग बरसाता सूरज
धरती को धमकाता सूरज
वीरानापन टहल रहा है
संयम बेबस फिसल रहा है
है मुगालता सम्हल रहा है
यह मलबा भी महल रहा है
व्यर्थ न अपना शीश धुनो
कोरे सपने नहीं बुनो
मौसम की सिसकियाँ सुनो
२२-४-२०२२
•••
सॉनेट
महाशक्ति
महाशक्ति हूँ; दुनिया माने
जिससे रूठूँ; उसे मिटा दूँ
शत्रु शांति का; दुनिया जाने
चाहे जिसको मार उठा दूँ
मौतों का सौदागर निर्मम
गोरी चमड़ी; मन है काला
फैलाता डर दहशत मातम
लज्जित यम; मरघट की ज्वाला
नर पिशाच खूनी हत्यारा
मिटा जिंदगी खुश होता हूँ
बारूदी विष खाद मिलाकर
बीज मिसाइल के बोता हूँ
सुना नाश के रहा तराने
महाशक्ति हूँ दुनिया माने
२२-४-२०२२
•••
चिंतन ४
कैसे?
'कैसे' का विचार तभी होता है इससे पहले 'क्यों' और 'क्या' का निर्णय ले लिया गया हो।
'क्यों' करना है?
इस सवाल का जवाब कार्य का औचित्य प्रतिपादित करता है। अपनी गतिविधि से हम पाना क्या चाहते हैं?
'क्या' करना है?
इस प्रश्न का उत्तर परिवर्तन लाने की योजनाओं और प्रयासों की दिशा, गति, मंज़िल, संसाधन और सहयोगी निर्धारित करता है।
'कैसे'
सब तालों की चाबी यही है।
चमन में अमन कैसे हो?
अविनय (अहंकार) के काल में विनय (सहिष्णुता) से सहयोग कैसे मिले?
दुर्बोध हो रहे सामाजिक समीकरण सुबोध कैसे हों?
अंतर्राष्ट्रीय, वैश्विक और ब्रह्मांडीय संस्थाओं और बरसों से पदों को पकड़े पुराने चेहरों से बदलाव और बेहतरी की उम्मीद कैसे हो?
नई पीढ़ी की समस्याओं के आकलन और उनके समाधान की दिशा में सामाजिक संस्थाओं की भूमिका कितनी और कैसे हो?
नई पीढ़ी सामाजिक संस्थाओं, कार्यक्रमों और नीतियों से कैसे जुड़े?
कैसे? कैसे? कैसे?
इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तलाशने का श्रीगणेश कैसे हो?
२२•४•२०२२
***
प्रात नमन
*
मन में लिये उमंग पधारें राधे माधव
रचना सुमन विहँस स्वीकारें राधे माधव
राह दिखाएँ मातु शारदा सीख सकें कुछ
सीखें जिससे नहीं बिसारें राधे माधव
हों बसंत मंजरी सदृश पाठक रचनाएँ
दिन-दिन लेखन अधिक सुधारें राधे-माधव
तम घिर जाए तो न तनिक भी हैरां हों हम
दीपक बन दुनिया उजियारें राधे-माधव
जीतेंगे कोविंद न कोविद जीत सकेगा
जीवन की जय-जय उच्चारें राधे-माधव
***
प्राची ऊषा सूर्य मुदित राधे माधव
मलय समीरण अमल विमल राधे माधव
पंछी कलरव करते; कोयल कूक रही
गौरैया फिर फुदक रही राधे माधव
बैठ मुँडेरे कागा टेर रहा पाहुन
बनकर तुम ही आ जाओ राधे माधव
सुना बजाते बाँसुरिया; सुन पायें हम
सँग-सँग रास रचा जाओ राधे माधव
मन मंदिर में मौन न मूरत बन रहना
माखन मिसरी लुटा जाओ राधे माधव
२१-४-२०२०
***
दोहा सलिला
नियति रखे क्या; क्या पता, बनें नहीं अवरोध
जो दे देने दें उसे, रहिए आप अबोध
*
माँगे तो आते नहीं , होकर बाध्य विचार
मन को रखिए मुक्त तो, आते पा आधार
*
सोशल माध्यम में रहें, नहीं हमेशा व्यस्त
आते नहीं विचार यदि, आप रहें संत्रस्त
*
एक भूमिका ख़त्म कर, साफ़ कीजिए स्लेट
तभी दूसरी लिख सकें,समय न करता वेट
*
रूचि है लोगों में मगर, प्रोत्साहन दें नित्य
आप करें खुद तो नहीं, मिटे कला के कृत्य
*
विश्व संस्कृति के लगें, मेले हो आनंद
जीवन को हम कला से, समझें गाकर छंद
*
भ्रमर करे गुंजार मिल, करें रश्मि में स्नान
मन में खिलते सुमन शत, सलिल प्रवाहित भान
*
हैं विराट हम अनुभूति से, हुए ईश में लीन
अचल रहें सुन सकेंगे, प्रभु की चुप रह बीन
***
मनरंजन -
आर्य भट्ट ने शून्य की खोज ६ वीं सदी में की तो लगभग ५००० वर्ष पूर्व रामायण में रावण के दस सर की गणना और त्रेता में सौ कौरवों की गिनती कैसे की गयी जबकि उस समय लोग शून्य (जीरो) को जानते ही नही थे।
*
आर्यभट्ट ने ही (शून्य / जीरो) की खोज ६ वीं सदी में की, यह एक सत्य है। आर्यभट्ट ने ० (शून्य, जीरो) की खोज *अंकों मे* की थी, *शब्दों* नहीं। उससे पहले ० (अंक को) शब्दों में शून्य कहा जाता था। हिन्दू धर्म ग्रंथों जैसे शिव पुराण,स्कन्द पुराण आदि में आकाश को *शून्य* कहा गया है। यहाँ शून्य का अर्थ अनंत है । *रामायण व महाभारत* काल में गिनती अंकों में नहीं शब्दो में होती थी, वह भी *संस्कृत* में।
१ = प्रथम, २ = द्वितीय, ३ = तृतीय, ४ = चतुर्थ, ५ = पंचम, ६ = षष्ठं, ७ = सप्तम, ८ = अष्टम, ९= नवंम, १० = दशम आदि।
दशम में *दस* तो आ गया, लेकिन अंक का ० नहीं।
आया, ‍‍रावण को दशानन, दसकंधर, दसशीश, दसग्रीव, दशभुज कहा जाता है !!
*दशानन मतलव दश+आनन =दश सिरवाला।
त्रेता में *संस्कृत* में *कौरवो* की संख्या सौ *शत* शब्दों में बतायी गयी, अंकों में नहीं।
*शत्* संस्कृत शब्द है जिसका हिन्दी में अर्थ सौ (१००) है। *शत = सौ*
रोमन में १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, ०, के स्थान पर i, ii, iii, iv, v, vi, vii, viii, ix, x आदि लिखा-पढ़ा जाता है किंतु शून्य नहीं आता।आप भी रोमन में एक से लेकर सौ की गिनती पढ़ लिख सकते है !!
आपको ० या ०० लिखने की जरूरत भी नहीं पड़ती है।
तब गिनती को *शब्दो में* लिखा जाता था !!
उस समय अंकों का ज्ञान नहीं, था। जैसे गीता,रामायण में अध्याय १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, को प्रथम अध्याय, द्वितीय अध्याय, पंचम अध्याय,दशम अध्याय... आदि लिखा-पढ़ा जाका था।
दशम अध्याय ' मतलब दसवाँ पाठ (10th lesson) होता है !!
इसमे *दश* शब्द तो आ गया !! लेकिन इस दश मे *अंको का ०* (शून्य, जीरो)" का प्रयोग नही हुआ !!
आर्यभट्ट ने शून्य के लिये आंकिक प्रतीक "०" का अन्वेषण किया जो हमारे आभामंडल, पृथ्वी के परिपथ या सूर्य के आभामंडल का लघ्वाकार है।
*
२०-४-२०२०
कुंडलिया
*
नारी को नर पूजते, नारी नर की भक्त
एक दूसरे के बिना दोनों रहें अशक्त
दोनों रहें अशक्त, मिलें तो रचना करते
उनसा बनने भू पर, ईश्वर आप उतरते
यह दीपक वह ज्योत, पुजारिन और पुजारी
मन मंदिर में मौन, विराजे नर अरु नारी
२२-४-२०२०
***
दोहा-दोहा राम
*
भीतर-बाहर राम हैं, सोच न तू परिणाम
भला करे तू और का, भला करेंगे राम
*
विश्व मित्र के मित्र भी, होते परम विशिष्ट
युगों-युगों तक मनुज कुल, सीख मूल्य हो शिष्ट
*
राम-नाम है मरा में, जिया राम का नाम
सिया राम पैगाम है, राम सिया का नाम
*
उलटा-सीधा कम-अधिक, नीचा-ऊँच विकार
कम न अधिक हैं राम-सिय, पूर्णकाम अविकार
*
मन मारुतसुत हो सके, सुमिर-सुमिर सिय-राम
तन हनुमत जैसा बने, हो न सके विधि वाम
*
मुनि सुतीक्ष्ण मति सुमति हो, तन हो जनक विदेह
धन सेवक हनुमंत सा, सिया-राम का गेह
*
शबरी श्रम निष्ठा लगन, सत्प्रयास अविराम
पग पखर कर कवि सलिल, चल पथ पर पा राम
*
हो मतंग तेरी कलम, स्याही बन प्रभु राम
श्वास शब्द में समाहित, गुंजित हो निष्काम
*
अत्रि व्यक्ति की उच्चता, अनुसुइया तारल्य
ज्ञान किताबी भंग शर, कर्मठ राम प्रणम्य
*
निबल सरलता अहल्या, सिया सबल निष्पाप
गौतम संयम-नियम हैं, इंद्र शक्तिमय पाप
*
नियम समर्थन लोक का, पा बन जाते शक्ति
सत्ता दण्डित हो झुके, हो सत-प्रति अनुरक्ति
*
जनगण से मिल जूझते, अगर नहीं मतिमान.
आत्मदाह करते मनुज, दनुज करें अभिमान.
*
भंग करें धनु शर-रहित, संकुच-विहँस रघुनाथ.
भंग न धनु-शर-संग हो, सलिल उठे तब माथ.
२२-४-२०१९
***
श्री श्री चिंतन दोहा मंथन
इंद्रियाग्नि:
24.7.1995, माँट्रियल आश्रम, कनाडा
*
जीवन-इंद्रिय अग्नि हैं, जो डालें हो दग्ध।
दूषित करती शुद्ध भी, अग्नि मुक्ति-निर्बंध।।
*
अग्नि जले; उत्सव मने, अग्नि जले हो शोक।
अग्नि तुम्हीं जल-जलाते, या देते आलोक।।
*
खुद जल; जग रौशन करें, होते संत कपूर।
प्रेमिल ऊष्मा बिखेरें, जीव-मित्र भरपूर।।
*
निम्न अग्नि तम-धूम्र दे, मध्यम धुआँ-उजास।
उच्च अग्नि में ऊष्णता, सह प्रकाश का वास।।
*
करें इंद्रियाँ बुराई, तिमिर-धुआँ हो खूब।
संयम दे प्रकृति बदल, जा सुख में तू डूब।।
*
करें इंद्रियाँ भलाई, फैला कीर्ति-सुवास।
जहाँ रहें सत्-जन वहाँ, सब दिश रहे उजास।।
***
12.4.2018
मुक्तक
अर्थ डे है, अर्थ दें तो अर्थ का कुछ अर्थ हो.
जेब खाली ही रहे तो काटना भी व्यर्थ हो
जेब काटे अगर दर्जी तो न मर्जी पूछता
जेबकतरा जेब काटे बिन सजा न अनर्थ हो
***
अभिनव प्रयोग
त्रिपदियाँ
(सोलह मात्रिक संस्कारी जातीय छंद, पदांत गुरु)
*
तन्मय जिसमें रहें आप वो
मूरत मन-मंदिर में भी हो
तीन तलाक न दे पाएँगे।
*
नहीं एक के अगर हुए तो
दूजी-तीजी के क्या होंगे?
खाली हाथ सदा पाएँगे।
*
बीत गए हैं दिन फतवों के
साथ समय के नहीं चले तो
आप अकेले पड़ जाएँगे।
२२-४-२०१७
*
छन्द बहर का मूल है ९
मुक्तिका:
*
पंद्रह वार्णिक, अति शर्करी जातीय सीता छंद.
छब्बीस मात्रिक महाभागवत जातीय गीतिका छंद
मात्रा क्रम -२१२.२/२१.२२/२.१२२./२१२
गण सूत्र-रतमयर
बहर- फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन
*
कामना है रौशनी की भीख दें संसार को
मनुजता को जीत का उपहार दें, हर हार को
सर्प बाधा, जिलहरी है परीक्षा सामर्थ्य की
नर्मदा सा ढार दें शिवलिंग पर जलधार को
कौन चाहे मुश्किलों से हो कभी भी सामना
नाव को दे छोड़ जब हो जूझना मँझधार को
भरोसा किस पर करें जब साथ साया छोड़ दे
नाव से खतरा हुआ है हाय रे पतवार को
आ रहे हैं दिन कहीं अच्छे सुना क्या आपने?
सूर्य ही ठगता रहा जुमले कहा उद्गार को
२३-०७-२०१५
***
नवगीत
*
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
जनमत के लोथड़े बटोरें
पद के भूखे चंद चटोरे.
दर-दर घूम समर्थन माँगें
ले हाथों में स्वार्थ-कटोरे.
मिलीभगत
फैला अफवाहें
खड़ा करो हऊआ.
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
बाँट रहे अनगिन आश्वासन,
जुमला कहते पाकर शासन.
टैक्स और मँहगाई बढ़ाते
माल उड़ाते, देते भाषण.
त्याग-परिश्रम
हैं अवमूल्यित
साध्य खेल-चऊआ.
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
निर्धन हैं बेबस अधनंगे
धनी-करें फैशन अधनंगे.
लाज न ढँक पाता है मध्यम
भद्र परेशां, लुच्चे चंगे.
खाली हाथ
सभी को जाना
सुने न क्यों खऊआ?
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
नवगीत
फतवा
*
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
ठेकेदार
हमीं मजहब के।
खासमखास
हमई हैं रब के।
जब चाहें
कर लें निकाह फिर
दें तलाक.
क्यों रायशुमारी?
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
सही-गलत क्या
हमें न मतलब।
मनमानी ही
अपना मजहब।
खुद्दारी से
जिए न औरत
हो जूती ही
अपनी चाहत।
ख्वाब न उसके
बनें हकीकत
है तैयारी।
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
हमें नहीं
कानून मानना।
हठधर्मी कर
रार ठानना।
मनगढ़ंत
हम करें व्याख्या
लाइलाज है
अकल अजीरण
की बीमारी।
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
नवगीत: बिंदु-बिंदु परिचय
*
१. नवगीत के २ हिस्से होते हैं १. मुखड़ा २. अंतरा।
२. मुखड़ा की पंक्तिसंख्या या पंक्ति में वर्ण या मात्रा संख्याका कोई बंधन नहीं होता पर मुखड़े की प्रथम या अंतिम एक पंक्ति के समान पदभार की पंक्ति अंतरे के अंत में आवश्यक है ताकि उसके बाद मुखड़े को दोहराया जा सके तो निरंतरता की प्रतीति हो।
३. सामान्यतः २ या ३ अंतरे होते हैं। अन्तरा सामान्यतः स्वतंत्र होता है पर पूर्व या पश्चात्वर्ती अंतरे से सम्बद्ध नहीं होता। अँतरे में पंक्ति या पंक्तियों में वर्ण या मात्रा का कोई बंधन नहीं होता किन्तु अंतरे की पंक्तियों में एक लय का होना तथा वही लय हर अन्तरे में दोहराई जाना आवश्यक है।
४. नवगीत में विषय, रस, भाव आदि का कोई बंधन नहीं होता।
५. संक्षिप्तता, लाक्षणिकता, मार्मिकता, बेधकता, स्पष्टता, सामयिकता, सहजता-सरलता नवगीत के गुण या विशेषतायें हैं।
६. नवगीत की भाषा में देशज शब्दों के प्रयोग से उपज टटकापन या अन्य भाषिक शब्द विशिष्टता मान्य है, जबकि लेख, निबंध में इसे दोष कहा जाता है।
७. नवगीत की भाषा सांकेतिक होती है, गीत में विस्तार होता है।
८. नवगीत में आम आदमी की या सार्वजनिक भावनाओं को अभिव्यक्ति दी जाती है जबकि गीत में गीतकार अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को शब्दित करता है।
९. नवगीत में अप्रचलित छंद या नए छंद को विशेषता कहा जाता है। छंद मुक्तता भी स्वीकार्य है पर छंदहीनता नहीं।
१०. नवगीत में अलंकारों की वहीं तक स्वीकार्यता है जहाँ तक वे कथ्य की स्पष्ट-सहज अभिव्यक्ति में बाधक न हों।
११. नवगीत में प्रतीक, बिम्ब तथा रूपक भी कथ्य के सहायक के रूप में ही होते हैं।
सारत: हर नवगीत अपने आप में पूर्ण तथा गीत होता है पर हर गीत नवगीत नहीं होता। नवगीत का अपरिहार्य गुण उसका गेय होना है।
+++++++
नवगीत:
.
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
साये से भय खाते लोग
दूर न होता शक का रोग
बलिदानी को युग भूले
अवसरवादी करता भोग
सत्य न सुन
सह पाते
झूठी होती वाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
उसने पाया था बहुमत
साथ उसी के था जनमत
सिद्धांतों की लेकर आड़
हुआ स्वार्थियों का जमघट
बलिदानी
कब करते
औरों की परवाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
सत्य, झूठ को बतलाते
सत्ता छिने न, भय खाते
छिपते नहीं कारनामे
जन-सम्मुख आ ही जाते
जननायक
का स्वांग
पाल रहे डाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
वह हलाहल रहा पीता
बिना बाजी लड़े जीता
हो विरागी की तपस्या
घट भरा वह, शेष रीता
जन के मध्य
रहा वह
चाही नहीं पनाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
कोई टोंक न पाया
खुद को झोंक न पाया
उठा हुआ उसका पग
कोई रोक न पाया
सबको सत्य
बताओ, जन की
सुनो सलाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
***
मुक्तक:
*
हम एक हों, हम नेक हों, बल दो हमें जगदंबिके!
नित प्रात हो, हम साथ हों, नत माथ हो जगवन्दिते !!
नित भोर भारत-भारती वर दें हमें सब हों सुखी
असहाय के प्रति हों सहायक हो न कोई भी दुखी
*
मत राज्य दो मत स्वर्ग दो मत जन्म दो हमको पुन:
मत नाम दो मत दाम दो मत काम दो हमको पुन:
यदि दो हमें बलिदान का यश दो, न हों जिन्दा रहें
कुछ काम मातु! न आ सके नर हो, न शर्मिंदा रहें
*
तज दे सभी अभिमान को हर आदमी गुणवान हो
हँस दे लुटा निज ज्ञान को हर लेखनी मतिमान हो
तरु हों हरे वसुधा हँसे नदियाँ सदा बहती रहें-
कर आरती माँ भारती! हम हों सुखी रसखान हों
*
फहरा ध्वजा हम शीश को अपने रखें नत हो उठा
मतभेद को मनभेद को पग के तले कुचलें बिठा
कर दो कृपा वर दो जया!हम काम भी कुछ आ सकें
तव आरती माँ भारती! हम एक होकर गा सकें
*
[छंद: हरिगीतिका, सूत्र: प्रति पंक्ति ११२१२ X ४]
२२-४-२०१५
***
षट्पदी :
*'
हिन्दी की जय बोलिए, हो हिन्दीमय आप.
हिन्दी में पढ़-लिख 'सलिल', सकें विश्व में व्याप्त..
नेह नर्मदा में नहा, निर्भय होकर डोल.
दिग-दिगंत को गुँजा दे, जी भर हिन्दी बोल..
जन-गण की आवाज़ है, भारत मान ता ताज.
हिन्दी नित बोले 'सलिल', माँ को होता नाज़..
*
२२-४-२०१०
छंद सलिला:
विशेषिका छंद
*
छंद-लक्षण: जाति महादैशिक , प्रति चरण मात्रा २० मात्रा, चरणांत तीन लघु लघु गुरु (सगण)।
लक्षण छंद:
'विशेषिका' कलाएँ बीस संग रहे
विशेष भावनाएँ कह दे बिन कहे
कमल ज्यों नर्मदा में हँस भ्रमण करे
'सलिल' चरण के अंत में सगण रहे
उदाहरण:
१. नेता जी! सीखो जनसेवा, सुधरो
रिश्वत लेना छोडो अब तो ससुरों!
जनगण ने देखे मत तोड़ो सपने
मानो कानून सभी मानक अपने
२. कान्हा रणछोड़ न जा बज मुरलिया
राधा का काँप रहा धड़कता जिया
निष्ठुर शुक मैना को छोड़ उड़ रहा
यमुना की लहरों का रंग उड़ रहा
नीलाम्बर मौन है, कदम्ब सिसकता
पीताम्बर अनकहनी कहे ठिठकता
समय महाबली नाच नचा हँस रहा
नटवर हो विवश काल-जाल फँस रहा
३. बंदर मामा पहन पजामा सजते
मामी जी पर रोब ज़माने लगते
चूहा देखा उठकर भागे घबरा
मामी मन ही मन मुस्काईं इतरा
२२-४-२०१४
*********************************************
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कामिनीमोहन कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दीपकी, दोधक, नित, निधि, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हेमंत, हंसगति, हंसी)
***
मुक्तक:
नव संवत्सर मंगलमय हो.
हर दिन सूरज नया उदय हो.
सदा आप पर ईश सदय हों-
जग-जीवन में 'सलिल' विजय हो.
*
दिल चुराकर आप दिलवर बन गए.
दिल गँवाकर हम दीवाने हो गए.
दिल कुचलनेवाले दिल की क्यों सुनें?
थामकर दिल वे सयाने बन गए.
*
पीर पराई हो सगी, निज सुख भी हो गैर.
जिसको उसकी हमेशा, 'सलिल' रहेगी खैर..
सबसे करले मित्रता, बाँट सभी को स्नेह.
'सलिल' कभी मत किसी के, प्रति हो मन में बैर..
*
मन मंदिर में जो बसा, उसको भी पहचान.
जग कहता भगवान पर वह भी है इंसान..
जो खुद सब में देखता है ईश्वर का अंश-
दाना है वह ही 'सलिल' शेष सभी नादान..
*
'संबंधों के अनुबंधों में ही जीवन का सार है.
राधा से,मीरां से पूछो, सार भाव-व्यापार है..
साया छोडे साथ,गिला क्यों?,उसका यही स्वभाव है.
मानव वह जो हर रिश्ते से करता'सलिल'निभाव है.'
२२-४-२०१०
***

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

अप्रैल २१, सॉनेट, रेलगाड़ी, दोहा, कुण्डलिया, नवगीत, बुंदेली कहानी, बाला छंद, रामवत छंद, हेमंत छंद, अंगिका

सलिल सृजन अप्रैल २१
*
हरिऔध कथा १ ० दोहा प्रगटे थे हरिऔध जी, लेकर प्रतिभा दिव्य। अनुपम जीवट के धनी, सहज सरल शुचि भव्य।। चौपाई हिंदी-हित ही भू पर आए। हिंदी के गुण पल-पल गाए।। सिंह अयोध्या के निष्काम। कलम चली युग-युग अविराम।। कालजयी कृतियाँ सब अनुपम। समय साsक्षी चिंतन परचम।। है हरिऔध प्रेरणा-दायी। नव चिंतन हम सब अनुयायी।। भरा रस कलश शब्द-शब्द में। पंक्ति-पंक्ति पढ़ सब निशब्द थे।। अलंकारमय भाषा भूषित। तत्सम-तद्भव शब्द विशेषित।। अनुप्रासिक छवि-छटा निराली। महकी बगिया कवितावाली।। उपमा सम्यक नवल अनूठी। हुईं न जो पहले से जूठी।। रूपक न्यारे मन को छूते। यमक सभंग-अभंग अनूठे।। दोहा पढ़-सुन गहरे डूबिए, पाएँ मोती नित्य। अतिशय उक्ति नहीं तनिक। अनुभव करिए सत्य।। २१.४.२०२६
०००
दोहा ग़ज़ल ० मालव की विद्यावती, बन बुंदेली शान। शिप्रा-सागर सेतु बन, गई गुँजा निज गान।। मालविका-वर्षा-शरद, एक रूप दो बिंब। सारस्वत रचना जगत, हिंदी हित रसखान।। नेह नर्मदा विरासत, सुरभित ज्यों किंजल्क। शिव प्रसाद जिसको मिला, धन्य वही जजमान।। गौर करें हरि सिंह सतत, जिस पर हो वह तीर्थ। रहा न विश्व विद्यालय, गुरुकुल हुआ महान।। कंकर को शंकर करे, श्रम-सीकर की बूँद। बंजर संजीवित करें, सलिल अमिय सम मान।। २१ . ४ . २०२६
०००
पूर्णिका
.
लिली लली भर ले उड़ान हँस
रह सतर्क मत तूफां में फँस
.
बाधा पद-तल कुचल, न डरना
शैतानों को नागिन बन डँस
.
बदनामी का दलदल घातक
छींटों से बच, नहीं पंक धँस
.
जगह न देता कोई किसी को
आप बना लें जगह, जूझ-ठँस
.
गर उपहास करे जग तेरा
लगा ठहाका तू जग पर हँस
२१.४.२५
०००
*
सॉनेट
रेलगाड़ी
रेलगाड़ियाँ दौड़ रही हैं।
पूरब-पच्छिम-उत्तर-दक्खिन।
सबको पीछे छोड़ रही हैं।।
करें सफर हर साँझ-रात-दिन।।
कौन बताए कितने चक्के?
बोगी-बर्थ-सीट हैं कितनी?
खातीं, देतीं कितने धक्के?
सहनशक्ति है ईश्वर जितनी।।
जितना पैसा, उतनी सुविधा।
बिना टिकट मत चढ़ो मुसाफिर।
रखना मन में तनिक न दुविधा।।
लड़ना हर मुश्किल से डटकर।।
सबसे लेती होड़ रही हैं।
रेलगाड़ियाँ दौड़ रही हैं।।
२१-४-२०२३
●●●
सॉनेट
जागरण
जागरण का समय जागो
बहुत सोये अब न सोना।
भुज भरे आलस्य त्यागो
नवाशा के बीज बोना।।
नमन कर रख कदम भू पर
फेफड़ों में पवन भर ले।
आचमन कर सलिल का फिर
गगन-रवि को नमन कर ले।।
मुड़ न पीछे, देख आगे
स्वप्न कुछ साकार कर ले।
दैव भी वरदान माँगे
जगत का उद्धार कर दे।।
भगत के बस में रहे वह
ईश जिसको जग रहा कह।।
२१-४-२०२२
•••
चित्र अलंकार
अर्ध पिरामिड
*
हे
राम!
मत हो
प्रभु वाम।
कोरोना मार,
लो हमें उबार,
हर पीर तमाम।
बहुत दुखी संसार,
सब तरफ हाहाकार,
बाँह थाम, स्वीकार प्रणाम।
*
दोहा सलिला
*
प्राण दीप की दीप्ति दे, कोरोना को मात।
श्वास सलिल संजीव कर, कहे हुआ फिर प्रात।।
*
लोभ-मोह कम कीजिए, सुख देता संतोष।
बाहर कम घर अधिक रह, बढ़ा स्नेह का कोष।।
*
जो बिछुड़े उनको नमन, जो सँग रखिए ध्यान।
खुद भी रहिए सुरक्षित, पा-दें साँसें दान।।
*
करें गरारे भाप लें, सुबह शाम लें धूप।
कांता की जय बोले, कहिए कांत अनूप।।
*
आशा कभी न छोड़िए, करें साधना योग।
लगे मुखौटा दूर हो, कोरोना का रोग।।
२१-४-२०२१
***
नवगीत
शेष है
*
दुनिया की
उत्तम किताब हम
खुद को पढ़ना
मगर शेष है
*
पोथी पढ़-पढ़ थक हारे हैं
बिना मौत खुद को मारे हैं
ठाकुर हैं पर सत्य न बूझें
पूज रहे ठाकुरद्वारे हैं
विधना की
उत्तम रचना हम
खुद कुछ रचना
मगर शेष है
*
अक्षर होकर क्षर ही जोड़ा
राह बना, अपना पग मोड़ा
तिनका-तिनका चले जोड़ने
जोड़-जोड़कर हर दिल तोडा
छंदों का
उत्तम निभाव हम
खुद का निभना
मगर शेष है
*
डर मत, उछल-कूद मस्ता ले
थक जाए तो रुक सुस्ता ले
क्यों यंत्रों सा जीवन जीता?
चल पंछी बन, कलरव गा ले
कर्मों की
उत्तम कविता हम
खुद को कहना
मगर शेष है
***
***
बुंदेली कहानी
समझदारी
*
आज-काल की नईं, बात भौर दिनन की है।
अपने जा बुंदेलखंड में चन्देलन की तूती बोलत हती।
सकल परजा भाई-चारे कें संगै सुख-चैन सें रैत ती।
सेर और बुकरियाँ एकई घाट पै पानी पियत ते।
राजा की मरजी के बगैर नें तो पत्ता फरकत तो, नें चिरइया पर फड़फड़ाउत ती।
सो ऊ राजा कें एक बिटिया हती।
बिटिया का?, कौनऊ हूर की परी घाईं, भौतऊ खूबसूरत।
बा की खूबसूरती को कह सकत आय?
जैसे पूरनमासी में चाँद, दीवारी में दिया जोत की सी, जैंसे दूद में झाग।
ऐंसी खिलंदड जैसे नर्मदा और ऊजरी जैंसे गंगा।
जब कभूं राजकुँवरि दरबार में जात तीं तौ दरबार जगमगान लगत तो।
राजकुँवरि के रूप और गुनन कें बखान सें सकल परजा को सर उठ जात तो।
एक सें बढ़के एक राजा, जागीरदार अउर जमींदार उनसें रिश्ते काजे ललचात रैत ते।
मनो राजकुँवरि कौनऊ के ढिंगे आँख उठा के भी नें हेरत ती।
जब कभऊं राजदरबार में कछू बोलत ती तो मनो बीना कें तार झनझना जाउत ते।
राजा के मूं लगे दरबारन नें एक दिना हिम्मत जुटा कहें राजा साब सें कई।
"महाराज जू! बिटिया रानी सयानी भई जात हैं।
उनके ब्याह-काज कें लाने बात करो चाही।
समय जात देर नईं लगत, बात-चीत भओ चहिए।''
दरबारन की बातें कान में परतई राजकुँवरि के गालन पे टमाटर घाईं लाली छा गई।
राजकुँवरि के नैन नीचे झुक गए हते।
राजा साहब ने जा देख कें अनुमान कर लओ कि दरबारी ठीकई कै रए।
राजकुँवरि ने परदे की ओट सें कई -''दद्दा जू! हुसियार राजा कहें अपनेँ वफादार दरबारन की बात सुनों चाही।''
राजा साब नें अचरज के साथ राजकुँवरि की तरफ हेर खें कई ''हम सोई ऐंसई सोचत रए। ''
''दद्दा जू! मनो ब्याह काजे हमरी एक शर्त है।
हम बा शर्त पूरी करबे बारे सें ब्याह करो चाहत हैं।"
अब तो महाराज जू और दरबारां सबईं खों जैसे साँप सूंघ गओ।
बेटी जू के मूं सें सरत को नाम सुनतई राजा साब और दरबारी सब भौंचक्के रए गए।
कोई ने सोची नईं हती के राजकुँवरि ऐसो कछू बोल सकत ती।
सबरे जाने सोच में पर गए कि राजकुँवरि कछू ऐसो-वैसो नें कै दें।
कहूँ उनकी कई पूरी नें कर पाए तो का हुईहै?
राजकुँवरि नें सबखों चुप्पी लगाए देख खें आपई कई।
"आप औरन खों परेसान होबे की कौनऊ जरूरत नईआ।''
अब राजा साब ने बेटी जू सें कई- "बेटी जू! अपुन अपुनी सरत बताओ तें हम सब अपुन की सरत पूरी करबे में कछू कोर-कसार नें उठा रखबी।"
अब बेटी जु ने संकुचाते-संकुचाते अपनी सरत बताबे खातिर हिम्मत जुटाई और बोलीं-
"दद्दा जू! हम ऐसें वर सें ब्याह करो चाहत हैं जो चाहे गरीब हो या अमीर, गोरो होय चाए कारो, पढ़ो-लिखो होय चाए अनपढ़, लंगड़ो होय चाए लूलो पै बो बैठ खें उठ्बो नें जानत होय।"
बेटी जू सें ऐंसी अनोखी सरत सुन खें दरबारन खों दिमाग चकरा गओ।
आप राजा साब सोई कछू नें समझ पा रए थे।
मनो राजा साब राजकुँवरि की समझदारी के कायल हते।
सबई दारबारन खों सोच-बिचार में डूबो देख राजा जू नें तुरतई राज घराने कें पुरोहित खें बुला लाबे काजे एक चिठिया ले कें खबास खें भेज दओ।
पंडज्जी और खबास खों आओ देख कें महाराज जू नें एक चिट्ठी दे कें आदेस दओ-
"तुम दोउ जनें देस-बिदेस घूम-घूम खें जा मुनादी कराओ और कौनऊ ऐसे खों पता लगैयों जो बैठ खें उठाबो नें जानत होए।"
तुमें जिते ऐसो कौनऊ जोग बार मिले जो बैठ खें उठ्बो नेब जानत होय, उतई बेटी जू का ब्याह तय कर अइयो।
उतई बेटू जु के ब्याओ काजे फलदान को नारियल धर अइयो।
राजा साब की आज्ञा सुनकें पंडज्जी और खबास दोई जनें देसन-देसन कें राजन लौ गए।
बे हर जगू बिन्तवारी करत गए मनो निरासा हाथ लगत गई।
बे जगूं-जगूं कैत गए "जून राजकुंवर बैठ खें उठ्बो नें जानत होय ओई के संगे अपनी राजकुंवरि का फलदान करबे काजे आये हैं।"
बे जिते-जिते गए, उतई नाहीं को जवाब मिलत गओ।
कहूँ-कहूँ राजा लोग कयें 'जे कैसी अजब सर्त सुनात हो?
राजकुंवरि खें ब्याओ करने हैं कि नई?
पंडज्जी और खबास घूमत-घूमत थक गए।
महीनों पे महीने निकारत गए मनो बात नई बनीं।
सर्त पूरी करबे बारो कौनौ राजकुमार नें मिलो।
आखिरकार बिननें थक-हार कर बापिस होबे को फैसला करो।
आखिरी कोसिस करबे बार बे आखिरी रजा के ढींगे गए।
इतै बी सर्त सुन कें राजदर्बाराब और राजा ने हथियार दार दै।
दोऊ झनें लौटन लगे तबई राजकुमार बाहर सें दरबार में पधारे।
उनने पूरी बात जानबे के बाद रजा साब सें अरज करी-
" महाराज जू! आज लॉन अपने दरबार सें कौनऊ मान्गाबे बारो खली हात नई गओ है।
पुरखों को जस माटी में मिलाए से का फायदा?
अपने देस जाके और रस्ते में जे दोनों जगू-जगू अपन अपजस कहत जैहें।
ऐसें बचबे को एकई तरीको है।
आप जू इन औरन की बात रख लेओ।
आपकी अनुमत होय तो मैं इन राजकुमारी की सर्त पूरी करे के बाद ब्याओ कर सकत।"
जा सुन खें महाराज जू और दरबारी पैले तो संकुचाये कि बे ओरन कछू राह नई निकार पाए।
कम अनुभवी राजकुमार नें रास्ता खोज लओ।
अपनें राजकुमार की होसियारी पे भरोसा करखें महाराज जू नें कई-
" कुंवर जू! अपनी बात पे भरोसा कर खें हम फलदान रख लेंत हैं, मनो हमाओ सर नें झुकइयो।
काये कि सर्त पूरी नें भई तो राजकुमारी मुस्किल में पड़ जैहें।
राज कुमार ने कई "आप हमाओ भरोसा करकें फलदान ले लेओ मगर हमरी सोई एक सर्त है।
अब सबरे दरबारी, रजा, पंडज्जी और खबास चकराए।
अब लौ एकई सर्त पूरीनें हो रई हती, अब एक और सर्त का चक्कर कैसे सुलझेगो?
महाराज नें पूछी तो राजकुमार नें सर्त बताई।
महाराज आप जेई कागज़ पे एक संदेस लिख कें पठा दें।
हमाई सरत है कि राजकुमारी की सरत पूरी करबे के काजे हमाओ राजकुमार तैयार है।
मनो अकेले बे ऊ राजकुमारी सें ब्याओ कर्हें जो परके टरबो नें जानत होय।'
जो राजकुमारी खों जे सर्त स्वीकार होय तो बो अपनी हामी के संगे अपने पिताजू सें फलदान पठा देवें।
राजकुँवर सें हामी भरवाखें पंडज्जी और खवास दोउ जनों ने जान की खैर मनाई।
बे दोनों सारदा मैया की जय कर अपने राज खों लौट चले।
राजा के लिंगा लौट खें पुरोहित नें पूरो हालचाल बताओ।
पुरोहित नें कई "महाराज! हम दोउ जनें कहूँ रुकें बिना दिन-रात दौरतई रए।
पैले एक तरफ सें आगे बढ़े हते।
हौले-हौले देस-बिदेस कें सबई राजा जनों के दरबार में जात गए।
मनो अकेलीं बेटी जू की सर्त पूरी करे काजे कौनऊ राजकुमार नें हामी नई भरी।
हर जगूं सुरु-सुरु में भौत उत्साह सें न्योटा लऔ जात।
मनो सर्त की बात सामने आतेई बिनकों सांप सूंघ जात तो।
आखर में हम दोऊ निरास हो खें अपने परोसी राजा कने गए।
बिनने हुलास सें स्वागत-सत्कार करो।
जैसेई सर्त की बात भई सबकें मूं उतर गए।
राजा और दरबारी तो चुप्पै रए गए।
हम औरन नें सोचीं के खाली हात वापिस होबे के सिवाय कौनौ चारो नईयाँ।
मनो बुजुर्ग ठीकई कै गए हैं मन सोची कबहूँ नई, प्रभु सोची तत्काल।
हमाई बिदाई होते नें होते राजकुंवर जू दरबार में पधार गए।
कुँवर जू ने सारी बात ध्यान सें सुनी, कछू देर सोचो और सर्त के लाने हामी भर दई।
मनों अपनी तरफ सें एक सर्त और धर दई।
एं कौन सी सर्त? कैसी सर्त? महाराज जू नें हडबडा खें पूछी।
बतात हैं महाराज! बा सर्त बी बड़ी बिचित्र है।
कुँवर नें कई के बें ऐसी स्त्री सें ब्याओ करहें जोन पर खें टरबो नईं जानत होय।
नें मानो तो अपुन जू जा कागज़ खों बांच लेओ।
जा कागज में सब कछू लिखा दओ है कुँवर नें।
जा सर्त जान खें महाराज और दरबानी परेसान हते।
कौनौ खें समझ मीन कौनऊ रास्ता नें सूझो।
महाराज ने राजकुँवरी खें बुला भेजो।
बे अपनी सखियाँ खें संगे अमराई में हतीं।
महाराज जू को संदेसा मिलो तो तुरतई दरबार कें लाने चल परीं।
राजकुँवरी ने जुहार कर अपनी जगह पे पधार गईं।
महाराज नें कौनौ भूमिका बनाए बिना पंडज्जी सें कई के बा कागज़ बांच देओ।
पंडत नें राजा कें हुकुम का पालन कर्खें बा कागज़ झट सें बांच दओ।
बामें लिखी सर्त सुन खें राजकुँवरी हौले सें मुसक्या दईं और सरम सें सर झुका लओ।
जा देख खें सबई की जान में जान आई।
महाराज नें पूछी तो राजकुँवरी नें धीरे सें कै दई के बे जा सर्त पूरी कर सकत हैं।
फिर का हती, बिटिया रानी की हामी सुनतई पंडत नें तुरतई रजा जी सें कई 'अब बिलम्ब केहि कारज कीजे ?'
रजा जू पंडत खों मतलब समझ गए और बोले- श्री गनेस जू का ध्यान कर खें मुहूर्त बताओ।
पंडज्जी तो ए ई औसर की तलास में हते।
बिनने झट से पोथा-पत्तर निकारो और मुहूरत बता दओ।
राजा नें महारानी खें बुलाबा भेजो और उन रजामंदी सें संदेश निमंत्रण पत्रिका लिखा दई।
पत्रिका में लिखो हतो के आप जू अपने राजकुंवर की बारात लें खें अमुक तिथि खों पधारें।
कवास खें आदेस दओ के जा पत्रिका राजा साब जू खें धिंगे पौन्चाओ।
खवास तो ऐई मौके की टाक माँ हतो।
जानत तो दोऊ जगू मोटी बखसीस मिलहै।
पत्रिका पहुँचतई दोऊ राजन के महलन में ब्याओ की तैयारियां सुरु हो गईं।
लिपाई-पुताई, चौक पुराई, गाने-बजाने, आबे-जाबे औए मेहमानन के सोर-सराबे से चहल-पहल हो गई।
दसों दिसा में भोर सें साँझ लौ मंगाल गान गूंजन लगे।
जैसेंई ब्याओ की तिथि आई बैसेई राजा जू अपने कुँवर साब खों दुल्हा बना खें पूरे फ़ौज-फांटे के संगे चल परे। समधी की राज में बिनकी खूबई आवभगत भई।
जनवासे में बरात की अगवानी की गई।
बेंड़नी खों नाच देखबे के खातिर लोग उमड़ परे।
बरातियों खों पेट भर जलपान और भोजन कराओ गओ।
जहाँ-तहाँ सहनाई और ढोल-बतासे बजट हते।
बरात की अगवानी भई, पलक पांवड़े बिछा दए गए।
सजी-धजी नारियाँ स्वागत गीत गुंजात तीं।
नाऊ और खवास बरातियन की मालिस करत हते।
ज्योनार कें समै कोकिलकंठों से ज्योनार गीत और गारी सुन-सुन खें बराती खूबई मजा लेत ते।
बरात उठी तो बाकी सोभा कही नें जात ती।
हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल सब अपनी मस्ती में मस्त हते।
ढोल, मंजीरा, ताशा, बिगुल, शहनाई के सँग नाच-गाना की धूम हती।
मंडवा तरे भांवरन की तैयारी होन लगी।
मंडवा तरे राजकुमारी, राजकुमार दूल्हा-दुलहन के काजे रखे पटा पे बिराजे।
दोउ राजा जू, रानीजू, नजीकी रिस्तेदार दास-दासियाँ, पंडज्जी और खवास सबै आस-पास बैठे हते।
बन्ना-बन्नी गीत गूंजत हते।
चारों तरफी हल्ला-गुल्ला, चहल-पहल, उत्साह हतो।
अब जैसेईं तीं भांवरें पड़ चुकीं, बैसेई कन्या पक्ष को पुरोहित खड़ो हो गओ।
वर पक्ष के पंडज्जी सें बोलो 'नेंक रुक जाओ पंडज्जी!
अपुन दोऊ जनन खों मालुम है कै ब्याओ होबे के काजे कछू शर्तें हतीं।
पैले उनका खुलासा हो जावे, तब आगे की भाँवरें पारी जैहें।
फिर बानें कुँवर जू सें कई "कुँवर जू! पैले अपुन बतावें के बेटी जू नें कौन सी सर्त रखी हती?
अपुन जा सोई बताएँ के बा सर्त कब-कैंसें पूरी कर सकत?"
जा बात सुनतेई दुल्हा बने राजकुमार झट सें खड़े हो गए।
बे बोले स्यानन कें बीच में जादा बोलबो ठीक नईयाँ।
अपनी अकल के माफिक मैं जा समझो के राजकुमारी जी ने सर्त रखी हती के बै ऐसो बर चाउत हैं जो बैठ कें उठबो नें जानत होय।
जा सर्त में राजकुमारी जू की जा इच्छा छिपी हती के उनको बर जानकार, अकलमंद, कुल-सीलवान, सुन्दर, औए बलसाली भओ चाही।
ई इच्छा का कारन जे है के कौनऊ सभा में, कौनऊ मुकाबले में ओ खों कौउ हरा नें सकें।
बिद्वान सें बिद्वान जन हों चाए ताकतवर लोग कौनऊ बाखों हरा खें उठा नें पावे।
सबै जगा बाकी जीत को डंका पिटो चाही।
ओके जीतबे से राजकुमारी जू को सर हमेसा ऊँचो रहेगो।
राजकुमारी अपने वर के कारन नीचो नई देखो चाहें।
बे जब चाहे, जैसे चाहें आजमा सकत आंय। "
दूल्हा राजा के चुप होतई पंडज्जी ने राजकुमारी से पूछो- 'काय बिटिया जू! तुमाई सर्त जोई हती के कछू और हती?"
जा सुन कें राजकुमारी नें हामी में सर हिला दओ।
मंडवा कें नीचे बैठे सबई जनें राजकुमार की अकाल की तारीफ कर कें वाह, वाह कै उठे।
जा के बाद राजकुमार को पुरोहित खडो हो गओ।
पुरोहित नें खड़े हो खें कही 'हमाए राजकुमार ने भी एक सर्त रखी हती।
अब राजकुमारी जू बताबें के बा सर्त का हती और बे कैसे पूरी कर सकत हैं?'
ई पै राजकुमारी लाज और संकोच सें गड़ सी गईं, मनो धीरे से सिमट-संकुच कें खड़ी भईं।
कौनऊ और चारा नें रहबे से बिन्ने जमीन को ताकत भए मंडवा के नीचे बैठे बड़ों-बुजुर्गों से अपने बात रखे के काजे आज्ञा माँगी।
आज्ञा मिलबे पर धीमी लेकिन साफ़ आवाज़ में कई 'राजकुँवर की सर्त जा हती के बें ऐसी स्त्री सें ब्याओ करो चाहत हैं जौन पर खें टरबो नईं जानत होय।'
हम सर्त से जा समझें के राजकुमार नम्र और चतुर पत्नी चाहत हैं।
ऐंसी पत्नी जो घरब के सब काम-काज जानत होय।
ऐंसी पत्नी जो कामचोर और आलसी नें होय।
जो घर के सब बड़ों को अपने रूप, गुण, सील और काम-काज सें प्रसन्न रख सके।
ऐसो नें होय के जब दोउ जनें परबे खों जांय तो कछू छूटो काम याद आने से उठनें परे।
ऐसो भी ने होय कि बड़ो-बूढ़ों परबे या उठबे के बाद कौनौ बात की सिकायत करे और घर में कलह हो।
राजकुमार ऐंसी सुघड़ घरबारी चाहत हैं जो कमरा में आ कें परे तो कौनऊ कारन सें उठबो नें जानें।
राजकुमार जब - जैसे चाहें परीक्छा ले लें।
दुल्हन के चुप होतई पुरोहित ने राजकुमार से पूछो- 'काय कुँवर जू! तुमाई सर्त जोई हती के कछू और हती?"
जा सुन कें राजकुमार नें अपनी रजामंदी जता दई।
मंडवा कें नीचे बैठे सबई लोग-लुगाई और सगे-संबंधी ताली बजाओं लगै।
राजकुंवरी और राजकुमार की समझदारी नें सबई खों मन मोह लओ हतो।
पंडज्जी और पुरोहित नें दोऊ पक्षों के सर्त पूरी होबे की मुनादी कर दई।
राजकुँवर मंद-मंद मुसक्या रए हते।
राजकुमारी अपने गोर नाज़ुक पैर के अंगूठे सें गोबर लिपा अँगना कुरेदत हतीं।
उनकें गोरे गालन पे लाली सोभायमान हती।
पंडज्जी और पुरोहित जी ने अगली भांवर परानी सुरु कर दई।
सब जनें भौत खुस भये कि दुल्हा-दुल्हन एक-दूसरे के मनमाफिक आंय।
सबसे ज्यादा खुसी जे बात की हती के दोऊ के मन में धन-संपत्ति और दहेज को लोभ ना हतो।
दोऊ जनें गुन और सील को अधिक महत्व देखें संतोस और एक-दूसरे की पसंद को ख्याल रख कें जीवन गुजारन चाहत ते।
सब जनों ने भांवर पूरी होबे पर दूल्हा-दुल्हिन और उनके बऊ-दद्दा खों खूब मुबारकबाद दई।
इस ब्याव के पैले सबई जन घबरात हते कि "बैठ कें उठबो नें जानन बारो" वर और "पर खें टरबो नईं जानन बारी बहू" कहाँ सें आहें?
असल में कौनऊ इन शर्तों का मतलबई नें समझ पाओ हतो।
आखिर में जब सब राज खुल गओ तो सबनें चैन की सांस लई।
इनसे समझदार मोंड़ा-मोंडी हर घर में होंय जो धन की जगू गुन खों चाहें।
तबई देस और समाज को उद्धार हुइहै।
राजकुमारी और राजकुमार को भए सदियाँ गुजर गईं मनों आज तक होत हैं चर्चे उनकी समझदारी के।
***
एक दोहा
*
हम तो हिंदी के हामी हैं, फूल मिले या धूल
अंग्रेजी को 'सलिल' चुभेंगे, बनकर शूल बबूल
***
छंद बहर का मूल है: ८
*
छंद परिचय:
संरचना: SIS SIS SIS S / SIS SIS SISS
सूत्र: रररग।
दस वार्णिक पंक्ति जातीय बाला छंद।
सत्रह मात्रिक महासंस्कारी जातीय रामवत छंद।
बहर: फ़ाइलुं फ़ाइलुं फ़ाइलुं फ़े / फ़ाइलुं फ़ाइलुं फ़ाइलातुं ।
*
आप हैं जो, वही तो नहीं हैं
दीखते है वही जो नहीं हैं
*
खोजते हैं खुदी को जहाँ पे
जानते हैं वहाँ तो नहीं हैं
*
जो न बोला वही बोलते हैं
बोलते, बोलते जो नहीं हैं
*
माल को तौलते ही रहे जो
आत्म को तौलते वो नहीं
*
देश शेष क्या? पूछते हैं
देश में शेष क्या जो नहीं हैं
*
आद्म्मी देवता क्या बनेगा?
आदमी आदमी ही नहीं है
*
जोश में होश को खो न देना
देश में जोश हो, क्यों नहीं है?
***
SIS SIS SISS
आपका नूर है आसमानी
गायकी आपकी शादमानी
*
आपका ही रहा बोलबाला
लोच है, सोज़ है रातरानी
*
आसमां छू रहीं भावनाएँ
भ्रांत हों ही नहीं वासनाएँ
*
खूब हालात ने आजमाया
आज हालात को आजमाएँ
*
कोशिशों को मिली कामयाबी
कोशिशें ही सदा काम आएँ
*
आदमी के नहीं पास आएँ
हैं विषैले न वे काट खाएँ
२१.४.२०१७
***
नवगीत:
.
इन्द्रप्रस्थ में
विजय-पराजय
पर लगते फिर दाँव
.
कृष्णार्जुन
रणनीति बदल नित
करते हक्का-बक्का.
दुर्योधन-राधेय
मचलकर
लगा रहे हैं छक्का.
शकुनी की
घातक गुगली पर
उड़े तीन स्टंप.
अम्पायर धृतराष्ट्र
कहे 'नो बाल'
लगाकर जंप.
गांधारी ने
स्लिप पर लपका
अपनों का ही कैच.
कर्ण
सूर्य से आँख फेरकर
खोज रहा है छाँव
इन्द्रप्रस्थ में
विजय-पराजय
पर लगते फिर दाँव
.
द्रोणाचार्य
पितामह के सँग
कृष्ण कर रहे फिक्सिंग.
अर्जुन -एकलव्य
आरक्षण
माँग रहे कर मिक्सिंग.
कुंती
द्रुपदसुता लगवातीं
निज घर में ही आग.
राधा-रुक्मिणी
को मन भाये
खूब कालिया नाग.
हलधर को
आरक्षण देकर
कंस सराहे भाग.
गूँज रही है
यमुना तट पर
अब कौओं की काँव
इन्द्रप्रस्थ में
विजय-पराजय
पर लगते फिर दाँव
.
मठ, मस्जिद,
गिरिजा में होता
श्रृद्धा-शोषण खूब.
लंगड़ा चढ़े
हिमालय कैसे
रूप-रंग में डूब.
बोतल नयी
पुरानी मदिरा
गंगाजल का नाम.
करो आचमन
अम्पायर को
मिला गुप्त पैगाम.
घुली कूप में
भाँग रहे फिर
कैसे किसको होश.
शहर
छिप रहा आकर
खुद से हार-हार कर गाँव
इन्द्रप्रस्थ में
विजय-पराजय
पर लगते फिर दाँव
.
***
नवगीत:
.
बदलावों से क्यों भय खाते?
क्यों न
हाथ, दिल, नजर मिलाते??
.
पल-पल रही बदलती दुनिया
दादी हो जाती है मुनिया
सात दशक पहले का तेवर
हो न प्राण से प्यारा जेवर
जैसा भी है सैंया प्यारा
अधिक दुलारा क्यों हो देवर?
दे वर शारद! नित्य नया रच
भले अप्रिय हो लेकिन कह सच
तव चरणों पर पुष्प चढ़ाऊँ
बात सरलतम कर कह जाऊँ
अलगावों के राग न भाते
क्यों न
साथ मिल फाग सुनाते?
.
भाषा-गीत न जड़ हो सकता
दस्तरखान न फड़ हो सकता
नद-प्रवाह में नयी लहरिया
आती-जाती सास-बहुरिया
दिखें एक से चंदा-तारे
रहें बदलते सूरज-धरती
धरती कब गठरी में बाँधे
धूप-चाँदनी, धरकर काँधे?
ठहरा पवन कभी क्या बोलो?
तुम ठहरावों को क्यों तोलो?
भटकावों को क्यों दुलराते?
क्यों न
कलेवर नव दे जाते?
.
जितने मुँह हैं उतनी बातें
जितने दिन हैं, उतनी रातें
एक रंग में रँगी सृष्टि कब?
सिर्फ तिमिर ही लखे दृष्टि जब
तब जलते दीपक बुझ जाते
ढाई आखर मन भरमाते
भर माते कैसे दे झोली
दिल छूती जब रहे न बोली
सिर्फ दिमागों की बातें कब
जन को भाती हैं घातें कब?
अटकावों को क्यों अपनाते?
क्यों न
पथिक नव पथ अपनाते?
***
२१.४.२०१५
छंद सलिला:
हेमंत छंद
*
छंद-लक्षण: जाति महादैशिक , प्रति चरण मात्रा २० मात्रा, चरणांत गुरु लघु गुरु (रगण), यति बंधन नहीं।
लक्षण छंद:
बीस-बीस दिनों सूर्य दिख नहीं रहा
बदन कँपे गुरु लघु गुरु दिख नहीं रहा
यति भाये गति मन को लग रही सजा
ओढ़ ली रजाई तो आ गया मजा
उदाहरण:
१. रंग से रँग रही झूमकर होलिका
छिप रही गुटककर भांग की गोलिका
आयी ऐसी हँसी रुकती ही नहीं
कौन कैसे कहे क्या गलत, क्या सही?
२. देख ऋतुराज को आम बौरा गया
रूठ गौरा गयीं काल बौरा गया
काम निष्काम का काम कैसे करे?
प्रीत को यादकर भीत दौरा गया
३.नाद अनहद हुआ, घोर रव था भरा
ध्वनि तरंगों से बना कण था खरा
कण से कण मिल नये कण बन छा गये
भार-द्रव्यमान पा नव कथा गा गये
सृष्टि रचना हुई, काल-दिशाएँ बनीं
एक डमरू बजा, एक बाँसुरी बजी
नभ-धरा मध्य थी वायु सनसनाती
सूर्य-चंदा सजे, चाँदनी लुभाती
***
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कामिनीमोहन कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हेमंत, हंसगति, हंसी)
***
दोहे का रंग - अंगिका के संग:
(अंगिका बिहार के अंग जनपद की भाषा, हिन्दी का एक लोक भाषिक रूप)
काल बुलैले केकरs, होतै कौन हलाल?
मौन अराधे दैव कै, ऐतै प्रातः काल..
मौज मनैतै रात-दिन, होलै की कंगाल.
साथ न आवै छाँह भी, आगे कौन हवाल?.
एक-एक के खींचतै, बाल-पकड़ लै खाल.
नीन नै आवै रात भर, पलकें करैं सवाल..
मुक्तक
दर्पण में जिसको देखा वह बिम्ब मात्र था।
और उजाले में केवल साया पाया।।
जब-जब बाहर देखा तो पाया मैं हूँ।
जब-कब भीतर झाँका तो उसको पाया।।
२१-४-२०१०

***