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शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

फरवरी २१ * लघुकथा, सॉनेट, नदी, छंद विधान, चित्रालंकार, हाइकु, सदोका, सवैया, श्रृंगार गीत, दोहा हास्य

सलिल सृजन फरवरी २१
*
अखबार 
० 
अख़बार में 'बार' है 
लेकिन काला कोट नहीं है, 
अर्थात कुछ सफेद मिलने की 
तनिक सी गुंजाइश तो है।
न्याय की संभावना 
न्यून ही सही, है। 
अन्याय 
बिन खोजे भी मिल सकता है। 
अखबार के 'बार' के साथ 
'बार बाला' है या नहीं?
राम जाने। 
राम सब मर्जों की दवा हैं। 
'राम राम' कहकर विदाई ले लो
या 'हे राम' कहकर आह भर लो
'जै राम की' कहकर
राम की जय बोली या 
सामनेवाले की?
'हरे राम' कहा तो 
राम को बना दिया 
मनुष्य से हरि। 
हरि किस अर्थ में 
यह न पूछिए, 
आस्था को ठेस लग सकती है। 
राम  को 
स्वर्णनगरी का सम्राट 
प्रलोभन नहीं दे सका, 
सोने का मृग नहीं मोह सका, 
सोने की नगरी 
राम की पग-रज ही नहीं पा सका। 
किन्तु अब राम वनवासी नहीं हैं 
राम हैंस्वर्ण कपाट में कैद 
बहुमूल्य वस्त्रों और रत्नों से सुशोभित। 
अब वे नहीं धुलवा सकते 
केवट से पैर। 
अब उनके चरण पखारते हैं 
अपने आपको खास-उल-खास बताते 
आम लोगों की 
समझ में न आते मंत्र पढ़ते, 
चढ़ोत्री का गणित खुले आम नहीं 
मन ही मन गुनते 
खुद को राम से पहले 
पुजवाते पुजारी।
अंटी में कुछ है तो 
ठहरो! दर्शन करो, 
पुष्प-प्रसाद लो। 
अंटी की खाली तो 
खाओ धक्का, बजाओ ताली 
और सिर पर मत चढ़ो  
आगे बढ़ो, नहीं तो 
वर्दीधारी अर्पित करने लगेंगे सेवा 
बिना दक्षिण लिए 
थाने में खुश नहीं होंगे देवा। 
इसलिए समझदारी इसी में है 
कि लोकों में आँख खोलकर 
देव-दर्शन का मोह छोड़कर,
आँख के कपाट बंदकर 
अपने मन-मंदिर में
कर लो अपने इष्ट से साक्षात्कार 
अथवा 
हाथ में थाम लो अखबार 
किसी न किसी पृष्ठ पर 
मिल ही जाएँगे
राम भक्ति के दावेदार 
सत्तासीन भक्त 
और यह तो सबही जानते हैं कि 
'राम ते अधिक राम के दासा' 
इसलिए राम से पहले 
राम की कृपा से 
सत्ता-सुखभोग रहे
भक्तों के दर्शन करो और तरो। 
२१.२.२०२६ 
०००  
लघुकथा
शेर नहीं हिरण
*
- 'जियो तो ऐसे जियो जैसे सब तुम्हारा है' ज़िंदगी जीना है तो राजा की तरह जियो, शेर की तरह जिओ। जहाँ जाता है वानर उसके आगमन की सूचना देते हैं, हिरण भागने लगते हैं फिर भी मारे जाते हैं।' गुरु जी शिष्य को उपदेश दे रहे थे।
= 'मगर गुरु जी! शेर की तरह जीकर क्या फायदा? शेर अपने १०० हमलों में ७५ से ८० बार नाकामयाब रहता है, जबकि हिरण बच जाता है।'
- 'इससे क्या? शेर आखिर शेर है।'
= 'सो तो है, शेर आखिर शेर है जो दुनिया से लापता होने की कगार पर आ पहुँचा है। बेचारा अपने सबसे बड़े दुश्मन और हत्त्यारे आदमी के रहमो-करम पर जिन्दा है चिड़ियाघरों में तमाशा बनकर। इससे तो हिरण ही अच्छा है, दिखता कमजोर है पर आज तक मिटा नहीं। शेर ही नहीं आदमी, चीता, बाघ, तेंदुआ और अन्य कई हत्यारे मिलकर भी उसे मिटा नहीं सके। जानवर मारने को न मिलें तो शेर भूख से मर जाएगा पर हिरण घास-फूस खाकर काम चला लेगा। इसलिए ताकत नहीं लचीलापन, सहनशीलता और सद्भाव रखकर हिरन बनना ही बेहतर है।'
२१-२-२०२२
***
सॉनेट
नदी
नदी नहीं है सिर्फ नदी।
जीवन-मृत्यु किनारे इसके।
सपने पलें सहारे इसके।।
देख नदी में अगिन सदी।।
मरु को मधुवन नदी बनाती।
मिले मेघ से जितना पानी।
सागर को जा देती दानी।।
जीवन को जीना सिखलाती।।
गर्मी-सर्दी, धूप-छाँव में।
पर्वत-जंगल नगर गाँव में।
बहती रुके न एक ठाँव में।।
जननी जन्मे, विहँस पालती।
काम न किंचित कभी टालती।
नव आशा का दीप बालती।।
२१-२-२०२२
•••
लेख :
छंद और छंद विधान
*
वेद को सकल विद्याओं का मूल माना गया है । वेद के ६ अंगों (छंद, कल्प, ज्योतिऽष , निरुक्त, शिक्षा तथा व्याकरण) में छंद का प्रमुख स्थान है ।
छंदः पादौतु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ कथ्यते ।
ज्योतिऽषामयनं नेत्रं निरुक्तं श्रोत्र मुच्यते ।।
शिक्षा घ्राणंतुवेदस्य मुखंव्याकरणंस्मृतं
तस्मात् सांगमधीत्यैव ब्रम्हलोके महीतले ।।
वेद का चरण होने के कारण छंद पूज्य है । छंदशास्त्र का ज्ञान न होने पर मनुष्य पंगुवत है, वह न तो काव्य की यथार्थ गति समझ सकता है न ही शुद्ध रीति से काव्य रच सकता है । छंदशास्त्र को आदिप्रणेता महर्षि पिंगल के नाम पर पिंगल तथा पर्यायवाची शब्दों सर्प, फणि, अहि, भुजंग आदि नामों से संबोधित कर शेषावतार माना जाता है । जटिल से जटिल विषय छंदबद्ध होने पर सहजता से कंठस्थ ही नहीं हो जाता, आनंद भी देता है ।
नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा ।
कवित्वं दुर्लभं तत्र, शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा ।।
अर्थात संसार में नर तन दुर्लभ है, विद्या अधिक दुर्लभ, काव्य रचना और अधिक दुर्लभ तथा सुकाव्य-सृजन की शक्ति दुर्लभतम है । काव्य के पठन-पाठन अथवा श्रवण से अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है ।
काव्यशास्त्रेण विनोदेन कालो गच्छति धीमताम ।
व्यसने नच मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ।।
विश्व की किसी भी भाषा का सौंदर्य उसकी कविता में निहित है । प्राचीन काल में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कम होने के कारण काव्य-सृजन केवल कवित्व शक्ति संपन्न प्रतिभावान महानुभावों द्वारा किया जाता था जो श्रवण परंपरा से छंद की लय व प्रवाह आत्मसात कर अपने सृजन में यथावत अभिव्यक्त कर पाते थे । वर्तमान काल में शिक्षा का सर्वव्यापी प्रचार-प्रसार होने तथा भाषा या काव्यशास्त्र से आजीविका के साधन न मिलने के कारण सामान्यतः अध्ययन काल में इनकी उपेक्षा की जाती है तथा कालांतर में काव्याकर्षण होने पर भाषा का व्याकरण- पिंगल समझे बिना छंदहीन तथा दोषपूर्ण काव्य रचनाकर आत्मतुष्टि पाल ली जाती है जिसका दुष्परिणाम आमजनों में कविता के प्रति अरुचि के रूप में दृष्टव्य है । काव्य के तत्वों रस, छंद, अलंकार आदि से संबंधित सामग्री व उदाहरण पूर्व प्रचलित भाषा / बोलियों में होने के कारण उनका आशय हिंदी के वर्तमान रूप से परिचित छात्र पूरी तरह समझ नहीं पाते । प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा के चलन ने हिंदी की समझ और घटायी है ।
छंद विषयक चर्चा के पूर्व हिंदी भाषा की आरंभिक जानकारी दोहरा लेना लाभप्रद होगा ।
भाषा :
अनुभूतियों से उत्पन्न भावों को अभिव्यक्त करने के लिए भंगिमाओं या ध्वनियों की आवश्यकता होती है। भंगिमाओं से नृत्य, नाट्य, चित्र आदि कलाओं का विकास हुआ। ध्वनि से भाषा, वादन एवं गायन कलाओं का जन्म हुआ।
चित्र गुप्त ज्यों चित्त का, बसा आप में आप।
भाषा सलिला निरंतर करे अनाहद जाप।।
भाषा वह साधन है जिससे हम अपने भाव एवं विचार अन्य लोगों तक पहुँचा पाते हैं अथवा अन्यों के भाव और विचार गृहण कर पाते हैं। यह आदान-प्रदान वाणी के माध्यम से (मौखिक) या लेखनी के द्वारा (लिखित) होता है।
निर्विकार अक्षर रहे मौन, शांत निः शब्द।
भाषा वाहक भाव की, माध्यम हैं लिपि-शब्द ।।
व्याकरण ( ग्रामर ) -
व्याकरण ( वि + आ + करण ) का अर्थ भली-भाँति समझना है. व्याकरण भाषा के शुद्ध एवं परिष्कृत रूप सम्बन्धी नियमोपनियमों का संग्रह है। भाषा के समुचित ज्ञान हेतु वर्ण विचार (ओर्थोग्राफी) अर्थात वर्णों (अक्षरों) के आकार, उच्चारण, भेद, संधि आदि, शब्द विचार (एटीमोलोजी) याने शब्दों के भेद, उनकी व्युत्पत्ति एवं रूप परिवर्तन आदि तथा वाक्य विचार (सिंटेक्स) अर्थात वाक्यों के भेद, रचना और वाक्य विश्लेष्ण को जानना आवश्यक है।
वर्ण शब्द संग वाक्य का, कविगण करें विचार।
तभी पा सकें वे 'सलिल', भाषा पर अधिकार।।
वर्ण / अक्षर :
वर्ण के दो प्रकार स्वर (वोवेल्स) तथा व्यंजन (कोंसोनेंट्स) हैं।
अजर अमर अक्षर अजित, ध्वनि कहलाती वर्ण।
स्वर-व्यंजन दो रूप बिन, हो अभिव्यक्ति विवर्ण।।
स्वर ( वोवेल्स ) :
स्वर वह मूल ध्वनि है जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता. वह अक्षर है। स्वर के उच्चारण में अन्य वर्णों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती। यथा - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:. स्वर के दो प्रकार १. हृस्व ( अ, इ, उ, ऋ ) तथा दीर्घ ( आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: ) हैं।
अ, इ, उ, ऋ हृस्व स्वर, शेष दीर्घ पहचान।
मिलें हृस्व से हृस्व स्वर, उन्हें दीर्घ ले मान।।
व्यंजन (कांसोनेंट्स) :
व्यंजन वे वर्ण हैं जो स्वर की सहायता के बिना नहीं बोले जा सकते। व्यंजनों के चार प्रकार १. स्पर्श (क वर्ग - क, ख, ग, घ, ङ्), (च वर्ग - च, छ, ज, झ, ञ्.), (ट वर्ग - ट, ठ, ड, ढ, ण्), (त वर्ग त, थ, द, ढ, न), (प वर्ग - प,फ, ब, भ, म) २. अन्तस्थ (य वर्ग - य, र, ल, व्, श), ३. (उष्म - श, ष, स ह) तथा ४. (संयुक्त - क्ष, त्र, ज्ञ) हैं। अनुस्वार (अं) तथा विसर्ग (अ:) भी व्यंजन हैं।
भाषा में रस घोलते, व्यंजन भरते भाव।
कर अपूर्ण को पूर्ण वे मेटें सकल अभाव।।
शब्द :
अक्षर मिलकर शब्द बन, हमें बताते अर्थ।
मिलकर रहें न जो 'सलिल', उनका जीवन व्यर्थ।।
अक्षरों का ऐसा समूह जिससे किसी अर्थ की प्रतीति हो शब्द कहलाता है। यह भाषा का मूल तत्व है। शब्द के निम्न प्रकार हैं-
१. अर्थ की दृष्टि से :
सार्थक शब्द : जिनसे अर्थ ज्ञात हो यथा - कलम, कविता आदि एवं
निरर्थक शब्द : जिनसे किसी अर्थ की प्रतीति न हो यथा - अगड़म बगड़म आदि ।
२. व्युत्पत्ति (बनावट) की दृष्टि से :
रूढ़ शब्द : स्वतंत्र शब्द - यथा भारत, युवा, आया आदि ।
यौगिक शब्द : दो या अधिक शब्दों से मिलकर बने शब्द जो पृथक किए जा सकें यथा - गणवेश, छात्रावास, घोडागाडी आदि एवं
योगरूढ़ शब्द : जो दो शब्दों के मेल से बनते हैं पर किसी अन्य अर्थ का बोध कराते हैं यथा - दश + आनन = दशानन = रावण, चार + पाई = चारपाई = खाट आदि ।
३. स्रोत या व्युत्पत्ति के आधार पर:
तत्सम शब्द : मूलतः संस्कृत शब्द जो हिन्दी में यथावत प्रयोग होते हैं यथा - अम्बुज, उत्कर्ष आदि।
तद्भव शब्द : संस्कृत से उद्भूत शब्द जिनका परिवर्तित रूप हिन्दी में प्रयोग किया जाता है यथा - निद्रा से नींद, छिद्र से छेद, अर्ध से आधा, अग्नि से आग आदि।
अनुकरण वाचक शब्द : विविध ध्वनियों के आधार पर कल्पित शब्द यथा - घोड़े की आवाज से हिनहिनाना, बिल्ली के बोलने से म्याऊँ आदि।
देशज शब्द : आदिवासियों अथवा प्रांतीय भाषाओँ से लिये गये शब्द जिनकी उत्पत्ति का स्रोत अज्ञात है यथा - खिड़की, कुल्हड़ आदि।
विदेशी शब्द : संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओँ से लिये गये शब्द जो हिन्दी में जैसे के तैसे प्रयोग होते हैं। यथा - अरबी से - कानून, फकीर, औरत आदि, अंग्रेजी से - स्टेशन, स्कूल, ऑफिस आदि।
४. प्रयोग के आधार पर:
विकारी शब्द : वे शब्द जिनमें संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया या विशेषण के रूप में प्रयोग किये जाने पर लिंग, वचन एवं कारक के आधार पर परिवर्तन होता है। यथा - लड़का, लड़के, लड़कों, लड़कपन, अच्छा, अच्छे, अच्छी, अच्छाइयाँ आदि।
अविकारीशब्द : वे शब्द जिनके रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता। इन्हें अव्यय कहते हैं। यथा - यहाँ, कहाँ, जब, तब, अवश्य, कम, बहुत, सामने, किंतु, आहा, अरे आदि। इनके प्रकार क्रिया विशेषण, सम्बन्ध सूचक, समुच्चय बोधक तथा विस्मयादि बोधक हैं।
नदियों से जल ग्रहणकर, सागर करे किलोल।
विविध स्रोत से शब्द ले, भाषा हो अनमोल।।
कविता के तत्वः
कविता के 2 तत्व बाह्य तत्व (लय, छंद योजना, शब्द योजना, अलंकार, तुक आदि) तथा आंतरिक तत्व (भाव, रस, अनुभूति आदि) हैं ।
कविता के बाह्य तत्वः
लयः
भाषा के उतार-चढ़ाव, विराम आदि के योग से लय बनती है । कविता में लय के लिये गद्य से कुछ हटकर शब्दों का क्रम संयोजन इस प्रकार करना होता है कि वांछित अर्थ की अभिव्यक्ति भी हो सके ।
छंदः
मात्रा, वर्ण, विराम, गति, लय तथा तुक (समान उच्चारण) आदि के व्यवस्थित सामंजस्य को छंद कहते हैं । छंदबद्ध कविता सहजता से स्मरणीय, अधिक प्रभावशाली व हृदयग्राही होती है । छंद के 2 मुख्य प्रकार मात्रिक (जिनमें मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है) तथा वर्णिक (जिनमें वर्णों की संख्या निश्चित तथा गणों के आधार पर होती है) हैं । छंद के असंख्य उपप्रकार हैं जो ध्वनि विज्ञान तथा गणितीय समुच्चय-अव्यय पर आधृत हैं ।
शब्दयोजनाः
कविता में शब्दों का चयन विषय के अनुरूप, सजगता, कुशलता से इस प्रकार किया जाता है कि भाव, प्रवाह तथा गेयता से कविता के सौंदर्य में वृद्धि हो ।
तुकः
काव्य पंक्तियों में अंतिम वर्ण तथा ध्वनि में समानता को तुक कहते हैं । अतुकांत कविता में यह तत्व नहीं होता । मुक्तिका या ग़ज़ल में तुक के 2 प्रकार तुकांत व पदांत होते हैं जिन्हें उर्दू में क़ाफि़या व रदीफ़ कहते हैं ।
अलंकारः
अलंकार से कविता की सौंदर्य-वृद्धि होती है और वह अधिक चित्ताकर्षक प्रतीत होती है । अलंकार की न्यूनता या अधिकता दोनों काव्य दोष माने गये हैं । अलंकार के 2 मुख्य प्रकार शब्दालंकार व अर्थालंकार तथा अनेक भेद-उपभेद हैं ।
कविता के आंतरिक तत्वः
रस:
कविता को पढ़ने या सुनने से जो अनुभूति (आनंद, दुःख, हास्य, शांति आदि) होती है उसे रस कहते हैं । रस को कविता की आत्मा (रसात्मकं वाक्यं काव्यं), ब्रम्हानंद सहोदर आदि कहा गया है । यदि कविता पाठक को उस रस की अनुभूति करा सके जो कवि को कविता करते समय हुई थी तो वह सफल कविता कही जाती है । रस के 9 प्रकार श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, भयानक, वीर, वीभत्स, शांत तथा अद्भुत हैं । कुछ विद्वान वात्सल्य को दसवां रस मानते हैं ।
अनुभूतिः
गद्य की अपेक्षा पद्य अधिक हृद्स्पर्शी होता है चूंकि कविता में अनुभूति की तीव्रता अधिक होती है इसलिए कहा गया है कि गद्य मस्तिष्क को शांति देता है कविता हृदय को ।
भावः
रस की अनुभूति करानेवाले कारक को भाव कहते हैं । हर रस के अलग-अलग स्थायी भाव इस प्रकार हैं । श्रृंगार-रति, हास्य-हास्य, करुण-शोक, रौद्र-क्रोध, भयानक-भय, वीर-उत्साह, वीभत्स-जुगुप्सा/घृणा, शांत-निर्वेद/वैराग्य, अद्भुत-विस्मय तथा वात्सल्य-ममता ।
***
अशआर
*
चंद पैसे हैं तो सवेरे हैं।
जेब खाली तो बस अँधेरे हैं।।
*
दिल की बातें कहें कहो कैसे,
बेदिलों तुम्हारी महफिल में?
*
आज किश्तों में बात करनी है।
टैक्स बातों पे लग न जाए कहीं।।
*
तालियाँ सुनके फूलना न सलिल।
गालियाँ साथ दूनी मिलती हैं।।
२१-२-२०२१
***
चित्रालंकार
पर्वत
सनम
गले लग।
नयन मिला
हो न विलग।
दो न रहें, एक हों
प्रिय! इरादे नेक हों
***
हाइकु
लोग दें फूल
जुमला कह नेता
बोले- fool।
*
सदोका
है चौकीदार
वफादार लेकिन
चोरियाँ होती रही।
लुटती रहीं
देश की तिजोरियाँ
जनता रोती रही।
*
नवगीत:
अंतर में
पल रही व्यथाएँ
हम मुस्काएँ क्या?
*
चौकीदार न चोरी रोके
वादे जुमलों को कब टोंके?
संसद में है शोर बहुत पर
नहीं बैंक में कुत्ते भौंके।
कम पहनें
कपड़े समृद्ध जन
हम शरमाएँ क्या?
*
रंग बदलने में हैं माहिर
राजनीति में जो जगजाहिर।
मुँह में राम बगल में छूरी
कुर्सी पूज रहे हैं काफिर।
देख आदमी
गिरगिट लज्जित
हम भरमाएँ क्या?
*
लोक फिर रहा मारा-मारा,
तंत्र कर रहा वारा-न्यारा।
बेच देश को वही खा रहे
जो कहते यह हमको प्यारा।।
आस भग्न
सांसों लेने को भी
तड़पाएँ क्या?
***
दोहा
शुभ प्रभात अरबों लुटा, कहो रहो बेफिक्र।
चौकीदारी गजब की, सदियों होगा जिक्र।।
*
पिया मेघ परदेश में, बिजली प्रिय उदास।
धरती सासू कह रही, सलिल बुझाए प्यास।।
*
बहतरीन सर हो तभी, जब हो तनिक दिमाग।
भूसा भरा अगर लगा, माचिस लेकर आग।।
*
नया छंद
जाति: सवैया
विधान: ८ मगण + गुरु लघु
प्रकार: २६ वार्णिक, ५१ मात्रिक छंद
बातों ही बातों में, रातों ही रातों में, लूटेंगे-भागेंगे, व्यापारी घातें दे आज
वादों ही वादों में, राजा जी चेलों में, सत्ता को बाँटेंगे, लोगों को मातें दे आज
यादें ही यादें हैं, कुर्सी है प्यादे हैं, मौका पा लादेंगे, प्यारे जो लोगों को आज
धोखा ही धोखा है, चौका ही चौका है, छक्का भी मारेंगे, लूटेंगे-बाँटेंगे आज
२१-२-२०१८
***
पुस्तक सलिला:
संगीताधिराज हृदयनारायण देव - संगीत संबंधी जानकारियों का कोष
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
[पुस्तक विवरण: संगीताधिराज हृदयनारायण देव, कृतिकार डॉ. सुमन लता श्रीवास्तव, शोध-सन्दर्भ ग्रंथ, आकार २४ से. मी. X १६ से. मी., आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, क्लॉथ बंधन, पृष्ठ ३५२, ८००/-, विद्यानिधि प्रकाशन डी १० / १०६१ समीप श्री महागौरी मंदिर, खजुरी खास दिल्ली ११००९४, ०११ २२९६७६३८, कृतिकार संपर्क १०७ इन्द्रपुरी कॉलोनी, जबलपुर ४८२००१]
*
अतीत को भूलनेवालेवाली कौमें भविष्य का निर्माण नहीं कर सकतीं। डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव इस सनातन सत्य से सुपरिचित हैं इसलिए उन्होंने सत्रहवीं सदी के पूर्वार्ध में गोंड शासक हृदयनारायण देव द्वारा संस्कृत में रचित संगीत विषयक दो ग्रंथों हृदय कौतुकम् और ह्रदय प्रकाश: के प्रकाश में भारतीय संगीत के आधारभूत तत्वों और सिद्धांतों के परीक्षण का दुष्कर कार्य किया है। वैदिक काल से गार्गी, मैत्रेयी. लोपामुद्रा जैसी विदुषियों की परंपरा को जीवंत करती सुमन जी की यह कृति पाश्चात्य मूल्यों और जीवनपद्धति के अंध मोह में ग्रस्त युवाओं के लिये प्रेरणा स्त्रोत हो सकती है।
हिंदी में प्रतिदिन प्रकाशित होनेवाली सहस्त्राधिक पुस्तकों में से हर महाविद्यालय और पुस्तकालय में रखी जाने योग्य कृतियाँ अँगुलियों पर गिनने योग्य होती हैं। विवेच्य कृति के विस्तृत फलक को दस परिच्छेदों में विभक्त किया गया है। भारतीय संगीत की परंपरा: उद्भव और विकास शीर्षक प्रथम परिच्छेद में नाद तथा संगीत की उत्पत्ति, प्रभाव और उपादेयता, संगीत और काव्य का अंतर्संबंध, भारतीय संगीत का वैशिष्ट्य, मार्गी और देशी संगीत, शास्त्रीय और सुगम संगीत, उत्तर भारतीय व् दक्षिण भारतीय संगीत, संगीत ग्रन्थ परंपरा व सूची आदि का समावेश है। द्वितीय परिच्छेद ह्रदय नारायण देव: महराज हृदयशाह के रूप में परिचय के अंतर्गत महराज हृदयशाह और गढ़ा राज्य, गोंड वंश और शासक, लोकहितकारी कार्य, हृदय कौतुकम् और ह्रदय प्रकाश: की विषयवस्तु, सिद्धांत विवेचन, रचनाकाल, तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों का संकेत है। आदि की प्रामाणिक जानकारी का सार प्रस्तुत किया गया है। श्रुति और स्वर: ह्रदय नारायण देव की श्रुति-स्वर व्यवस्था शीर्षक परिच्छेद में श्रुति का अर्थ व स्वरूप, संख्या व नामावली, श्रुति व स्वर में भेद, सप्तक का निर्माण आदि का तुलनात्मक अध्ययन है। चतुर्थ अनुच्छेद के अंतर्गत ग्रंथ द्वय में उल्लिखित पारिभाषिक शब्दों का विवेचन, संवाद, वादी-संवादी-अनुवादी-परिवादी, गमक, अलंकार, तान, मूर्च्छना आदि परिभाषिक शब्दों का विवेचन किया गया है।
वीणा के तार पर ज्यामितीय स्वर-स्थापना का निदर्शन पंचम परिच्छेद में है। राग वर्गीकरण और संस्थान की अवधारणा शीर्षक षष्ठम परिच्छेद राग-रागिनी वर्गीकरण से उत्पन्न विसंगतियों के निराकरण हेतु हृदयनारायण द्वारा अन्वेषित 'थाट-राग व्यवस्था' का विश्लेषण है। सप्तम परिच्छेद प्रचलित और स्वरचित रागों की व्याख्या में ह्रदयनारायण देव द्वारा गृह-अंश-न्यास, वर्ज्यावर्ज्य स्वर, स्वरकरण, ९२ रागों का निरूपण तथा तुलनात्मक अध्ययन है। ग्रन्थ द्वय की भाषा शैली के विवेचन पर अष्टम परिच्छेद केंद्रित है। पौर्वापर्य्य विचार नामित नवम परिच्छेद में हृदयनारायण देव के साथ पंडित लोचन तथापंडित अहोबल के सम्बन्ध में तुलनात्मक अध्ययन है। अंतिम दशम परिच्छेद 'ह्रदय नारायण देव का संगीतशास्त्र को योगदान' में ग्रंथनायक का मूल्यांकन किया गया है। ग्रंथांत में हृदय कौतुकम् और ह्रदय प्रकाश: का अविकल हिंदी अनुवाद सहित पाठ संदर्भ ग्रंथ सूची, ग्रंथनायक की राजधानी मंडला के रंगीन छायाचित्रादि तथा ग्रन्थारंभ में विदुषी डॉ. इला घोष लिखी सम्यक भूमिका ने ग्रन्थ की उपादेयता तथा महत्व बढ़ाया है।
पद्य साहित्य में रस-छंद-अलंकार में रूचि रखनेवाले रचनाकार गति-यति तथा लय साधने में संगीत की जानकारी न होने के कारण कठिनाई अनुभव कर छंद मुक्त कविता की अनगढ़ राह पर चल पड़ते हैं। आलोच्य कृति के विद्यार्थी को ऐसी कठिनाई से सहज ही मुक्ति मिल सकती है। छंद लेखन-गायन-नर्तन की त्रिवेणी में छिपे अंतर्संबंध को अनुमानने में सांगीतिक स्वर लिपि की जानकारी सहायक होगी। महाप्राण निराला की रचनाओं में पारम्परिक छंद विधान के अंधानुकरण न होने पर भी जो गति-यति-लय अन्तर्निहित है उसका कारण रवीन्द्र संगीत और लोक काव्य की जानकारी ही है। गीत-नवगीत के निरर्थक विवाद में उलझी मनीषाएँ इस ग्रन्थ का अध्ययन कर अपनी गीति रचनाओं में अन्तर्व्याप्त रागों को पहचान कर उसे शुद्ध कर सकें तो रचनाओं की रसात्मकता श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर सकेगी।
संगीत ही नहीं साहित्य संसार भी सुमन जी की इस कृति हेतु उनका आभारी होगा। संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि और शोध कार्य कर चुकी और बुद्धिजीवी कायस्थ परिवार की प्रमुख सुमन जी का भाषा पर असाधारण अधिकार होना स्वाभाविक है। ग्रन्थ की जटिल विषयवस्तु को सुरुचिपूर्वक सरलता से प्रस्तुतीकरण लेखिका के विषय पर पूर्णाधिकार का परिचायक है। पूरे ग्रन्थ में संस्कृत व हिंदी सामग्री के पाठ को त्रुटि रहित रखने के लिये टंकण, पृष्ठ रूपांकन तथा पाठ्य शुद्धि का श्रमसाध्य कार्य उन्होंने स्वयं किया है। वे कुलनाम 'श्रीवास्तव' के साथ-साथ वास्तव में भी 'श्री' संपन्न तथा साधुवाद की पात्र हैं। उनकी लेखनी ऐसे ही कालजयी ग्रंथों का प्रणयन करे तो माँ शारदा का कोष अधिक प्रकाशमान होगा। हिंदी को विश्व वाणी बनाने की दिशा में विविध विषयों की पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण और सक्षम भावाभिव्यक्ति संपन्न शब्दावली के विकास में ऐसे ग्रन्थ सहायक होंगे।
***
लघुकथा
योग्यता
*
गत कुछ वर्षों से वे लगातार लघुकथा मंच का सभापति बनाने पधार रहे थे। हर वर्ष आयोजनों में बुलाते, लघुकथा ले जाकर पत्रिका में प्रकाशित करते। संस्थाओं की राजनीति से उकता चुका वह विनम्रता से हाथ जोड़ लेता। इस वर्ष विचार आया कि समर्पित लोग हैं, जुड़ जाना चाहिए। उसने संरक्षकता निधि दे दी।
कुछ दिन बाद एक मित्र ने पूछा आप लघु कथा के आयोजन में नहीं पधारे? वे चुप्पी लगा गये, कैसे कहते कि जब से निधि दी तब से किसी ने रचना लेने, आमंत्रित करने या संपर्क साधने योग्य ही नहीं समझा।
***
नवगीत
घर तो है
*
घर तो है
लेकिन आँगन
या तुलसी चौरा
रहा नहीं है।
*
अलस्सुबह
उगता है सूरज
किंतु चिरैया
नहीं चहकती।
दलहन-तिलहन,
फटकन चुगने
अब न गिलहरी
मिले मटकती।
कामधेनुएँ
निष्कासित हैं,
भैरव-वाहन
चाट रहे मुख।
वन न रहे,
गिरि रहे न गौरी
ब्यौरा गौरा
रहा नहीं है।
*
घरनी छोड़
पड़ोसन ताकें।
अमिय समझ
विष गुटखा फाँकें।
नगदी सौदा
अब न सुहाये,
लुटते नित
उधार ला-ला के।
संबंधों की
नीलामी कर-
पाल रहे खुद
दुःख
कहकर सुख।
छिपा सकें मुख
जिस आँचल में
माँ का ठौरा
रहा नहीं है।
२१-२-२०१६
***
नवगीत
.
मैं नहीं नव
गीत लिखता
उजासों की
हुलासों की
निवासों की
सुवासों की
खवासों की
मिदासों की
मिठासों की
खटासों की
कयासों की
प्रयासों की
कथा लिखता
व्यथा लिखता
मैं नहीं नव
गीत लिखता
.
उतारों की
चढ़ावों की
पड़ावों की
उठावों की
अलावों की
गलावों की
स्वभावों की
निभावों की
प्रभावों की
अभावों की
हार लिखता
जीत लिखता
मैं नहीं नव
गीत लिखता
.
चाहतों की
राहतों की
कोशिशों की
आहटों की
पूर्णिमा की
‘मावसों की
फागुनों की
सावनों की
मंडियों की
मन्दिरों की
रीत लिखता
प्रीत लिखता
मैं नहीं नव
गीत लिखता
***
श्रृंगार गीत:
.
चाहता मन
आपका होना
डूब नयनों में 
हुलस खोना 
.
शशि ग्रहण से
घिर न जाए
मेघ दल में
छिप न जाए
चाह अजरा
बने तारा
रूपसी की
कीर्ति गाये
मिले मन में
एक तो कोना
.
द्वार पर
आ गया बौरा
चीन्ह भी लो
तनिक गौरा
कूक कोयल
गाए बन्ना
सुना बन्नी
आम बौरा
मार दो मंतर
करो टोना
.
माँग इतनी
माँग भर दूँ
आप का
वर-दान कर दूँ
मिले कन्या-
दान मुझको
जिंदगी को
गान कर दूँ
प्रणय का प्रण
तोड़ मत देना
२१.२.२०१५
....
गीत:
*
द्रोण में
पायस लिये
पूनम बनी,
ममता सनी,
आई सुजाता,
बुद्ध बन जाओ.
.
सिसकियाँ
कब मौन होतीं?
अश्रु
कब रुकते?
पर्वतों सी पीर पीने
मेघ रुक झुकते.
धैर्य का सागर
पियें कुम्भज
नहीं थकते.
प्यास में,
संत्रास में
नवगीत का
अनुप्रास भी
मन को न भाता.
क्रुद्ध हो गाओ.
.
लहरियाँ
कब रुकीं-हारीं.
भँवर कब थकते?
सागरों सा धीर
धरकर
मलिनता तजते.
स्वच्छ सागर सम
करो मंथन
नहीं चुकना.
रास में
खग्रास में
परिहास सा
आनंद पाओ
शुद्ध बन जाओ.
२१-२-२०१५
***
आभा सक्सेना, देहरादून
‘सलिल’ जी से हुआ है जब से वार्तालाप
कविता लिखनी आ गई, आया मात्रा नाप
आया मात्रा नाप मात्रा गिननी सीखी
कविता मन को भाई लगती छंद सरीखी
कह आभा मुस्काय लगे अब गीत सरल है
छाने लगे छंद कविता में गन्ध ‘सलिल’ है
२१-२-२०१५
***
नवगीत:
.
जन चाहता
बदले मिज़ाज
राजनीति का
.
भागे न
शावकों सा
लड़े आम आदमी
इन्साफ मिले
हो ना अब
गुलाम आदमी
तन माँगता
शुभ रहे काज
न्याय नीति का
.
नेता न
नायकों सा
रहे आम आदमी
तकलीफ
अपनी कह सके
तमाम आदमी
मन चाहता
फिसले न ताज
लोकनीति का
(रौद्राक छंद)
१४.२.२०१५
***
हाइकु नवगीत :
.
टूटा विश्वास
शेष रह गया है
विष का वास
.
कलरव है
कलकल से दूर
टूटा सन्तूर
जीवन हुआ
किलकिल-पर्याय
मात्र संत्रास
.
जनता मौन
संसद दिशाहीन
नियंता कौन?
प्रशासन ने
कस लिया शिकंजा
थाम ली रास
.
अनुशासन
एकमात्र है राह
लोक सत्ता की.
जनांदोलन
शांत रह कीजिए
बढ़े उजास
.
***
हाइकु
.
दर्द की धूप
जो सहे बिना झुलसे
वही है भूप
.
चाँदनी रात
चाँद को सुनाते हैं
तारे नग्मात
.
शोर करता
बहुत जो दरिया
काम न आता
.
गरजते हैं
जो बादल वे नहीं
बरसते हैं
.
बैर भुलाओ
वैलेंटाइन मना
हाथ मिलाओ
.
मौन तपस्वी
मलिनता मिटाये
नदी का पानी
.
नहीं बिगड़ा
नदी का कुछ कभी
घाट के कोसे
.
गाँव-गली के
दिल हैं पत्थर से
पर हैं मेरे
.
गले लगाते
हँस-मुस्काते पेड़
धूप को भाते
***
तांका
.
बिना आहट
सांझ हो या सवेरे
लिये चाहत
ओस बूँद बिखेरे
दूब पर मौसम
.
मंजिल मिली
हमसफर बिछड़े
सपने टूटे
गिला मत करना
फिर चल पड़ना
.
तितली उड़ी
फूल की ओर मुड़ी
मुस्काई कली
हवा गुनगुनाई
झूम फागें सुनाईं
.
घमंड थामे
हाथ में तलवार
लड़ने लगा
अपने ही साये से
उलटे मुँह गिरा
....
लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला, जयपुर
*
आग्रह स्वीकार कर कीन्ही कृपा गुरुदेव
मित्रवत भाव से अब ले सकूँ सलाह सदैव
हार्दिक आभार आपका श्री संजीव सलिल
स्वागत करता 'लक्ष्मण' दे तुम्हे ये दिल ।
२१-२-२०१३
***
दोहा सलिला मुग्ध
*
दोहा सलिला मुग्ध है, देख बसंती रूप.
शुक प्रणयी भिक्षुक हुआ, हुई सारिका भूप..
चंदन चंपा चमेली, अर्चित कंचन-देह.
शराच्चन्द्रिका चुलबुली, चपला करे विदेह..
नख-शिख, शिख-नख मक्खनी, महुआ सा पीताभ.
पाटलवत रत्नाभ तन, पौ फटता अरुणाभ..
सलिल-बिंदु से सुशोभित, कृष्ण कुंतली भाल.
सरसिज पंखुड़ी से अधर, गुलकन्दी टकसाल..
वाक् सारिका सी मधुर, भौंह-नयन धनु-बाण.
वार अचूक कटाक्ष का, रुकें न निकलें प्राण..
देह-गंध मादक मदिर, कस्तूरी अनमोल.
ज्यों गुलाब-जल में 'सलिल', अंगूरी दी घोल..
दस्तक कर्ण कपट पर, देते रसमय बोल.
वाक्-माधुरी हृदय से, कहे नयन-पट खोल..
दाड़िम रद-पट मौक्तिकी, संगमरमरी श्वेत.
रसना मुखर सारिका, पिंजरे में अभिप्रेत..
वक्ष-अधर रस-गगरिया, सुख पा कर रसपान.
बीत न जाये उमरिया, शुष्क न हो रस-खान..
रसनिधि हो रसलीन अब, रस बिन दुनिया दीन.
तरस न तरसा, बरस जा, गूंजे रस की बीन..
रूप रंग मति निपुणता, नर्तन-काव्य प्रवीण.
बहे नर्मदा निर्मला, हो न सलिल-रस क्षीण..
कंठ सुराहीदार है, भौंह कमानीदार.
पिला अधर रस-धार दो, तुमसा कौन उदार..
रूपमती तुम, रूप के कद्रदान हम भूप.
तृप्ति न पाये तृषित गर, व्यर्थ 'सलिल' जल-कूप..
गाल गुलाबी शराबी, नयन-अधर रस-खान.
चख-पी डूबा बावरा, भँवरा पा रस-दान..
जुही-चमेली वल्लरी, बाँहें कमल मृणाल.
बंध-बँधकर भुजपाश में, होता 'सलिल' रसाल..
***
हास्य रचना:
साहिब जी मोरे...
*
साहिब जी मोरे मैं नहीं रिश्वत खायो.....
झूठो सारो जग मैं साँचो, जबरन गयो फँसायो.
लिखना-पढ़ना व्यर्थ, न मनभर नोट अगर मिल पायो..
खन-खन दै तब मिली नौकरी, खन-खन लै मुसक्यायो.
पुरुस पुरातन बधू लच्छमी, चंचल बाहि टिकायो..
पैसा लै कारज निब्टायो, तन्नक माल पचायो.
जिनके हाथ न लगी रकम, बे जल कम्प्लेंट लिखायो..
इन्क्वायरी करबे वारन खों अंगूरी पिलबायो.
आडीटर-लेखा अफसर खों, कोठे भी भिजवायो..
दाखिल दफ्तर भई सिकायत, फिर काहे खुल्वायो?
सूटकेस भर नागादौअल लै द्वार तिहारे आयो..
बाप न भैया भला रुपैया, गुपचुप तुम्हें थमायो.
थाम हँसे अफसर प्यारे, तब चैन 'सलिल'खों आयो..
लेन-देन सभ्यता हमारी, शिष्टाचार निभायो.
कसम तिहारी नेम-धरम से भ्रष्टाचार मिटायो..
अपनी समझ पड़ोसन छबि, निज नैनं मध्य बसायो.
हल्ला कर नाहक ही बाने तिरिया चरित दिखायो..
अबला भाई सबला सो प्रभु जी रास रचा नई पायो.
साँच कहत हो माल परयो 'सलिल' बाँटकर खायो..
साहब जी दूना डकार गये पर बेदाग़ बचायो.....
***
हास्य पद:
जाको प्रिय न घूस-घोटाला
*
जाको प्रिय न घूस-घोटाला...
वाको तजो एक ही पल में, मातु, पिता, सुत, साला.
ईमां की नर्मदा त्यागयो, न्हाओ रिश्वत नाला..
नहीं चूकियो कोऊ औसर, कहियो लाला ला-ला.
शक्कर, चारा, तोप, खाद हर सौदा करियो काला..
नेता, अफसर, व्यापारी, वकील, संत वह आला.
जिसने लियो डकार रुपैया, डाल सत्य पर ताला..
'रिश्वतरत्न' गिनी-बुक में भी नाम दर्ज कर डाला.
मंदिर, मस्जिद, गिरिजा, मठ तज, शरण देत मधुशाला..
वही सफल जिसने हक छीना,भुला फ़र्ज़ को टाला.
सत्ता खातिर गिरगिट बन, नित रहो बदलते पाला..
वह गर्दभ भी शेर कहाता बिल्ली जिसकी खाला.
अख़बारों में चित्र छपा, नित करके गड़बड़ झाला..
निकट चुनाव, बाँट बन नेता फरसा, लाठी, भाला.
हाथ ताप झुलसा पड़ोस का घर धधकाकर ज्वाला..
सौ चूहे खा हज यात्रा कर, हाथ थाम ले माला.
बेईमानी ईमान से करना, 'सलिल' पान कर हाला..
है आराम ही राम, मिले जब चैन से बैठा-ठाला.
परमानंद तभी पाये जब 'सलिल' हाथ ले प्याला..
(महाकवि तुलसीदास से क्षमाप्रार्थना सहित)
***
गीत :
*
सबको हक है जीने का,
चुल्लू-चुल्लू पीने का.....
*
जिसने पाई श्वास यहाँ,
उसने पाई प्यास यहाँ.
चाह रचा ले रास यहाँ.
हर दिन हो मधुमास यहाँ.
आह न हो, हो हास यहाँ.
आम नहीं हो खास यहाँ.
जो चाहा वह पा जाना
है सौभाग्य नगीने का.....
*
कोई अधूरी आस न हो,
स्वप्न काल का ग्रास न हो.
मनुआ कभी उदास न हो,
जीवन में कुछ त्रास न हो.
विपदा का आभास न हो.
असफल भला प्रयास न हो.
तट के पार उतरना तो
है अधिकार सफीने का.....
*
तम है सघन, उजास बने.
लक्ष्य कदम का ग्रास बने.
ईश्वर का आवास बने.
गुल की मदिर सुवास बने.
राई, फाग हुलास बने.
खास न खासमखास बने.
ज्यों की त्यों चादर रख दें
फन सीखें हम सीने का.....
२१.२.२०१०

***

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

फरवरी ७, हिंगलिश, ग़ज़ल, हाइकु गीत, ताण्डव छंद, शे'र, लोकतंत्र, लघुकथा, मुण्डकोपनिषद, गाय, मुक्तिका

सलिल सृजन फरवरी ७

सरला जी को नमस्कार है . सुबह-सुबह बगिया में जातीं सूर्य देव को शीश नवातीं फूल न तोड़ें, पौधे सींचें कलियों को हँसकर दुलरातीं संग हमेशा सद्विचार है सरला जी को नमस्कार है ० हरी दूब पर लगता आसन सब बगिया पर चलता शासन किसे उखाड़ें, किसको रोपें दें-लें दाना-पानी राशन कोई न जाने चमत्कार है सरला जी को नमस्कार है

७ . २ . २०१६ ०००

अभिनव प्रयोग
हिंगलिश ग़ज़ल
*
Get well soon.
दे दुश्मन को भून।
है विपक्ष अभिशाप।
Power party boon.
Be officer first.
तब ही मिले सुकून।
कर धरती को नष्ट।
Let us go to moon.
Fight for the change.
कुतर नहीं नाखून।
न्यायमूर्ति भगवान।
Every plaintiff coon.
Always do your best.
तब ही मिले सुकून।
*
coon = हबशी गुलाम
७.२.२०२४
***
विमर्श
लोकतंत्र है तो विरोध की गुंजाइश भी बनी रहे!
स्रोतः स्व. खुशवंत सिंह
सरकार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करने वालों के लिए भी कोई कायदे−कानून होने चाहिए। उसके लिए हमें बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। अपने बापू तो दुनिया के महानतम विरोध करने वाले थे। उनके जेहन में बिल्कुल साफ था कि क्या सही है और क्या गलत? बॉयकॉट उनके लिए जायज तरीका था। उन्होंने विदेशी कपड़ों के बॉयकॉट की अपील की। आखिर जो इस देश में बन रहा है, उसका इस्तेमाल होना चाहिए। उन्होंने चीजों का ही बॉयकॉट नहीं किया, लोगों का भी किया। वे लोग जिनको हिन्दुस्तान में नहीं होना चाहिए था, उनके बॉयकॉट के लिए भी कहा। उन्होंने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा दिया। विरोध−प्रदर्शन का बापू का तरीका किसी की जिंदगी में परेशानी लाने के लिए नहीं था। वह जिंदगी को रोकना भी नहीं चाहते थे। वह तो बस अपना विरोध दर्ज करना चाहते थे।
बापू का दांडी मार्च गजब की मिसाल थी। उन्होंने पहले सरकार को नोटिस दिया। उसमें कहा कि नमक तो गरीबों के लिए भी जरूरी है। सो, नमक बनाने का हक सिर्फ सरकार का नहीं हो सकता। सरकार जो कर रही है, वह गलत है। इसलिए वह उस कानून को तोड़ने जा रहे हैं। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मुजरिम करार दिए गए। जेल भेज दिया गया। तब भी उनकी जीत हुई। वह जीते, क्योंकि वह सही थे। उनका मुद्दा जन−जन से जुड़ा था। विरोध के जब तमाम तरीके काम न आए तो वह अनशन पर बैठ गए। लोगों ने उसे महसूस किया और उन्हें जम कर समर्थन दिया। उन्होंने अपने अनशन का पब्लिक प्रदर्शन नहीं किया।
बापू के तरीकों के उलट आज के विरोध−प्रदर्शन हैं। जरा गौर तो फरमाइए। रास्ता रोको, बंद, घेराव वगैरह−वगैरह। इन सबसे हमारी आम जिंदगी पर असर पड़ता है। ये सब कुल मिलाकर किसी को ब्लैकमेल करने या परेशान करने के लिए होते हैं। इसीलिए वे गलत हैं और अपने मकसद को पूरा नहीं कर पाते। बापू इस तरह के विरोध को अपनी रजामंदी नहीं देते।
विरोध के जायज तरीकों के लिए हमारे रोल मॉडल सांसद और विधायक हो सकते हैं, लेकिन वे अपना रोल ठीक से कर नहीं पा रहे हैं। पंडित नेहरू जब तक प्रधानमंत्री थे, तब तक ये लोग कायदे से विरोध करते थे। शायद ही कभी वे सदन में अध्यक्ष की ओर भागते हों। सदन न चलने वाला शोर−शराबा करते हों। आज तो जरा−सी बात पर हंगामा हो जाता है और सदन को रोक दिया जाता है। ऐसा लगता है कि संसदीय प्रणाली वाला लोकतंत्र अपने यहां चुक गया है। हम आसानी से सारी तोहमत आज के नेताओं पर लगा देते हैं। ऐसा करने से पहले हमें सोचना चाहिए कि क्या उन्हें हमने नहीं चुना है? क्या हमने उन्हें कानून बनाने की जिम्मेदारी नहीं सौंपी?
टिड्डी दल
एक बार दिल्ली में जबर्दस्त आंधी आई थी। फिर जबर्दस्त बारिश हुई थी। दिन में ऐसा महसूस होता था मानो रात हो गई हो। उस वक्त मुझे अपने लड़कपन के दिन याद आए। तब भी मैंने ऐसा ही तूफान देखा था। कुछ−कुछ ऐसा हुआ था। अचानक आसमान पर बादल घिर आए थे। टिडि्डयों का जबर्दस्त हमला हुआ था। अरबों की तादाद में ये दल हर पेड़ पर छा गए थे और पत्तों को खाने लगे थे। कुछ मुसलमान भाई तो अपनी छत पर चादर लेकर चढ़ गए थे, उसे बिछा कर
टिडि्डयों को इकट्ठा करने लगे, ताकि उसके पकोड़े बना सकें। तभी जोरों की आंधी आई थी। फिर आई थी जबर्दस्त बरसात। देखते ही देखते मौसम ठंडा हो गया था। बारिश के तमाम धूल−मिट्टी को धो−पोंछ दिया था। हर तरफ गजब की सफाई और हरियाली ही हरियाली बिखर गई थी।
मेरे मुसलमान दोस्त कहते नहीं थकते थे कि उनके पूर्वज टिडि्डयों को खाते थे। ये टिडि्डयां उत्तरी अफ्रीका से आती हैं। वह अक्सर घूमती रहती हैं। अपनी जगह बदलती रहती हैं। ये पूरे मध्य एशिया में छा जाती हैं। वहां से होते हुए हिन्दुस्तान और पाकिस्तान चली आती हैं। लातीनी अमेरिका में उसे लोकस्ट माइग्रेटोरिया कहते हैं। ये बर्बादी करने वाली होती हैं। उसका जिक्र बाइबिल में भी आता है। वहां इनकी वजह से भयंकर तबाही के बारे में चर्चा है। उसे जंगली शहद भी कहा गया है। इन दिनों हम लोग टिड्डी दलों का हमला नहीं देखते हैं, लेकिन उसकी कई यादें मेरे जेहन में हैं। अगर वे कभी वापसी करती हैं और मैं आसपास होता हूं तो मजा आ जाएगा। मैं अपने रसोइए से गुजारिश करूंगा कि वह मुझे उनके पकोड़े बना कर खिलाए। मैं अपने शाम के ड्रिंक के साथ उनका मजा लेना चाहूंगा।
टिप्पणीः यह आलेख स्व. खुशवंत सिंह के पुरालेखों में से एक है।
***
लघुकथा
बाज
.
नीम आसमान में परवाज भर रहा था बाज। समीप ही उड़ रहे रेवेन पक्षी ने बाज को ऊपर उठते देखा तो लपक कर बाज की गर्दन के ऊपर जा बैठा और लगा चोंच मारने। रेवेन सोच रहा था बाज उससे लड़ने के लिए नीचे उतरेगा और वह पल भर में आसमान में ऊपर जाकर बाज को नीचा दिखा देगा।
बाज को आसमान का बादशाह कहा जाता है और यह रेवेन को बर्दाश्त नहीं होता था।
बाज ने रेवेन के चंचु-प्रहार सहते हुए ऊपर उठना जारी रखा। बाज की सहनशीलता रंग लाई। जैसे जैसे बाज आसमान में ऊपर उठता गया, वायुमंडल में ओषजन वायु कम होती गई। हमेशा ऊँचाई पर उड़नेवाला बाज कम ओषजन में उड़ने का अभ्यस्त था किंतु रेवेन के लिए यह पहला अवसर था। बाज अपनी ऊँचाई और गति बढ़ाता गया। रेवेन के लिए बाज की गर्दन पर टिके रहना कठिन होता गया और अंतत: रेवेन धराशायी हो गया औरआसमान छूता रहा बाज ।
७-३-२०२३
***
लघुकथा
अपराधी
.
अपराधी के कटघरे में एक बालक खड़ा था। न्यायाधीश ने उस पर दृष्टि डाली, ऐसा प्रतीत हुआ बादलों में चंद्रमा छिपा हो। बालक उदास, नीची निगाह किए, चिंताग्रस्त दिख रहा था। न्यायाधीश अनुभवी थे, समझ गए कि यह आदतन अपराधी नहीं है।
सरकारी वकील ने बालक का अपराध बताया कि वह होटल से खाद्य सामग्री चुरा रहा था, तभी उसे पकड़ लिया गया। होटल मालिक ने बालक के जुर्म की तस्दीक करते हुए गर्व के साथ कहा कि उसीने अपने कर्मचारियों की मदद से बालक को पकड़ कर मरम्मत भी की थी ताकि फिर चोरी करने की हिम्मत न पड़े।
न्यायाधीश के पूछने पर लड़के ने स्वीकार किया कि उसने डबलरोटी उठाई थी हुए बिस्कुट उठाने के पहले ही उसे दबोच लिया गया था। यह भी बताया कि वहाँ कई तरह की मिठाइयाँ भी थीं, उसे मिठाई बहुत अच्छी लगती है।
'जब तुम्हें मिठाई बहुत अच्छी लगती है और वहां कई प्रकार की मिठाइयाँ रखी थीं तो तुमने मिठाई न उठकर डबलरोटी क्यों उठाई, पैसे क्यों नहीं दिए?' -न्यायाधीश ने पूछा।
''घर पर माँ बीमार है, उसे डबलरोटी खिलानी थी, मेरे पास या घर में एक भी रुपया नहीं था।''
'तो किसी से माँग लेते, चोरी बुरी बात है न?'
"कई लोगों से रोटी या पैसे माँगे सबने दुतकार दिया, इनसे भी डबलरोटी माँगी थी और कहा था कि माँ को खिलाकर आकर होटल में काम कर दूँगा पर इन्होंने भी डाँटकर भगा दिया।" -होटलवाले की तरफ देखकर बालक बोला।
मुकदमे के फैसला दोपहर भोजन काल के बाद सुनाने का आदेश देते हुए न्यायाधीश ने भूखे बालक को सरकारी व्यय पर भोजन कराए जाने का आदेश दिया।
डफरबाद अदालत बैठी तो न्यायाधीश ने कहा- 'यह किसी सभ्य समाज के लिए शर्म की बात है कि लोककल्याणकारी गणराज्य में किसी असहाय स्त्री हुए बालक को रोटी भी नसीब न हो। सरकार, प्रशासन, समाज और नागरिक सभी इस परिस्थिति के लिए दोषी हैं कि हम अपने वर्तमान और भविष्य की समुचित देखभाल नहीं कर पा रहे और नौनिहालों को मजबूरन चोरी करने के लिए विवश होना पड़े, अगर हर चोरी दंडनीय होती तो माखन-मिसरी चुराने के लिए कन्हैया को भी दंड दिया जाता। लोकोक्ति है 'भूखे भजन न होय गुपाला'।
इस बालक के अपराध के लिए हम सब दोषी हैं, स्वयं मैं भी। इसलिए मुझ समेत इस अदालत में उपस्थित हर व्यक्ति दस-दस रुपए जमा करे। होटल मालिक को संवेदनहीनता तथा बालक को बिना अधिकार पीटने के लिए एक हजार रुपए जमा करने होंगे। यह राशि बालक की माँ को दे दी जाए जिससे वह स्वस्थ्य होने तकअपने तथा बालक के भोजन की व्यवस्था कर सके। जिलाधिकारी को निर्देश है कि बालक की निशुल्क शिक्षा का प्रबंध करें तथा माँ को गरीबी रेखा से नीचे होने का प्रमाणपत्र देकर शासकीय योजनाओं से मिलनेवाले लाभ दिलाकर इस न्यायालय को सूचित करें। न्याय देने का अर्थ केवल दंड देना नहीं होता, ऐसी परिस्थिति का निर्माण करना होता है ताकि भविष्य में कोई अन्य निर्दोष विवश होकर न बने अपराधी।
७-२-२०२३
***
मुण्डकोपनिषद १
परा सत्य अव्यक्त जो, अपरा वह जो व्यक्त।
ग्राह्य परा-अपरा, नहीं कहें किसी को त्यक्त।।
परा पुरुष अपरा प्रकृति, दोनों भिन्न-अभिन्न।
जो जाने वह लीन हो, अनजाना है खिन्न।।
जो विदेह है देह में, उसे सकें हम जान।
भव सागर अज्ञान है, अक्षर जो वह ज्ञान।।
मन इंद्रिय अरु विषय को, मान रहा मनु सत्य।
ईश कृपा तप त्याग ही, बल दे तजो असत्य।।
भोले को भोले मिलें, असंतोष दुःख-कोष।
शिशु सम निश्छल मन रखें, करें सदा संतोष।।
पाना सुखकारक नहीं, खोना दुखद न मान।
पाकर खो, खोकर मिले, इस सच को पहचान।।
'कुछ होने' का छोड़ पथ, 'कुछ मत हो' कर चाह।
जो रीता वह भर सके, भरा रीत भर आह।।
तन को पहले जान ले, तब मन का हो ज्ञान।
अपरा बिना; न परा का, हो सकता अनुमान।।
सांसारिक विज्ञान है, अपरा माध्यम मान।
गुरु अपरा से परा की, करा सके पहचान।।
अक्षर अविनाशी परा, अपरा क्षर ले जान।
अपरा प्रगटे परा से, त्याग परा पहचान।।
मन्त्र हवन अपरा समझ, परा सत्य का भान।
इससे उसको पा सके, कर अभ्यास सुजान।।
अपरा पर्दा कर रही, दुनियावी आचार।
परा न पर्दा जानती, करे नहीं व्यापार।।
दृष्टा दृष्ट न दो रहें, अपरा-परा न भिन्न।
क्षर-अक्षर हों एक तो, सत्यासत्य अभिन्न।।
***
मुक्तिका
किसे दिखाएँ मन के छाले?
पिला रहे सब तन को प्याले
संयम मैखाने में मेहमां
सती बहकती कौन सम्हाले?
वेणु झूमती पीकर पब में
ब्रज की रेणु क्रशर के पाले
पचा न पाएँ इतना खाते
कुछ, कुछ को कौरों के लाले
आदम मन की देख कालिमा
शरमा रहे श्याम पट काले
***
मुक्तिका
घातक सपनों के लिए जीवन का यह दौर
फागुन से डर काँपती कोमल कमसिन बौर
महुआ मर ही गया है, हो बोतल में कैद
मस्ती को मिलती नहीं मानव मन में ठौर
नेता जुमलेबाज है, जनता पत्थरबाज
भूख-प्यास का राज है, नंगापन सिरमौर
सपने मोहनभोग के छपा घोषणा पत्र
छीन-खा रहे रात-दिन जन-हित का कागौर
'सलिल' सियासत मनचली मुई हुई निर्लज्ज
छलती जन विश्वास को, भुला तरीके-तौर
७-६-२०२०
***
मुक्तिका
जंगल जंगल
*
जंगल जंगल कहाँ रहे अब
नदी सरोवर पूर रहे अब
काटे तरु, बोई इमारतें
चंद ठूँठ बेनूर रहे अब
कली मुरझती असमय ही लख
कामुक भौंरे क्रूर हुए अब
होली हो ली, अनहोली अब
रंग तंग हो दूर हुए अब
शेष न शर्म रही नैनों में
स्नेहिल नाते सूर हुए अब
पुष्पा पुष्प कहें काँटों से
झुक खट्टे अंगूर हुए अब
मिटी न खुद से खुद की दूरी
सपने चकनाचूर हुए अब
***
एक रचना
*
गाय
*
गाय हमारी माता है
पूजो गैया को पूजो
*
पिता कहाँ है?, ज़िक्र नहीं
माता की कुछ फ़िक्र नहीं
सदा भाई से है लेना-
नहीं बहिन को कुछ देना
है निज मनमानी करना
कोई तो रस्तों सूझो
पूजो गैया को पूजो
*
गौरक्षक हम आप बने
लाठी जैसे खड़े-तने
मौका मिलते ही ठोंके-
बात किसी की नहीं सुनें
जबरा मारें रों न देंय
कार्य, न कारण तुम बूझो
पूजो गैया को पूजो
*
गैया को माना माता
बैल हो गया बाप है
अकल बैल सी हुई मुई
बात अक्ल की पाप है
सींग मारते जिस-तिस को
भागो-बचो रे! मत जूझो
पूजो गैया को पूजो
*
मुक्तिका
*
मुक्त मन मुस्कान मंजुल मुक्तिका
नर्मदा का गान किलकिल मुक्तिका
मुक्तकों से पा रही विस्तार यह
षोडशी का भान खिलखिल मुक्तिका
बीज अंकुर कुसुम कंटक धूल सह
करे जीवन गान हिलमिल मुक्तिका
क्या कहे कैसे कहाँ कब, जानती
ज्योत्सना नभ-शान झिलमिल मुक्तिका
रूपसी अपरूप उज्वल धूपसी
मनुजता का मान प्रांजल मुक्तिका
नर्मदा रस-भाव-लय की गतिमयी
कथ्य की है जान, निश्छल मुक्तिका
सत्य-शिव-सुंदर सलिल आराध्य है
मीत गुरु गंभीर-चंचल मुक्तिका
७-२-२०२०
***
नवगीत
पकौड़ा-चाय
*
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
*
हमने सबको साथ ले,
सबका किया विकास।
'बना देश में' का दिया,
नारा खासुलखास।
नव धंधा-आजीविका
रोजी का पर्याय
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
*
सब मिल उत्पादन करो,
साधो लक्ष्य अचूक।
'भारत में ही बना है'
पीट ढिंढोरा मूक।।
हम कुर्सी तुम सड़क पर
बैठो यही उपाय
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
*
लाइसेंस-जीएसटी,
बिना नोट व्यापार।
इनकम कम, कर दो अधिक,
बच्चे भूखे मार।।
तीन-पांच दो गुणित दो
देशभक्ति अध्याय
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
***
छंद: दोहा
***
नवगीत
*
तू कल था
मैं आज हूं
*
उगते की जय बोलना
दुनिया का दस्तूर।
ढलते को सब भूलते,
यह है सत्य हुजूर।।
तू सिर तो
मैं ताज हूं
*
मुझको भी बिसराएंगे,
कहकर लोग अतीत।
हुआ न कोई भी यहां,
जो हो नहीं व्यतीत।।
तू है सुर
मैं साज हूं।।
*
नहीं धूप में किए हैं,
मैंने बाल सफेद।
कल बीता हो तजूंगा,
जगत न किंचित खेेद।।
क्या जाने
किस व्याज हूं?
***
७.२.२०१८
***
लघुकथा-
बेटा
*
गलत संगत के कारण उसे चोरी की लत लग गयी. समझाने-बुझाने का कोई प्रभाव नहीं हुआ तो उसे विद्यालय से निकाल दिया गया. अपने बेटे को जैसे-तैसे पढ़ा-लिखा कर भला आदमी बनाने का सपना जी रही बीमार माँ को समाचार मिला तो सदमे के कारण लकवा लग गया.
एक रात प्यास से बेचैन माँ को निकट रखे पानी का गिलास उठाने में भी असमर्थ देखकर बेटे से रहा नहीं गया. पानी पिलाकर वह माँ के समीप बैठ गया और बोला 'माँ! तेरे बिना मुझसे रोटी नहीं खाई जाती.' बेबस माँ को आँखों से बहते आँसू पोंछने के बाद बेटा सवेरे ही घर से चला जाता है.
दिन भर बेटे के घर न आने से चिंतित माँ ने आहत सुन दरवाजे से बेटे के साथ एक अजनबी को घर में घुसते हुए देखा तो उठने की कोशिश की किन्तु कमजोरी के कारण उठ न सकी. अजनबी ने अपना परिचय देते हुए बताया कि बेटे ने उनके गोदाम में चोरी करनेवाले चोरों को पकड़वाया है. इसलिए वे बेटे को चौकीदार रखेंगे. वह काम करने के साथ-साथ पढ़ भी सकेगा.
अजनबी के प्रति आभार व्यक्त करने की कोशिश में हाथ जोड़ने की कोशिश करती माँ के मुँह से निकला 'बेटा'
***
मुक्तक
मेटते रह गए कब मिटीं दूरियाँ?
पीटती ही रहीं, कब पिटी दूरियाँ?
द्वैत मिटता कहाँ, लाख अद्वैत हो
सच यही कुछ बढ़ीं, कुछ घटीं दूरियाँ
*
कुण्डलिया
जल-थल हो जब एक तो, कैसे करूँ निबाह
जल की, थल की मिल सके, कैसे-किसको थाह?
कैसे-किसको थाह?, सहायक अगर शारदे
संभव है पल भर में, भव से विहँस तार दे
कहत कवि संजीव, हरेक मुश्किल होती हल
करें देखकर पार, एक हो जब भी जल-थल
*
***
एक प्रश्न:
*
लिखता नहीं हूँ,
लिखाता है कोई
*
वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान
*
शब्द तो शोर हैं तमाशा हैं
भावना के सिंधु में बताशा हैं
मर्म की बात होंठ से न कहो
मौन ही भावना की भाषा है
*
हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं,
*
अवर स्वीटेस्ट सांग्स आर दोज विच टेल ऑफ़ सैडेस्ट थॉट.
*
जितने मुँह उतनी बातें के समान जितने कवि उतनी अभिव्यक्तियाँ
प्रश्न यह कि क्या मनुष्य का सृजन उसके विवाह अथवा प्रणय संबंधों से प्रभावित होता है? क्या अविवाहित, एकतरफा प्रणय, परस्पर प्रणय, वाग्दत्त (सम्बन्ध तय), सहजीवी (लिव इन), प्रेम में असफल, विवाहित, परित्यक्त, तलाकदाता, तलाकगृहीता, विधवा/विधुर, पुनर्विवाहित, बहुविवाहित, एक ही व्यक्ति से दोबारा विवाहित, निस्संतान, संतानवान जैसी स्थिति सृजन को प्रभावित करती है?
यह प्रभाव कब, कैसे, कितना और कैसा होता है? इस पर विचार दें.
आपके विचारों का स्वागत और प्रतीक्षा है.
७-२-२०१७
***
द्विपदियाँ (अश'आर)
*
उगते सूरज को करे, दुनिया सदा प्रणाम
तपते से बच,डूबते देख न लेती नाम
*
औरों के ऐब देखना, आसान है बहुत
तू एक निगाह, अपने आप पे भी डाल ले
*
आगाज़ के पहले जरा अंजाम सोच ले
शुरुआत किसी काम की कर, बाद में 'सलिल'
*
उगते सूरज को करे, दुनिया सदा प्रणाम
तपते से बच,डूबते देख न लेती नाम
*
३-२-२०१६
अमरकंटक एक्सप्रेस बी २ /३५, बिलासपुर-भाटापारा
***
एक रचना
परिंदा
*
करें पत्ते परिंदों से गुफ्तगू
व्यर्थ रहते हैं भटकते आप क्यूँ?
बंद पिंजरों में रहें तो हर्ज़ क्या?
भटकने का आपको है मर्ज़ क्या??
परिंदे बोले: 'न बंधन चाहिए
जमीं घर, आकाश आँगन चाहिए
फुदक दाना चुन सकें हम खुद जहाँ
उड़ानों पर भी न हो बंदिश वहाँ
क्यों रहें हम दूर अपनी डाल से?
मरें चाहे, जूझ तो लें हाल से
चुगा दें चुग्गा उन्हें असमर्थ जो
तोल कर पर नाप लें वे गगन को
हम नहीं इंसान जो खुद के लिये
जियें, हम जीते यहाँ सबके लिये'
मौन पत्ता छोड़ शाखा गिर गया
परिंदा झट से गगन में उड़ गया
२०-१२-२०१५
***
हाइकु गीत:
.
रेवा लहरें
झुनझुना बजातीं
लोरी सुनातीं
.
मन लुभातीं
अठखेलियाँ कर
पीड़ा भुलातीं
.
राई सुनातीं
मछलियों के संग
रासें रचातीं
.
रेवा लहरें
हँस खिलखिलातीं
ठेंगा दिखातीं
.
कुनमुनातीं
सुबह से गले मिल
जागें मुस्कातीं
.
चहचहातीं
चिरैयाँ तो खुद भी
गुनगुनातीं
.
रेवा लहरें
झट फिसल जातीं
हाथ न आतीं
***
कविता
प्रश्नोत्तर
कल क्या होगा?
कौन बचेगा? कौन मरेगा?
कौन कहे?
.
आज न डरकर
कल की खातिर
शिव मस्तक से सतत बहे बहे
.
कल क्या थे?
यह सोच-सोचकर
कल कैसे गढ़ पाएँगे?
.
दादा चढ़े
हिमालय पर
क्या हम भी कदम बढ़ाएँगे?
.
समय
सवाल कर रहा
मिलकर उत्तर दें
.
चुप रहने से
प्रश्न न हल
हो पाएँगे।
७-२-२०१५
***
छंद सलिला :
ताण्डव छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, ताण्डव, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, मधुभार,माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
*
तांडव रौद्र कुल का बारह मात्रीय छंद है जिसके हर चरण के आदि-अंत में लघु वर्ण अनिवार्य है.
उदाहरण:
१. भर जाता भव में रव, शिव करते जब ताण्डव
शिवा रहित शिव हों शव, आदि -अंत लघु अभिनव
बारह आदित्य मॉस राशि वर्ण 'सलिल' खास
अधरों पर रखें हास, अनथक करिए प्रयास
२. नाश करें प्रलयंकर, भय हरते अभ्यंकर
बसते कंकर शंकर, जगत्पिता बाधा हर
महादेव हर हर हर, नाश-सृजन अविनश्वर
त्रिपुरारी उमानाथ, 'सलिल' सके अब भव तर
३. जग चाहे रहे वाम, कठिनाई सह तमाम
कभी नहीं करें डाह, कभी नहीं भरें आह
मन न तजे कभी चाह, तन न तजे तनिक राह
जी भरकर करें काम, तभी भला करें राम
३०.१.२०१४
बिहार और कायस्थ
बंगाल से बिहार का अलग होना और राष्ट्र भाषा हिंदी के लिए आन्दोलन व हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने वाले कायस्थ ही हैं :-
राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के आरंभिक बिहारी नेता यथा महेश नारायण, सच्चिदानन्द सिन्हा एवं अन्य सभी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति ‘सचेत’ उदासीन भाव रखते हुए बंगाल से बिहार को अलग करने के आंदोलन से गहरे जुड़े थे। बिहार के नवजागरण का एक अत्यंत रोचक तथ्य है कि सन् १९१२ से पहले प्रतिक्रियावादी जमींदार वर्ग कांग्रेस अर्थात् राष्ट्रीय आंदोलन के साथ है और बंगाल से बिहार के पृथक्करण के विरोध में है जबकि प्रगतिशील मध्यवर्ग पृथक्करण के तो पक्ष में है लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति उदासीन है। बल्कि कई बार यह प्रगतिशील तबका अपनी ‘राजभक्ति’ भी प्रदर्शित करता है।
हसन इमाम ने कहा कि महेश नारायण ‘बिहारी जनमत के जनक’ हैं तो सिन्हा ने उन्हें ‘बिहारी नवजागरण का जनक’ कहा। कहना न होगा कि यह नवजागरण बिहार के पृथक्करण की शक्ल में था। महेश नारायण के बड़े भाई गोविंद नारायण कलकत्ता विश्वविद्यालय में एम. ए. की डिग्री पानेवाले पहले बिहारी थे। उनके ही नेतृत्व में बिहार में सर्वप्रथम राष्ट्रभाषा का आंदोलन आरंभ किया गया था और यह उन्हीं की प्रेरणा का फल था कि हिंदी का प्रवेश उस समय स्कूलों और कचहरियों में हो सका।
बंगाल से बिहार के पृथक्करण में महेश नारायण, डा. सच्चिादानंद सिन्हा, नंदकिशोर लाल, परमेश्वर लाल, राम बहादुर कृष्ण सहाय, भगवती सहाय तथा आरा के हरवंश सहाय समेत लगभग तमाम लोग, जिनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण कही जा सकती है, जाति से कायस्थ थे और अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों में उनकी जाति अग्रणी थी। सुमित सरकार(बंगाली कायस्थ ) ने बंगालियों के प्रभुत्त्व को चुनौती देते बिहार की कायस्थ जाति के लोगों के द्वारा पृथक बिहार हेतु आंदोलन का नेतृत्त्व करने की बात पर प्रकाश डाला है। यह अकारण नहीं था कि १९०७ में महेश नारायण के निधन के बाद डा. सच्चिदानंद सिन्हा ने बंगालियों के प्रभुत्त्व को तोड़नेवाले नेतृत्त्व की अगुआई की और अंततः इस जाति ने बंगाली प्रभुत्त्व को समाप्त कर अपनी प्रभुता कायम कर ली। इस वर्ग की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा ने एक बार पुनः बिहार से उड़ीसा को अलग करने का ‘साहसिक’ कार्य किया। डा. अखिलेश कुमार ने अन्यत्र डा. सच्चिदानंद सिन्हा की उस भूमिका को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि वे उड़ीसा के पृथक्करण के भी प्रमुख हिमायती थे। शिक्षित बिहारी युवकों ने महसूस किया था कि अपना अलग प्रांत नहीं होगा तो उनका कोई भविष्य नहीं है। इन युवकों में अधिकतर कायस्थ थे। अतएव वे अलग बिहार प्रांत बनाने के आंदोलन में स्वाभाविक रूप से कायस्थ जाति के लोग ही आगे आए। जाहिर है, रोजगार एवं अवसर की तलाश की इस मध्यवर्गीय लड़ाई को सच्चिदानंद सिन्हा ने एक व्यापक आधार प्रदान करने हेतु ‘बिहारी पहचान’ एवं ‘बिहारी नवजागरण’ की बात ‘गढ़ी’। उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा है, ‘सिर्फ खुद बिहारियों को छोड़कर बाकी लोगों में बिहार का नाम भी लगभग अनजान था।’ आगे उन्होंने लिखा, ‘पिछली सदी के ९० के दशक के प्रारंभ में मैं जब एक छात्र के रूप में लंदन में था, तब मुझे जबरन इस ओर ध्यान दिलाया गया। तभी मैंने यह दर्दनाक और शर्मनाक खोज की कि आम बर्तानवी के लिए तो बिहार एक अनजान जगह है ही, और यहां तक कि अवकाशप्राप्त आंग्ल-भारतीयों के बहुमत के लिए भी बिहार अनजाना ही है। …मेरे लिए आज के बिहारियों को यह बताना बड़ा कठिन है कि उस वक्त मुझे और कुछ दूसरे उतने ही संवेदनशील बिहारी मित्रों को कितनी शर्मिंदगी और हीनता महसूस हुई जब हमें महसूस हुआ कि हम ऐसे लोग हैं जिनकी अपनी कोई अलग पहचान नहीं है, कोई प्रांत नहीं है जिसको वे अपना होने का दावा करें, दरअसल उनकी कोई स्थानीय वासभूमि नहीं है जिसका कोई नाम हो। यह पीड़ादायक भावना उस वक्त और टीस बन गई जब सन् १८९३ में स्वदेश लौटने पर बिहार में प्रवेश करते-करते पहले ही रेलवे स्टेशन पर एक लंबे-तगड़े बिहारी सिपाही के बैज पर ‘बंगाल पुलिस’ अंकित देखा। घर लौटने की खुशियां गायब हो गईं और मन खट्टा हो गया। …पर सहसा ख्याल आया कि बिहार को एक अलग और सम्मानजनक इकाई का दर्जा दिलाने के लिए, जिसकी देश के अन्य महत्वपूर्ण प्रांतों की तरह अपनी एक अलग पहचान हो, मैं सब कुछ करने का संकल्प लूं जो करना मेरे बूते में है। एक शब्द में कहूं तो यही मेरे जीवन का मिशन बन गया और इसको हासिल करना मेरे सार्वजनिक क्रियाकलापों की प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत।’
***
सामयिक कविता:
रंग-बिरंगे नेता करते बात चटपटी.
ठगते सबके सब जनता को बात अटपटी.
लोकतन्त्र को लोभतंत्र में बदल हँस रहे.
कभी फाँसते हैं औरों को कभी फँस रहे.
ढंग कहो, बेढंग कहो चल रही जंग है.
हर चहरे की अलग कहानी, अलग रंग है.
***
हर चेहरे की अलग कहानी, अलग रंग है.
अलग तरीका, अलग सलीका, अलग ढंग है...
यह नेता भैंसों को ब्लैक बोर्ड बनवाता.
कुर्सी पड़े छोड़ना, बीबी को बैठाता.
घर में रबड़ी रखे मगर खाता था चारा.
जनता ने ठुकराया अब तडपे बेचारा.
मोटा-ताज़ा लगे, अँधेरे में वह भालू.
जल्द पहेली बूझो नाम बताओ........?
*
भगवा कमल चढ़ा सत्ता पर जिसको लेकर
गया पाक बस में, आया हो बेबस होकर.
भाषण लच्छेदार सुनाये, काव्य सुहाये.
धोती कुरता गमछा धारे सबको भाये.
बरस-बरस उसकी छवि हमने विहँस निहारी.
ताली पीटो, नाम बताओ-...
*
गोरी परदेसिन की महिमा कही न जाए.
सास और पति के पथ पर चल सत्ता पाए.
बिखर गया परिवार मगर क्या खूब सम्हाला?
देवरानी से मन न मिला यह गड़बड़ झाला.
इटली में जन्मी, भारत का ढंग ले लिया.
बहू दुलारी भारत माँ की नाम? .........
*
छोटी दाढीवाला यह नेता तेजस्वी.
कम बोले करता ज्यादा है श्रमी-मनस्वी.
नष्ट प्रान्त को पुनः बनाया, जन-मन जीता.
मरू-गुर्जर प्रदेश सिंचित कर दिया सुभीता.
गोली को गोली दे, हिंसा की जड़ खोदी.
कर्मवीर नेता है भैया ...
*
माया की माया न छोड़ती है माया को.
बना रही निज मूर्ति, तको बेढब काया को.
सत्ता प्रेमी, कांसी-चेली, दलित नायिका.
नचा रही है एक इशारे पर विधायिका.
गुर्राना-गरियाना ही इसके मन भाया.
चलो पहेली बूझो, नाम बताओ...
*
मध्य प्रदेशी जनता के मन को जो भाया.
दोबारा सत्ता पाकर भी ना इतराया.
जिसे लाडली बेटी पर आता दुलार है.
करता नव निर्माण, कर रहा नित सुधार है.
दुपहर भोजन बाँट, बना जन-मन का तारा.
जल्दी नाम बताओ वह ............. हमारा.
*
बंगालिन बिल्ली जाने क्या सोच रही है?
भय से हँसिया पार्टी खम्बा नोच रही है.
हाथ लिए तृण-मूल, करारी दी है टक्कर.
दिल्ली-सत्ताधारी काटें इसके चक्कर.
दूर-दूर तक देखो इसका हुआ असर जी.
पहचानो तो कौन? नाम ...
*
तेजस्वी वाचाल साध्वी पथ भटकी है.
कौन बताये किस मरीचिका में अटकी है?
ढाँचा गिरा अवध में उसने नाम काया.
बनी मुख्य मंत्री, सत्ता सुख अधिक न भाया.
बड़बोलापन ले डूबा, अब है गुहारती.
शिव-संगिनी का नाम मिला, है ...
*
डर से डरकर बैठना सही न लगती राह.
हिम्मत गजब जवान की, मुँह से निकले वाह.
घूम रहा है प्रान्त-प्रान्त में नाम कमाता.
गाँधी कुल का दीपक, नव पीढी को भाता.
जन मत परिवर्तन करने की लाता आँधी.
बूझो-बूझो नाम बताओ ...
*
बूढा शेर बैठ मुम्बई में चीख रहा है.
देश बाँटता, हाय! भतीजा दीख रहा है.
पहलवान है नहीं मुलायम अब कठोर है.
धनपति नेता डूब गया है, कटी डोर है.
शुगर किंग मँहगाई अब तक रोक न पाया.
रबर किंग पगड़ी बाँधे, पहचानो भाया.
*
७-२-२०१०
***